भारतकोश
उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा

स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished364 पृष्ठ

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पृष्ठ 196

१७० उपदेशसाहस्री दृष्ट्वा बाह्यं निमील्यैाथ स्मृत्वा तत्प्रविहाय च । *अथोन्मील्यात्मनो दृष्टिं ब्रह्म प्राप्नोत्यनध्वगः ॥५७॥ दृष्ट्वेति—मुमुक्षु पुरुष जाग्रत् काल के बाह्य पदार्थों को देखता रहता है, तथापि उनकी ओर से अपनी दृष्टि को हटा लेता है, उन्हीं को स्वप्न में वासनामय पदार्थ के रूप से स्मरण करता है, तदनन्तर उस वासनामय पदार्थ का भी त्याग कर देता है, बाद में सुषुप्ति की कारणभूत (बीजभूत) अज्ञान रूप दृष्टि का भी त्याग कर देता है, तब उसके बाद आत्मा की ज्ञानप्रकाशरूप आत्मदृष्टि को खोलकर वह अर्चिरादि मार्ग से बिना गये ही ब्रह्म को पा लेता है ॥ ५७ ॥ हृदयस्पर्शिनी इस प्रकार उपाधिपरामर्श हुए बिना आत्मा में भेद (संसार) आदि की उपलब्धि नहीं होती । और आत्मा की उपाधियों की स्वतन्त्र सत्ता में कोई प्रमाण नहीं है । अविद्यामय होनेपर भी वह चिदात्मा नित्य शुद्ध एवं परिपूर्ण ही है, इस प्रकार अवान्तर वाक्यों के द्वारा अवधारित हुआ आत्मा ही सत्यज्ञानादिलक्षण ब्रह्म है, इस प्रकार के महा- वाक्य से आचार्य के द्वारा आत्मतत्त्व को समझा हुआ मुमुक्षु जब यह जान लेता है कि समस्त दृश्य अवस्थात्रयात्मक ही है और उसका निरसन कर तत्साक्षीरूप में और तदधिष्ठान के रूप में अव्यभिचारी चिदेकरस ब्रह्म ही आत्मा है, ऐसा अनुभव जब उसे होने लगता है, तब वह मुक्त हो जाता है । इसी तथ्य को ध्यान में रखकर अनुसंधान करने का प्रकार बता रहे हैं—जाग्रत्-कालीन पञ्चीकृत पञ्चमहाभूतों के कार्यात्मक समष्टि-व्यष्टिरूप समस्त बाह्य पदार्थों को देखकर (द्रष्टा और दृश्य यानी कारण और कार्य को अन्वय-व्यतिरेक के द्वारा देखकर) तत्पश्चात् उनकी ओर से दृष्टि हटाकर अर्थात् समस्त दृश्य (कार्य) द्रष्टामात्र यानी सम्पूर्ण कार्य को कारणरूप ही समझे । उसके बाद जाग्रत् काल के अनुभव से उत्पन्न संस्कारों का कार्य यह स्वप्न है, अतः स्वप्नदर्शन एक स्मरण (स्मृति) मात्र है, ऐसा समझकर विश्व-वैश्वानर सहित स्थूल उपाधि को उस वासनामय लिङ्ग शरीर (सूक्ष्मभूत सहित सूक्ष्म-शरीर) में विलीन कर उस जाग्रत् प्रपञ्च को वासनामय स्वप्नमात्र ही समझे । तदनन्तर वासनासहित मन, प्राण, इन्द्रियसंधात (समुदाय) रूप लिङ्ग (सूक्ष्म) शरीर को भी उसके कारण में यानी पञ्चतन्मात्रा में विलीन कर दे, अर्थात् उस कार्यभूत सूक्ष्म शरीर को भी कारण (पंचतन्मात्रा) रूप ही समझे । इस प्रकार उत्पत्तिक्रम के विपरीत क्रम का अनुसरण करते हुए उस पञ्चतन्मात्रा को भी साभास अज्ञान से पृथक् न समझे, अर्थात् साभास अज्ञान में पञ्चतन्मात्राओं को विलीन कर दे । तदनन्तर सुषुप्ति में बीजरूप जो अज्ञानमात्र शेष रहा, उसे भी विवेक के द्वारा बाधित कर दे । वह अज्ञान न सत् है, न असत् है, न भिन्न है, न अभिन्न है, किसी प्रकार से भी उसको नहीं बताया जा सकता, अतः वह अन्ध पुरुष के द्वारा कल्पित अन्धकार के समान यत्किंचित् है, अनिर्वचनीय है, मिथ्या है, इस प्रकार के विवेक के द्वारा उस अज्ञान का भी बाध करे । तदनन्तर सभी अवस्थाओं का साक्षी बनकर रहने वाला सच्चिदानन्द मात्र मैं (आत्मा) हूँ, इस प्रकार ज्ञानप्रकाश रूप दृष्टि को खोले अर्थात् ज्ञानस्वरूप आत्मा को निरुपाधिक समझे, तब वह सत्यज्ञानादिलक्षण ब्रह्म ही हो जाता है । अर्थात् उसे अर्चिरादि मार्ग से जाने की आवश्यकता नहीं रहती । क्योंकि ब्रह्म ही उसका आत्मा है, अतः उसकी ब्रह्म- प्राप्ति अर्चिरादि मार्ग द्वारा गति के अधीन नहीं है ॥ ५७ ॥ प्राणाद्येवं त्रिकं हित्वा तीर्णोऽज्ञानमहोदधिम् । स्वात्मस्थो निर्गुणः शुद्धो बुद्धो मुक्तः स्वतो हि सः ॥५८॥ प्राणाद्येवमिति—इस तरह प्राणादि तीनों को अर्थात् प्राण, मन और बुद्धि रूप तीनों अन्तःकरणों को अथवा जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति रूप तीनों अवस्थाओं को त्याग कर अज्ञानरूप महासागर को पार करता हुआ वह पुरुष स्वयं आत्मनिष्ठ, निर्गुण तथा शुद्ध-बुद्ध-मुक्त स्वरूप हो जाता है ॥ ५८ ॥ हृदयस्पर्शिनी अनध्वग होता हुआ ब्रह्म को प्राप्त कर लेता है, इस कथन को ही और अधिक स्पष्ट करते हुए उसकी मुक्ति को निरुपाचरित (पूर्णरूपसे) बता रहे हैं । अर्थात् वह उपासक की मुक्ति की तरह आपेक्षिक नहीं है । उपर्युक्त प्रकार

  • अथान्मील्या०—पाठान्तरम् ।