उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)
Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary
आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा
स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)
१३८ उपदेशसाहस्री सिद्ध नहीं हो पाई । एवञ्च उक्त दोष तदवस्थ ही रहा । तस्मात् पुरुष के असंग, उदासीन, अतिशयशून्य होने से उसमें प्रवर्त्तकत्व उपपन्न नहीं होता, और प्रधान के विकारों के अतिरिक्त अन्य किसी कारण को स्वीकार न करने से तथा प्रलय-काल में प्रधान के विकारों का स्वरूप न रहने से कोई प्रवर्त्तक दिखलाई नहीं पड़ता । अतः प्रधान की प्रवृत्ति को निर्निमित्त ही कहना होगा । निर्निमित्त मानने पर पूर्वोक्त अव्यवस्था ज्यों-की-त्यों ही बनी रही । प्रधान की निमित्तरहित प्रवृत्ति मानने पर पुरुष का मोक्ष कभी भी नहीं हो सकेगा ॥ ५० ॥ न प्रकाश्यं यथोष्णत्वं ज्ञानेनैवं सुखादयः । एकनीडत्वतोऽग्राह्याः स्युः कणादादिवर्त्मनाम् ॥५१॥ नेति—जिस प्रकार अग्नि का उष्णत्व उसके प्रकाश से प्रकाशित नहीं होता, उसी प्रकार वैशेषिक दार्शनिकों के अनुसार एक ही आश्रय में स्थित रहने के कारण आत्मगत ज्ञान से उसके आनन्दादि गुणों का ग्रहण नहीं किया जा सकता ॥ ५१ ॥ हृदयस्पशिनी यहाँ तक निर्गुण पुरुषवादी सांख्य के मत का निराकरण किया गया । अब सगुण पुरुषवादी वैशेषिकों के मत का निराकरण कर रहे हैं—सगुण पुरुषवादी वैशेषिक लोग आत्मा को सुख, दुःख, ज्ञान आदि गुणों से विशिष्ट मानते हैं । और आत्मगत सुखादि गुणों को आत्मगत (आत्मनिष्ठ) ज्ञान से ग्राह्य (प्रकाशित) मानते हैं । किन्तु यह संगत नहीं हो रहा है । तथापि अग्निनिष्ठ (अग्नि का, अग्निगत) उष्णत्व उसके प्रकाश से (अग्निनिष्ठ, अग्निगत प्रकाश से) प्रकाशित नहीं होता (प्रकाश्य, प्रकाशार्ह नहीं होता), उसी प्रकार वैशेषिक सिद्धान्त के अनुसार एक ही आश्रय में स्थित होने के कारण आत्मगत ज्ञान से उसके (आत्मा के) सुखादि गुण ग्राह्य नहीं हो सकते । विषय- विषयी की समानदेशता रहने पर यह ग्राह्य है, इस प्रकार भेद-नियम नहीं बन सकता ॥ ५१ ॥ युगपत्समवेतत्वं सुखविज्ञानयोरपि । मनोयोगैकहेतुत्वादग्राह्यत्वं सुखस्य च ॥५२॥ युगपदिति—किञ्च आत्मा के साथ सुख और ज्ञान का समवायसम्बन्ध होना शक्य नहीं है । तथा सुख का ग्रहण आत्म-मनःसंयोग से होता है । अतः किसी भी प्रकार से सुख का ग्राह्यत्व नहीं बन पाता है ॥ ५२ ॥ हृदयस्पशिनी केवल एकाश्रय होने से ही ज्ञान-सुखादिकों में भास्य-भासकता की अनुपपत्ति नहीं है, अपितु यौगपद्य के संभव न होने से भी है । सुख और ज्ञान का आत्मा के साथ एक ही समवाय सम्बन्ध का होना भी संभव नहीं है । अर्थात् सुख और विज्ञान में युगपत् समवेतत्व संभव नहीं है । क्योंकि वैशेषिकों के सिद्धान्त के अनुसार ज्ञान और सुखादि का असमवायिकारण आत्म-मनःसंयोग है, और वह आत्म-मनःसंयोग रूप असमवायिकारण आत्मा के केवल एक ही गुण के प्रति कारण होता है । अतः जिस समय सुखनिमित्तक आत्म-मनःसंयोग होगा, उस समय ज्ञाननिमित्तक संयोग न होने के कारण सुख का ज्ञान नहीं हो सकता और सुख के असमवायिकारणरूप उस मनः- संयोग का नाश होने पर सुख का भी नाश हो जायगा । इस प्रकार किसी भी तरह सुख की ग्राह्यता नहीं बताई जा सकती । संयोगान्तररूप असमवायिकारण के ज्ञान से सुख की ग्राह्यता प्रत्यक्षतः उपपन्न नहीं है । ‘अपि’ शब्द से समवाय की कल्पना भी प्रामाणिक नहीं है । ‘च’ शब्द से निरवयव आत्मा और मन का कोई प्रदेश न रहने से दो आत्माओं की तरह संयोग भी अनुपपन्न है । यदि दो विभु आत्माओं का संयोग मान भी लिया जाय तो उनका विभाग अनुपपन्न है । विभाग के न हो पाने पर संयोगान्तर (अन्य संयोग) की अनुपपत्ति होगी, तब ज्ञानादि कार्यों के क्रम की उपपत्ति नहीं हो सकेगी । ‘कोई भी कार्य, अपने असमवायिकारण के देश का अतिक्रमण (उल्लङ्घन) नहीं किया करता’ इस नियम के अनुसार यहाँ भी अणुपरिमाण मनःसंयोग अणुप्रदेशमात्रवर्ती रहने से उस का कार्य भी तन्मात्रवर्ती ही रहेगा, तब सकल शरीरगत आत्मवेदना के अप्रत्यक्ष होने का प्रसङ्ग प्राप्त होगा, इत्यादि अनेक दोषों के होने की संभावना होगी ॥ ५२ ॥
पार्थिवप्रकरणम् १३९ तथाऽन्येषां च भिन्नत्वाद्युगपज्जन्म नेष्यते । गुणानां समवेतत्वं ज्ञानं चेन्न विशेषणात् ॥५३॥ तथेति—उसी प्रकार एक-दूसरे से भिन्न होने के कारण दुःख, इच्छा, प्रयत्न आदि अन्य गुणों की भी उत्पत्ति एक साथ होना शक्य नहीं है। यदि 'उन सभी गुणों का आत्मा के साथ समवायसम्बन्ध होना ही उनका ज्ञान है' [ऐसा कहा जाय]—किन्तु यह कथन भी उचित न होगा, क्योंकि उन गुणों का विशेषण रूप से व्यवहार [ज्ञात सुख, ज्ञात दुःख] किया जाता है ॥ ५३ ॥ हृदयस्पर्शिनी जैसे ज्ञान और सुख की युगपत् उत्पत्ति न होने से उनमें ग्राह्य-ग्राहकत्व की अनुपपत्ति बताई उसी प्रकार परस्पर भिन्न होने के कारण दुःख, इच्छा, प्रयत्नादि गुणों का भी एक साथ (युगपत्) उद्भव होना संभव नहीं है। क्योंकि एक आत्म-मनःसंयोग से अनेक कार्यों का होना संभव नहीं है। मूलगत 'च' से एक आश्रयवालों में विषय- विषयिभाव भी नहीं होता। सुखादिकों में ज्ञानभास्यता भले ही न रहे, एक आत्मा में उन सब का समवायसम्बन्ध से होना ही उनका ज्ञान है, किन्तु यह भी ठीक न होगा, क्योंकि 'ज्ञातं सुखम्, ज्ञातं दुःखम्'—इस प्रकार उनका विशिष्ट व्यवहार दृष्टिगत होता है। इससे यह स्पष्ट हुआ कि सुखादि, आत्मा के गुण न होकर आत्मा के विषय हैं और आत्मा उनका साक्षी है ॥ ५३ ॥ ज्ञानेनैव *विशेषत्वाज्ज्ञानाप्यत्वं स्मृतेस्तथा । सुखं ज्ञातं मयेत्येवं तवाज्ञानात्मकत्वतः ॥५४॥ ज्ञानेनैवेति—सुख-दुःखादि गुणों का विशेषण 'ज्ञान' है, यह ऊपर बता चुके हैं। अतः सुख-दुःखादि गुण, ज्ञान के द्वारा विशेषित रहने से और 'मुझे सुख ज्ञात हुआ' ऐसी स्मृति होने से स्पष्ट होता है कि सुखादि की प्राप्ति में 'ज्ञान' साधन है। किन्तु तुम्हारे [वैशेषिकों के] मत में तो आत्मा को ज्ञानस्वरूप नहीं कहा गया है। अतः सुखादि गुणों की सिद्धि नहीं हो सकती ॥ ५४ ॥ हृदयस्पर्शिनी उपर्युक्त कथन को ही और अधिक स्पष्ट करते हैं—ज्ञान के द्वारा सुखादि के विशेषित होने से वे सुखादि ज्ञान के द्वारा प्राप्य हैं। अर्थात् ज्ञान के द्वारा आहित संस्कारों से उत्पन्न स्मृति के विषय होने के कारण भी सुखादिकों में ज्ञानव्याप्यता समझनी चाहिए। 'मुझे सुख ज्ञात हुआ'— इस प्रकार स्मृति होने के कारण सुखादिक, ज्ञान के द्वारा प्राप्त (ग्राह्य) होते हैं। यदि सुखादि ज्ञान को ज्ञानविशिष्ट आत्मसमवेत होना ही मानते हो तो वह ठीक नहीं है, क्योंकि क्षणिक आत्मविशेषगुणों का युगपत् समवाय होना संभव नहीं है। अन्यथा आत्मगत संख्या, परिमाण आदि गुणों का भी ग्रहण होने लगेगा। उसी तरह सुखादि ज्ञान को केवल आत्मसमवेत होना भी नहीं कह सकते क्योंकि तुम्हारे (वैशेषिकों के) मत में आत्मा ज्ञानस्वरूप न होने के कारण सुखादि की सिद्धि नहीं हो सकती। वैशेषिकों के मत में आत्मा ज्ञानस्वरूप नहीं है, किन्तु मन के साथ आत्मा का संयोग होने पर उसमें ज्ञानादि गुणों का अनुभव होता है। इससे यह सिद्ध हुआ कि आत्मा घटादि के समान केवल द्रव्यमात्र है। अतः जड़रूप होने से उससे समवेत होने मात्र से सुखादि की सिद्धि नहीं हो सकती। क्योंकि सभी तो जड़ हैं। तुम्हारे मत में ज्ञान भी स्वयं- प्रकाश नहीं है। अतः केवल आत्मसमवेत होने मात्र से सुखादि के ज्ञान की सिद्धि नहीं हो सकती ॥ ५४ ॥ सुखादेर्नात्मधर्मत्वमात्मनस्तेऽविकारतः । भेदादन्यस्य कस्मान्न मनसो वाऽविशेषतः ॥५५॥ सुखादेरिति—तुम्हारे [वैशेषिकों के] मत के अनुसार भी 'आत्मा' निर्विकार, विभु और अनेक है। अतः सुखादि उसके धर्म तो हो नहीं सकते तथा भेद में किसी प्रकार की कोई विशेषता न रहने के कारण वे किसी दूसरे आत्मा या मन के धर्म क्यों नहीं होंगे ? ॥ ५५ ॥
- विशेष्यत्वा०—पाठान्तरम् ।
१४० उपदेशसाहस्री हृदयस्पर्शिनी
