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उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा

स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished364 पृष्ठ

१७२ उपदेशसाहस्री जिस ब्रह्मज्ञानी का अन्तःकरण अहंभाव से रहित है और जिसकी बुद्धि धर्माधर्म संस्कार से रहित है, उसे पुण्य-पाप का बन्धन नहीं होता ॥ ६१ ॥ सत्यं ज्ञानमनन्तं च रसादेः पञ्चकात्परम् । स्यामदृश्यादिशास्त्रोक्तमहं ब्रह्मेति निर्भयः ॥६२॥ सत्यमिति—अदृश्यादि शास्त्र के द्वारा बताया हुआ, अन्नमयादि पञ्चकोषोंके परे स्थित, तथा सत्य, ज्ञान और अनन्त रूप ब्रह्म मैं हूँ, यह जानकर आत्मज्ञानी पुरुष निर्भय हो जाता है ॥ ६२ ॥ हृदयस्पर्शिनी पदार्थपरिशोधनपूर्वक महावाक्य से 'अहं ब्रह्मास्मि'-मैं ब्रह्म हूँ, इस प्रकार अनुभव करनेवाले ज्ञानी को पुनः संसारभय की आशंका नहीं रहती, इस उक्त अर्थ में “आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान्, न बिभेति कुतश्चन" इस श्रुति के अर्थ को 'सत्यं ज्ञानमनन्तं' से बता रहे हैं। अदृश्यादि शास्त्र— “अदृश्येऽनात्म्येऽनिरुक्तेऽभयं प्रतिष्ठां विन्दते" के द्वारा बताये गये और रसादि पञ्चक अर्थात् अन्नमय-प्राणमय-मनोमय-विज्ञानमय-आनन्दमय इन पंचकोशों के पर, यानी आधारभूत “ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठा" इस श्रुति से जिसका निर्देश किया गया है, उसी को 'अदृश्यादि शास्त्र' से गया है, वह सत्य ज्ञान एवं अनन्तरूप परब्रह्म 'मैं' हूँ, ऐसा समझकर पुरुष निर्भय हो जाता है ॥ ६२ ॥ यस्माद्भीताः प्रवर्तन्ते वाङ्मनःपावकादयः । तदात्मानन्दतत्त्वज्ञो न बिभेति कुतश्चन ॥६३॥ यस्मादिति—जिससे डरकर वाणी, मन तथा अग्नि आदि अपना-अपना काम करने में प्रवृत्त होते रहते हैं, उस आत्मानन्द के तत्त्व (रहस्य) को जानने वाला पुरुष कभी भी और किसी से भी भयभीत नहीं होता है ॥ ६३ ॥ हृदयस्पर्शिनी भयंकरों के लिये भी भयंकर ऐसे ब्रह्मात्मभूत हुए पुरुष को भय की शंका होने का भी अवकाश कहां ? इस प्रकार ब्रह्मज्ञ के पूर्वोक्त संसाराभाव को पुनः बताकर उसे दृढ़ कर रहे हैं। 'जिससे भयभीत होकर वाणी, मन एवं अग्नि आदि अपने-अपने व्यापारों में प्रवृत्त होते हैं, उस आत्मानन्द के रहस्य को जानने वाला पुरुष किसी से भी भय- भीत नहीं होता'। 'वाङ्मनः पावकादयः' के स्थान पर यदि 'वात्विनौ पावकादयः' पाठ हो तो 'इन' का अर्थ सूर्य समझना चाहिए । और 'आदि' शब्द से इन्द्र, मृत्यु का ग्रहण करना चाहिए । तथाच श्रुतिः - "भीषाऽस्माद्वातः पवते । भीषोदेति सूर्यः । भीषाऽस्मादग्निश्चेन्द्रश्च । मृत्युर्धावति पञ्चमः"१ । इसके भय से वायु चलता है, इसी के भय से सूर्य उदित होता है तथा इसी के भय से अग्नि, इन्द्र और पाँचवाँ मृत्यु दौड़ता है । "वाङ्मनःपावकादयः" पाठ में अध्यात्म वागादि हैं, और अधिदैव अग्नि आदि हैं। ये भी उसीके भय से प्रवृत्त होते हैं। तथाच श्रुतिः — "केनेषितं पतति प्रेषितं मनः केन प्राणः प्रथमः प्रैति युक्तः । केनेषितां वाचमिमां वदन्ति चक्षुः श्रोत्रं क उ देवो युनक्ति"२ । यह मन किसके द्वारा इच्छित और प्रेरित होकर अपने विषयों में गिरता है ? किससे प्रयुक्त होकर प्रधान प्राण चलता है ? प्राणी किसके द्वारा इच्छा की हुई यह वाणी बोलते हैं ? और कौन देव चक्षु तथा श्रोत्र को प्रेरित करता है ? तथा कठश्रुति भी कह रही है :— "भयादस्याग्निस्तपति भयात्तपति सूर्यः । भयादिन्द्रश्च वायुश्च मृत्युर्धावति पञ्चमः"३ ॥ इस परमेश्वर के भय से अग्नि तपता है, इसी के भय से सूर्य तपता है, तथा इसी के भय से इन्द्र, वायु और पाँचवाँ मृत्यु दौड़ता है ॥ ६३ ॥ १. ( तै. उ. २१८ ), भागवत ( ३।२५।४१-४४ ) से तुलना कर सकते हैं । २. ( के. उ. १।१ ) ३. ( कठ उ. २।३।३ )

