भारतकोश
उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा

स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished364 पृष्ठ

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दृष्टिरिति- दर्शन, स्पर्शन, श्रवण, घ्राणन, मनन, विज्ञान तथा और भी अन्यान्य शक्तियाँ समान रूप से यद्यपि चिद्रूप ही हैं, तथापि भिन्न-भिन्न उपाधियों के कारण उन शक्तियों में भिन्नता उपलब्ध होती है ॥ ५४ ॥ हृदयस्पर्शिनी उक्त लक्षणों से सम्पन्न गुरु समाहितादि गुणों से युक्त हुए शिष्य को सम्यग् ज्ञान के द्वारा अनायास ही इस संसार-सागर से किस प्रकार से पार करावेगा ? यह जिज्ञासा होने पर कहते हैं कि वह प्रथमतः पदार्थविवेक करावे । उसके लिये पदार्थशुद्धि की अपेक्षा होती है । अतः उसे संक्षेपतः बता रहे हैं—दर्शन, स्पर्शन, श्रवण, घ्राणन, मनन, विज्ञान तथा अन्यान्य शक्तियाँ यद्यपि अखण्डचिद्रूपा ही हैं, तथापि तत्तद् इन्द्रियद्वारक बुद्धिवृत्तिभेदरूप भिन्न-भिन्न उपाधियों के कारण उनमें भेद होता है । वह भेद वास्तविक नहीं है । अतः तत्तद् वृत्त्यंश का परित्याग कराते हुए समस्त वृत्तियों के साक्षी रूप से अनुगत प्रकाशस्वभाव आत्मा ही 'त्वं' पदार्थ है, यह ज्ञान उसे प्रथमतः करावे ॥ ५४ ॥ अपायोद्भूतिहीनाभिर्नित्यं दीप्यन् रवैर्यथा । सर्वदृक् सर्वगः* शुद्धः सर्वं जानाति सर्वदा ॥५५॥ अपायेति—जैसे भगवान् भास्कर उत्पत्ति-विनाशशून्य अपनी रश्मियों [किरणों] द्वारा सर्वदा प्रकाश करते हुए स्थित रहता है, वैसे ही सर्वज्ञ-सर्व साक्षी शुद्धस्वरूप आत्मा स्व-स्वरूपभूता अपनी चिच्छक्ति से सम्पूर्ण पदार्थों को जानता है ॥ ५५ ॥ हृदयस्पर्शिनी चिच्छक्तिभेद को उपाधिप्रयुक्त ही क्यों न माना जाय ? अनुभवानुरोधेन उसे स्वरूपप्रयुक्त क्यों न माना जाय ? परन्तु यह शंका उचित नहीं है, क्योंकि वैसा मानने पर आत्मा को विकारी मानना पड़ेगा और कल्पनागौरव भी होगा । आत्मा तो अखण्डरूप है, उसकी अखण्डरूपता को दृष्टान्त के द्वारा बताते हैं— जिस प्रकार सूर्य अकेला ही अपनी जन्म-विनाशशून्य रश्मियों के द्वारा सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को प्रकाशित करता हुआ अविकृत रहता है, उसी प्रकार सर्वज्ञ, सर्वसाक्षी शुद्धस्वरूप आत्मा भी अपनी स्वरूपभूत चिच्छक्तियों के द्वारा अर्थात् तत्तद् बुद्धिवृत्तिरूप उपाधियों के भेद से भिन्न हुई चिच्छक्तियों के द्वारा समस्त पदार्थों को अच्छी तरह (विशेषरूप से) जानता है, और सर्वदा सामान्यरूप से भी सब देखता रहता है । जबकि सम्पूर्ण दृश्य का अधिष्ठान होने से वह पूर्णतः अव्यभिचारी है, तस्मात् वह शुद्ध अर्थात् निर्विकार है— ऐसा समझना चाहिये ॥ ५५ ॥ अन्यदृष्टिः शरीरस्थस्तावन्मात्रो ह्यविद्यया । जलेन्द्राद्युपमाभिस्तु तद्धर्मा च विभाव्यते ॥५६॥ अन्यदृष्टिरिति—शरीर में स्थित आत्मा, अनात्मदृष्टि (अन्यदृष्टि) सम्पन्न होने से, जैसे जल में प्रतिबिम्बित चन्द्र, जल के चञ्चल रहने पर चञ्चल-सा दिखाई देता है, उसी तरह अविद्यावश देह (शरीर) में आत्मत्व का अध्यास होते रहने से आत्मा को देहधर्मों से युक्त और देह (शरीर) परिमाण का समझते हैं ॥ ५६ ॥ हृदयस्पर्शिनी यदि आत्मा उक्त लक्षण से लक्षित है, तो वह संसार से ग्रस्त क्यों होता है और उसका परिच्छेदप्रतिभास क्यों होता है ? इस प्रश्न का उत्तर यह है कि अविद्या के कारण स्थूल-सूक्ष्म शरीरों में ही उपलभ्यमान होने के कारण आत्मा शरीरपरिमाण मात्र समझा जाता है और शारीरिक धर्मों से युक्त जान पड़ता है, अर्थात् संसारी जान पड़ता है । जैसे जल में प्रतिबिम्बित हुआ चन्द्रमा, जल की चञ्चलता के कारण चञ्चल प्रतीत होता है, उसी प्रकार देह में आत्मत्व का अध्यास होने के कारण आत्मा, देह के धर्मों से युक्त और देहपरिमाण मात्र जान पड़ता है ॥ ५६ ॥

  • सर्वज्ञः सर्वदृक् ० — पाठान्तरम् । २२