ज्ञान, सुख आदि को आत्मा के गुण मानकर भास्य-भासक भाव को असंभव बताया, अब उन्हें आत्म- गुण कहना भी संभव नहीं, यह बता रहे हैं—क्योंकि वैशेषिकों के मतानुसार भी आत्मा विकाररहित होने के कारण सुखादि उसके धर्म हो नहीं सकते। उसी तरह आत्मा विभु होने के कारण उसे तुमने नित्य माना है। उसी तरह उसे अनेक भी माना है। तब कोई भी नित्य पदार्थ अनित्य गुण वाला हो, ऐसा कोई दृष्टान्त भी नहीं है। एवंच आत्मा का गुणवत्त्व ही सिद्ध नहीं हो पा रहा है। ग्राह्य-ग्राहकत्व की कल्पना तो दूर रही। किंच गुण-गुणी में अत्यन्त भेद मानने वाले तुम्हारे मत में इसी आत्मा के ये सुखादिक गुण हैं, यह नियम भी नहीं बन सकता। क्योंकि भेद में कोई विशेषता न होने के कारण वे सुखादिक किसी अन्य आत्मा के या मन के धर्म क्यों नहीं हो सकते? निष्कर्ष यह है— समस्त आत्माओं के विभु होने के कारण जिस शरीरावच्छिन्न आत्मा में सुखादि होंगे, उस समय वहाँ समस्त आत्माएँ विद्यमान होने से उनका भेद वहाँ ज्ञात नहीं हो सकता, इस कारण इसी आत्मा के ये सुखादि धर्म हैं, अन्य आत्मा के नहीं, ऐसा नियम नहीं किया जा सकता। यदि कहो कि जिस शरीरावच्छिन्न आत्मा के साथ मन का संयोग हो, उसी आत्मा के उन सुखादि धर्मों को समझा जायगा, एवंच भिन्न-भिन्न मनःसंयोगों को नियामक कहेंगे, तो वह भी ठीक नहीं रहेगा, क्योंकि शरीरस्थ मन का सभी आत्माओं के साथ समान सम्बन्ध है। भिन्न-भिन्न अदृष्टों को भी नियामक नहीं कह सकते, क्योंकि अदृष्ट भी आत्मा का धर्म है, यह अभी तक सिद्ध नहीं हो पाया है। अदृष्ट के हेतुभूत प्रयत्न आदि भी मनःसंयोग के निमित्त हुआ करते हैं। और वे सभी आत्माओं में समान हैं, उनमें कोई विशेषता (भिन्नता) नहीं होती। अतः अदृष्ट का भी कोई आश्रयविशेष (कोई एक ही आत्मा) सिद्ध नहीं हो पा रहा है। जहाँ कहीं भी होनेवाला सुखादि, जिस किसी का भी क्यों नहीं माना जा सकेगा? तथा मन में क्रिया के होने से और मूर्तता के होने से एवं सुखादिकों के देश (स्थान) का व्यभिचार न होने से सुखादिकों को मन के ही धर्म क्यों न माना जाय ? न मानने में कोई विनिगमना (युक्ति) नहीं है ।। ५५ ।।
स्यान्मालाऽपरिहार्या तु ज्ञानं चेज्ज्ञेयतां व्रजेत् । युगपद्वापि चोत्पत्तिरभ्युपेताऽत इष्यते ।।५६।।
स्यादिति—तुम्हारे मत के अनुसार यदि एक ज्ञान, दूसरे ज्ञान का विषय बन सकता है तो उन ज्ञानों की अनवस्था अनिवार्य हो जायगी और यदि उनकी उत्पत्ति एक साथ मान ली जाय तो रूप-रस आदि सभी ज्ञानों की एकसाथ उत्पत्ति माननी होगी ।। ५६ ।।
हृदयस्पर्शिनी
वैशेषिकों ने एक ज्ञान को दूसरे ज्ञान का विषय (वेद्य) होना स्वीकार किया है, किन्तु वह भी अनवस्था के कारण उचित नहीं है। वैशेषिकों के मतानुसार विषयज्ञान व्यवसायात्मक है और उसका पुनः ज्ञान अनुव्यवसायात्मक है। प्रत्येक व्यवसायात्मक ज्ञान अपने अनुव्यवसायात्मक ज्ञान का विषय होता है। इस प्रकार ज्ञान को ज्ञानान्तर का विषय मानने से अनुव्यवसायात्मक ज्ञान भी दूसरे अनुव्यवसायात्मक ज्ञान का और दूसरा तीसरे का विषय होगा। इस प्रकार अनवस्था होगी। इसके अतिरिक्त प्रत्येक ज्ञान किसी पूर्ववर्ती ज्ञान की अपेक्षा से ही होता है, अतः इस प्रकार से भी अनवस्था का दोष होगा। इसलिये ज्ञान को ज्ञानान्तर का विषय मानना उचित नहीं है। और यदि समस्त ज्ञानों को एक ही आत्म-मनःसंयोग से उत्पन्न हुआ कहें तो शब्द, स्पर्श, रूप, रसादि सभी ज्ञान एक साथ (युगपत्) होने लगेंगे। अभिप्राय यह है कि जिस आत्म-मनःसंयोग से प्रथम ज्ञान उत्पन्न होता है, उससे भिन्न किसी संयोगान्तर से तद्- विषयक अन्य ज्ञान होता है या उसी पूर्व संयोग से ही अन्य ज्ञान होता है ? पूर्वज्ञान यदि ज्ञेयता को प्राप्त होता है तो ज्ञान-परम्परा (अनवस्था-ज्ञानमाला) का परिहार करना कठिन होगा। विषय के अवभास के समय यदि ज्ञान का अवभास नहीं होता है ऐसा कहें तो क्या विषय स्वयं ही भासित होता है ? या ज्ञान के अधीन होकर भासित होता है ? इसका विवेक करना शक्य न होने से उसी समय ज्ञान के भान के लिए ज्ञानान्तर को मानना होगा, उसका भी भान न हो पाने पर पूर्वज्ञान में ज्ञानान्तरभास्यता के सिद्ध न हो पाने से उसके भानार्थ पुनः एक ज्ञानान्तर—इस तरह अनवस्था
पार्थिवप्रकरणम् १४१ दुर्निवार्य हो जायगी। एवंच प्रथम ज्ञानोत्पत्ति के अनन्तर मन में क्रिया, उससे विभाग, उससे पूर्वसंयोग का नाश, उससे संयोगान्तर, तब कहीं ज्ञानान्तर—इस प्रकार से अनेक क्षणों के विलम्ब से उत्पन्न होनेवाला उत्तरज्ञान, पूर्वज्ञान का अवभासन कैसे कर पायगा ? क्योंकि उसका उस काल में अभाव ही रहेगा। इस प्रकार 'ज्ञानं चेद् ज्ञेयतां व्रजेत्' इस प्रथम पक्ष में दोष है। अब 'युगपद् वाप्युत्पत्तिः' इस द्वितीय पक्ष को स्वीकारते हैं, तो अतिप्रसक्ति दोष होगा। अर्थात् अनवस्था दोष को दूर करने के लिए एक ही संयोग से पूर्वोत्तर ज्ञानों की युगपत् उत्पत्ति को कहें तो उस एक ही संयोग से संनिकृष्ट रूप-रस-गन्ध-शब्द-स्पर्शों के ज्ञानों की उसी समय युगपत् उत्पत्ति मान ली जाय, और उसी समय संस्कारोद्बोध संपात् में सहकारी लाभ होने से तदर्थक स्मृतियों का भी युगपत् उत्पन्न होना मान लिया जाय ? अतः ज्ञान को ज्ञानान्तर से वेद्य होने की कल्पना करना युक्तियुक्त नहीं है ॥ ५६ ॥ अनवस्थान्तरत्वाच्च बन्धो नात्मनि *विद्यते । नाशुद्धिश्चाप्यसङ्गतत्वादसङ्गो हीति च श्रुतेः ॥५७॥ अनवस्थेति—आत्मा में कभी कोई अवस्थान्तर नहीं होता है। अतः उसे बन्ध नहीं है तथा 'पुरुष असंग है' इस श्रुतिवचन के अनुसार उसके असंग होने के कारण उसमें अशुद्धि भी नहीं है ॥ ५७ ॥ हृदयस्पर्शिनी किंच—'आत्मनश्चैतन्यम्'—आत्मा का चैतन्य—यह आत्मा का स्वरूपलक्षण है या तटस्थलक्षण है ? यदि इसे स्वरूपलक्षण कहें तो पृथिवी में गन्ध की तरह सर्वदा ही उसके रहने से और उसका स्वरूप से अतिरेक (भिन्नता) न रहने से 'अनित्यज्ञानवान् आत्मा है' यह तुम्हारा उद्घोष मिथ्या हो जायगा। और यदि उसे तटस्थलक्षण कहें तो अनात्म पदार्थों में अतिप्रसक्त न होनेवाला कोई दूसरा ही स्वरूपलक्षण कहना होगा। वह स्वरूपलक्षण, चेतन के अलावा और कुछ हो ही नहीं सकता। अतः देहादि जड़ पदार्थों से विलक्षण आत्मा है—यही कहोगे, तब तुम्हें आत्मा को सदैव निर्विशेष, चिद्रूप, कूटस्थ ही स्वीकार करना पड़ेगा। अन्यथा 'विकारी पदार्थ अनित्य होता है' इस नियम के अनुसार 'बन्ध-मोक्ष से सम्बन्धित (अन्वयी) एक ही आत्मा होता है',—यह कहना तुम्हारे लिये कठिन हो जायगा। इसी अभिप्राय को उक्त पद्य के द्वारा बता रहे हैं—वैशेषिकों की कल्पना कोई उचित नहीं है। वस्तुतः आत्मा में कोई अवस्थान्तर नहीं होता, क्योंकि वह तो कूटस्थ है, इसलिए उसमें वस्तुतः विशेषगुणवत्त्वरूप बन्ध नहीं है। 'च' कार से बन्धनिवृत्तिरूप मोक्ष भी नहीं है। अर्थात् आत्मा का न तो बन्ध है और न ही मोक्ष है। 'असङ्गो ह्ययं पुरुषः'१— पुरुष असंग है, इस श्रुति के अनुसार असंग होने के कारण उसमें अशुद्धि भी नहीं है तस्मात् आत्मा नित्य शुद्ध ही है। वैशेषिकों की कल्पना का निराकरण करने का फल यह है कि स्वगतधर्मकृत बन्धाभाव की तरह अन्यसंसर्गकृत अशुद्धि भी असंग होने के कारण उसमें नहीं है ॥ ५७ ॥ सूक्ष्मैकागोचरेभ्यश्च न लिप्यत इति श्रुतेः । एवं तर्हि न मोक्षोऽस्ति बन्धाभावात्कथंचन ॥५८॥ सूक्ष्मेति—किञ्च सूक्ष्मत्व, अद्वितीयत्व और अविषयत्व रूप हेतुओं से तथा 'आत्मा, लोकदुःखों से लिप्त नहीं होता'—इस श्रुतिवचन के अनुसार भी वह [आत्मा] नित्य शुद्ध है। प्रश्न—यदि ऐसी बात है तो बन्ध का अभाव रहने से किसी प्रकार मोक्ष भी नहीं हो सकेगा ॥ ५८ ॥ हृदयस्पर्शिनी आत्मा में पारमार्थिक बन्ध आदि के न होने में और भी कारण है—सूक्ष्मत्व (सूक्ष्मता) अर्थात् मन और वाणी से गम्य न होना 'मनोवागगम्यत्वम्', और अद्वितीयत्व अर्थात् एकत्व 'एकत्वमद्वितीयत्वम्', तथा अगोचरत्व (अविषयत्व) अर्थात् 'अगोचरत्वं निर्विशेषत्वम्'—इन हेतुओं से आत्मा की नित्य शुद्धता को ही बताया गया है२। १. (वृ. उ. ४।३।१५) २. 'न लिप्यते लोकदुःखेन'—(कठ. उ. ५।११)
- युज्यते०—पाठान्तरम्
१४२ उपदेशसाहस्री कठश्रुति ने भी उसकी शुद्धता को प्रमाणित किया है। तथा गीता^१ का स्मृतिवचन भी उक्तार्थ का समर्थन कर रहा है। इतना भाव 'सूक्ष्मैका .... .... ... इति श्रुतेः' इस अर्धश्लोक से बताया गया है। इसपर पूर्वपक्षी पुनः प्रश्न करता है कि क्या आत्मा की नित्यशुद्धबुद्धमुक्तस्वभावता को सिद्ध करने वाले वेदान्ती लोग आत्मोपदेश शास्त्र को निरर्थक समझ रहे हैं ? अर्थात् वेदान्तियों के मतानुसार आत्मा को बन्ध का अभाव होने के कारण उसके मोक्ष की कोई बात ही नहीं है। मोक्ष तो बन्धपूर्वक होता है, बन्ध नहीं तो मोक्ष भी नहीं ॥ ५८ ॥ शास्त्रानर्थक्यमेव स्यान्न बुद्धेर्भ्रान्तिरिष्यते । बन्धो मोक्षश्च तन्नाशः स यथोक्तो न चान्यथा ॥५९॥ शास्त्रानर्थक्यमिति—उत्तर—तथा च मोक्षप्रतिपादक शास्त्र व्यर्थ ही हो जायेगा। किन्तु मोक्षप्रतिपादक शास्त्र को व्यर्थ नहीं कहा जा सकता, क्योंकि बुद्धि की भ्रान्ति को बन्धन और उस भ्रान्ति के नाश को मोक्ष माना गया है। इस बात को पहिले बता चुके हैं। इसके अतिरिक्त और किसी प्रकार का मोक्ष नहीं है ॥ ५९ ॥ हृदयस्पर्शिनी तथाच मोक्षोपायभूत उपदेशशास्त्र का आनर्थक्य ही रहेगा। उक्त आशंका का समाधान आचार्यचरण कर रहे हैं कि बुद्धि के भ्रम (भ्रान्ति) को बन्ध कहते हैं और उस भ्रम (भ्रान्ति) के नाश को मोक्ष कहते हैं। वस्तुतः आत्मा को न बन्ध है और न ही मोक्ष है। इस प्रकार 'अज्ञानं कल्पनामूलं संसारस्य नियामकम्' यह पहले बता चुके हैं। तथाच अज्ञान से कल्पित बन्धभ्रम के निवृत्त्यर्थ उपदेशशास्त्र की आवश्यकता है, उसे निरर्थक नहीं कहा जा सकता ॥ ५९ ॥ बोधात्मज्योतिषा दीप्ता बोधमात्मनि मन्यते । बुद्धिर्नान्योऽस्ति बोद्धेति सेयं भ्रान्तिर्हि धीगता ॥६०॥ बोधात्मेति—बोधस्वरूप (ज्ञानस्वरूप) आत्मा से प्रकाशित हुई बुद्धि अपने ही में ज्ञान का होना समझती है कि मुझसे भिन्न कोई अन्य बोद्धा नहीं है, किन्तु इस प्रकार समझना बुद्धि की भ्रान्ति ही है ॥ ६० ॥ हृदयस्पर्शिनी पहले बता चुके हैं कि चिदात्मा में बुद्धिधर्म का अध्यासरूप बन्ध, अज्ञानमूलक है, उसी का उपपादन किया जा रहा है—बोध (ज्ञान) रूप आत्मा की जो ज्योति (प्रकाश) है, वही चिदाभास है, उससे प्रकाशित (दीप्त - व्याप्त) हुई बुद्धि, अपने में ही बोध (ज्ञान, चैतन्य) समझती है, और अपने से अतिरिक्त अन्य कोई बोद्धा नहीं है, 'मैं ही बोद्धा' इस प्रकार साभास बुद्धि प्रकाशित होती है। उसके अविवेक से आत्मा में 'मैं ही बद्ध हूँ, कर्ता हूँ' इत्यादि जो संसार प्रतीत होता रहता है, वह सब बुद्धि की ही भ्रान्ति है ॥ ६० ॥ बोधस्यात्मस्वरूपत्वान्नित्यं तत्रोपचर्यते । अविवेकोऽप्यनाद्योऽयं संसारो नान्य इष्यते ॥६१॥ बोधस्येति—बोध (ज्ञान) तो आत्मा का ही स्वरूप है। बुद्धि में तो उसका नित्य उपचार किया जाता है। यह अविवेक के कारण होता है। यह अविवेक भी अनादि है। इसके अतिरिक्त अन्य कोई संसार नहीं है ॥ ६१ ॥ हृदयस्पर्शिनी प्रतीति के अनुसार बुद्धि को ही वस्तुतः बोधरूप क्यों न माना जाय ? इस आशंका का उत्तर यह है कि बुद्धि के आगन्तुक होने से बोध का व्यभिचार है, अतएव सुषुप्ति में बुद्धि के बिना भी बोध का सद्भाव रहने से (ज्ञान १. 'यथा सर्वगतं सौक्ष्म्यादाकाशं नोपलिप्यते । सर्वत्रावस्थितो देहे तथात्मा नोपलिप्यते ॥'—(भ. गी. १३।३२)
पार्थिवप्रकरणम् १४३ की सत्ता, विद्यमानता रहने से) आत्मा का स्वरूप तो विद्यमान ही है। बोध तो सर्वदा आत्मा का ही स्वरूप है। बुद्धि में तो उसका उपचार होता है। अर्थात् अविवेक के कारण अध्यास करके व्यवहार किया जाता है। यदि अविवेक के कारण यह अध्यास किया जाता है, तो वह अविवेक सादि है या अनादि ? यदि अनादि अज्ञानकृत अविवेक होने से उसे भी अनादि कहा जाता है, तो ब्रह्मात्मज्ञान से उस अविवेक की ही निवृत्ति कही जाय, संसार की निवृत्ति क्यों बताई जा रही है ? इस भ्रम का निवारण यह है कि कर्त्रादिधर्मक बुद्धि का जो अविवेक है, वही तो संसार है, उस अविवेक के अतिरिक्त अन्य कोई संसार नहीं है ।। ६१ ।। मोक्षस्तन्नाश एव *स्यान्नान्यथाऽनुपपत्तितः । येषां वस्त्वन्तरापत्तिर्मोक्षो नाशस्तु तैर्मतः ॥६२॥ मोक्ष इति—उस अविवेक (अज्ञान) का नाश ही मोक्ष है, इसके अतिरिक्त अन्य कोई मोक्ष उपपन्न नहीं हो सकता। जिनके मत में आत्मा का किसी अन्य वस्तु के आकार को प्राप्त होना 'मोक्ष' माना गया है, उन्हें उसके (आत्मा के) नाश को भी मोक्ष मानना होगा ॥ ६२ ॥ हृदयस्पर्शिनी बन्ध की अज्ञानात्मकता का फल बता रहे हैं—ज्ञान से अज्ञान की निवृत्ति होनेपर अज्ञानकार्यरूप बन्ध की जो निवृत्ति है, उसे ही मोक्ष (मुक्ति) कहते हैं। इसके अतिरिक्त अन्य कोई मोक्ष, हेय या उपादेय के रूप में उपपन्न नहीं हो सकता। जो लोग स्व-स्वरूप के अतिरिक्त अन्य वस्तु (वस्त्वन्तर) की प्राप्ति को या अपने स्वरूप का त्याग कर अन्य वस्तु के स्वरूपाकार होने को ही मोक्ष कहते हैं, उन लोगों को, आत्म-नाश को ही मोक्ष का स्वरूप मानना पड़ेगा। कोई वस्तु स्थित रहे या नष्ट हो जाय तो भी वह अन्य नहीं कहलाती। 'स्वरूपादन्यवस्त्वन्तरापत्ति' से यदि प्राप्ति विवक्षित है, तो 'संयोगा विप्रयोगान्ताः'१ इस न्याय से कृतक की 'अनित्यत्व' के साथ व्याप्ति रहती है, अतः मोक्ष को अनित्य कहना होगा ॥ ६२ ॥ अवस्थान्तरमप्येवमविकारान्न युज्यते । विकारेऽवयवित्वं स्यात्ततो नाशो घटादिवत् ॥६३॥ अवस्थान्तरमिति—इसी प्रकार आत्मा का अवस्थान्तर होना भी संभव नहीं है, क्योंकि वह विकाररहित (निर्विकार) है। यदि उसमें विकार होना माना जाय तो उसे सावयव कहना होगा। तब घट-पटादि के समान उसका नाश भी मानना पड़ेगा ॥ ६३ ॥ हृदयस्पर्शिनी जैसे 'वस्त्वन्तरापत्तिमोंक्षः' इस पक्ष में अनुपपत्ति और अनित्यत्वापत्ति होती है, उसी तरह 'आत्मनोऽ- वस्थान्तरापत्तिमोंक्षः' पक्ष में भी वही दोष समानरूप से है। क्योंकि आत्मा निर्विकार है, अतः उसमें अवस्थान्तर होने की संभावना ही नहीं। यदि उसमें विकार माना जाय, तो उसे सावयव मानना होगा। तब सावयव रहने से घटादि के समान उसका नाश होना अपरिहार्य रहेगा। अतः 'भ्रान्तिनिवृत्तिरेव मोक्षः'—भ्रान्ति का ध्वंस हो जाना ही मोक्ष है ॥ ६३ ॥ तस्माद्भ्रान्तिरतोन्या हि बन्धमोक्षादिकल्पनाः । साङ्ख्यकाणादबौद्धानां मीमांसाह[हं]तकल्पनाः ॥६४॥ तस्मादिति—अतः इस वेदान्तसिद्धान्त को न मानकर जिन लोगों ने बिना विवेक किये जो बन्ध-मोक्षादि की कल्पना की है, वह तो केवल उनका भ्रम ही है। वस्तुतः सांख्य, काणाद (वैशेषिक) और बौद्धों की वे कल्पनाएँ सर्वथा अविचारपूर्ण ही हैं ॥ ६४ ॥ १. ( महा. भा. स्त्रीपर्व २।३ तथा मोक्षपर्व ३३८।२० )
- स्यान्नान्योऽस्त्यनु०—पाठान्तरम् ।
१४४ उपदेशसाहस्री हृदयस्पर्शिनी अतः वेदान्त के सिद्धान्त से पृथक् विविध वादियों के द्वारा बन्ध-मोक्षादि की जो कल्पनाएँ की गई हैं, वे श्रुति-स्मृति के न्यायों से बाधित होने के कारण मानने योग्य नहीं हैं। परिशेषात् आत्मा के बन्ध-मोक्ष का जो प्रतिभास होता है, वह भ्रम ही है, ऐसा श्रुति आदि ने कहा है। बन्ध-मोक्ष के भ्रम के अतिरिक्त जो उनके स्वरूप की और उनके हेतुओं की कल्पनाएँ अन्य लोगों के द्वारा की गई हैं, वे कभी भी मानने योग्य नहीं हैं। सांख्य, कणाद और बौद्धों की कल्पनाएँ तो सर्वथा विचारशून्य ही हैं ।। ६४ ।। शास्त्रयुक्ति*विहीनत्वान्नादार्तव्याः कदाचन । शक्यन्ते शतशो वक्तुं दोषास्तासां सहस्रशः ।।६५।। शास्त्रेति - उन सांख्यादि दार्शनिकों की बन्ध-मोक्ष विषयक कल्पनाएँ शास्त्र और युक्ति के विरुद्ध हैं। अतः उन कल्पनाओं में आदरबुद्धि नहीं करनी चाहिये । अर्थात् वे कल्पनाएँ उपेक्षणीय हैं। क्योंकि उन कल्पनाओं में सैकड़ों- हजारों दोष बताये जा सकते हैं ।। ६५ ।। हृदयस्पर्शिनी शास्त्र और युक्ति दोनों से विरुद्ध होने के कारण वे कल्पनाएँ किसी भी तरह आदरणीय नहीं है, क्योंकि उनमें सैकड़ों-हजारों दोष बताये जा सकते हैं ।। ६५ ।। अपि निन्दोपपत्तेश्च यान्यतोऽन्यानि चेत्यतः । त्यक्त्वादृतो ह्यन्यशास्त्रोक्तोर्मतिं कुर्याद्दृढां बुधः ।।६६।। अपीति- 'यान्यतोऽन्यानि' आदि वचनों से वेदान्तशास्त्र के अतिरिक्त शास्त्रों की निन्दा की गई है। अतः उन शास्त्रों के कथन की उपेक्षा करके विद्वान् पुरुष को चाहिये कि वह वेदान्तशास्त्र के सिद्धान्तों में सुदृढ निष्ठा रखे ।।६६।। हृदयस्पर्शिनी मनु एवं सूत संहिता आदि में वेदान्तातिरिक्त शास्त्रों की निन्दा की गई है। अतः वेदान्त से भिन्न शास्त्रों की उपेक्षा करके बुद्धिमान् मुमुक्षु वेदान्तशास्त्र में ही अपनी निष्ठा को दृढ़ करे । मनु कहते हैं कि इस पृथ्वीपर वेदान्तशास्त्र से भिन्न जो विविध शास्त्र हैं, उन सब से धर्मशुद्धि चाहने वाला विद्वान् पुरुष सशंक रहे । जितनी भी वेदबाह्य स्मृतियाँ तथा कुतर्क हैं, वे सभी निष्फल हैं और मृत्यु के पश्चात् निरय में ले जाने वाली हैं ऐसा कहा गया है¹ ।। ६६ ।। श्रद्धाभक्ती पुरस्कृत्य हित्वा सर्वमनार्जवम् । वेदान्तस्यैव तत्त्वार्थे व्यासस्याभिमते** तथा ।।६७।। श्रद्धेति - मुमुक्षु विद्वान् को चाहिये कि वह सब प्रकार की कुटिलता को त्याग कर श्रद्धा एवं भक्ति के साथ साक्षात् नारायणावतार भगवान् व्यास के द्वारा अभिमत वेदान्तगम्य तत्त्वार्थ में अपनी बुद्धि को लगावे और उसे उसी में स्थिर रखे ।। ६७ ।। हृदयस्पर्शिनी विद्वान् मुमुक्षु को चाहिये कि वह सर्वविध कुटिलता का त्याग करके श्रुत्युक्त अर्थ में विश्वास ( श्रद्धा ) और उसके प्रति तत्परता (भक्ति) के साथ भगवान् व्यास के अभिमतवेदान्त प्रतिपादित तत्त्व में ही अपनी बुद्धि को दृढ़ करे ।। ६७ ।। १. 'यान्यतोऽन्यानि शास्त्राणि पृथिव्यां विविधानि वै । शङ्कनीयानि विद्वद्भिर्धर्मशुद्धिमभीप्सुभिः' । या वेदबाह्याः स्मृतयो याश्च काश्च कुदृष्टयः । सर्वास्ता निष्फलाः प्रेत्य तमोनिष्ठा हि ताः स्मृताः ।।'- ( मनु. १२।९५, सूत. सं. २।१४।१८ )
- विरोधात्ता ना० - पाठान्तरम् । ** भिमतौ ० - पाठान्तरम् ।
