उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)
Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary
आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा
स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१३८ उपदेशसाहस्री सिद्ध नहीं हो पाई । एवञ्च उक्त दोष तदवस्थ ही रहा । तस्मात् पुरुष के असंग, उदासीन, अतिशयशून्य होने से उसमें प्रवर्त्तकत्व उपपन्न नहीं होता, और प्रधान के विकारों के अतिरिक्त अन्य किसी कारण को स्वीकार न करने से तथा प्रलय-काल में प्रधान के विकारों का स्वरूप न रहने से कोई प्रवर्त्तक दिखलाई नहीं पड़ता । अतः प्रधान की प्रवृत्ति को निर्निमित्त ही कहना होगा । निर्निमित्त मानने पर पूर्वोक्त अव्यवस्था ज्यों-की-त्यों ही बनी रही । प्रधान की निमित्तरहित प्रवृत्ति मानने पर पुरुष का मोक्ष कभी भी नहीं हो सकेगा ॥ ५० ॥ न प्रकाश्यं यथोष्णत्वं ज्ञानेनैवं सुखादयः । एकनीडत्वतोऽग्राह्याः स्युः कणादादिवर्त्मनाम् ॥५१॥ नेति—जिस प्रकार अग्नि का उष्णत्व उसके प्रकाश से प्रकाशित नहीं होता, उसी प्रकार वैशेषिक दार्शनिकों के अनुसार एक ही आश्रय में स्थित रहने के कारण आत्मगत ज्ञान से उसके आनन्दादि गुणों का ग्रहण नहीं किया जा सकता ॥ ५१ ॥ हृदयस्पशिनी यहाँ तक निर्गुण पुरुषवादी सांख्य के मत का निराकरण किया गया । अब सगुण पुरुषवादी वैशेषिकों के मत का निराकरण कर रहे हैं—सगुण पुरुषवादी वैशेषिक लोग आत्मा को सुख, दुःख, ज्ञान आदि गुणों से विशिष्ट मानते हैं । और आत्मगत सुखादि गुणों को आत्मगत (आत्मनिष्ठ) ज्ञान से ग्राह्य (प्रकाशित) मानते हैं । किन्तु यह संगत नहीं हो रहा है । तथापि अग्निनिष्ठ (अग्नि का, अग्निगत) उष्णत्व उसके प्रकाश से (अग्निनिष्ठ, अग्निगत प्रकाश से) प्रकाशित नहीं होता (प्रकाश्य, प्रकाशार्ह नहीं होता), उसी प्रकार वैशेषिक सिद्धान्त के अनुसार एक ही आश्रय में स्थित होने के कारण आत्मगत ज्ञान से उसके (आत्मा के) सुखादि गुण ग्राह्य नहीं हो सकते । विषय- विषयी की समानदेशता रहने पर यह ग्राह्य है, इस प्रकार भेद-नियम नहीं बन सकता ॥ ५१ ॥ युगपत्समवेतत्वं सुखविज्ञानयोरपि । मनोयोगैकहेतुत्वादग्राह्यत्वं सुखस्य च ॥५२॥ युगपदिति—किञ्च आत्मा के साथ सुख और ज्ञान का समवायसम्बन्ध होना शक्य नहीं है । तथा सुख का ग्रहण आत्म-मनःसंयोग से होता है । अतः किसी भी प्रकार से सुख का ग्राह्यत्व नहीं बन पाता है ॥ ५२ ॥ हृदयस्पशिनी केवल एकाश्रय होने से ही ज्ञान-सुखादिकों में भास्य-भासकता की अनुपपत्ति नहीं है, अपितु यौगपद्य के संभव न होने से भी है । सुख और ज्ञान का आत्मा के साथ एक ही समवाय सम्बन्ध का होना भी संभव नहीं है । अर्थात् सुख और विज्ञान में युगपत् समवेतत्व संभव नहीं है । क्योंकि वैशेषिकों के सिद्धान्त के अनुसार ज्ञान और सुखादि का असमवायिकारण आत्म-मनःसंयोग है, और वह आत्म-मनःसंयोग रूप असमवायिकारण आत्मा के केवल एक ही गुण के प्रति कारण होता है । अतः जिस समय सुखनिमित्तक आत्म-मनःसंयोग होगा, उस समय ज्ञाननिमित्तक संयोग न होने के कारण सुख का ज्ञान नहीं हो सकता और सुख के असमवायिकारणरूप उस मनः- संयोग का नाश होने पर सुख का भी नाश हो जायगा । इस प्रकार किसी भी तरह सुख की ग्राह्यता नहीं बताई जा सकती । संयोगान्तररूप असमवायिकारण के ज्ञान से सुख की ग्राह्यता प्रत्यक्षतः उपपन्न नहीं है । ‘अपि’ शब्द से समवाय की कल्पना भी प्रामाणिक नहीं है । ‘च’ शब्द से निरवयव आत्मा और मन का कोई प्रदेश न रहने से दो आत्माओं की तरह संयोग भी अनुपपन्न है । यदि दो विभु आत्माओं का संयोग मान भी लिया जाय तो उनका विभाग अनुपपन्न है । विभाग के न हो पाने पर संयोगान्तर (अन्य संयोग) की अनुपपत्ति होगी, तब ज्ञानादि कार्यों के क्रम की उपपत्ति नहीं हो सकेगी । ‘कोई भी कार्य, अपने असमवायिकारण के देश का अतिक्रमण (उल्लङ्घन) नहीं किया करता’ इस नियम के अनुसार यहाँ भी अणुपरिमाण मनःसंयोग अणुप्रदेशमात्रवर्ती रहने से उस का कार्य भी तन्मात्रवर्ती ही रहेगा, तब सकल शरीरगत आत्मवेदना के अप्रत्यक्ष होने का प्रसङ्ग प्राप्त होगा, इत्यादि अनेक दोषों के होने की संभावना होगी ॥ ५२ ॥