भारतकोश
उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा

स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished364 पृष्ठ

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१६८ उपदेशसाहस्री तांपानन्तत्वादिति—स्त्री-पुत्रादि बाह्य विषयों में जो प्रेम (प्रीति) है, वह परिणाम में दुःख (ताप) दायक होता है, वह प्रेम अनित्य है, वह आत्मार्थ यानी स्वार्थप्रयुक्त (अपने लिये) है। अतः उस प्रेम का (अनात्मविषयक प्रेम का) अपने आत्मा में उपसंहार कर सत्यार्थी (सत्य को चाहने वाला) पुरुष किसी ब्रह्मनिष्ठ सद्गुरु का आश्रय ले ॥ ५१ ॥ हृदयस्पशिनी पुनः जिज्ञासा होती है कि साधन सहित कर्म के त्याग मात्र से ही मुक्ति हो जाती है किंवा उसके लिये कुछ और भी करना पड़ता है ? उस पर कहा गया है कि आत्मतत्त्व का ज्ञान प्राप्त करने के लिये गुरूपसत्ति करनी चाहिये। अथवा इस तरह समझिये कि समस्त प्रीति (प्रेम) कर्मनिबन्धन होने से अनित्य है, अर्थात् बाह्य पुत्र- कलत्रादि विषयों में जो प्रीति है, वह परिणाम में दुःखरूप और स्वार्थप्रयुक्त है, इस कारण उस अनात्मविषयक प्रीति को अपनी आत्मा में उपसंहृत कर नित्य पुरुषार्थी, सत्यसंकल्प गुरु का आश्रय ले, इस प्रकार मुमुक्षु को शिक्षा दे रहे हैं ॥ ५१ ॥ शान्तं प्राज्ञं तथा मुक्तं निष्क्रयं ब्रह्मणि स्थितम् । श्रुतेराचार्यवान्वेद तद्विद्धीति स्मृतेस्तथा ॥५२॥ शान्तमिति—भगवती श्रुति—'आचार्यवान् पुरुष को ही ज्ञान होता है', तथा स्मृति—'उसे प्रणाम के द्वारा जानो'—के अनुसार मुमुक्षु जिज्ञासु पुरुष उस गुरु का आश्रय ले, जो शान्त, मेधावी, मुक्त, निष्क्रिय और ब्रह्मनिष्ठ हो ॥ ५२ ॥ हृदयस्पशिनी उपगन्तव्य गुरु कैसा होना चाहिये ? उसे बता रहे हैं—अक्षुब्ध (शान्त) चित्तवाला, मेधावी (प्राज्ञ), परित्यक्तबन्ध-सजातीयबन्ध से पुनः बद्ध न होने वाला अर्थात् मुक्त यानी निष्किञ्चन, ऐहिक और आमुष्मिक कार्य- प्रवृत्ति रहित (निष्क्रिय), ब्रह्म में स्थित अर्थात् स्व-स्वरूपानन्द का अनुभव होने से सर्वत्र उदासीन, ऐसे गुरु के समीप जाना चाहिये । क्योंकि श्रुति कहती है कि 'आचार्यवान् पुरुषो वेद१'—आचार्यवान् पुरुष को ही ज्ञान होता है—तथा स्मृति “तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया । उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः२” भी कह रही है कि उसे प्रणाम के द्वारा जानो ॥ ५२ ॥ स गुरुस्तारयेद्युक्तं शिष्यं शिष्यगुणान्वितम् । ब्रह्मविद्याप्लवेनाशु स्वान्तध्वान्तमहोदधिम् ॥५३॥ स गुरुरिति—शिष्य के पूर्वोक्त गुण जिसमें हो, उस समाहित चित्तवाले शिष्य को वह गुरु ब्रह्मविद्यारूप नौका के द्वारा उसके अन्तः करण में स्थित अज्ञानरूप (अविद्यारूप) महासमुद्र के पार कर दे ॥ ५३ ॥ हृदयस्पशिनी पूर्वोक्त प्रमाण के अनुरोध से उक्त विशेषणों से विशिष्ट सद्गुरु के समीप पहुँचने पर होनेवाली निरतिशय फलप्राप्ति को बता रहे हैं—जिसका चित्त समाहित हो और भगवद्गीता में बताये हुए अमानित्वादि गुणों से युक्त तथा पूर्वोक्त 'प्रशान्तचित्ताय जितेन्द्रियाय' के द्वारा बताये गये गुणों से युक्त हुए शिष्य को वह गुरु ब्रह्मविद्यारूप अल्प नौका के द्वारा अन्तःकरणरूप उपाधि से युक्त जीव को स्वरूपावरक विक्षेप शक्तिवाले अनादि अनिर्वाच्य, अज्ञान (संसार) समुद्र से तार दे ॥ ५३ ॥ दृष्टिः स्पृष्टिः श्रुतिर्घ्रातिर्मतिर्विज्ञातिरेव च । शक्तयोऽन्याश्च भिद्यन्ते चिद्रूपत्वेऽप्युपाधिभिः ॥५४॥ १. ( छां. उ. ६।१४।२ ) २. ( भ. गी. ४।३४ )