पार्थिवप्रकरणम् १४५ इति प्रणुन्ना द्वयवादकल्पना निरात्मवादाश्च तथा हि युक्तितः । व्यपेतशङ्काः परवादतः स्थिरा मुमुक्षवो ज्ञानपथे स्युरित्यतः* ॥६८॥ इतीति—इस प्रकार द्वैतवाद की कल्पना और निरात्मवाद का युक्तिपूर्वक खण्डन कर दिया गया। अतः मुमुक्षु विद्वान् लोग अन्यान्य वादों में न फँस कर सब प्रकार की शङ्काओं (सन्देह) का परित्याग करके अर्थात् निःशङ्क होकर वेदान्तशास्त्रनिर्दिष्ट ज्ञानमार्ग में स्थिर हो जायें ॥ ६८ ॥ हृदयस्पर्शिनी इस प्रकार भेदवाद की कल्पनाओं का युक्तिपुरःसर खण्डन किया गया, उसी तरह निरात्मवादी बौद्धों की कल्पनाओं का भी खण्डन किया गया। अतः मुमुक्षुगण वेदान्तातिरिक्त अन्यान्य शास्त्रीय वादों की ओर से निःशङ्क होकर वेदान्तोक्त ज्ञानमार्ग में सुस्थिर हो जायें ॥ ६८ ॥ स्वसाक्षिकं ज्ञानमतीव निर्मलं विकल्पनाभ्यो विपरीतमद्वयम् । अवाप्य सम्यग्यदि निश्चितो भवेत् निरन्वयो निर्वृतिमेति शाश्वतीम् ॥६९॥ स्वसाक्षिकमिति—इस आत्मसाक्षिक, अत्यन्त निर्मल, सब प्रकार की कल्पनाओं से विपरीत और अद्वय (अद्वैत) ज्ञान को प्राप्त करके मोक्षपथिक विद्वान् यदि सम्यक्तया निश्चय कर ले तो वह सम्पूर्ण अज्ञान और उसके कार्यों के सम्बन्ध से रहित होकर नित्य शान्ति अर्थात् अखण्ड आनन्दानुभव को प्राप्त कर लेता है ॥ ६९ ॥ हृदयस्पर्शिनी वेदान्तविहित ब्रह्मात्मज्ञान ही पुरुषार्थ का साधन है, इसलिये उसके स्वरूप को बताते हुए मुमुक्षुओं को तन्निष्ठ होने की आवश्यकता बता रहे हैं—इस स्वसाक्षिक (आत्मसाक्षिक), अत्यन्त निर्मल, विविध प्रकार की कल्पनाओं के विपरीत, और अखण्डवस्तुमात्राकार (अद्वय) ज्ञान को प्राप्त कर साधक यदि सम्यक् प्रकार से निश्चय कर ले तो वह अज्ञान और उसके कार्य के सम्बन्ध से रहित होकर अखण्ड आनन्दानुभवस्वरूपाविर्भावरूप शाश्वती निर्वृति का अनुभव करता है ॥ ६९ ॥ इदं रहस्यं परमं परायणं व्यपेतदोषैरभिमानवर्जितैः । समीक्ष्य कार्या मतिरार्जवे सदा न तत्त्वदृक्स्वा†न्यमतिर्हि कश्चन ॥७०॥ इदमिति—दोषरहित और अभिमानरहित मुमुक्षु विद्वान् इस परमगति रूप परम रहस्य का सम्यक् चिन्तन करके सर्वदा स्व-स्वरूप ब्रह्म में एकनिष्ठ हो जायें। आत्मा से भिन्न वस्तु में निष्ठा रखने वाला (अपने आराध्य को आत्मा से भिन्न मानने वाला) कोई भी पुरुष तत्त्ववेत्ता नहीं हो सकता ॥ ७० ॥ हृदयस्पर्शिनी यथोक्त ज्ञान के अधिकारी को बताते हुए तत्त्वनिष्ठा के स्वरूप को बता रहे हैं—जिसे पा कर शाश्वती निर्वृति को प्राप्त करता है, वह रहस्य एकमात्र उपदेशगम्य ही है। वह परमात्मतत्त्व का प्रकाशक होने से सर्वोत्तम (परम) है। वह निरवधिक सर्वाश्रय-परमगतिरूप (परायण) है। इस प्रकार आत्मज्ञान को सम्यक् आलोचना के द्वारा दृढ़ करे। इस प्रकार के आत्मज्ञान को प्राप्त करने के लिये इन्द्रियों की बहिर्मुखता को दूर करना होगा, और पाण्डित्य आदि के कारण उत्पन्न हुए चित्तदोषों को दूर कर (अभिमानरहित होकर) शान्त-दान्त बनना होगा। ऐसा अधिकारी ही अपनी बुद्धि को समस्वरूप (आर्जव अर्थात् ऋजुभावापन्न) ब्रह्मात्मतत्त्व में परिनिष्ठित कर सकता है। ब्रह्मात्मतत्त्व ही सर्वदा, सर्वत्र एकरूप होने से 'ऋजु' कहलाता है। उसके स्वरूप को ही आर्जव कहते हैं। क्योंकि उसमें निर्विशेषता रहती है। तथाच ब्रह्माऽभेदेन आत्मज्ञाननिष्ठा को ही तत्त्वनिष्ठा कहते हैं। इसी को व्यतिरेककथन के द्वारा विशद (स्पष्ट) कर रहे हैं—जो कोई प्रत्यगात्मा से भिन्न वस्तु को ही ब्रह्म मानकर, यदि उसी में निष्ठा रखनेवाला है, तो
- त्यतः—पाठान्तरम् । † शाप्यमति०—पाठान्तरम् । १९
१४६ उपदेशसाहस्री वह वस्तुतः तत्त्ववेत्ता (तत्त्वदृक्, तत्त्वदृष्टिसम्पन्न) नहीं है। क्योंकि श्रुति कह रही है—‘तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदि- दमुपासते’१ तथा ‘योऽन्यां देवतामुपास्तेऽन्योसावन्योऽहमस्मि इति न स वेद२ ॥ ७० ॥ अनेकजन्मान्तरसंचितैर्नरो विमुच्यतेऽज्ञाननिमित्तपातकैः । इदं विदित्वा परमं हि पावनं न लिप्यते व्योम* इवेह कर्मभिः ॥७१॥ अनेकेति—इस परम पवित्र आत्मतत्त्व का ज्ञान प्राप्त कर ज्ञानी पुरुष, जन्म-जन्मान्तर के सञ्चित अज्ञानजनित पापों से मुक्त हो जाता है, तदनन्तर पुनः वह इस लोक में आकाश के समान कर्मों से निर्लिप्त रहता है ॥ ७१ ॥ हृदयस्पर्शिनी अत्यन्त प्रयत्न से लब्ध हुए ज्ञान का फल बता रहे हैं—इस परम पवित्र आत्मतत्त्व का ज्ञान प्राप्त कर मनुष्य जन्म-जन्मान्तर के संचित हुए अज्ञान से उत्पन्न होनेवाले पापों से मुक्त हो जाता है। तदनन्तर पुनः इस संसार के कर्मों से वह आकाश के ही समान लिप्त नहीं होता है ॥ ७१ ॥ प्रशान्तचित्ताय जितेन्द्रियाय च प्रहीणदोषाय यथोक्तकारिणे । गुणान्वितायानुगताय सर्वदा प्रदेयमेतत्सततं मुमुक्षवे ॥७२॥ प्रशान्तचित्तायेति—गुरु का भी यह कर्तव्य है कि जो अत्यन्त शान्तचित्त, जितेन्द्रिय, दोषशून्य, शास्त्रोक्त स्वधर्म का आचरण करने वाला, सद्गुणसम्पन्न और अपने अनुकूल रहने वाला मोक्षकामी शिष्य हो, उसी को सतत इस आत्मज्ञान का उपदेश करे ॥ ७२ ॥ हृदयस्पर्शिनी आचार्य का कर्तव्य बताते हैं—वह आचार्य गुरु अपने शिष्य को जब अच्छी तरह परख ले कि शिष्य अत्यन्त शान्तचित्त, जितेन्द्रिय, दोषरहित, शास्त्रप्रतिपादित स्वधर्म का अनुसरण करने वाला तथा गुरु की आज्ञा का श्रद्धा-भक्ति से पालन करने वाला, गुणवान्, और अपने अनुकूल रहने वाला है, तब उस मोक्षेच्छु शिष्य को ही३ इस आत्मज्ञान को सर्वदा दे, जिस किसी को शिष्य मानकर इस आत्मतत्त्व ज्ञान को न दे ॥ ७२ ॥ परस्य देहे न †यथाभिमानिता परस्य तद्वत्परमार्थमीक्ष्य च । इदं हि विज्ञानमतीव निर्मलं संप्राप्य मुक्तोऽथ भवेच्च सर्वतः ॥७३॥ परस्येति—जिस प्रकार एक पुरुष के शरीर में दूसरे पुरुष को अभिमान नहीं होता है, उसी प्रकार अपने शरीर में भी अभिमानरहित हो जाय। यह तभी हो सकता है कि जब वह इस शरीर में परमार्थतत्त्व का साक्षात्कार कर ले, तथा इस अत्यन्त निर्मल ज्ञान को प्राप्त कर ले तभी वह सब ओर से सर्वथा मुक्त हो सकता है ॥ ७३ ॥ हृदयस्पर्शिनी उपर्युक्त प्रकार का शिष्य महावाक्य के द्वारा ज्ञात कराये जाने वाले आत्मतत्त्व को किस प्रकार से अवगत कर पाता है ? और उससे उसे क्या फलप्राप्ति होती है ? जिस प्रकार अपने से भिन्न दूसरे पुरुष के शरीर में किसी पुरुष को अभिमान नहीं होता अर्थात् मैं-मेरा इस प्रकार अभिमान नहीं होता, उसी प्रकार अपने शरीर में १. (के. उ. ४, ५, ६, ७, ८) २. (बृ. उ. १।४।१०) ३. ‘शान्तो दान्त उपरतस्तितिक्षुः समाहितो भूत्वात्मन्येवात्मानं पश्यति’—(बृ. उ. ४।४।२३ तथा गीता—६।३, २।६६, २।५८, १८।६६, २।१४, २।५३, १२।८, ४।३९, ४।४० तथा मोक्षधर्म प. ३१०।३५-३८ तथा भागवते ३।३२।३९-४२)
- भवदेव क—पाठान्तरम् । † यथाहममानिता०—पाठान्तरम् ।
पार्थिवप्रकरणम् १४७ भी परमार्थतत्त्व का अर्थात् देहातिरिक्त आत्मतत्त्व का साक्षात्कार कर अभिमानरहित होता हुआ इस अत्यन्त निर्मल ज्ञान को प्राप्त कर पुरुष सर्वथा मुक्त हो जाता है। अर्थात् अज्ञान और उसके कार्यभूत संस्कारों से रहित होकर परमानन्दानुभवरूप ब्रह्मात्मस्वरूप हो जाता है ॥ ७३ ॥ न हीह लाभोऽभ्यधिकोऽस्ति कश्चन स्वरूपलाभात् स इतो हि नान्यतः । न देयमैन्द्रादपि राज्यतोऽधिकं स्वरूपलाभं त्वपरीक्ष्य यत्नतः ॥७४॥ नहीति—इस संसार में स्वरूपलाभ (आत्मलाभ) से बढ़कर अन्य कोई लाभ नहीं है। वह लाभ वेदान्त- वाक्यों से ही हो सकता है, किसी अन्य उपाय (साधन) से नहीं। अतः इस आत्मलाभ को, जो इन्द्रलोक के राज्य से भी बढ़कर है, उसे प्रयत्न पूर्वक परीक्षा किये बिना किसी को नहीं देना चाहिये ॥ ७४ ॥ हृदयस्पर्शिनी गुणविशेषविशिष्ट शिष्य की परीक्षा करने की गुरु को आवश्यकता क्यों होती है ? जिस किसी भी आये हुए शिष्य को यह आत्मविद्या क्यों नहीं दी जाती ? इस संसार (देव-मनुष्यादि जन्मपरंपरा) में आत्मतत्त्वज्ञान (स्वरूपलाभ) से बढ़कर कोई दूसरा लाभ नहीं है१। और वह लाभ वेदान्तवाक्यों से ही हो सकता है, अर्थात् तत्त्व मस्यादि वाक्य का पदार्थविवेक करनेवाले मुमुक्षु को ही निःसंदिग्ध (निर्विचिकित्स) ‘अहं ब्रह्म’ इस प्रकार साक्षात्कार- रूप ज्ञान, जो वेदान्तवाक्य से उत्पन्न हुआ है, वही मोक्ष प्राप्त कराने में हेतु होता है; किसी अन्य शास्त्रान्तरों से नहीं होता है। इस कारण शिष्य की प्रयत्नपूर्वक परीक्षा किये बिना इस स्वरूपलाभ कराने वाले ज्ञान को नहीं देना चाहिये। क्योंकि यह लाभ इन्द्रलोक के राज्य से भी कहीं अधिक बढ़कर है। अतः ऐसे-वैसे किसी भी अनधिकारी शिष्य को यह ज्ञान कभी भी न दे। श्रुति ने भी यही आज्ञा दी है२ ॥ ७४ ॥ ॥ इति षोडशम्पार्थिवप्रकरणं समाप्तम् ॥ १. ‘आत्मलाभान्न परं विद्यते’—(आप. ध. १।२२।२) २. ‘प्राणाय्याय वान्तेवासिने नान्यस्मै कस्मैचन यद्यप्यस्मा इमामद्भिः परिगृहीतां धनस्य पूर्णां दद्यादेतदेव ततो भूयः’—(छां. उ. ३।११।६)
पद्यभाग १७: सम्यङ्मतिप्रकरणम्
