भारतकोश
उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा

स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished364 पृष्ठ

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१४० उपदेशसाहस्री हृदयस्पर्शिनी

ज्ञान, सुख आदि को आत्मा के गुण मानकर भास्य-भासक भाव को असंभव बताया, अब उन्हें आत्म- गुण कहना भी संभव नहीं, यह बता रहे हैं—क्योंकि वैशेषिकों के मतानुसार भी आत्मा विकाररहित होने के कारण सुखादि उसके धर्म हो नहीं सकते। उसी तरह आत्मा विभु होने के कारण उसे तुमने नित्य माना है। उसी तरह उसे अनेक भी माना है। तब कोई भी नित्य पदार्थ अनित्य गुण वाला हो, ऐसा कोई दृष्टान्त भी नहीं है। एवंच आत्मा का गुणवत्त्व ही सिद्ध नहीं हो पा रहा है। ग्राह्य-ग्राहकत्व की कल्पना तो दूर रही। किंच गुण-गुणी में अत्यन्त भेद मानने वाले तुम्हारे मत में इसी आत्मा के ये सुखादिक गुण हैं, यह नियम भी नहीं बन सकता। क्योंकि भेद में कोई विशेषता न होने के कारण वे सुखादिक किसी अन्य आत्मा के या मन के धर्म क्यों नहीं हो सकते? निष्कर्ष यह है— समस्त आत्माओं के विभु होने के कारण जिस शरीरावच्छिन्न आत्मा में सुखादि होंगे, उस समय वहाँ समस्त आत्माएँ विद्यमान होने से उनका भेद वहाँ ज्ञात नहीं हो सकता, इस कारण इसी आत्मा के ये सुखादि धर्म हैं, अन्य आत्मा के नहीं, ऐसा नियम नहीं किया जा सकता। यदि कहो कि जिस शरीरावच्छिन्न आत्मा के साथ मन का संयोग हो, उसी आत्मा के उन सुखादि धर्मों को समझा जायगा, एवंच भिन्न-भिन्न मनःसंयोगों को नियामक कहेंगे, तो वह भी ठीक नहीं रहेगा, क्योंकि शरीरस्थ मन का सभी आत्माओं के साथ समान सम्बन्ध है। भिन्न-भिन्न अदृष्टों को भी नियामक नहीं कह सकते, क्योंकि अदृष्ट भी आत्मा का धर्म है, यह अभी तक सिद्ध नहीं हो पाया है। अदृष्ट के हेतुभूत प्रयत्न आदि भी मनःसंयोग के निमित्त हुआ करते हैं। और वे सभी आत्माओं में समान हैं, उनमें कोई विशेषता (भिन्नता) नहीं होती। अतः अदृष्ट का भी कोई आश्रयविशेष (कोई एक ही आत्मा) सिद्ध नहीं हो पा रहा है। जहाँ कहीं भी होनेवाला सुखादि, जिस किसी का भी क्यों नहीं माना जा सकेगा? तथा मन में क्रिया के होने से और मूर्तता के होने से एवं सुखादिकों के देश (स्थान) का व्यभिचार न होने से सुखादिकों को मन के ही धर्म क्यों न माना जाय ? न मानने में कोई विनिगमना (युक्ति) नहीं है ।। ५५ ।।

स्यान्मालाऽपरिहार्या तु ज्ञानं चेज्ज्ञेयतां व्रजेत् । युगपद्वापि चोत्पत्तिरभ्युपेताऽत इष्यते ।।५६।।

स्यादिति—तुम्हारे मत के अनुसार यदि एक ज्ञान, दूसरे ज्ञान का विषय बन सकता है तो उन ज्ञानों की अनवस्था अनिवार्य हो जायगी और यदि उनकी उत्पत्ति एक साथ मान ली जाय तो रूप-रस आदि सभी ज्ञानों की एकसाथ उत्पत्ति माननी होगी ।। ५६ ।।

हृदयस्पर्शिनी

वैशेषिकों ने एक ज्ञान को दूसरे ज्ञान का विषय (वेद्य) होना स्वीकार किया है, किन्तु वह भी अनवस्था के कारण उचित नहीं है। वैशेषिकों के मतानुसार विषयज्ञान व्यवसायात्मक है और उसका पुनः ज्ञान अनुव्यवसायात्मक है। प्रत्येक व्यवसायात्मक ज्ञान अपने अनुव्यवसायात्मक ज्ञान का विषय होता है। इस प्रकार ज्ञान को ज्ञानान्तर का विषय मानने से अनुव्यवसायात्मक ज्ञान भी दूसरे अनुव्यवसायात्मक ज्ञान का और दूसरा तीसरे का विषय होगा। इस प्रकार अनवस्था होगी। इसके अतिरिक्त प्रत्येक ज्ञान किसी पूर्ववर्ती ज्ञान की अपेक्षा से ही होता है, अतः इस प्रकार से भी अनवस्था का दोष होगा। इसलिये ज्ञान को ज्ञानान्तर का विषय मानना उचित नहीं है। और यदि समस्त ज्ञानों को एक ही आत्म-मनःसंयोग से उत्पन्न हुआ कहें तो शब्द, स्पर्श, रूप, रसादि सभी ज्ञान एक साथ (युगपत्) होने लगेंगे। अभिप्राय यह है कि जिस आत्म-मनःसंयोग से प्रथम ज्ञान उत्पन्न होता है, उससे भिन्न किसी संयोगान्तर से तद्- विषयक अन्य ज्ञान होता है या उसी पूर्व संयोग से ही अन्य ज्ञान होता है ? पूर्वज्ञान यदि ज्ञेयता को प्राप्त होता है तो ज्ञान-परम्परा (अनवस्था-ज्ञानमाला) का परिहार करना कठिन होगा। विषय के अवभास के समय यदि ज्ञान का अवभास नहीं होता है ऐसा कहें तो क्या विषय स्वयं ही भासित होता है ? या ज्ञान के अधीन होकर भासित होता है ? इसका विवेक करना शक्य न होने से उसी समय ज्ञान के भान के लिए ज्ञानान्तर को मानना होगा, उसका भी भान न हो पाने पर पूर्वज्ञान में ज्ञानान्तरभास्यता के सिद्ध न हो पाने से उसके भानार्थ पुनः एक ज्ञानान्तर—इस तरह अनवस्था