भारतकोश
उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा

स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished364 पृष्ठ

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१७२ उपदेशसाहस्री जिस ब्रह्मज्ञानी का अन्तःकरण अहंभाव से रहित है और जिसकी बुद्धि धर्माधर्म संस्कार से रहित है, उसे पुण्य-पाप का बन्धन नहीं होता ॥ ६१ ॥ सत्यं ज्ञानमनन्तं च रसादेः पञ्चकात्परम् । स्यामदृश्यादिशास्त्रोक्तमहं ब्रह्मेति निर्भयः ॥६२॥ सत्यमिति—अदृश्यादि शास्त्र के द्वारा बताया हुआ, अन्नमयादि पञ्चकोषोंके परे स्थित, तथा सत्य, ज्ञान और अनन्त रूप ब्रह्म मैं हूँ, यह जानकर आत्मज्ञानी पुरुष निर्भय हो जाता है ॥ ६२ ॥ हृदयस्पर्शिनी पदार्थपरिशोधनपूर्वक महावाक्य से 'अहं ब्रह्मास्मि'-मैं ब्रह्म हूँ, इस प्रकार अनुभव करनेवाले ज्ञानी को पुनः संसारभय की आशंका नहीं रहती, इस उक्त अर्थ में “आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान्, न बिभेति कुतश्चन" इस श्रुति के अर्थ को 'सत्यं ज्ञानमनन्तं' से बता रहे हैं। अदृश्यादि शास्त्र— “अदृश्येऽनात्म्येऽनिरुक्तेऽभयं प्रतिष्ठां विन्दते" के द्वारा बताये गये और रसादि पञ्चक अर्थात् अन्नमय-प्राणमय-मनोमय-विज्ञानमय-आनन्दमय इन पंचकोशों के पर, यानी आधारभूत “ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठा" इस श्रुति से जिसका निर्देश किया गया है, उसी को 'अदृश्यादि शास्त्र' से गया है, वह सत्य ज्ञान एवं अनन्तरूप परब्रह्म 'मैं' हूँ, ऐसा समझकर पुरुष निर्भय हो जाता है ॥ ६२ ॥ यस्माद्भीताः प्रवर्तन्ते वाङ्मनःपावकादयः । तदात्मानन्दतत्त्वज्ञो न बिभेति कुतश्चन ॥६३॥ यस्मादिति—जिससे डरकर वाणी, मन तथा अग्नि आदि अपना-अपना काम करने में प्रवृत्त होते रहते हैं, उस आत्मानन्द के तत्त्व (रहस्य) को जानने वाला पुरुष कभी भी और किसी से भी भयभीत नहीं होता है ॥ ६३ ॥ हृदयस्पर्शिनी भयंकरों के लिये भी भयंकर ऐसे ब्रह्मात्मभूत हुए पुरुष को भय की शंका होने का भी अवकाश कहां ? इस प्रकार ब्रह्मज्ञ के पूर्वोक्त संसाराभाव को पुनः बताकर उसे दृढ़ कर रहे हैं। 'जिससे भयभीत होकर वाणी, मन एवं अग्नि आदि अपने-अपने व्यापारों में प्रवृत्त होते हैं, उस आत्मानन्द के रहस्य को जानने वाला पुरुष किसी से भी भय- भीत नहीं होता'। 'वाङ्मनः पावकादयः' के स्थान पर यदि 'वात्विनौ पावकादयः' पाठ हो तो 'इन' का अर्थ सूर्य समझना चाहिए । और 'आदि' शब्द से इन्द्र, मृत्यु का ग्रहण करना चाहिए । तथाच श्रुतिः - "भीषाऽस्माद्वातः पवते । भीषोदेति सूर्यः । भीषाऽस्मादग्निश्चेन्द्रश्च । मृत्युर्धावति पञ्चमः"१ । इसके भय से वायु चलता है, इसी के भय से सूर्य उदित होता है तथा इसी के भय से अग्नि, इन्द्र और पाँचवाँ मृत्यु दौड़ता है । "वाङ्मनःपावकादयः" पाठ में अध्यात्म वागादि हैं, और अधिदैव अग्नि आदि हैं। ये भी उसीके भय से प्रवृत्त होते हैं। तथाच श्रुतिः — "केनेषितं पतति प्रेषितं मनः केन प्राणः प्रथमः प्रैति युक्तः । केनेषितां वाचमिमां वदन्ति चक्षुः श्रोत्रं क उ देवो युनक्ति"२ । यह मन किसके द्वारा इच्छित और प्रेरित होकर अपने विषयों में गिरता है ? किससे प्रयुक्त होकर प्रधान प्राण चलता है ? प्राणी किसके द्वारा इच्छा की हुई यह वाणी बोलते हैं ? और कौन देव चक्षु तथा श्रोत्र को प्रेरित करता है ? तथा कठश्रुति भी कह रही है :— "भयादस्याग्निस्तपति भयात्तपति सूर्यः । भयादिन्द्रश्च वायुश्च मृत्युर्धावति पञ्चमः"३ ॥ इस परमेश्वर के भय से अग्नि तपता है, इसी के भय से सूर्य तपता है, तथा इसी के भय से इन्द्र, वायु और पाँचवाँ मृत्यु दौड़ता है ॥ ६३ ॥ १. ( तै. उ. २१८ ), भागवत ( ३।२५।४१-४४ ) से तुलना कर सकते हैं । २. ( के. उ. १।१ ) ३. ( कठ उ. २।३।३ )

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