उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)
Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary
आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा
स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंपार्थिवप्रकरणम् १४१ दुर्निवार्य हो जायगी। एवंच प्रथम ज्ञानोत्पत्ति के अनन्तर मन में क्रिया, उससे विभाग, उससे पूर्वसंयोग का नाश, उससे संयोगान्तर, तब कहीं ज्ञानान्तर—इस प्रकार से अनेक क्षणों के विलम्ब से उत्पन्न होनेवाला उत्तरज्ञान, पूर्वज्ञान का अवभासन कैसे कर पायगा ? क्योंकि उसका उस काल में अभाव ही रहेगा। इस प्रकार 'ज्ञानं चेद् ज्ञेयतां व्रजेत्' इस प्रथम पक्ष में दोष है। अब 'युगपद् वाप्युत्पत्तिः' इस द्वितीय पक्ष को स्वीकारते हैं, तो अतिप्रसक्ति दोष होगा। अर्थात् अनवस्था दोष को दूर करने के लिए एक ही संयोग से पूर्वोत्तर ज्ञानों की युगपत् उत्पत्ति को कहें तो उस एक ही संयोग से संनिकृष्ट रूप-रस-गन्ध-शब्द-स्पर्शों के ज्ञानों की उसी समय युगपत् उत्पत्ति मान ली जाय, और उसी समय संस्कारोद्बोध संपात् में सहकारी लाभ होने से तदर्थक स्मृतियों का भी युगपत् उत्पन्न होना मान लिया जाय ? अतः ज्ञान को ज्ञानान्तर से वेद्य होने की कल्पना करना युक्तियुक्त नहीं है ॥ ५६ ॥ अनवस्थान्तरत्वाच्च बन्धो नात्मनि *विद्यते । नाशुद्धिश्चाप्यसङ्गतत्वादसङ्गो हीति च श्रुतेः ॥५७॥ अनवस्थेति—आत्मा में कभी कोई अवस्थान्तर नहीं होता है। अतः उसे बन्ध नहीं है तथा 'पुरुष असंग है' इस श्रुतिवचन के अनुसार उसके असंग होने के कारण उसमें अशुद्धि भी नहीं है ॥ ५७ ॥ हृदयस्पर्शिनी किंच—'आत्मनश्चैतन्यम्'—आत्मा का चैतन्य—यह आत्मा का स्वरूपलक्षण है या तटस्थलक्षण है ? यदि इसे स्वरूपलक्षण कहें तो पृथिवी में गन्ध की तरह सर्वदा ही उसके रहने से और उसका स्वरूप से अतिरेक (भिन्नता) न रहने से 'अनित्यज्ञानवान् आत्मा है' यह तुम्हारा उद्घोष मिथ्या हो जायगा। और यदि उसे तटस्थलक्षण कहें तो अनात्म पदार्थों में अतिप्रसक्त न होनेवाला कोई दूसरा ही स्वरूपलक्षण कहना होगा। वह स्वरूपलक्षण, चेतन के अलावा और कुछ हो ही नहीं सकता। अतः देहादि जड़ पदार्थों से विलक्षण आत्मा है—यही कहोगे, तब तुम्हें आत्मा को सदैव निर्विशेष, चिद्रूप, कूटस्थ ही स्वीकार करना पड़ेगा। अन्यथा 'विकारी पदार्थ अनित्य होता है' इस नियम के अनुसार 'बन्ध-मोक्ष से सम्बन्धित (अन्वयी) एक ही आत्मा होता है',—यह कहना तुम्हारे लिये कठिन हो जायगा। इसी अभिप्राय को उक्त पद्य के द्वारा बता रहे हैं—वैशेषिकों की कल्पना कोई उचित नहीं है। वस्तुतः आत्मा में कोई अवस्थान्तर नहीं होता, क्योंकि वह तो कूटस्थ है, इसलिए उसमें वस्तुतः विशेषगुणवत्त्वरूप बन्ध नहीं है। 'च' कार से बन्धनिवृत्तिरूप मोक्ष भी नहीं है। अर्थात् आत्मा का न तो बन्ध है और न ही मोक्ष है। 'असङ्गो ह्ययं पुरुषः'१— पुरुष असंग है, इस श्रुति के अनुसार असंग होने के कारण उसमें अशुद्धि भी नहीं है तस्मात् आत्मा नित्य शुद्ध ही है। वैशेषिकों की कल्पना का निराकरण करने का फल यह है कि स्वगतधर्मकृत बन्धाभाव की तरह अन्यसंसर्गकृत अशुद्धि भी असंग होने के कारण उसमें नहीं है ॥ ५७ ॥ सूक्ष्मैकागोचरेभ्यश्च न लिप्यत इति श्रुतेः । एवं तर्हि न मोक्षोऽस्ति बन्धाभावात्कथंचन ॥५८॥ सूक्ष्मेति—किञ्च सूक्ष्मत्व, अद्वितीयत्व और अविषयत्व रूप हेतुओं से तथा 'आत्मा, लोकदुःखों से लिप्त नहीं होता'—इस श्रुतिवचन के अनुसार भी वह [आत्मा] नित्य शुद्ध है। प्रश्न—यदि ऐसी बात है तो बन्ध का अभाव रहने से किसी प्रकार मोक्ष भी नहीं हो सकेगा ॥ ५८ ॥ हृदयस्पर्शिनी आत्मा में पारमार्थिक बन्ध आदि के न होने में और भी कारण है—सूक्ष्मत्व (सूक्ष्मता) अर्थात् मन और वाणी से गम्य न होना 'मनोवागगम्यत्वम्', और अद्वितीयत्व अर्थात् एकत्व 'एकत्वमद्वितीयत्वम्', तथा अगोचरत्व (अविषयत्व) अर्थात् 'अगोचरत्वं निर्विशेषत्वम्'—इन हेतुओं से आत्मा की नित्य शुद्धता को ही बताया गया है२। १. (वृ. उ. ४।३।१५) २. 'न लिप्यते लोकदुःखेन'—(कठ. उ. ५।११)
- युज्यते०—पाठान्तरम्