भारतकोश
उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा

स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished364 पृष्ठ

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उपोद्घातप्रकरणम् ११ हृदयस्पशिनी सोलहवे श्लोक में अप्रामाण्यापत्ति के दो विकल्प निर्दिष्ट किये गये थे। उनमें से प्रथम विकल्प (पक्ष) का तो खण्डन हो चुका। अब द्वितीय विकल्प का भी इष्टापत्ति कहकर खण्डन कर रहे हैं। 'सत्यस्य सत्यम्' इत्यादि श्रुति में 'नेति नेति' इस वीप्सार्थक श्रुति के द्वारा मिथ्यादृष्टि से (आत्माऽऽत्मीयभाव से) गृहीत देहादि अशेष पदार्थों का निषेध करते- करते प्रतिषेधावधिभूत आत्मा ही अवशिष्ट रह जाता है। अर्थात् पराक् अर्थों का निषेध करते करते निषेधावधि के रूप में प्रत्यगर्थ ही बचा रहता है, जिससे प्रत्यक् तत्त्व का बोध हो जाता है। अर्थात् अविशेषात्मबोध के लिये एक अवधि तक निषेध किया गया है। 'अविशेषात्मबोध' का अर्थ है- निर्विशेषचित्सदानन्दस्वभावाविर्भाव। 'अविशेषश्चासौ आत्मा च, तस्य बोधः, तदर्थम् अविशेषात्मबोधार्थम्' । इस प्रकार आत्मज्ञान होने पर कर्मानुष्ठान में अधिकार दिलाने वाला कारणभूत देहाभिमान (देह आदि में आत्माभिमान) जिस अविद्या के कारण होता है, उस अविद्या की निवृत्ति अपने परिकर सहित हो जाती है। अतः 'निमित्ता- भावान्नैमित्तिकाभावः' इस न्याय के अनुसार आत्मज्ञानी के लिये कर्मविधि की प्रतिपत्ति नहीं है। उसकी दृष्टि में कर्मकाण्ड की फलवद्विज्ञानजनकता न होने से कर्मकाण्ड भाग का अप्रामाण्य क्रोधशून्य की दृष्टि में अभिचार विधिशास्त्र के तुल्य उचित ही है। निष्कर्ष यह है कि आत्मज्ञान के पश्चात् मूलाविद्या के न रहने के कारण, तदुत्पन्न अभिमान के न होने से कर्मकाण्ड में प्रवृत्ति ही नहीं होगी, इसलिये उस दशा में कर्मकाण्डविधि के प्रवर्तक न हो पाने से उसका अप्रामाण्य तो इष्ट ही है ॥१७॥ निवृत्ता सा कथं भूयः प्रसूयेत प्रमाणतः । असत्येवाविशेषेऽपि प्रत्यगात्मनि केवले ॥ १८ ॥ निवृत्तेति-अविद्या की निवृत्ति प्रमाण के द्वारा कर देने पर वह पुनः कैसे उत्पन्न हो सकती है? वह तो निर्विशेष विशुद्ध आत्मा में मिथ्या ही है ॥ १८ ॥ हृदयस्पशिनी प्रत्यक् तत्त्वज्ञान से अज्ञान की निवृत्ति एक बार होने पर भी पुनः कालान्तर में उत्पन्न होकर वह अपना कार्य क्यों नहीं करेगी? एवञ्च कर्माधिकार में हेतुभूत अविद्या के संभव होने से कर्म-प्रवृत्ति बराबर चलती ही रहेगी। लोकव्यवहार में देखा जाता है कि शुक्ति के यथार्थरूप का ज्ञान होने पर अज्ञान की निवृत्ति हो जाने पर भी पुनः कुछ समय के पश्चात् रजतभ्रम होता ही है। इस शंका का समाधान प्रस्तुत अठारहवें श्लोक के द्वारा किया जा रहा है। प्रमाणरूप अग्नि के द्वारा दग्ध हुई वह अविद्या पुनः अपने कार्य को कैसे उत्पन्न करेगी? मृत और दग्ध हुई भार्या पुनः प्रसव नहीं करती। एक अविद्या के नष्ट होने पर भी अन्य (दूसरी) अविद्या उत्पन्न होगी कहें, तो विचार करना होगा कि वह उत्पत्ति बिना किसी निमित्त के होगी या किसी निमित्त से होगी? प्रथम पक्ष तो ठीक नहीं है, क्योंकि अकारणकार्योत्पत्ति कहने पर अतिप्रसङ्ग होगा। द्वितीय पक्ष में क्या आत्मा उसकी उत्पत्ति में निमित्त होगा या अनात्मा? प्रथम पक्ष में विचार करें तो अविशेष (केवल), सर्वान्तर्यामी परमार्थवस्तुभूत प्रत्यगात्मा में उस अविद्या का अस्तित्व ही नहीं रहता। ऐसी स्थिति में असहाय कूटस्थ आत्मा में कर्तृत्व का होना संभव नहीं है। अर्थात् वह अविद्यान्तर का उत्पादक नहीं हो सकता। अविद्यान्तर की सहायता से उसे अविद्योत्पत्ति में निमित्त कहें तो अन्योन्याश्रय होगा तथा अनवस्था भी प्रसक्त होगी। श्लोक में आये हुए 'अविशेषे और केवले' इन दो पदों में व्याख्यान-व्याख्येयभाव समझना चाहिये। अथवा 'अविशेषे' कहने पर मूर्यादि कतिपय विशेषों के न रहने पर भी अन्य विशेषों की आशंका हो सकती है। इसलिये 'केवले' कहा गया है। यदि श्लोक में 'केवले' पद को ही रखते तो आत्मा के एकाकी रहने पर भी उसमें प्रयत्नादि- गुणसम्बन्धित्वविशेष के होने की आशंका हो सकती है। अतः उसके निराकरणार्थ 'अविशेषे' पद दिया गया है, यह समझना