उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)
Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary
आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा
स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंउपदेशसाहस्री हृदयस्पर्शिनी कर्मकाण्ड प्रतिपादित नानाविद्यकर्मानुष्ठान से होनेवाली बुद्धिशुद्धि के अनन्तर ब्रह्मजिज्ञासु के प्रति ब्रह्मविद्या का उपदेश देने के लिये वेदान्त की प्रवृत्ति है, यह पूर्वश्लोक के द्वारा बताया गया है। किन्तु मुमुक्षु को उसकी अपेक्षित मोक्षप्राप्ति यदि कर्म से ही हो जाय तो ब्रह्मविद्या की कोई आवश्यकता नहीं, तब तदङ्गत्वेन (मोक्षप्राप्ति के अंगरूप से) वेदान्त की प्रवृत्ति का होना कैसे उपपन्न होगा? शंका करने वाले किसो कर्मजडव्यक्ति का अभिप्राय यह है कि लोक- व्यवहार में हम देखते हैं कि किये गये कर्म ही कर्ता को फल देते हैं। जैसे पिता के द्वारा उपदिष्ट कर्मों से इष्ट फल तथा उसके द्वारा निषिद्ध किये गये कर्मों से अनिष्ट फल, और ऐसे भी कर्म हैं जो न उपदिष्ट हैं और न निषिद्ध ही हैं, केवल दैववशात् हो जाते हैं, उनसे इष्टानिष्ट दोनों प्रकार के फल प्राप्त होते हैं। वैसे ही वेद से विहित कर्मों का इष्टफल और वेद से निषिद्ध किये गये कर्मों का अनिष्ट फल तथा व्यामिश्र (विहित-प्रतिषिद्ध) कर्मों से व्यामिश्र (इष्टानिष्ट) फल होगा। इसी अभिप्राय का शास्त्रवचन भी है—"अनिष्टमिष्टं मिश्रं च त्रिविधं कर्मणः फलम्"—[ भ० गी० १८–१२]। एवं च कर्म से फल होना चाहिये। उस मोक्षरूप फल के लिये विद्या (ज्ञान) की आवश्यकता नहीं और न उनके लिये मुमुक्षु को ज्ञानकाण्ड के विचार करने की आवश्यकता है। किन्तु अक्षयफल के लिये चातुर्मास्यादि किसी कर्म का ही अनुष्ठान करना चाहिये। इस आशंका का निरास इस तृतीय व चतुर्थ श्लोक के द्वारा किया गया है। कर्मानुष्ठान करनेवाले अज्ञ व्यक्ति को कर्म के द्वारा शरीरादि- परम्परया पुनः पुनः संसाररूप अनर्थ की प्राप्ति अवश्यंभावी रहने से कर्मों को मोक्षप्राप्ति का साधन (उपाय) नहीं कहा जा सकता। जाति, आयु और भोग—ये कर्म के फल हैं, इनका होना देहसंबंध के विना संभव नहीं। अतः यह कहना होगा कि कर्म तो देह से सम्बन्ध कराने के लिये ही होते हैं। देह सम्बन्ध होने पर प्रिय अप्रिय, सुख-दुःख आदि संसार का होना अनिवार्य है।१ तदनन्तर उनके साधनों के प्रति वासनाएँ (राग-द्वेष) भी होंगी। उस वासनात्मकनिमित्त से वाचिक, मानसिक, शारीरिक क्रियाएँ होंगी ॥ ३ ॥ धर्माधर्मौ ततोऽज्ञस्य देहयोगस्तथा पुनः । एवं नित्यप्रवृत्तोऽयं संसारश्चक्रवद्भृशम् ॥ ४ ॥ धर्माधर्माविति—उन कर्मों के अनुष्ठान से अज्ञानी व्यक्ति को धर्माधर्म की प्राप्ति होती है, उससे पुनः शरीर की प्राप्ति होती है, इस रीति से यह संसार, चक्र की तरह सतत चल रहा है ॥ ४ ॥ हृदयस्पर्शिनी प्रत्यगात्मतत्त्व ब्रह्म को न जानने के कारण अहंकार के अधीन रहनेवाला अज्ञ व्यक्ति विहितप्रतिषिद्ध कर्मों को करता रहता है। उनसे धर्माधर्म की निष्पत्ति होती है, उनसे पुनः शरीर की प्राप्ति होती है। इस प्रकार जन्म-मरण-कर्मकरण तत्फलभोगलक्षणसंसार, कुलाल के चक्र की तरह अनादिकाल से निरन्तर चल रहा है यह सभी देख रहे हैं। अतः कर्मों के ऐहिकफल अनित्य हुआ करते हैं यह अनुभव सभी को है। उसी तरह पारलौकिकफलसम्पादक कर्म भी, कर्म होने के नाते उनके फल भी नित्य कैसे हो सकते हैं ? अर्थात् उनके फल भी अनित्य हैं। इसके समर्थन में वस्तुबलावलम्बी श्रुति कह रही है—'तद्यथेहकर्मजितो लोकःक्षीयते, एवमेवामुत्र पुण्यजितोलोकःक्षीयते'। अतः २अर्थवादश्रुति का अवलम्ब लेकर कर्मजडव्यक्ति का कर्मफल को नित्य समझ बैठना उचित नहीं हैं ॥ ४ ॥ अज्ञानं तस्य मूलं स्यादिति तद्धानमिष्यते । ब्रह्मविद्याऽत आरब्धा ततो निःश्रेयसं भवेत् ॥ ५ ॥ अज्ञानमिति—अज्ञान ही उस संसार का मूल है, अतः उसका त्याग करना सभी को अभीष्ट है, इसलिए ब्रह्मविद्या का आरम्भ किया जा रहा है, उसीसे वास्तविक कल्याण हो सकता है ॥ ५ ॥ १. ‘न वै सशरीरस्य सतः प्रियाप्रिययोरपहतिरस्ति ।’—[छां० उ० ८।१२।१] २. ‘अक्षय्यं ह वै चातुर्मास्ययाजिनः सुकृतम् ।'— [श० ब्रा० २।६।३।१]