उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)
Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary
आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा
स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंपार्थिवप्रकरणम् ११९ आत्मा के द्वारा ज्ञेय है, वैसे आत्मा भी किसी के द्वारा ज्ञेय होगा । उसका समाधान यह है कि प्रकाश, ज्ञान तो आत्मा का स्वरूप ही है। अतः वह किसी के द्वारा ज्ञेय नहीं है, वह तो स्वयंप्रकाश है। रूप और आलोक (प्रकाश) के समान भास्य और भासक का भेद रहने से भास्यरूप बुद्धि का भासक, उससे अन्य ही है, और वही आत्मा है ।। ४ ।। व्यञ्जकस्तु यथाऽऽलोको व्यङ्ग्यस्याकारतां गतः । व्यतिकीर्णोऽप्यसंकीर्णस्तद्वज्ज्ञः प्रत्ययैः सदा ॥५॥ व्यञ्जकस्त्विति-जैसे वस्तु (पदार्थ = विषय) के अभिव्यञ्जक (दीपक से होने वाला) प्रकाश, अपने व्यङ्ग्य विषय (वस्तु) के समान आकार वाला हो जाता है, किन्तु उसके साथ मिला हुआ प्रतीत होने पर भी वस्तुतः उससे मिलता नहीं है। उसी प्रकार चेतन आत्मा भी अपने प्रकाश्य प्रत्ययों से सर्वदा अलिप्त रहता है ॥ ५ ॥ हृदयस्पर्शिनो आत्मा को बुद्धि का प्रकाशक (भासक) मानने पर उस बुद्धि के संसर्ग से उसमें (आत्मा में) अशुद्धि आयेगी, किन्तु यह शंका ठीक नहीं है। जिस प्रकार विषय को प्रकाशित (अभिव्यक्त) करने वाला दीप का प्रकाश (दीपालोक) अपने घटादि व्यङ्ग्य विषय के समान आकार वाला हो जाता है, इस रीति से उसके साथ मिला हुआ (व्यतिकीर्ण, व्यामिश्र हुआ) प्रतीत होने पर भी वस्तुतः वह उससे मिला हुआ नहीं (असंकीर्ण, विविक्त-स्वभाव ही) रहता है, उसी तरह 'ज्ञ' (आत्मा, चेतन) भी अपने प्रकाश्य बुद्धिवृत्तियों (प्रत्ययों) से सर्वदा अलिप्त ही रहता है। अतः उसमें बुद्धिगत अशुद्धि के आने की कोई संभावना नहीं है। वह आत्मा नित्य शुद्ध ही है ॥ ५ ॥ स्थितो दीपो यथाऽयत्नतः प्राप्तं सर्वं प्रकाशयेत् । शब्दाद्याकारबुद्धीर्ज्ञः प्राप्तास्तद्वत्प्रपश्यति ॥६॥ स्थित इति - जिस प्रकार एक स्थान पर रखा हुआ दीपक अपने समीप स्थित सभी पदार्थों को बिना किसी प्रयत्न के ही प्रकाशित कर देता है, उसी प्रकार शब्द-स्पर्शादि के आकार में परिणत होकर प्राप्त हुई बुद्धिवृत्तियों को यह आत्मा साक्षी बना हुआ देखता रहता है ॥ ६ ॥ हृदयस्पर्शिनो यह आत्मा, बुद्धि आदि सभी पदार्थों से अत्यन्त विलक्षण और निर्व्यापार है, तो वह बुद्धि आदि का अवभासक कैसे होता है ? इस शंका का समाधान यह होगा कि जिस प्रकार एक स्थान पर स्थित हुआ दीपक, अपने समीप आये हुए सभी पदार्थों को बिना किसी प्रयत्न के प्रकाशित कर देता है, उसी प्रकार शब्दादि के आकार में परिणत होकर अपने समीप आयी हुई बुद्धिवृत्तियों का साक्षी मात्र रहने से उस आत्मा को उनका अवभासक कहा जाता है ॥ ६ ॥ शरीरेन्द्रियसंगात आत्मत्वेन गतां धियम् । नित्यात्मज्योतिषा दीप्तां विशिषन्ति सुखादयः ॥७॥ शरीरेन्द्रियेति - सुख-दुःखादि भी शरीर तथा इन्द्रियसंधात में आत्मत्व को प्राप्त हुई और नित्य आत्मज्योति से प्रकाशित होने वाली बुद्धि को ही विशेषित करते हैं, 'आत्मा' को नहीं। देहादि में आत्मत्व का अभिमान करने वाली बुद्धि है, उसी के ये सुख-दुःखादि धर्म हैं। अतः 'अहं सुखी' इत्यादि अनुभव के समय अहं-पदवाच्य बुद्धि ही सुख-दुःखादि से विशिष्ट होती है। आत्मा तो केवल उसका साक्षी मात्र है ॥ ७ ॥ हृदयस्पर्शिनो तथापि जिज्ञासा अभी शान्त नहीं हो पा रही है, क्योंकि 'अहं सुखी, अहं दुःखी' इस प्रकार से सुखित्वादि का स्फुरण होते रहने से उस आत्मा में शुद्धि कैसे रह सकती है? एवञ्च आत्मा की शुद्धता अभी सिद्ध नहीं हो पा रही