उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)
Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary
आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा
स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें११८ उपदेशसाहस्री आस्योदकवत्।' 'चक्षुः तैजसं रूपादिषु रूपस्यैव व्यञ्जकत्वात् दीपवत्।' 'त्वग् वायवीया स्पर्शादिषु स्पर्शस्यैव अभिव्यञ्जकत्वात् व्यजनवायुवत्।' 'श्रोत्रम् आकाशीयम् शब्दादिषु शब्दस्यैव व्यञ्जकत्वात् वेणुदिवरवत्।' इन अनुमानों से इन्द्रियों का भौतिकत्व सिद्ध है, अतः घट-पटादि के समान इन्द्रियों का अनात्मत्व स्पष्ट है ॥ २ ॥ बुद्धयर्थान्याहुरेतानि वाक्पाण्यादीनि कर्मणे । तद्विकल्पार्थमन्तःस्थं मन एकादशं भवेत् ॥३॥ बुद्धयर्थानीति—घ्राण, रसना, चक्षु, त्वक् और श्रोत्र इन पाँच इन्द्रियों को ज्ञान का साधन कहते हैं, और वाक्, पाणि, पाद, पायु और उपस्थ—इन पाँच इन्द्रियों को कर्म का साधन कहते हैं। तथा इनके विकल्प के लिये आभ्यन्तर मन को ग्यारहवाँ इन्द्रिय कहा गया है ॥ ३ ॥ हृदयस्पर्शिनी इन्द्रियों का करणत्व (साधनत्व) अनुमान से भी सिद्ध है, अतः उन्हें 'आत्मा' नहीं कहा जा सकता । अनुमान प्रयोग इस प्रकार होगा—'इन्द्रियाणि, न आत्मानः, करणत्वात्, कुठारवत्' इति । अब उनके कार्यों को देखने से उनकी एकादश संख्या का निर्धारण किया जा रहा है। ये घ्राणादि इन्द्रियाँ ज्ञान (बुद्धि) के लिये होने से ज्ञान की साधना (करण) कही गयी हैं। तथा वाक्, पाणि (हाथ), पाद (पैर), पायु (मलेन्द्रिय), उपस्थ (मूत्रेन्द्रिय) ये पाँचों इन्द्रियाँ क्रमशः वचन, आदान (ग्रहण), गमन, विसर्ग (त्याग), और आनन्दरूप कर्मों के लिये होने से वे कर्म की साधन (करण) कही गयी हैं। उन दसों इन्द्रियों का युगपत् (एकसाथ) विषयसन्निधान होने पर क्रम से तत्तद् विषयों के ज्ञान का नियमन करने के लिये (विकल्पार्थ) जो एक अन्य इन्द्रिय माना जाता है, अर्थात् पूर्वोक्त दशसंख्याक इन्द्रियों की अपेक्षा जो एक अतिरिक्त एकादशवां (ग्यारहवां) अन्तःस्थ इन्द्रिय माना जाता है, उसे ही 'मन' कहते हैं। उसे अवश्य ही मानना होगा, क्योंकि आत्मा तो व्यापक है, उसका सभी इन्द्रियों के साथ निरन्तर समानरूप से सम्बन्ध है । यदि आत्मा और इन्द्रियों के सम्बन्ध (संयोग) से ही ज्ञान की उत्पत्ति कही जाय, तो प्रतिक्षण एक साथ ही (युगपत् ही) समस्त इन्द्रियजनित ज्ञान उत्पन्न होता रहता, परन्तु ऐसा होता नहीं। ऐसा न हो सकने में कारण 'मन' ही है। जिस इन्द्रिय के साथ मन का संयोग होता है, उसी इन्द्रिय के विषय का ज्ञान आत्मचैतन्य के द्वारा प्रकाशित होता है। मन का परिमाण 'अणु' माना गया है। उस कारण उसका (मन का) एक साथ (युगपत्) समस्त इन्द्रियों के साथ सम्बन्ध नहीं होता, अतएव उसे इन्द्रियजन्य ज्ञान के विकल्प का कारण (हेतु, निमित्त) कहा गया है। सर्वविध ज्ञानों के प्रति साधारण कारण के रूप में 'मन' को अवश्य ही मानना होगा। इस रीति से वह एकादशवाँ 'मन' भी साधन होने से इन्द्रियों के समान उसे भी अनात्मा ही समझना चाहिये ॥ ३ ॥ निश्चयार्था भवेद्बुद्धिस्तां सर्वार्थानुभाविनीम् । ज्ञाताऽऽत्मोक्तः स्वरूपेण ज्योतिषा व्यञ्जयन्सदा ॥४॥ निश्चयार्थेति—अन्तःकरण की निश्चयार्था वृत्ति को बुद्धि कहते हैं। तथा समस्त पदार्थों के अनुभव को कराने वाली उस बुद्धि को अपने स्वरूपभूत प्रकाश से सर्वदा अभिव्यक्त करनेवाले आत्मा को उस बुद्धि का ज्ञाता कहते हैं ॥ ४ ॥ हृदयस्पर्शिनी अब बौद्धों के मत का खण्डन करने के लिये बुद्धि का भी अनात्मत्व सिद्ध कर रहे हैं—'बुद्धिरपि न आत्मा, करणविशेषत्वात्, मनोवत्'—इस अनुमान से उसका अनात्मत्व स्पष्ट है। अब उसके स्वभाव को बताते हैं—जिस अन्तःकरणवृत्ति का प्रयोजन (फल) निश्चय (अर्थपरिच्छेद) करना है, उसे 'बुद्धि' कहते हैं। अर्थात् अन्तःकरण की निश्चयार्था वृत्ति को बुद्धि कहते हैं। वह निश्चय करने का साधन (करण) है। एवं च निश्चय का कारण (साधन) होने से उसे 'आत्मा' नहीं कह सकते। किञ्च अन्य (आत्मा) के द्वारा दृश्य (ज्ञेय) रहने से भी उसे आत्मा नहीं कह सकते । समस्त पदार्थों का अनुभव कराने वाली उस बुद्धि को अपने स्वरूपभूत प्रकाश से सर्वदा अभिव्यक्त करने वाला 'आत्मा' उसका ज्ञाता कहा जाता है। अतः आत्मा की ज्ञेय होने से बुद्धि भी 'आत्मा' नहीं है। यदि कोई कहे कि बुद्धि जैसी