भारतकोश
उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा

स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished364 पृष्ठ

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पृष्ठ 146

१२० उपदेशसाहस्री है। यह जिज्ञासा इस प्रकार समझने से शान्त हो जायेगी। सुख-दुःखादि भी आत्मा के धर्म नहीं हैं, वे भी देहादि में आत्मत्व का अभिमान करनेवाली बुद्धि के ही धर्म हैं। अतः जिस समय यह अनुभव होता है कि 'मैं सुखी या दुःखी हूँ', उस समय अहंपदवाच्य बुद्धि ही दुःखविशिष्ट होती है, आत्मा तो उसका केवल साक्षीमात्र है। वे सुखादि, आत्मा को विशेषित नहीं करते हैं। तथाच भास्य बुद्धि और भासक आत्मा इन दोनों का विवेक न हो पाने से 'आत्मा सुखादि- मान्' ऐसी भ्रान्ति होती है ॥ ७ ॥ शिरोदुःखादिनाऽऽत्मानं दुःख्यस्मीति हि पश्यति । द्रष्टान्यो दुःखिनो दृश्याद्द्रष्टृत्वाच्च न दुःख्यसौ ॥८॥ शिरोदुःखादिनेति—यह आत्मा शिर की वेदना से अपने को 'मैं दुःखी हूँ'—ऐसा देखता है (समझता है)। किन्तु वह अपने दृश्यभूत 'दुःखी' से वस्तुतः भिन्न है, क्योंकि वह तो उस दृश्य का द्रष्टा है। द्रष्टा होने के कारण वह दुःखी भी नहीं है ॥ ८ ॥ हृदयस्पर्शिनी ये सुखादिक, शरीरादि से सम्बन्धित बुद्धि को ही विशेषित करते हैं, आत्मा को नहीं—यह निश्चय कैसे किया गया ? इस प्रकार किया गया कि जिस समय यह अनुभव होता है कि 'मैं सुखी हूँ, या दुःखी हूँ', उस समय उस सुख या दुःख का कारण स्थूल देहगत कोई विकार या हर्ष, शोक, मोहादि लिङ्ग (सूक्ष्म) देहगत कोई विकार ही होता है। उस विकार का जो आधार है, वही उससे होनेवाले सुख-दुःख का भी आधार है। और आत्मा उसका साक्षी होने के कारण उससे सर्वथा असंग है। निष्कर्ष यह है कि आत्मा को जो विशेष ज्ञान होता है, वह बुद्धि के अध्यास के कारण होता है (बुद्धद्यध्यासनिबन्धन है)। तथाच शिरोदुःख से या उदरदुःख से मैं दुःखी हूँ, इस प्रकार अभिमान करनेवाले बुद्धद्यवस्थापन्न विशेष को ही वह ज्ञान होता है, क्योंकि वही दुःखी होता है। अतः बुद्धि ही सुख-दुःखादिकों से विशिष्ट होती है, यही कहना उचित है। दुःखी होनेवाले दृश्य से उसका द्रष्टा तो भिन्न ही है। अर्थात् देहादिकों में आत्मा के रूप में (आत्मत्वेन) समझी जानेवाली (अभिमन्यमान), देह के किसी अवयवादि के आहत हो जाने पर उत्पन्न होने वाले दुःख के आकार वाली, दृश्यसाभास बुद्धि का जो साक्षी है, वह उससे अन्य ही है। अतः वह केवल द्रष्टामात्र होने से उसे कोई दुःख-सुखादि नहीं होते। ये सुख-दुःखादि तो अहंपदवाच्य साभास बुद्धि को ही हुआ करते हैं, आत्मा को नहीं ॥ ८ ॥ दुःखी स्याद्दुःख्यहंमानाद्दुःखिनो दर्शनान्न वा । संहतेऽङ्गादिभिर्द्रष्टा दुःखी दुःखस्य नैव सः ॥९॥ दुःखीति—यह जीवात्मा जो अपने को दुःखी समझता है, उसका इस प्रकार समझना दुःखी अन्तःकरण (बुद्धि) में अभिमान करने के कारण ही है, दुःखविशिष्ट अन्तःकरण (बुद्धि) का साक्षी होने के कारण नहीं है ॥ ९ ॥ हृदयस्पर्शिनी 'आत्मा (में केवल द्रष्टृत्व) द्रष्टामात्र रहने से वह दुःखी नहीं होता'—इसी को स्पष्ट कर रहे हैं—यह आत्मा (जीव) जो दुःखी प्रतीत होता है, वह दुःखविशिष्ट अन्तःकरण (बुद्धि) में अर्थात् दुःखाकार से परिणत होनेवाले अन्तःकरण में 'अहम्'=मैं—ऐसा अभिमान करने के कारण वैसा प्रतीत होता है। दुःखविशिष्ट अन्तःकरण का साक्षी होने के कारण आत्मा दुःखी प्रतीत नहीं हो रहा है। यदि दुःखाकार से परिणत होनेवाले के देखनेमात्र से (साक्षी होने मात्र से) उसे दुःखी कहा जाय तो अन्य दुःखी जीवों को देखकर भी उसे दुःखी कहना होगा। अतः हस्त-पादादि अवयवों से संहत शरीर में जो दुःख है, उससे दुःखी बुद्धि ही है, उसका साक्षी आत्मा उसके दुःख से दुःखी नहीं है ॥९॥ चक्षुर्वत्कर्मकर्तृत्वं स्याच्चेज्ज्ञानेकमेव तत् । संहतं च ततो नात्मा द्रष्टृत्वात्कर्मतां व्रजेत् ॥१०॥