भारतकोश
उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा

स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished364 पृष्ठ

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पार्थिवप्रकरणम् १४३ की सत्ता, विद्यमानता रहने से) आत्मा का स्वरूप तो विद्यमान ही है। बोध तो सर्वदा आत्मा का ही स्वरूप है। बुद्धि में तो उसका उपचार होता है। अर्थात् अविवेक के कारण अध्यास करके व्यवहार किया जाता है। यदि अविवेक के कारण यह अध्यास किया जाता है, तो वह अविवेक सादि है या अनादि ? यदि अनादि अज्ञानकृत अविवेक होने से उसे भी अनादि कहा जाता है, तो ब्रह्मात्मज्ञान से उस अविवेक की ही निवृत्ति कही जाय, संसार की निवृत्ति क्यों बताई जा रही है ? इस भ्रम का निवारण यह है कि कर्त्रादिधर्मक बुद्धि का जो अविवेक है, वही तो संसार है, उस अविवेक के अतिरिक्त अन्य कोई संसार नहीं है ।। ६१ ।। मोक्षस्तन्नाश एव *स्यान्नान्यथाऽनुपपत्तितः । येषां वस्त्वन्तरापत्तिर्मोक्षो नाशस्तु तैर्मतः ॥६२॥ मोक्ष इति—उस अविवेक (अज्ञान) का नाश ही मोक्ष है, इसके अतिरिक्त अन्य कोई मोक्ष उपपन्न नहीं हो सकता। जिनके मत में आत्मा का किसी अन्य वस्तु के आकार को प्राप्त होना 'मोक्ष' माना गया है, उन्हें उसके (आत्मा के) नाश को भी मोक्ष मानना होगा ॥ ६२ ॥ हृदयस्पर्शिनी बन्ध की अज्ञानात्मकता का फल बता रहे हैं—ज्ञान से अज्ञान की निवृत्ति होनेपर अज्ञानकार्यरूप बन्ध की जो निवृत्ति है, उसे ही मोक्ष (मुक्ति) कहते हैं। इसके अतिरिक्त अन्य कोई मोक्ष, हेय या उपादेय के रूप में उपपन्न नहीं हो सकता। जो लोग स्व-स्वरूप के अतिरिक्त अन्य वस्तु (वस्त्वन्तर) की प्राप्ति को या अपने स्वरूप का त्याग कर अन्य वस्तु के स्वरूपाकार होने को ही मोक्ष कहते हैं, उन लोगों को, आत्म-नाश को ही मोक्ष का स्वरूप मानना पड़ेगा। कोई वस्तु स्थित रहे या नष्ट हो जाय तो भी वह अन्य नहीं कहलाती। 'स्वरूपादन्यवस्त्वन्तरापत्ति' से यदि प्राप्ति विवक्षित है, तो 'संयोगा विप्रयोगान्ताः'१ इस न्याय से कृतक की 'अनित्यत्व' के साथ व्याप्ति रहती है, अतः मोक्ष को अनित्य कहना होगा ॥ ६२ ॥ अवस्थान्तरमप्येवमविकारान्न युज्यते । विकारेऽवयवित्वं स्यात्ततो नाशो घटादिवत् ॥६३॥ अवस्थान्तरमिति—इसी प्रकार आत्मा का अवस्थान्तर होना भी संभव नहीं है, क्योंकि वह विकाररहित (निर्विकार) है। यदि उसमें विकार होना माना जाय तो उसे सावयव कहना होगा। तब घट-पटादि के समान उसका नाश भी मानना पड़ेगा ॥ ६३ ॥ हृदयस्पर्शिनी जैसे 'वस्त्वन्तरापत्तिमोंक्षः' इस पक्ष में अनुपपत्ति और अनित्यत्वापत्ति होती है, उसी तरह 'आत्मनोऽ- वस्थान्तरापत्तिमोंक्षः' पक्ष में भी वही दोष समानरूप से है। क्योंकि आत्मा निर्विकार है, अतः उसमें अवस्थान्तर होने की संभावना ही नहीं। यदि उसमें विकार माना जाय, तो उसे सावयव मानना होगा। तब सावयव रहने से घटादि के समान उसका नाश होना अपरिहार्य रहेगा। अतः 'भ्रान्तिनिवृत्तिरेव मोक्षः'—भ्रान्ति का ध्वंस हो जाना ही मोक्ष है ॥ ६३ ॥ तस्माद्भ्रान्तिरतोन्या हि बन्धमोक्षादिकल्पनाः । साङ्ख्यकाणादबौद्धानां मीमांसाह[हं]तकल्पनाः ॥६४॥ तस्मादिति—अतः इस वेदान्तसिद्धान्त को न मानकर जिन लोगों ने बिना विवेक किये जो बन्ध-मोक्षादि की कल्पना की है, वह तो केवल उनका भ्रम ही है। वस्तुतः सांख्य, काणाद (वैशेषिक) और बौद्धों की वे कल्पनाएँ सर्वथा अविचारपूर्ण ही हैं ॥ ६४ ॥ १. ( महा. भा. स्त्रीपर्व २।३ तथा मोक्षपर्व ३३८।२० )

  • स्यान्नान्योऽस्त्यनु०—पाठान्तरम् ।
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