उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)
Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary
आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा
स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१४२ उपदेशसाहस्री कठश्रुति ने भी उसकी शुद्धता को प्रमाणित किया है। तथा गीता^१ का स्मृतिवचन भी उक्तार्थ का समर्थन कर रहा है। इतना भाव 'सूक्ष्मैका .... .... ... इति श्रुतेः' इस अर्धश्लोक से बताया गया है। इसपर पूर्वपक्षी पुनः प्रश्न करता है कि क्या आत्मा की नित्यशुद्धबुद्धमुक्तस्वभावता को सिद्ध करने वाले वेदान्ती लोग आत्मोपदेश शास्त्र को निरर्थक समझ रहे हैं ? अर्थात् वेदान्तियों के मतानुसार आत्मा को बन्ध का अभाव होने के कारण उसके मोक्ष की कोई बात ही नहीं है। मोक्ष तो बन्धपूर्वक होता है, बन्ध नहीं तो मोक्ष भी नहीं ॥ ५८ ॥ शास्त्रानर्थक्यमेव स्यान्न बुद्धेर्भ्रान्तिरिष्यते । बन्धो मोक्षश्च तन्नाशः स यथोक्तो न चान्यथा ॥५९॥ शास्त्रानर्थक्यमिति—उत्तर—तथा च मोक्षप्रतिपादक शास्त्र व्यर्थ ही हो जायेगा। किन्तु मोक्षप्रतिपादक शास्त्र को व्यर्थ नहीं कहा जा सकता, क्योंकि बुद्धि की भ्रान्ति को बन्धन और उस भ्रान्ति के नाश को मोक्ष माना गया है। इस बात को पहिले बता चुके हैं। इसके अतिरिक्त और किसी प्रकार का मोक्ष नहीं है ॥ ५९ ॥ हृदयस्पर्शिनी तथाच मोक्षोपायभूत उपदेशशास्त्र का आनर्थक्य ही रहेगा। उक्त आशंका का समाधान आचार्यचरण कर रहे हैं कि बुद्धि के भ्रम (भ्रान्ति) को बन्ध कहते हैं और उस भ्रम (भ्रान्ति) के नाश को मोक्ष कहते हैं। वस्तुतः आत्मा को न बन्ध है और न ही मोक्ष है। इस प्रकार 'अज्ञानं कल्पनामूलं संसारस्य नियामकम्' यह पहले बता चुके हैं। तथाच अज्ञान से कल्पित बन्धभ्रम के निवृत्त्यर्थ उपदेशशास्त्र की आवश्यकता है, उसे निरर्थक नहीं कहा जा सकता ॥ ५९ ॥ बोधात्मज्योतिषा दीप्ता बोधमात्मनि मन्यते । बुद्धिर्नान्योऽस्ति बोद्धेति सेयं भ्रान्तिर्हि धीगता ॥६०॥ बोधात्मेति—बोधस्वरूप (ज्ञानस्वरूप) आत्मा से प्रकाशित हुई बुद्धि अपने ही में ज्ञान का होना समझती है कि मुझसे भिन्न कोई अन्य बोद्धा नहीं है, किन्तु इस प्रकार समझना बुद्धि की भ्रान्ति ही है ॥ ६० ॥ हृदयस्पर्शिनी पहले बता चुके हैं कि चिदात्मा में बुद्धिधर्म का अध्यासरूप बन्ध, अज्ञानमूलक है, उसी का उपपादन किया जा रहा है—बोध (ज्ञान) रूप आत्मा की जो ज्योति (प्रकाश) है, वही चिदाभास है, उससे प्रकाशित (दीप्त - व्याप्त) हुई बुद्धि, अपने में ही बोध (ज्ञान, चैतन्य) समझती है, और अपने से अतिरिक्त अन्य कोई बोद्धा नहीं है, 'मैं ही बोद्धा' इस प्रकार साभास बुद्धि प्रकाशित होती है। उसके अविवेक से आत्मा में 'मैं ही बद्ध हूँ, कर्ता हूँ' इत्यादि जो संसार प्रतीत होता रहता है, वह सब बुद्धि की ही भ्रान्ति है ॥ ६० ॥ बोधस्यात्मस्वरूपत्वान्नित्यं तत्रोपचर्यते । अविवेकोऽप्यनाद्योऽयं संसारो नान्य इष्यते ॥६१॥ बोधस्येति—बोध (ज्ञान) तो आत्मा का ही स्वरूप है। बुद्धि में तो उसका नित्य उपचार किया जाता है। यह अविवेक के कारण होता है। यह अविवेक भी अनादि है। इसके अतिरिक्त अन्य कोई संसार नहीं है ॥ ६१ ॥ हृदयस्पर्शिनी प्रतीति के अनुसार बुद्धि को ही वस्तुतः बोधरूप क्यों न माना जाय ? इस आशंका का उत्तर यह है कि बुद्धि के आगन्तुक होने से बोध का व्यभिचार है, अतएव सुषुप्ति में बुद्धि के बिना भी बोध का सद्भाव रहने से (ज्ञान १. 'यथा सर्वगतं सौक्ष्म्यादाकाशं नोपलिप्यते । सर्वत्रावस्थितो देहे तथात्मा नोपलिप्यते ॥'—(भ. गी. १३।३२)