भारतकोश
उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा

स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished364 पृष्ठ

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उपोद्घातप्रकरणम् ३ कर उसके साथ वेदान्त वाक्यों ( ज्ञानकाण्ड ) की संगति ( सम्बन्ध ) तथा उनकी ( वेदान्त वाक्यों की ) कर्मकाण्ड वाक्यों से अगतार्थता ( भिन्नार्थप्रतिपादकता ) और अनन्यशेषता ( किसी दूसरे का अंगभूत न होना ) को इस द्वितीय श्लोक के द्वारा प्रस्तुत कर रहे हैं। अभिप्राय यह है कि विवेक-वैराग्य-शमादि साधनों से सम्पन्न मुमुक्षु व्यक्ति के लिये मोक्षप्राप्ति में उपायभूत ब्रह्मविद्या का प्रतिपादन करने के उद्देश से वेद का ज्ञानकाण्ड प्रवृत्त हो रहा है। उपर्युक्त साधन-सम्पत्ति का लाभ, कर्मकाण्डोक्त कर्मों के अनुष्ठान से बुद्धि [ अन्तःकरण ] की शुद्धि का होना है। नित्य-निरतिशय पुरुषार्थ ( मोक्ष ) प्राप्ति की कामना से उसके उपाय का अन्वेषण सर्वत्र करने पर भी जब साधक को वह नहीं मिलता, तब वेद में उसे ( उस उपाय को ) बताते हैं। वह उपाय समग्र वेद का वास्तविक तात्पर्य आत्मा के प्रतिपादन में ही मिलता है।१ आत्मतत्त्वज्ञान ही मोक्ष का उपाय है।२ उस आत्मतत्त्वज्ञान का उपदेश, अशुद्ध ( अपवित्र ) अन्तःकरण वाले व्यक्ति को करना उचित नहीं है, क्योंकि आत्मतत्त्वज्ञान के ग्रहण करने का सामर्थ्य उसमें नहीं होता।३ अतः ज्ञानोत्पत्ति में प्रतिबन्धक उसके दुरितक्षय के लिये वेद के कर्मकाण्ड भाग में नित्य कर्मों को प्रथमतः बताया गया है। वह ( कर्मकाण्ड भाग ) संयोग ( फल ) रूप ( द्रव्य-देवता ) चोदना और समाख्या ( नाम ) के एकरूप होने के कारण सर्वशाखाप्रत्ययन्यायसे४ इतिकर्तव्यतारूप अंगकलापपरिमाण, अधिकारी, विशेषोक्ति के द्वारा कर्म के अनुष्ठान की सबको शिक्षा देता है।५ धर्म ( कर्म ) नुष्ठान से दुरित क्षय होता है। अतः परम्परया कर्मानुष्ठान का उपयोग परमपुरुषार्थ की प्राप्ति में होता है।६ 'कर्मणा पितृलोकः' इत्यादि श्रुति से प्रतिपादित पितृलोक आदि की प्राप्ति होना कर्म का मुख्य फल नहीं है, वह तो आनुषङ्गिक फल है। पितृलोकादि फल तो कालान्तर से क्षीण हो जाते हैं। अतः क्षय ( क्षीणता ) आदि दोष से दूषित होने के कारण वे हेय हैं। उन्हें मुख्य फल नहीं कह सकते। यदि उन्हें मुख्य फल मानने का आग्रह ही हो तो भी वे चित्तशुद्धि में प्रतिबन्धक नहीं हैं।७ उसी प्रकार काम्यकर्मों का विधान पुरुष को अपनी ओर आकर्षित कर उसे स्वाभाविक कुप्रवृत्ति की ओर से निवृत्त करने के लिये है। एवं च मोक्ष के उपायस्वरूप तत्त्वज्ञान की प्राप्ति के लिये चित्तशुद्धि प्रथम अपेक्षित होती है। अतः चित्तशुद्धि के लिये प्रथमतः कर्म- विधान प्रवृत्त होता है, तब पश्चात् ज्ञानोपदेश किया जाता है। कर्मकाण्ड और ज्ञानकाण्ड में अर्थ दृष्ट्या ( फल की दृष्टि से ) हेतु-हेतुमद्भाव होने से यह क्रम (पौर्वापर्यसम्बन्ध) बताया गया है। ज्ञानकाण्ड का विषय साक्षात् परमपुरुषार्थरूप फल है। जिसकी प्राप्ति कर्म से नहीं होती। इससे ज्ञानकाण्ड की अगतार्थता व अनन्यशेषता भी स्पष्ट हो जाती है ॥ २ ॥ कर्माणि देहयोगार्थं देहयोगे प्रियाप्रिये । ध्रुवे स्यातां ततो रागो द्वेषश्चैव ततः क्रियाः ॥ ३ ॥ कर्माणीति—देह से सम्बन्ध प्राप्ति में किये हुये कर्म कारण होते हैं, और देह के साथ सम्बन्ध होने पर निश्चय हो प्रिय तथा अप्रिय की अनुभूति होती है। उससे राग और द्वेष होते हैं, तब उनसे प्रवृत्त होकर पुनः क्रियाएँ (कर्म) होतो हैं ॥ ३ ॥ १. 'सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति ।'—[ कठ० उ० २।१५ ], 'सर्वे वेदा यत्रैकं भवन्ति ...........स मानसीन आत्मा जनानाम् ।'— [ तै० आ० ३।११।१ ], 'वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यः ।'—[ भ० गी० १५।१५ ] । २. 'तमेव विदित्वाति मृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय ।'—[ श्वे० उ० ३।८ ] । ३. 'नाविरतो दुश्चरितान्नाशान्तो नासमाहितः । नाशान्तमानसो वापि प्रज्ञानेनैनमाप्नुयात् ।'—[ कठ० उ० २।२४ ] । ४. [ जै० सू०-२।४।९ ] । ५. 'धर्मेण पापमपनुदति'—[ महाना० उ० ७९ ], 'न कर्म लिप्यते नरे'—[ ई० उ० २।११ ], वहीं पर 'अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा०' । ६. [ बृ० उ० १।५।१६ ] । ७. 'नित्येषु शुद्धिप्राधान्याद् भोगोऽप्यप्रतिबन्धकः । भोगं भङ्गुरमीक्षन्ते बुद्धिशुद्धिस्तु रोचते ॥' सं० वाति० १।१३१-- [ सुरेश्वराचार्य ]