उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)
Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary
आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा
स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१२ उपदेशसाहस्री चाहिये । ‘अविशेषेऽपि’ यहाँ ‘अपि’ के कहने से द्वितीयपक्ष का निरसन कहा जा रहा है—अनात्मा में भी वह असती (अविद्यमान) अविद्या है, अर्थात् उसका अस्तित्व (सत्ता) नहीं है। अतः अविद्या के कार्यरूप अनात्म पदार्थ भी अविद्यो- त्पत्ति के हेतु कैसे हो सकते हैं? शुक्ति-रजत का जो दृष्टान्त दिया गया है, वह प्रस्तुत स्थल में संगत नहीं है, क्योंकि शुक्ति- रजत आदि में अविद्या के शक्तिविशेष रजतादिविक्षेपशक्तिरूप उपादानांश की ही ज्ञान के द्वारा निवृत्ति मानी गई है। उस जैसी अनन्त शक्तियों से विशिष्ट मूलाज्ञान (मूलाविद्या) तो वहाँ रहता ही है, उस कारण पुनः कालान्तर में शुक्ति-रजत भ्रम होने लगता है ॥ १८ ॥ न चेद् भूयः प्रसूयेत कर्ता भोक्तेति धीः कथम् । सदस्मीति च विज्ञाने तस्माद्विद्याऽसहायिका ॥ १९ ॥ नचेदिति—जब अविद्या पुनः उत्पन्न ही नहीं हो पाती, तब 'मैं कर्ता हूँ, भोक्ता हूँ, यह बुद्धि कैसे हो सकती है ? अतः 'मैं सत् हूँ' इस ज्ञान के होने में विद्या (ज्ञान) को अन्य किसी की सहायता की आवश्यकता नहीं होती ॥ १९ ॥ हृदयस्पार्शिनी आत्मा या अनात्मा से अविद्या की उत्पत्ति न हो सकने के कारण अर्थात् निरन्तर 'ब्रह्मैव अहमस्मि' इत्याकारक विशिष्ट ज्ञान (अपरोक्षानुभव) के होते रहनेपर कर्माधिकारप्राप्ति में निमित्तभूत 'कर्ता, भोक्ता हूँ' यह ज्ञान उसे कैसे हो सकेगा ? अर्थात् कभी हो ही नहीं सकता। श्लोक में 'च' कार का प्रयोग 'कर्तृत्व-भोक्तृत्वबुद्धि पारमार्थिक (वास्तविक) नहीं है', बताने के लिये किया गया है। कर्तृत्व-भोक्तृत्वबुद्धि (ज्ञान) यदि वास्तविक होती तो विद्या (ज्ञान) से उसकी निवृत्ति न हो पाती, तब तो कभी मोक्ष होगा ही नहीं । निष्कर्ष यह है कि 'अहं ब्रह्मास्मि' यह ज्ञान होने पर कर्मप्रवृत्ति के लिये अवकाश ही नहीं रहता। अतः कहना होगा कि विद्वान् (ज्ञानी) को कर्म में अधिकार नहीं है। जबकि विद्या (ज्ञान) के उत्पन्न होने पर कर्म निरवकाश हो जाता है (कर्म का होना संभव नहीं रहता) तब बिना किसी की सहायता के केवल (अकेली) विद्या ही कैवल्य (मोक्ष) की हेतु कही जाती है ॥ १९ ॥ अत्यरेचयदित्युक्तो न्यासः श्रुत्याऽत एव हि । कर्मभ्यो मानसान्तेभ्य एतावदिति वाजिनाम् ॥ २० ॥ अमृतत्त्वं श्रुतं यस्मात् त्याज्यं कर्म मुमुक्षुभिः । अग्निष्टोमवदित्युक्तं तन्नेदमभिधीयते ॥ २१ ॥ अतीति, अमृतत्वमिति—अतएव भगवती श्रुति ने सत्य से लेकर मानस तक सभी कर्मों की अपेक्षा संन्यास को उत्कृष्ट बताया है। 'एतावद्धचवरे खल्वमृतत्वम्' इस बृहदारण्यक श्रुति ने भी अमृतत्व को उत्कृष्ट बताया है। अतः मुमुक्षुजनों को (ज्ञानी मुमुक्षुओं को) कर्म का त्याग ही करना चाहिये। अर्थात् कर्मानुष्ठान में आसक्ति रखकर समय का अपव्यय नहीं करना चाहिये। समुच्चयवादी ने अग्निष्टोम याग के समान ज्ञान को भी कर्म की अपेक्षा का प्रतिपादन जो किया था, उसके विषय में अब कहते हैं ॥ २०-२१ ॥ हृदयस्पार्शिनी विद्या (ज्ञान) की सहकारिनिरपेक्षता को पूर्व श्लोक के द्वारा युक्ति से बताया था । उसी को अब श्रौत (वैदिक) लिङ्ग के द्वारा बता रहे हैं । तैत्तिरीयोपनिषत् में 'सत्यं परं सत्यम्' उपक्रम कर सत्य, तप आदि मानसान्त कर्मों को श्रेयःसाधन बताकर 'तानि वा एतान्यवराणि तपांसि' के द्वारा उनका फल्गु (व्यर्थ) फल है, ऐसी निन्दा की गई है। तदनन्तर 'न्यास इति ब्रह्मा' इस श्रुतिवाक्य के द्वारा बताये गये तत्त्वज्ञानानन्तरङ्गभूत संन्यास की 'न्यास एवात्यरेचयत्' कहकर स्तुति की