सम्यङ्मतिप्रकरणम् आत्मा ज्ञेयः परो ह्यात्मा यस्मादन्यन्न विद्यते । सर्वज्ञः सर्वदृक् शुद्धस्तस्मै ज्ञेयात्मने नमः ॥१॥ आत्मेति—तत्त्वजिज्ञासु मनुष्य को आत्मज्ञान अवश्य प्राप्त करना चाहिये। क्योंकि सांसारिक जितने भी ज्ञेय पदार्थ हैं, उन सब से वह उत्कृष्ट है। तथा उससे पृथक् कोई अन्य पदार्थ है ही नहीं। वह (आत्मा) सर्वज्ञ, सर्वद्रष्टा (सर्वसाक्षी) और शुद्ध है। उस ज्ञातव्य (ज्ञेय) स्वरूप आत्मा को मेरा नमस्कार है ॥ १ ॥ हृदयस्पार्शिनी मोक्षसाधनभूत ज्ञान को परपक्ष का निराकरण करते हुए अभी तक बताया गया, अब अपनी प्रक्रिया के अनुसार भी उसे व्यक्त करने की इच्छा से प्रकरणान्तर का आरम्भ कर देवताभक्ति को विद्याप्राप्ति में अन्तरङ्ग साधन बताते हुए प्रणाम करने के व्याज से प्रकरणप्रतिपाद्य अर्थ को संक्षेप से बता रहे हैं। आत्मा का ज्ञान स्वरूपतः प्राप्त करना चाहिये। किन्तु घटज्ञान में ज्ञान का विषय मानकर घट का ज्ञान प्राप्त करते हैं, उस तरह आत्मज्ञान को नहीं मानना चाहिये। वह (आत्मा) यच्चयावत् समस्त ज्ञेय पदार्थों से उत्कृष्ट है। वह (आत्मा) ज्ञेयत्वधर्म से रहित है। क्योंकि उस आत्मा (स्वरूप) से भिन्न कोई अन्य पदार्थ, या उसका धर्म वस्तुतः नहीं है। तथाच—रूपरहित होने से चक्षुरादि इन्द्रिय का वह गोचर (विषय) नहीं है। तथा अपने तुल्य (स्व-समानजातीय) किसी अन्य व्यक्ति का प्रत्यक्ष न रहने से (प्रत्यक्ष व्यक्त्यन्तर के अभाव के कारण) व्याप्तिग्रह (व्याप्तिज्ञान) के न हो पाने के कारण अनुमान तथा अर्थापत्ति प्रमाण का भी वह विषय नहीं है। उसके सदृश अन्य वस्तु के न होने के कारण वह उपमान का भी विषय नहीं है। जाति, गुण, क्रिया आदि धर्मों के न होने से शब्दप्रमाण का भी वह विषय नहीं है। और ज्ञाता तो स्वरूप (आत्मा) ही है, उस कारण 'नास्ति'-नहीं है—यह भी स्वीकार नहीं कर सकते। परिशेषात् विषयभूत देह, इन्द्रिय, अन्तःकरण आदि का प्रत्याख्यान (निषेध) करते हुए अन्वेषण करने पर विषय के स्वरूप से रहित बल्कि समस्त विषयों का साक्षी ऐसा स्वयंप्रकाश आत्मा जानने योग्य है, अर्थात् ज्ञेय है। एवं त्वंपदार्थ शोधन कर, वह (त्वम्) तत् पदार्था्रूप ही है, और वही वाक्यार्थ है, यह बताने के लिये 'तत्' पदार्थ को बता रहे हैं—ग्रन्थकार ने 'सर्वज्ञ' और 'सर्वदृक्' दो शब्दों का प्रयोग किया है। उनमें 'सर्वज्ञ' उसे कहते हैं, जो सामान्यतः सब जानता है— 'सामान्यतः सर्वं जानातीति सर्वज्ञः'। और विशेषतः जो सब देखता है, उसे 'सर्वदृक्' कहते हैं—'विशेषतः सर्वं पश्यतीति सर्वदृक्'। सर्वज्ञत्व को उपलक्षण (तटस्थलक्षण) बताकर उसके स्वरूपलक्षण को कह रहे हैं कि वह अनृत, जड़, परिच्छिन्न, दुःखादि प्रपञ्च के संसर्ग से रहित, सत्य-ज्ञान-अनन्त-आनन्दरूप है। और 'तत्'-'त्वम्' इन दो पदार्थों का जो ऐक्य (एकता) वही वाक्यार्थ है। ऐसे सर्वज्ञत्त्वाद्युपलक्षित सत्य, ज्ञान, अनन्त, आनन्द, सर्वसाक्षी, शुद्ध, ज्ञेयस्वरूप आत्मा के लिये प्रणाम (प्रह्वीभाव) है। यहाँ पर 'भेददृष्टि का विलय' होना ही 'नमः' शब्द का अर्थ है ॥ १ ॥ पदवाक्यप्रमाणज्ञैर्दीपभूतैः प्रकाशितम् । ब्रह्म वेदरहस्यं यैस्तान्नित्यं प्रणतोऽस्म्यहम् ॥२॥ पदवाक्येति—पद (व्याकरण), वाक्य (मीमांसा), और प्रमाण (न्यायशास्त्र) अर्थात् पद-वाक्य-प्रमाण- पारावारीण प्रदीपस्वरूप जिन गुरुजनों ने ब्रह्म (परब्रह्म और वेद) के रहस्य को प्रकाशित किया है, उनके चरणा- रविन्दों में मैं नित्य प्रणाम करता हूँ ॥ २ ॥
सम्यङ्मतिकरणम् १४९ हृदयस्पशिनी देवताभक्ति की तरह गुरुभक्ति भी विद्या प्राप्ति¹ का अन्तरङ्ग साधन है। कहा भी है— 'यस्य देवे परा भक्तिर्यथा देवे तथा गुरौ। तस्यैते कथिता ह्यर्थाः प्रकाशन्ते महात्मनः²' ।। इतना बताकर गुरुपरम्परा को प्रणाम कर रहे हैं। पद, वाक्य और प्रमाण के रहस्य को जानने वाले अर्थात् पदों की शक्ति और वाक्यों की तात्पर्यमर्यादा के अनुसार प्रमाणों को जानने वाले (पद-वाक्य-प्रमाणज्ञ) अथवा पद-वाक्य और अनुमानादि को जानने वाले दीपकस्वरूप अर्थात् बिना आयास के ही सर्वार्थप्रकाशक जिन गुरुचरणों ने वेद के रहस्य को प्रकट किया है, उन्हें मैं सर्वदा प्रणाम करता हूँ ।। २ ।। यद्वाक्सूर्यांशुसंपातप्रणष्टध्वान्तकल्मषः । प्रणम्य तान् गुरून् वक्ष्ये ब्रह्मविद्याविनिश्चयम् ।।३।। यदिदिति—जिनकी वाणी स्वरूप रविरश्मियों के संस्पर्श से मेरे अज्ञानरूप पापराशि का ध्वंस हो गया है, उन गुरुचरणों में प्रणाम कर मैं ब्रह्मविद्या के निश्चायक न्याय को बता रहा हूँ ।। ३ ।। हृदयस्पशिनी सामान्यतया आचार्यपरम्परा को प्रणाम करके विशेषतया अपने गुरु को प्रणाम करते हुए अपने उद्देश्य की प्रतिज्ञा करते हैं—जिसके वाक्यरूप रविकिरणों के सम्पर्क से मेरे अज्ञानरूप पापराशि का नाश हो गया, उस श्री गुरु को प्रणाम कर मैं ब्रह्मविद्या का निश्चय कराने वाले एक विशेष न्याय को बताऊँगा ।। ३ ।। आत्मलाभात्परो नान्यो लाभः कश्चन विद्यते । यदर्था वेदवादाश्च स्मार्ताश्चापि तु याः क्रियाः ।।४।। आत्मेति—संसार में आत्म लाभ से बढ़कर अन्य कोई लाभ नहीं है। जिसे प्राप्त करने के लिये ही सम्पूर्ण वेदवाद और स्मृतिप्रतिपादित क्रियाएँ ( कर्मकाण्ड ) हैं ।।४।। हृदयस्पशिनी ब्रह्मविद्या का विनिश्चय किसलिये बताया जायगा ? उत्तर यही होगा कि आत्मलाभ से बढ़कर अन्य कोई लाभ नहीं है। जिसके लिये समस्त वेदवचन हैं और समस्त स्मार्तवचन हैं, और जो वेद-स्मृतिविदित कर्म- परक वचन हैं, वे भी चित्तशुद्धिपरम्परया आत्मलाभ के लिये ही हैं ।। ४ ।। आत्मार्थोऽपि हि यो लाभः सुखायेष्टो विपर्ययः । आत्मलाभः परः प्रोक्तो नित्यत्वाद्व्रह्मवेदिभिः ।।५।। आत्मार्थ इति—संसार में जिस लाभ ( स्त्री-पुत्र-धन-गृह-आदि ) को सुख का कारण समझा जाता है, वह भी सब आत्मा के लिये ही होता है। वे ही सुखसाधनीभूत पदार्थ, किसी समय, किसी-किसी के लिये दुःखप्रद भी हो जाते हैं। परन्तु ब्रह्मज्ञ विद्वानों ने आत्मलाभ को परम लाभ कहा है, क्योंकि वह नित्य सुखमय है ।। ५ ।। हृदयस्पशिनी पुत्र आदि के लाभ से आत्मलाभ श्रेष्ठ रहने पर भी पुत्रादि का परित्याग करना आवश्यक होने के कारण आत्मलाभ के उपाय का आश्रय करना उचित नहीं है, क्योंकि वह (पुत्रादिकों का आश्रय करना) भी आत्म- सुख में हेतु है—इस प्रकार की आशंका होती है, किन्तु उसका समाधान यही है कि संसार में सुख के लिये जिस १. 'शास्त्रज्ञोऽपि स्वातन्त्र्येण ब्रह्मज्ञानान्वेषणं न कुर्यात्'—(मुं. उ. १।१।१२) भाष्ये तथा 'असम्प्रदायवित् सर्वशास्त्रविदपि- मूर्खवदेव उपेक्षणीयः—(गीताभाष्ये १३।२) २. ( श्वे. उ. ६।२३ )
१५० उपदेशसाहस्री पुत्र-धनादिविषयक लाभ को अभीष्ट समझा जाता है, वह भी आत्मसुख के लिये ही है। इस पर भी पुनः शंका हो सकती है कि यदि पुत्र-धनादि के लाभ से ही आत्मसुख की प्राप्ति हो जाती है तो आत्मलाभार्थ आत्मज्ञान के लिये इच्छा क्यों रखनी चाहिये ? क्योंकि आत्मसुख दोनों में समान ही है । इस शंका का समाधान यह होगा कि संसार में पुत्र-धन आदि का लाभ, जो सुख का हेतु माना गया है, दुःख का हेतु भी हो जाया करता है, कदाचित् किसी के दुःख का हेतु उसका पुत्र ही बन जाता है। तस्मात् अन्यान्य लाभों की अपेक्षा आत्मलाभ ही परम श्रेष्ठ है। इसलिये सर्वसंगपरित्याग करके भी आत्मज्ञान का ही सम्पादन करना चाहिये । उसके नित्य होने से उसमें विपर्यय की आशंका होने का प्रश्न ही नहीं है। इसलिये ब्रह्मवेत्ताओं ने आत्मलाभ को परम लाभ कहा है। श्रुति भी कह रही है—‘तदेतत्प्रेयः पुत्रात् प्रेयो वित्तात् प्रेयोऽन्यस्मात् सर्वस्मात् सर्वस्मादन्तरतरं यदयमात्मा । स योऽन्यमात्मनः प्रियं ब्रुवाणं ब्रूयात् प्रियं रोत्स्यतीतीश्वरो ह तथैव स्यादात्मानमेव प्रियमुपासीत स य आत्मानमेव प्रियमुपास्ते न हास्य प्रियं प्रमायुक्तं भवति१ इति ॥ ५ ॥ स्वयं लब्धस्वभावत्वाल्लाभस्तस्य न चान्यतः । अन्यापेक्षस्तु यो लाभः सोऽन्यदृष्टिसमुद्भवः ॥६॥ स्वयमिति—वह आत्मा तो स्वाभाविक रूप से नित्य प्राप्त ही है। उसको प्राप्त करने के लिये किसी अन्य साधन की आवश्यकता नहीं है। क्योंकि अन्य सांसारिक (लौकिक) साधन से आत्मलाभ की प्राप्ति नहीं होती । जिस लाभ की प्राप्ति में किसी अन्य साधन की अपेक्षा रहती है, उस लाभ की उत्पत्ति परापेक्ष (पराधीन) होती है। उस लौकिक अन्य (पर) साधन के न होने पर वह लौकिक लाभ भी क्षीण (नष्ट) हो जाता है, अतः वह लौकिक लाभ अनित्य है, किन्तु आत्मलाभ नित्य है, क्योंकि उसे किसी अन्य उपाय की अपेक्षा नहीं है, वह नित्य लब्ध (प्राप्त) ही है ॥ ६ ॥ हृदयस्पशिनी आत्मसुख के लाभ की पूर्वोक्त नित्यता को सिद्ध कर रहे हैं—वह आत्मलाभ, किसी अन्य के द्वारा प्राप्त नहीं होता, क्योंकि वह नित्यप्राप्तस्वरूप है अर्थात् वह किसी साधन (उपाय) से साध्य (प्राप्य) होने वाला नहीं है। जो लाभ अन्य की अपेक्षा रखता है, वह अन्य साधनों से उत्पन्न होने वाला होता है। उन अन्य साधनों का अभाव रहने पर उसका भी अभाव हो जाता है। अतः वह पुत्र-धन आदि से होने वाला सुखलाभ अनित्य है ॥६॥ अन्यदृष्टिस्त्वविद्या स्यात्तन्नाशो मोक्ष उच्यते । ज्ञानेनैव तु सोऽपि स्याद्विरोधित्वान्न कर्मणा ॥७॥ अन्यदृष्टिरिति—अनात्मा (जड़ पदार्थों) में आत्मदृष्टि अर्थात् अन्यदृष्टि को ही अविद्या कहते हैं, और उस अविद्या के विनाश को मोक्ष कहते हैं। उस मोक्ष की प्राप्ति (अविद्या का विनाश) ज्ञान से ही हो सकता है, कर्म से नहीं, क्योंकि वह ज्ञान ही 'अज्ञान' का विरोधी है ॥ ७ ॥ हृदयस्पशिनी उपर्युक्त श्लोक में अन्यापेक्ष लाभ को अन्यदृष्टिसमुद्भव कहा है। अर्थात् अनात्मलाभ अन्यदृष्टि- समुद्भव है। परन्तु यह 'अन्यदृष्टि' क्या है ? और अन्यदृष्टिसमुद्भव होने से अन्य पुत्रादि लाभ के अनित्य होने में क्या हानि है ? इस शंका के समाधान में कहते हैं कि 'अन्यस्मिन् अनात्मनि दृष्टिः प्रतीतिः यस्याः सा अन्यदृष्टिः'—अनात्मविषयक प्रतीति जिससे होती है, वह अविद्या ही यहाँ पर 'अन्यदृष्टि' शब्द से विवक्षित है। अर्थात् अनात्मा में आत्मदृष्टि रखना ही 'अन्यदृष्टि' है। ततश्च पुत्र-धनादि की प्राप्ति में ही जिस लाभ की प्रतीति होती है, वह अविद्याकृत भ्रान्ति के कारण होती है। वह लाभ की प्रतीति, स्वप्न के तुल्य है, उससे नित्य आत्मसुख की हानि होगी। तथाच अविद्या की निवृत्ति हुए बिना आत्मस्वरूप के नित्य सुख का लाभ होना संभव नहीं। अतः अविद्यानाश को ही मोक्ष कहा जाता है। अर्थात् नित्य निरतिशय परमानन्दाविर्भाव, जो अविद्या के नाश से ही होता है, १. (बृ० उ० १।४।८)