सम्यङ्मतिप्रकरणम् १७३ नामादिभ्यः परे भूम्नि स्वाराज्ये चेत्स्थितोऽद्वये । प्रणमेत्कं तदाऽऽत्मज्ञो न कार्यं कर्मणा *तथा ॥६४॥ नामेति—वह ब्रह्मात्मैक्यज्ञानसम्पन्नपुरुष यदि नाम आदि से अतीत, व्यापक, अद्वितीय स्वाराज्य में स्थित हो गया है तो वह किसे प्रणाम करेगा ? उस समय तो उस पुरुष को कर्म से कोई प्रयोजन ही नहीं होता ॥ ६४ ॥ हृदयस्पर्शिनी हरि, हर, हिरण्यगर्भ आदि बड़े-बड़े देवता, विद्वान् ब्रह्मज्ञानी के लिये भी प्रणम्य होते हैं। उनके अति- क्रमण का भय संभव रहने से उस ब्रह्मवित् के लिये कार्यशेष तो मानना ही होगा ? —ऐसा यदि कोई कहे तो उसपर कह रहे हैं कि ब्रह्मवित् यदि नामादि से अतीत, व्यापक, अद्वितीय स्वाराज्य में स्थित है तो वह किसको प्रणाम करेगा ? उस समय तो उसको कर्म से कोई प्रयोजन ही नहीं रहता; क्योंकि परिपक्वज्ञान होने से वह कृतकृत्य रहता है, अतः उसे किसी भी कर्म से कोई प्रयोजन नहीं होता । दूसरे के प्रति महद्भाव और अपने प्रति गौणीभाव रहने पर ही प्रणाम किया जाता है, किन्तु आत्मज्ञ विद्वान् तो प्रणम्यों का भी आत्मरूप है, जब सर्वत्र वही है, तो कौन छोटा और कौन बड़ा रहा ? सभी स्वस्वरूप हैं, अतः किसे प्रणाम करना होगा ? ॥ ६४ ॥ विराड्वैश्वानरो बाह्यः स्मरन्नन्तः प्रजापतिः । प्रविलीने तु सर्वस्मिन् प्राज्ञोऽव्याकृतमुच्यते ॥६५॥ विराडिति—वही आत्मा जाग्रदवस्था में बहिष्प्रज्ञ होने पर व्यष्टि और समष्टि के भेद से 'विराट्' और 'वैश्वानर', तथा स्वप्नावस्था में अन्तःकरण में स्मरण करने पर 'तैजस' और 'हिरण्यगर्भ', और सुषुप्तावस्था में सभी के लीन हो जाने पर 'प्राज्ञ' और 'अव्याकृत' कहलाता है ॥ ६५ ॥ हृदयस्पर्शिनी यह भूमा (ब्रह्म), नाम, वाक्, मन आदि से लेकर प्राण तक जितने भी हैं, उन सबके परे है, यह कहा गया है¹। ऐसी स्थिति में उस ब्रह्म को अद्वय कैसे कहें ? ये नाम आदि अवस्थात्रयरूप होने से अध्यस्त हैं, अतः मिथ्या हैं। उनका साक्षी तुरीय भूमा (ब्रह्म) तो अद्वय है, उसे बताने के लिए तीन अवस्थाओं को बताते हैं—वह आत्मतत्त्व ही जाग्रदवस्था में बहिष्प्रज्ञ होने पर व्यष्टि-समष्टि भेद से विराट् और वैश्वानर, स्वप्नावस्था में अन्तःकरण में स्मरण करने पर तैजस और हिरण्यगर्भ, तथा सुषुप्तावस्था में सबके लीन हो जाने पर प्राज्ञ और अव्याकृत कहा जाता है। अध्यात्म और अधिदैवत के अभेदाभिप्राय से विराट्-वैश्वानर अर्थात् विश्व-वैश्वानर कहा। बाह्य का अर्थ बहिःप्रज्ञ है। 'अन्तः स्मरन्' कहकर यह बताया है कि स्वप्न में वासनामय विषयों को देखनेवाला प्रजापति हिरण्यगर्भ तैजस है। अव्याकृत माया की उपाधि से युक्त ईश्वरतत्त्व को 'प्राज्ञ' कहा गया है ॥ ६५ ॥ वाचारम्भणमात्रत्वात्सुषुप्तादित्रिकं त्वसत् । सत्यो ज्ञश्चाहमित्येवं सत्यसन्धो विमुच्यते ॥६६॥ वाचारम्भणेति—सुषुप्तादि तीनों अवस्थाएँ तो मिथ्या हैं, क्योंकि ये वाचारम्भण मात्र हैं। 'मैं (आत्मा) ही ज्ञानस्वरूप हूँ'—यह जाननेवाला सत्यसन्ध मुमुक्षु पुरुष मुक्त हो जाता है ॥ ६६ ॥ हृदयस्पर्शिनी अवस्थात्रयात्मक जगत् को मिथ्या समझकर उसकी साक्षीभूत वस्तु जो ब्रह्म है, वह मैं हूँ, यह ज्ञान होनेपर मुक्त हो जाता है। वाणी से आरंभ होने के कारण सुषुप्ति आदि तीनों अवस्थाएँ मिथ्या हैं', 'मैं ज्ञानस्वरूप आत्मा ही सत्य हूँ' इस प्रकार का ज्ञान होनेपर सत्यप्रतिज्ञ पुरुष मुक्त हो जाता है ॥ ६६ ॥ १. ( के. उ. १।१-८ )

