भारतकोश
उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा

स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished364 पृष्ठ

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सम्यङ्मतिप्रकरणम् १६१ मायावी के रूप में लक्षित रहता हुआ भी उसके साथ माया का कोई संबंध नहीं रहता । क्योंकि माया तो व्यामोह को पैदा करती है। अर्थात् व्यामोह की हेतु रहती है। वह आत्मा में कैसे रह सकेगी ? क्योंकि आत्मा तो 'अहं परब्रह्म अस्मि' इस रूप में प्रकाशमान् है, अतः प्रकाश और व्यामोह की हेतुभूत माया इन दोनों से विरोध रखने से वाले आत्मा में नहीं रह सकती । तथाच ज्ञान की अवस्था में कदाचित् प्राणादि आकारों का ग्रहण करनेवाली माया को देखता हुआ भी वह अज्ञान अवस्था के समान मोहित नहीं होता, किन्तु सुषुप्त के समान निर्विकार ही रहता है ॥ ३१ ॥ *साक्षादेव स विज्ञेयः साक्षादात्मेति च श्रुतेः । भिद्यते हृदयग्रन्थिर्न चेदित्यादितः श्रुतेः ॥३२॥ साक्षादिति—'यत्साक्षादपरोक्षाद् ब्रह्म', “य आत्मा सर्वान्तरः”—यह साक्षात् आत्मा है, इत्यादि श्रुतिवचन के अनुसार उस आत्मा को ही साक्षात् ब्रह्म समझना चाहिये । 'उसको जान लेने पर हृदय को ग्रन्थि टूट जाती है', 'यदि उसे नहीं जाना तो महती हानि है' इत्यादि श्रुतियों से भी यही सिद्ध होता है ॥ ३२ ॥ हृदयस्पर्शिनी तस्मात् साक्षात् ब्रह्मात्मज्ञान से यह अमायावी माया और उसके कार्य और उसके कार्यसम्बन्ध से मुक्त हो जाता है, अतः मुमुक्षु को श्रुतिसिद्ध आत्मा पर ही श्रद्धा रखनी चाहिये । “यत्साक्षादपरोक्षाद् ब्रह्म य आत्मा सर्वान्तरः”१—वह साक्षात् आत्मा है इत्यादि श्रुति के अनुसार उस आत्मा को ही साक्षात् ब्रह्म समझना चाहिए । “भिद्यते हृदयग्रन्थिश्चिद्यन्ते सर्वसंशयाः । क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन् दृष्टे परावरे”२—उसको जान लेने पर हृदय की ग्रन्थि टूट जाती है, “न चेदिहावेदीन्महती विनष्टिः”३—यदि उसे न जाना तो बड़ी हानि है, इत्यादि श्रुतियों से भी यही सिद्ध होता है। वह आत्मा, समस्त विकारों का साक्षी और कूटस्थ है। वह 'विज्ञानमानन्दं ब्रह्म’४ है। आत्म- विज्ञान में ही लाभ है, और अविज्ञान में हानि है । 'आदि' शब्द से अन्यान्य श्रुतियों को भी समझ लेना चाहिए, जैसे “एकधैवानुद्रष्टव्यम्”५, “मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति”६ । जो इसमें नाना के तुल्य देखता है, वह मृत्यु से मृत्यु को प्राप्त होता है। एवंच आत्मा का अपरोक्षज्ञान ही परमार्थज्ञान है और उसी से मोक्ष होता है ॥ ३२ ॥ अशब्दादित्वतो नास्य ग्रहणं चेन्द्रियैर्भवेत् । सुखादिभ्यस्तथाऽन्यत्वाद्बुद्ध्या वाऽपि कथं भवेत् ॥३३॥ अशब्दादीति—अशब्दादिरूप होने के कारण इसका इन्द्रियों से भी ग्रहण नहीं हो सकता और सुखादि से भिन्न होने के कारण बुद्धि से भी इसका किस प्रकार ग्रहण हो सकता है ? बाह्य तथा अन्तः दोनों करणों ( इन्द्रियों से ) जबकि आत्मा ग्राह्य नहीं हो सकता है तो उसका साक्षात् विज्ञान कैसे होगा ? इस प्रकार पूर्व श्लोक से बताये गये साक्षात् आत्मविज्ञान पर आक्षेप किया गया है ॥ ३३ ॥ अदृश्योऽपि यथा राहुश्चन्द्रे बिम्बं यथाऽम्भसि । सर्वगोऽपि तथैवाऽऽत्मा बुद्धावेव स गृह्यते ॥३४॥ अदृश्योऽपीति—यद्यपि राहु अदृश्य है तथापि चन्द्रमा में और जल में उसके प्रतिबिम्ब का ग्रहण होता ही है, उसी प्रकार सर्वव्यापक रहते हुए भी आत्मा का बुद्धि में ग्रहण होता ही है ॥ ३४ ॥ १. ( बृ. उ. ३।४।१ ) २. ( मुं. उ. २।२।८ ) ३. ( के. उ. १३ ) ४. ( बृ. उ. ३।९।२७ ) ५. ( बृ. उ. ४।४।२० ) ६. ( बृ. उ. ४।४।१९ )

  • साक्षाद्देवः—पाठान्तरम् । २१