सम्यङ्मतिप्रकरणम् १५१ वह अविद्यानाशरूपी मोक्ष, 'ज्ञान' से ही हो सकता है; 'कर्म' से नहीं, क्योंकि ज्ञान ही अज्ञान का विरोधी है; कर्म नहीं। तस्मात् सर्वकर्मपरित्याग करके आत्मज्ञान का संपादन करे ॥ ७ ॥ कर्मकार्यस्त्वनित्यः स्यादविद्याकामकारणः । प्रमाणं वेद एवात्र ज्ञानस्याधिगमे स्मृतः ॥ ८ ॥ कर्मेति—कर्म से उत्पन्न होनेवाला फल (कर्मकार्य) अनित्य होता है, अविद्याजनित कामना ही उसकी कारण होती है। इस ज्ञान की प्राप्ति (अधिगम) में वेद को ही प्रमाण माना गया है ॥ ८ ॥ हृदयस्पर्शिनी विरोध न रहने से कार्यसहित अविद्यानिवृत्तिरूप मोक्ष, कर्म के द्वारा भले ही न हो, तथापि स्वर्गप्राप्ति के समान कर्म के द्वारा नित्य पुरुषार्थ रूप मोक्ष की प्राप्ति हो जायगी, तब ज्ञान की क्या आवश्यकता ? इस शंका का समाधान यह है कि कर्म का फल अनित्य होता है, क्योंकि अविद्याजन्य कामना (इच्छा) ही उसमें हेतु है। ज्ञानसाध्य फल ही नित्य होता है, इसमें वेद ही प्रमाण हैं। तथाहि—'तद्यथेह कर्मजितो लोकः क्षीयत एवमेवामुत्र पुण्यजितो लोकः क्षीयते' १, 'ब्रह्मविदाप्नोति परम्' २, 'तरति शोकमात्मवित्' ३ इत्यादि वेदवाक्यों को ही विद्वानों ने कर्मसाध्य के अनित्य होने में तथा ज्ञानसाध्य मोक्ष के नित्य होने में प्रमाण माना है ॥ ८ ॥ ज्ञानैकार्थपरत्वात्तं वाक्यमेकं ततो विदुः । एकत्वं ह्यात्मनो ज्ञेयं वाक्यार्थप्रतिपत्तितः ॥ ९ ॥ ज्ञानेति—वह वेद वस्तुतः एकवाक्य ही है, क्योंकि उसका, 'ज्ञान' ही एकमात्र फल है। उस एकवाक्य [महा- वाक्य] के अवान्तरवाक्य और महावाक्य के अर्थज्ञान से आत्मा की एकता ही जाननी चाहिये। अर्थात् ब्रह्मात्मैक्यज्ञान प्राप्त करना चाहिये ॥ ९ ॥ हृदयस्पर्शिनी किंच—सम्पूर्ण वेद, अध्ययन-विधि से उपात्त होने के कारण उसका अपुरुषार्थ में पर्यवसान न होने से, परमपुरुषार्थ में ही पर्यवसान कहना होगा। तब सम्पूर्ण वेद को आत्मैक्यज्ञानपरक समझना होगा, जिससे उसका महातात्पर्य 'कर्म' में नहीं हो सकेगा। वाक्यप्रमाणकोविद लोग वेद को एकवाक्यरूप मानते हैं, क्योंकि ज्ञान ही उसका एकमात्र प्रयोजन है। वेद के 'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म' आदि अवान्तर वाक्यार्थप्रतिपत्ति द्वारा 'तत्त्वमसि' आदि महावाक्यों से आत्मा का एकत्व ही ज्ञेय है अर्थात् ब्रह्मैकत्व ज्ञेय है। क्योंकि आत्मतत्त्वज्ञान ही परम पुरुषार्थ का हेतु है। कर्मकाण्ड भी तत्त्वज्ञान के लिये अपेक्षित चित्तशुद्धि में हेतुभूत कर्मविधान द्वारा परम्परया परमपुरुषार्थ के साधन के रूप में स्वीकृत होता है। उस कारण एकार्थ में ही पर्यवसान होने से वेदवाक्य को एक ही वाक्य मानना युक्तियुक्त है ॥ ९ ॥ वाच्यभेदात्तु तद्भेदः कल्प्यो वाच्योऽपि तच्छ्रुतेः । त्रयं त्वेतत्ततः प्रोक्तं रूपं नाम च कर्म च ॥ १० ॥ वाच्यभेदादिति—वाच्य (अर्थ) के भेद से शब्द (वाचक) भेद होता है, और शब्दभेद से वाच्यभेद की कल्पना की जाती है। अतएव भगवती श्रुति ने समस्त प्रपञ्च को नाम, रूप और कर्म त्रयरूप कहा है ॥ १० ॥ १. (छां. उ. ८।१।६) २. (तै. उ. २।१) ३. (छां. उ. ७।१।३)
१५२ उपदेशसाहस्री हृदयस्पर्शिनी यदि कहें कि 'आत्मा', 'ब्रह्म' आदि शब्द एक-दूसरे के पर्याय न होने के कारण उनके वाच्य 'आत्मा' और 'ब्रह्म' में अभेद नहीं हो सकता, अर्थात् 'आत्मा' और 'ब्रह्म' दोनों में एकत्व (ऐक्य) ज्ञान का होना उपपन्न नहीं हो सकता। किन्तु यह कहना ठीक नहीं है; क्योंकि वाच्यों के भेद से शब्दभेद और शब्दभेद से वाच्यभेद की कल्पना करने पर ही वाच्यभूत जीव-ब्रह्म का भेद होने पर तद्वाचक दोनों शब्दों का अपर्यायत्व सिद्ध होता है। तथा अपर्यायत्व के सिद्ध होने पर वाच्यरूप जीव-ब्रह्म का भेद सिद्ध हो पाता है। अतः अन्योन्याश्रय (इतरेतराश्रय) दोष उपस्थित होता है। अभिप्राय यह है कि स्वरूपतः (स्वरूप से) भेद की कल्पना करने में कोई प्रमाण नहीं है। इस पर प्रश्नकर्ता ने पुनः प्रश्न किया कि यदि भेद के अप्रामाणिक होने से एकत्व ज्ञान को उपपन्न कहो तो भेद भी प्रमाणसिद्ध है। क्योंकि “त्रयं वा इदं नाम रूपं कर्म” १ इस श्रुति ने उस आत्मा के अतिरिक्त (भिन्न) रूप, नाम और कर्म भी बताये हैं। अतः अनेकत्व (भेद) ही वेदार्थ है। उस पर सिद्धान्ती, भेदवाद का खण्डन कर एकत्व को सिद्ध कर रहा है—वह कहता है कि 'त्रयं वा इदं नाम रूपं कर्म' इस श्रुति में समस्त शब्दविशेष का वाङ्मात्रत्व, रूपविशेष का चक्षुर्मात्रत्व, और कर्मविशेष का शरीर- मात्रत्व बताया गया है। ये तीनों एक दूसरे से कल्पित हैं अर्थात् परस्परसापेक्षसिद्धि वाले हैं। इसलिये ये तीनों असत् हैं। भेद अन्योन्याश्रयदोष से ग्रस्त होने के कारण उस (भेद) को वस्तुतः जानना शक्य नहीं। अतः उसमें प्रामाणिकता नहीं है, तथापि कथञ्चित् लोकव्यवहारसिद्ध जो मिथ्या भेद है, उसीका केवल अनुवाद मात्र श्रुति ने वैराग्य पैदा करने के लिये किया है। अतः अद्वैत ज्ञान के होने में कोई विरोध नहीं है। अथवा—सम्पूर्ण वेद को एकार्थज्ञानपरक होने मात्र से एकवाक्य कैसे कहा जा सकता है? क्योंकि अपुनरुक्त शब्दभेद के कारण अर्थभेद की प्रतीति हो रही है। ऐसी शंका यदि कोई करे तो सिद्धान्ती कहता है कि शंका करने वाले की शंका करना उचित है, तथापि उन अपुनरुक्त शब्दों का तात्पर्य अर्थभेद में नहीं है। क्योंकि भेद (द्वैत) तो प्रमाणों से, युक्तियों से बाधित हो चुका है। वाच्यभेद के प्रामाणिक रहनेपर उसमें तात्पर्य रखने वाले शब्दों के भेद से अनेक वाक्य सिद्ध हुआ करते हैं। वाच्यभेद भी वाचक- शब्दभेद के श्रवण से कल्प्य है, अन्यथा वाच्यभेद को सिद्ध करने का अन्य कोई प्रकार नहीं है। अर्थतत्त्व का निश्चय करना शब्द के अधीन नहीं होता, क्योंकि आरोपित विषय में भी शब्दभेद (भिन्न शब्द) दिखाई पड़ते हैं तथा शब्द- निश्चय करना भी अर्थ के अधीन नहीं है, क्योंकि एक ही पुरुष व्यक्ति में पिता, भ्राता, मातुल, जामाता, पितृव्य इत्यादि उपाधिभेदों से अपुनरुक्त शब्दभेद दिखाई देते हैं। उक्त उदाहरण में प्रतियोग्युपाधिभेद के बिना वस्तु का भेद नहीं हुआ है। तथाच अनादि अविद्या से कल्पित अनेक उपाधियों के भेद से युक्त अनेक कर्त्रादि कारक भेद का अनुवाद कर, ज्ञान के लिये अपेक्षित अन्तःकरणशुद्धि के साधनभूत कर्मविधिपरक होने से कर्मकाण्ड और आत्मतत्त्व- ज्ञानकाण्ड के वाक्यों की एकवाक्यता उपपन्न हो जाती है। और निरतिशयानन्द तथा आत्यन्तिक दुःखनिवृत्तिरूप फल की इच्छा सभी को स्वाभाविक रूप से रहती है। उस इच्छा की पूर्ति का उपाय एकमात्र आत्मतत्त्वज्ञान ही है, उसके अतिरिक्त अन्य कोई उपाय नहीं है। अतः अविद्या के समान अवस्थारूप उपाधि के भेद से अधिकारी का भेद और प्रयोग का भेद उपपन्न हो जाता है। एवं च एकपुरुषापेक्षित एकमात्र परमपुरुषार्थ के एकमात्र साधन का प्रकाशक होने से वेद की एकवाक्यता (वेद को एक महावाक्य) कहना उचित ही है। इस रीति से द्वैत के अविद्याकल्पित होने में युक्ति बताकर अब प्रमाण भी बताते हैं। जबकि इस प्रपञ्च के आकारभेद का निरूपण नहीं किया है, उस कारण यह जो सम्पूर्ण दृश्य नाम, रूप और कर्म है, इन तीनों को सामूहिक रूप में (राशि के रूप में) श्रुति ने कह दिया है। और हेतु बताते हुए तत्तद्विशेषों का प्रविलापन कर अर्थात् भेद का निराकरण कर उसे सामान्य रूप से इनका त्रित्व बता कर ये तीनों (यह त्रय) एकमात्र 'सत्' आत्मा ही है, इस प्रकार अन्त में यह स्पष्ट बताया है कि यह एकमात्र सत्स्वरूप आत्मा ही है, ये तीन नहीं हैं और यह सम्पूर्ण जगत् एक आत्मस्वरूप ही है, इसमें तात्त्विक भेद नहीं है ॥१०॥ असदेतत्त्रयं *तस्मादन्योन्येन हि कल्पितम् । कृतो †वर्णो यथा शब्दाच्छ्रुतोऽन्यत्र धिया बहिः ॥११॥ १. (बृ. उ. १।६।१ )
- यस्मा—पाठान्तरम् । † रूपां०—पाठान्तरम् ।
