उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)
Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary
आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा
स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१६२ उपदेशसाहस्री हृदयस्पर्शिनी उक्त आक्षेप का परिहार कर रहे हैं—जिस प्रकार स्वरूप से अदृश्य होनेपर भी चन्द्रमण्डल में राहु का अथवा जल में चन्द्रबिम्ब का ग्रहण होता है, उसी प्रकार चक्षुराद्यगोचर वह परमात्मा सर्वव्यापक होनेपर भी ‘तत्त्व- मसि’ आदि महावाक्य से उत्पन्न हुई बुद्धि में ही प्रतिबिम्बित होता है, और उसका (आत्मा का) ग्रहण होता हैं। उस बुद्धि में प्रतिबिम्बित होने से उसका स्वतः स्फुरणात्मक ही ग्रहण होता है, विषयरूप में उसका ग्रहण नहीं होता । शास्त्रैकगम्य रहने पर भी उसका प्रत्यक्ष प्रमाण, राहु के दृष्टान्त से बताया गया है। सर्वत्र सबके सन्निहित भासमान रहने पर भी यथावत् उसका स्फुरण नहीं होता, तथापि उपाधिविशेष के रहने पर यथावत् स्फुरण में प्रतिबिम्ब का दृष्टान्त दिया गया है ॥ ३४ ॥ भानोर्बिम्बं यथा चौष्ण्यं जले दृष्टं न चाऽम्भसः । बुद्धौ बोधो न तद्धर्मस्तथैव स्याद्विधर्मतः ॥३५॥ भानोरिति—जल में दृश्यमान सूर्यबिम्ब और उसकी उष्णता, जल के धर्म नहीं हैं, उसी प्रकार बुद्धि में प्रकाशमान 'ज्ञान' भी बुद्धि का धर्म नहीं है, क्योंकि बुद्धि, उसके विपरीत धर्मवाली हैं, अर्थात् जड़ है ॥ ३५ ॥ हृदयस्पर्शिनी यदि बुद्धि में बोधरूप आत्मा का ग्रहण होता है तो वह बोध तो बुद्धि का धर्म होगा, इस शंका का निरास एक दृष्टान्त देकर कर रहे हैं—जिस प्रकार जल में दिखाई देनेवाला सूर्य का बिम्ब और उष्णता सूर्य के ही हैं, जल के धर्म नहीं कहलाते, क्योंकि जल का धर्म (स्वभाव) तो शैत्य (शीतलता) होता है। उसी तरह बुद्धि में स्फुरित (प्रकाशित) होनेवाला बोध (ज्ञान) बुद्धि का धर्म नहीं है। क्योंकि बुद्धि उससे विपरीत धर्मवाली है अर्थात् जाड्यधर्म वाली (जड़) है ॥ ३५ ॥ चक्षुर्युक्ता धियो वृत्तिर्या तां पश्यन्नलुप्तदृक् । दृष्टेर्द्रष्टा भवेदात्मा श्रुतेः श्रोता तथा *भवेत् ॥३६॥ चक्षुरिति—यह जीवात्मा, नेत्रेन्द्रिय से युक्त हुई बुद्धि की वृत्ति को देखता रहता है, इस कारण, वह ‘अलुप्तदृक्’ कहलाता है। इस प्रकार वह आत्मा, 'दृष्टि' का द्रष्टा और 'श्रवण' का श्रोता समझा जाता है ॥ ३६ ॥ हृदयस्पर्शिनी केवल शास्त्रीय बुद्धि में ही चिद्धातु परमात्मा स्फुरित नहीं होता, किन्तु लौकिक विषयाकार बुद्धिवृत्ति में भी वह आत्मा स्वतः अपरोक्ष होता हुआ साक्षी के रूप में स्फुरित होता रहता है। चक्षुरिन्द्रिय के माध्यम से रूपाकार हुई बुद्धिवृत्ति को प्रकाशित करने के कारण यह आत्मा अकुण्ठितज्ञानशक्ति होता हुआ दृष्टि का द्रष्टा और श्रवण का श्रोता माना जाता है ॥ ३६ ॥ केवलां मनसो वृत्तिं पश्यन् मन्ता मतेरजः । विज्ञाताऽलुप्तशक्तित्वात्तथा शास्त्रं न हीयतेः ॥३७॥ केवलामिति—वह अजन्मा विकाररहित आत्मा केवल मन की वृत्ति को देखता है, उस कारण उसे मति का मनन करनेवाला और उसका विज्ञाता कहते हैं, क्योंकि उसकी चैतन्यशक्ति अकुण्ठित है। इसी बात को 'विज्ञाता के विज्ञान का लोप नहीं होता है'—यह श्रुतिवचन बता रहा है ॥ ३७ ॥ हृदयस्पर्शिनी बाह्येन्द्रिय की अपेक्षा किये बिना ही यह आत्मा, धीवृत्ति का साक्षी होता है। अर्थात् चक्षुरादि इन्द्रियों के माध्यम से बाहर प्रवृत्त हुए बिना ही भीतर ही भीतर विषयाकार होनेवाली बुद्धिवृत्ति (मनोवृत्ति) को देखने के
- श्रुतेः—पाठान्तरम् ।