सम्यङ्मतिप्रकरणम् १५३ असदिति-ये तीनों (नाम, रूप, कर्म) कल्पित (मिथ्या) हैं, क्योंकि इन तीनों की कल्पना, परस्पर एक दूसरे से की जाती है। जैसे शब्द के द्वारा श्रुत तथा बुद्धिपूर्वक बाहर भित्ती आदि पर लिखे हुए वर्ण मिथ्या होते हैं॥ ११॥ हृदयस्पर्शिनी पूर्व श्लोक में सम्पूर्ण प्रपञ्च को समग्र रूप से 'नाम, रूप, और कर्म'-इस प्रकार त्रिविध बताया। इन तीनों की परस्पर एक दूसरे की अपेक्षा से कल्पना की जाती है, उस कारण ये मिथ्या हैं। जिस प्रकार शब्द द्वारा सुने गये वर्ण अर्थात् इन्द्रादि रूपविशेष सहस्राक्ष, वज्रबाहुत्व आदि की अपनी बुद्धि से कल्पना कर बाहर भित्ति आदि पर काढ़े हुए वर्ण की तरह कल्पित मिथ्या होते हैं। निष्कर्ष यह है कि जब हम चित्र में किसी देवता आदि का (सहस्राक्ष- वज्रबाहु वाला) रूपविशेष देखते हैं, वैसा ही वास्तविक रूप इन्द्र का नहीं रहता है। अतः शब्द, मिथ्या अर्थ को बताता है॥ ११॥ दृष्टं चापि यथा रूपं बुद्धेः शब्दाय कल्पते। एवमेतज्जगत्सर्वं भ्रान्तिबुद्धिविकल्पितम् ॥१२॥ दृष्टमिति-जिस प्रकार चित्र में किसी देवता आदि का रूप देखते हैं, तब वह देखा हुआ (दृष्ट) रूप, 'यह राम, कृष्ण' आदि देवता का ज्ञान (बुद्धि) उत्पन्न कराता है, और वह ज्ञान शब्दव्यवहार का कारण बन जाता है, किन्तु वह कल्पनाजनित होने के कारण मिथ्या ही है। उसी प्रकार यह सम्पूर्ण जगत् भ्रान्त बुद्धि के द्वारा ही कल्पित हैं, अतः भ्रमजनित होने के कारण मिथ्या ही है॥ १२॥ हृदयस्पर्शिनी शब्द से मिथ्या अर्थकल्पना को बताकर अब मिथ्या अर्थ से शब्दकल्पना को बताते हैं। किसी भित्ति पर या कपड़े पर चित्रित किये गये देवता रूप को देखने से संस्कृत हुई बुद्धि में ठीक उसी तरह वह रूप समा जाता है और तदनुसार शब्दव्यवहार किया जाता है। उसी तरह यह सम्पूर्ण जगत् भ्रान्त बुद्धि से कल्पित हुआ है। जैसे भ्रान्त बुद्धि से (मिथ्या ज्ञान से) शुक्ति में रजत की कल्पना की जाती है, वैसे ही आत्मा में विविध नाम-रूप-कर्मात्मक जगत् की भ्रान्त बुद्धि से (मिथ्या ज्ञान से) कल्पना की गई है, वस्तुतः वह 'सत्' नहीं है॥ १२॥ असदेतत्ततो युक्तं *संविन्मात्रं न कल्पितम्। वेदश्चापि स एवाद्यो वेद्यं चान्यत्तु कल्पितम् ॥१३॥ असदिति-अतः इस प्रपञ्च को मिथ्या कहना उचित ही है। केवल सत्-चित् स्वरूप आत्मा ही ऐसा है, जो कल्पित नहीं है। उसी तरह पूर्वसिद्ध आत्मा ही वेद है जो ज्ञान का हेतुभूत है। और वही वेद्य (ज्ञेय) है, उसके अतिरिक्त सभी कल्पित है। अतः सब मिथ्या है। ज्ञान के हेतुभूत श्रुति (वेद) और आचार्य भी आत्मस्वरूप ही हैं। क्योंकि आत्मा के अतिरिक्त अनात्म (जड़) पदार्थों में अर्थ को प्रकट करने की शक्ति नहीं होती॥ १३॥ हृदयस्पर्शिनी जगत् को मिथ्या सिद्ध कर देने पर यही कहना होगा कि सभी यदि कल्पित हैं तो बौद्धों के शून्यवाद में और सभी को कल्पित कहने में अन्तर ही क्या रहा ? इस शंका के उत्तर में बता रहे हैं कि बिना अधिष्ठान (निरधि- ष्ठान) कल्पना नहीं होती। समस्त कल्पनाओं के करने योग्य अधिष्ठान सचिन्मात्र (प्रत्यक् तत्त्व) है, वह सब का साक्षी होने से समस्त कल्पनाओं के पूर्व से ही सिद्ध है, अतः वही एकमात्र कल्पित नहीं है। किन्तु पुनः शंका होती है कि आत्मतत्त्वज्ञान के हेतुभूत वेद और आचार्य भी कल्पित नहीं हैं, तब सचिन्मात्र को ही अकल्पित कैसे कहा गया ? सचिन्त्स्वरूप आत्मा कल्पित नहीं और पूर्वसिद्ध आत्मा ही वेद और वेद्य भी है। वही श्रुति तथा आचार्य के रूप में माया के द्वारा प्रकट किया जाता है क्योंकि अर्थप्रकाशन की शक्ति का होना जड़ पदार्थ में कभी संभव नहीं। अग्नि की प्रकाशन शक्ति से भिन्न कोई अन्य (अपर) प्रकाशनशक्ति दीपक की नहीं हुआ करती। आत्मतत्त्व ही एकमात्र वेद्य है, वही पूर्वसिद्ध है। उसके अतिरिक्त जो भी विशेष है, वह सभी कल्पित है। तथाच कल्पित विशेष का अनुगत
- सच्चिन्मात्रं०-पाठान्तरम्। २०
१५४ उपदेशसाहस्री होने के कारण आत्मा ही बोधक है और समस्त कल्पनाओं के अपवाद (बाध) की अवधि होने के कारण वह आत्मा ही बोध्य है, यह समझना चाहिये ॥ १३ ॥ येन वेत्ति स वेदः स्यात्स्वप्ने सर्वं तु मायया । येन पश्यति तच्चक्षुः शृणोति श्रोत्रमुच्यते ॥१४॥ येनेति—स्वप्नावस्था में पदार्थों का ज्ञान जिसके द्वारा होता है, उसे वेद (आत्मा) कहते हैं। उस स्वप्न में जो वेद्य (ज्ञेय) है, वह भी माया से कल्पित है, उसे देखने वाला (स्वप्नद्रष्टा) वह आत्मा ही है। उस समय जिसके द्वारा वह आत्मा (जीव) देखता है, उसे चक्षु कहते हैं और जिसके द्वारा वह सुनता है, उसे श्रोत्र कहते हैं ॥ १४ ॥ हृदयस्पशिनी इसी कथन को स्वप्न का दृष्टान्त देकर समझाते हैं—वही पूर्वसिद्ध आत्मा, आद्य (वेद) और वेद्य है। स्वप्नावस्था में जिसके द्वारा समस्त स्वाप्न पदार्थों का ज्ञान होता है, वही वेद है। स्वप्न में चिदात्मा के अतिरिक्त अन्य कोई भासक नहीं है। उस समय आदित्यादि ज्योतियों का उपरम रहता है। यह आत्मा तो स्वयं ज्योतिःस्वरूप१ है। उस स्वप्नावस्था में जो भी कुछ है वह सब माया के कारण वेद्य है। अतः वह आत्मा भी वेद्य है। स्वप्न में अवकाश न रहने से कोई बाह्य विषय नहीं रहता। तथाच (आत्मा की) स्वसाक्ष्यभूत मायाकृत उपाधि के भेद से युक्त हुआ वह आत्मा ही अपने से (आत्मना) वेद्य होता है। और उसमें अनुस्यूत चिद्रूप से वेदनरूप भी होता है, इस प्रकार 'वेद्य-वेदितृभाव' मायिक है। स्वप्नावस्था में चक्षुरादि इन्द्रियों का उपरम होने से स्वप्नगत आत्मा, जिससे रूप देखता है, वही चक्षु है ऐसा समझना चाहिये । तथा जिसके द्वारा सुनता है, वह श्रोत्र कहलाता है ॥ १४ ॥ येन स्वप्नगतो वक्ति सा वाग्घ्राणं तथैव च । रसनस्पर्शने चैव मनश्चान्यत्तथेन्द्रियम् ॥१५॥ येनेति—जिसके द्वारा स्वप्न में बोलता है, वह वाणी है, और जिससे सूँघता है, वह घ्राण कहलाता है। इसी प्रकार रसना, त्वचा और मनरूप अन्य इन्द्रियों को भी समझना चाहिये ॥ १५ ॥ कल्प्योपाधिभिरेवैतद्भिन्नं ज्ञानमनेकधा । आधिभेदाद्यथा भेदो मणेरेकस्य जायते ॥१६॥ कल्प्येति—जिस प्रकार नील-पीत आदि उपाधियों के भेद से एक ही मणि में भेद की प्रतीति होने लगती है, उसी प्रकार स्वप्नकल्पित चक्षु-श्रोत्रादि विभिन्न उपाधियों के कारण यह एक ही 'ज्ञान' चाक्षुष ज्ञान, श्रावण ज्ञान आदि अनेक प्रकार के भेदों को प्राप्त हो जाता है ॥ १६ ॥ हृदयस्पशिनी एकरूप चैतन्य अर्थात् एक ही ज्ञान वेदादिरूप से अर्थात् वेद्य-वेदक-चक्षुरादि रूप से अनेक प्रकार के भेदों को कैसे प्राप्त होता है ? स्वप्न-कल्पित अनेक उपाधियों के कारण यह एक ही ज्ञान अनेक प्रकार के भेदों को प्राप्त हो जाता है। जैसे नील-पीतादि उपाधियों के भेद से एक ही स्फटिकमणि में अनेक भेदों की प्रतीति होती है। वस्तुतः ज्ञान एक ही है, किन्तु चक्षुःश्रोत्रादि विभिन्न उपाधियों के कारण चाक्षुष ज्ञान, श्रावण ज्ञान आदि विभिन्न रूप से व्यवहार किया जाता है ॥ १६ ॥ जाग्रतश्च *तथा भेदो ज्ञानस्यास्य विकल्पितः । बुद्धिस्थं व्याकरोत्यर्थं भ्रान्त्या तृष्णोद्भवक्रियः ॥१७॥ १. (बृ. उ. ४।३।९) ३. (बृ. उ. ४।३।९)
- यथा०—पाठान्तरम् ।
सम्यङ्मतिप्रकरणम् १५५ जाग्रत इति—जिस प्रकार स्वप्न में कल्पित उपाधियों के कारण एक ही ज्ञान के अनेक भेद हो जाते हैं, उसी प्रकार जाग्रत् अवस्था के ज्ञान का भेद भी आरोपित है, जिसमें अज्ञानवश कामनाजनित क्रिया की प्रतीति होती है, और यह जीव (आत्मा) बुद्धि में स्थित विषय को आत्मगत (अपना) समझ कर व्यवहार करता रहता है ॥ १७ ॥ हृदयस्पर्शिनी जैसे स्वप्न में कल्पित अनेक उपाधियों के कारण निर्भेद ज्ञान समस्त व्यवहार के योग्य रहता है, उसी प्रकार जागरित में भी उसकी अशेष व्यवहारास्पदता उपपन्न है। अर्थात् जाग्रत् अवस्था के चिद्रूप ज्ञान का भेद भी आरोपित है। अज्ञान से आवृत आत्मा प्रथमतः बुद्धि की कल्पना करता है, तब बुद्धि के आवरण को धारण करता है और अविवेक के कारण भ्रान्त होकर बुद्धिस्थित अर्थ (पदार्थ) को स्वात्मगत समझ बैठता है, उस कारण तदनुसार व्यवहार करने लगता है अर्थात् भ्रमप्रयुक्त तृष्णादि (इच्छा) से उत्पन्न हानोपादानव्यवहाररूप क्रिया करता है। तात्पर्य यह है कि अविद्या के कारण उपस्थापित अन्तःकरण, परिणामावस्था को अवभासित करता हुआ अविवेक के कारण अनेकरूप प्रपञ्च की अपने में कल्पना करता हुआ व्यवहार करता रहता है ॥ १७ ॥ स्वप्ने तद्वत्प्रबोधे यो बहिश्चान्तस्तथैव च । आलेख्याध्ययने यद्वत्तद्द्द्वयोन्योन्यधियो*द्भवम् ॥१८॥ स्वप्न इति—जिस प्रकार स्वप्न में व्यवहार होता है, उसी प्रकार जाग्रत् में भी होता है। तथा स्वप्न में जैसे आन्तर-बर्हिभाव की कल्पना होती है, वैसे ही जाग्रत् में भी आन्तर-बहिर्भाव की कल्पना हुआ करती है। जिस प्रकार लोकव्यवहार में किसी कागज आदि पर क-ख-ग आदि वर्ण लिखे जाते हैं, उसी तरह उन वर्णों को पढ़ा जाता है अर्थात् पढ़ पाना, लिखने पर निर्भर है और लिखना पढ़ने वाले के पढ़ने पर (बोलने वाले के बोलने पर) निर्भर है। अतः वे दोनों ही परस्पर एक-दूसरे के ज्ञान द्वारा कल्पित होने के कारण मिथ्या हैं। वस्तुतः 'वर्ण' नित्य और विभु हैं। उनको पत्रादि पर लिखना अथवा पढ़ना संभव नहीं है। तथापि विभु वर्ण को रेखाओं के रूप में पत्र आदि पर लिखते ही हैं और उसे देख कर पढते भी हैं ॥ १८ ॥ हृदयस्पर्शिनी जिस प्रकार स्वप्न में व्यवहार होता है, वैसे ही जाग्रत में भी होता है। इसी तरह स्वप्न के समान जाग्रत् में भी अन्तर्बहिर्भाव की कल्पना की जाती है। अर्थात् अन्तर्बहिर्भाव से प्रकट होने वाला व्यवहार स्वप्नवत् कल्पित है। उसी में अन्य दृष्टान्त बताते हैं—जिस प्रकार स्वप्नावस्था में चित्त के भीतर कल्पना किये जाने वाले और बाहर इन्द्रियों द्वारा गृहीत होने वाले दोनों प्रकार के पदार्थ मिथ्या हैं, उसी प्रकार जाग्रत् अवस्था में भी दोनों प्रकार के पदार्थ मिथ्या हैं। लोक में जिस समय क, ख आदि वर्ण पत्र पर लिखे जाते हैं, उस समय उन वर्णों की अपेक्षा से उन्हें पढ़ा जाता है और उनके पाठ की अपेक्षा से लिखा जाता है। अतः वे परस्पर के ज्ञान द्वारा कल्पित होने के कारण मिथ्या हैं, क्योंकि वस्तुतः वर्ण विभु और नित्य हैं। उन निरवयव वर्णों को पत्रादि पर लिखना या पढ़ना संभव नहीं है। तो भी विभु वर्ण को रेखा के रूप में पत्रादि पर लिखते ही हैं और उसे देखकर पढ़ते भी हैं ॥ १८ ॥ यदाऽयं कल्पयेद्भेदं तत्कामः सन् यथाक्रतुः । यत्कामस्तत्क्रतुर्भूत्वा कृतं यत्तत्प्रपद्यते ॥१९॥ यदेति—यह जीवात्मा जिस समय भेद की कल्पना करता है, उस समय वैसी कामना वाला होकर वैसा ही संकल्प करता है। इस प्रकार कामना के अनुसार ही संकल्प करके अपने अनुष्ठित कर्म का फल पाता है ॥ १९ ॥ हृदयस्पर्शिनी बुद्धिनिष्ठ अर्थ का स्पष्टीकरण करते हुए “भ्रान्त्या तृष्णोद्भवक्रियः” (श्लो. १७) के द्वारा उक्त अर्थ को अधिक स्पष्ट कर रहे हैं—जिसे यह आत्मा पूर्वभ्रान्तिसंस्कारवशात् बुद्धि से आवृत्त हुआ अविद्या के कारण
- द्वयः—पाठान्तरम् ।
भेद की कल्पना करता है, उस समय अध्यस्त विषय के प्रति उसके शोभन होने के कारण इच्छुक होता है और इच्छुक होने के कारण वैसा संकल्प करने लगता है। अर्थात् 'मैं इसे प्राप्त करूँगा' इस प्रकार अध्यवसायरूप संकल्प करता है। एवंच जैसी कामना, तदनुकूल संकल्प और तदनुसार कर्म, ततश्च तदनुरूप फल को प्राप्त करता है। अर्थात् कामना-संकल्प-कर्म-फल इस रीति से अन्योन्य की अपेक्षा से हेतु-फल के रूप में कल्पित संसार का अनुभव करता रहता है। श्रुति भी कह रही है—"अथो खल्वाहुः काममय एवायं पुरुष इति स यथा कामो भवति तथा क्रतुर्भवति, यथा क्रतुर्भवति तत्कर्म कुरुते, यत्कर्म कुरुते तदभिसम्पद्यते¹।" ॥ १९ ॥
अविद्याप्रभवं सर्वमसत्तस्मादिदं जगत्। तद्वता दृश्यते यस्मात्सुषुप्ते न च गृह्यते ॥२०॥
अविद्येति—यह सम्पूर्ण जगत् अविद्या से उत्पन्न हुआ है, उस कारण वह मिथ्या है। क्योंकि वह अविद्यावान् पुरुष को ही दिखाई देता है, और सुषुप्ति में उसकी प्रतीति भी नहीं होती ॥ २० ॥
विद्याऽविद्ये श्रुतिप्रोक्ते एकत्वान्यधियो हि नः। तस्मात्सर्वप्रयत्नेन शास्त्रे विद्या विधीयते ॥२१॥
विद्येति—भगवती श्रुति आत्मैक्यज्ञान को ही 'ज्ञान' और भेदज्ञान को ही 'अज्ञान' शब्द से हमें बताती है। अज्ञान (अविद्या) के समान ज्ञान (विद्या) का अनुभव सर्वसाधारण लोगों को नहीं होता है। ज्ञान (विद्या) का प्रतिपादन शास्त्र में ही किया गया है। अतः सर्वथा प्रयत्नपूर्वक शास्त्र के अध्ययन में अपने को तत्पर रखना चाहिये ॥ २१ ॥
हृदयस्पशिनी जगत् की हेतुभूत अविद्या का स्वरूप क्या है? और उसकी निवर्तक विद्या का स्वरूप क्या है? तथा उस विद्या और अविद्या को कौन जानता है? उत्तर यह है कि 'एकत्वधी' विद्या है और 'अन्यधी' अविद्या है। अर्थात् ब्रह्मात्मकत्व बुद्धि को विद्या कहते हैं और उनकी भेदबुद्धि को अविद्या कहते हैं। यही उनका स्वरूप है। विद्या और अविद्या के स्वरूप को श्रुति ने बताया है। "अथ योऽन्यां देवताम्²" इस श्रुति ने भेद-धी (भेदबुद्धि) को अविद्या कहा है। लोकानुभवसिद्ध भेद के अनुवादरूप में यह बताया गया है—"किमु तद्ब्रह्मावेत्³" इस प्रकार आक्षेप कर "ब्रह्म वा इदमग्र आसीत्तदात्मानमेवावेदहं ब्रह्मास्मि⁴" यह अप्रसिद्धार्थबोधक श्रुति प्रमाणभूत है। इसने भी एकत्वज्ञान को ही विद्या बताया है। अज्ञान के समान ज्ञान का सर्वसाधारण को अनुभव नहीं है। इस कारण शास्त्र प्रयत्नपूर्वक अध्यारोप और अपवाद के द्वारा विद्या (ज्ञान) का प्रतिपादन करता है। अतः मुमुक्षु को सर्वदा शास्त्रतत्पर रहना चाहिये ॥ २१ ॥
चित्ते ह्यादर्शवद्यस्माच्छुद्धे विद्या प्रकाशते । यमैर्नित्यैश्च *यज्ञैश्च तपोभिस्तस्य शोधनम् ॥२२॥
चित्त इति—जिस प्रकार दर्पण में मुख आदि का प्रकाश, दर्पण की शुद्धता (निर्मलता) पर निर्भर होता है, उसी प्रकार चित्त की शुद्धता (निर्मलता) रहने पर ही उसमें ज्ञान का प्रकाश होता है, अन्यथा नहीं। अतः यम, नियम, यज्ञ और तप के द्वार चित्त की शुद्धि करनी चाहिये ॥ २२ ॥
१. (बृ. उ. ४।४।७ माध्यंदिन. पाठ.), 'तत्क्रतुर्भवति यत्क्रतुर्भवति' इति काण्व पाठः (बृ. उ. ४।४।५ ) २. (बृ. उ. १।४।१० ) ३. (बृ. उ. १।४।९ ) ४. (बृ. उ. १।४।१० )
- नियमैस्तपो०—पाठान्तरम् ।
यहाँ प्रस्तुत पृष्ठ का संपूर्ण पाठ दिया गया है:
सम्यङ्मतिप्रकरणम् १५७ हृदयस्पर्शिनी यदि शास्त्र अत्यन्त प्रयत्नपूर्वक विद्या को बताता है, तो सभी लोग शास्त्र के प्रति प्रवृत्त क्यों नहीं होते ? तथा प्रवृत्त होने पर भी उन्हें विद्या की प्राप्ति क्यों नहीं होती ? इत्यादि शंकाओं का उत्तर एक ही है कि ‘चित्त की शुद्धि न होने से' प्रवृत्ति नहीं होती और यथाकथंचित् प्रवृत्ति हो भी जाय तो भी विद्या की प्राप्ति नहीं होती । इसलिये चित्तशुद्धि करनी चाहिये । ज्ञान का प्रकाश, दर्पण के समान शुद्ध चित्त में ही पड़ता है । यम, नियम, यज्ञ, और तप के द्वारा चित्त की शुद्धि करनी चाहिये । अहिंसा, ब्रह्मचर्य आदि को ‘यम' कहते हैं । नित्य शौच आदि को ‘नियम' कहते हैं । स्वाश्रमविहित धर्म को 'यज्ञ' कहते हैं। ईश्वर साक्षात्कार कराने वाले साधनों को ‘तप' कहते हैं। इनके अनुष्ठान से चित्त को निर्मल बनाया जा सकता है ॥ २२ ॥ शारीरादितपः कुर्याच्चित्तशुद्ध्यर्थमुत्तमम् । मन आदिसमाधानं तत्तद्देहविशेषणम् ॥२३॥ शारीरादीति—चित्त को निर्मल (शुद्ध) बनाने के लिये शारीरादि ( कायिक-वाचिक-मानसिक ) उत्तम तप करना चाहिये । मन और बाह्येन्द्रियों को निश्चल करना चाहिये । तथा भिन्न-भिन्न ऋतुओं में शीतोष्णादि द्वन्द्वों को सहन करते हुए शरीर को कृश करना चाहिये ॥ २३ ॥ हृदयस्पर्शिनी अन्तःकरण (चित्त-मन) की शुद्धि (निर्मलता) के लिये शास्त्रविहित पद्धति (उत्तम प्रकार) से शारीरिक (कायिक), मानसिक और वाचिक तप करना चाहिये । तथा मन और इन्द्रियों को निश्चल (समाधान = निश्चलता) एवं भिन्न-भिन्न ऋतुओं में शीतोष्णादि को सहन करते हुए शरीर को कृश करना चाहिये । भगवान् ने शारीरिक तप का स्वरूप बताया है—“देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजनं शौचमार्जवम् । ब्रह्मचर्यमहिंसा च शारीरं तप उच्यते ॥” उसी प्रकार वाचिक (वाङ्मय) तप का स्वरूप—“अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत् । स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते ॥” तथा मानसिक (मानस) तप का स्वरूप- “मनःप्रसादः सौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रहः । भावसंशुद्धिरित्येतत् तपो मानसमुच्यते १ ॥” इति । 'देवता, ब्राह्मण, गुरु और ब्रह्मज्ञानियों की पूजा, बाहर और भीतर की शुद्धि, कर्तव्य कर्म में एवं साधुजनों के विषय में सर्वत्र मन, वचन, और देह के व्यापारों की एकरूपता, ब्रह्मचर्य और अहिंसा-यह शारीरिक तप कहलाता है ।' 'उद्वेग न करने वाला, सत्य, प्रिय और हितकारक वाक्य और स्वाध्याय का अभ्यास वाङ्मय तप कहलाता है ।' 'मन की प्रसन्नता, सौम्यत्व, ध्यानपरायणता, मन का निग्रह और अन्तःकरण की शुद्धि- यह सब मानस तप कहलाता है ।' इन तीनों तपों का सात्त्विकता के साथ अनुष्ठान करना चाहिये, राजस-तामसरूप में नहीं । सात्त्विक तप का स्वरूप यह है- "श्रद्धया परया तप्तं तपस्तत्त्रिविधं नरैः । अफलाकांक्षिभिर्युक्तैः सात्त्विकं परिचक्षते ।।'—'जिनका एकाग्र चित्त है और जिनकी कर्मफलों में स्पृहा नहीं है, ऐसे पुरुषों द्वारा श्रद्धा से किये गये तीन प्रकार के तप को मुनि लोग सात्त्विक तप कहते हैं ।२' ॥ २३ ॥ “मनसश्चेन्द्रियाणां च ह्यैकाग्र्यं परमं तपः । तज्ज्यायः सर्वधर्मेभ्यः स धर्मः पर उच्यते” ॥२४॥ मनस इति-मनु ने मन और इन्द्रियों की एकाग्रता को 'परम तप' बताया है । उसे समस्त धर्मों की अपेक्षा उत्कृष्ट बताया है और उसी को परम धर्म कहा है ॥ २४ ॥ हृदयस्पर्शिनी इस प्रकार आरादुपकारक३ तप को बताकर श्रवण आदि में संनिपत्योपकारक तप के अनुष्ठानार्थ स्मृति- वाक्य को उपस्थित कर रहे हैं- “मनसश्चेन्द्रियाणां च ह्यैकाग्र्यं परमं तपः । तज्ज्यायः सर्वधर्मेभ्यः स धर्मः पर १. ( भ. गी. १७।१४-१७ ) २. ( भ. गी. १७।१७ ) ३. आरादुपकारक और संनिपत्योपकारक—ये पूर्व मीमांसा शास्त्र में अंगों की पारिभाषिक संज्ञाएँ हैं । 'यानि अंगानि साक्षात्