  • तदा—पाठान्तरम् ।

यहाँ पृष्ठ का पूर्ण देवनागरी पाठ प्रस्तुत है:

१७४ उपदेशसाहस्री भारूपत्वाद्यथा भानोर्नाहोरात्रे तथैव *च । ज्ञानाज्ञाने न मे स्यातां चिद्रूपत्वाविशेषतः ॥६७॥ भारूपत्वादिति—जिस प्रकार सूर्य में दिन तथा रात्रि नहीं होती है, क्योंकि वह प्रकाशरूप है, इसी प्रकार चिद्रूपत्त्व की समानता होने से मुझ (आत्मा) में न ज्ञान है और न अज्ञान ही है ॥ ६७ ॥ हृदयस्पर्शिनी आत्मतत्त्व का ज्ञान न होने से अध्यस्त रहनेवाले संसार की निवृत्ति अधिष्ठानरूप आत्मतत्त्व के ज्ञान से हो जाती है। यह कहने से ज्ञान और अज्ञान को आत्मधर्म कहना होगा ?—इस आशंका का समाधान दृष्टान्त देकर कर रहे हैं—जिस प्रकार प्रकाशस्वरूप होने के कारण सूर्य में दिन-रात का अभाव रहता है, उसी प्रकार चिद्रूपता की समानता होने से मुझ आत्मा में न ज्ञान है, न अज्ञान है। मैं तो ज्ञान-अज्ञान दोनों का ही साक्षी हूँ, और वे दोनों मेरे साक्ष्य हैं, अतः वे दोनों कल्पित हैं। कल्पित होने के कारण वे दोनों मेरे धर्म नहीं हैं ॥ ६७ ॥ शास्त्रस्यानतिशङ्क्यत्वादब्रह्मैव स्यामहं सदा । ब्रह्मणो मे न हेयं स्याद्ग्राह्यं वेति च संस्मरेत् ॥६८॥ शास्त्रस्येति—शास्त्र का प्रामाण्य किसी प्रकार भी शङ्का करने के योग्य न होने से 'मैं सर्वदा ब्रह्मरूप ही हूँ' । अतः मुझ ब्रह्मस्वरूप के लिये 'न कुछ हेय (त्याज्य) है और न कुछ उपादेय (ग्राह्य) है'—यह सर्वदा स्मरण रखना चाहिये ॥ ६८ ॥ हृदयस्पर्शिनी आत्मा की निर्विशेषता शास्त्रप्रामाण्य से ही सिद्ध हैं, अतः कुतर्क से मन को दूषित नहीं करना चाहिए। शास्त्र का प्रामाण्य किसी प्रकार से भी शंका करने योग्य नहीं है, उसका प्रामाण्य निःशङ्क है । अतः 'मैं सर्वदा ब्रह्म ही हूँ, ब्रह्मरूप हुए मेरे लिये न कुछ हेय है और न ग्राह्य है', यह सर्वदा स्मरण रखना चाहिए ॥ ६८ ॥ अहमेव च भूतेषु सर्वेष्वेको नभो यथा । मयि सर्वाणि भूतानि पश्यन्नेवं न जायते ॥६९॥ अह्ममिति—जैसे आकाश सर्वत्र विद्यमान है, वैसे मैं ही समस्त भूतों में विद्यमान हूँ तथा समस्त भूत मुझमें विद्यमान हैं, ऐसी दृष्टि रखने वाला पुरुष पुनः कभी उत्पन्न नहीं होता अर्थात् जन्म ग्रहण नहीं करता ॥ ६९ ॥ हृदयस्पर्शिनी वह ब्रह्मपरक शास्त्र कौन-सा है, और सर्वदा अहेय अनुपादेय ब्रह्मात्मज्ञाननिष्ठा का फल क्या है ? ऐसी अपेक्षा होनेपर 'यस्तु सर्वाणि भूतानि'१ इत्यादि मन्त्रार्थ को दे रहे हैं—मैं एकाकी ही आकाश के समान यच्चयावत् सम्पूर्ण भूतमात्र में विद्यमान हूँ, तथा सम्पूर्ण भूतमात्र मुझमें स्थित हैं। इस प्रकार की दृष्टि (ज्ञान) होनेपर उस ज्ञानी को जन्म नहीं लेना पड़ता ॥ ६९ ॥ न बाह्यं मध्यतो वाऽन्तर्विद्यतेऽन्यत्स्वतः क्वचित् । सबाह्यान्तःश्रुतेः किञ्चित्तस्माच्छुद्धः स्वयंप्रभः ॥७०॥ न बाह्यमिति—बाहर, भीतर या मध्य में आत्मा के अतिरिक्त अन्य कोई वस्तु नहीं है। इस तथ्य को भगवती श्रुति ने बताया है। इसलिये वह आत्मा शुद्ध और स्वयम्प्रकाश है ॥ ७० ॥ १. (ई. उ. ६)

  • तु—पाठान्तरम् ।

हृदयस्पर्शिनी आत्मा की अद्वितीय ब्रह्मरूपता में अर्थतः शास्त्र को बताकर अब उसकी निर्विशेष ब्रह्मरूपता में भी शास्त्र (श्रुति) बता रहे है—“तदेतद् ब्रह्मापूर्वमनपरमनन्तरमबाह्यमयमात्मा ब्रह्म सर्वानुभूः¹” पूर्वोक्तगुणविशिष्ट यह ब्रह्म अपूर्व (कारणरहित), अनपर (कार्यरहित), अनन्तर (विजातीय द्रव्य से रहित) और अबाह्य है। यह आत्मा ही सबका अनुभव करनेवाला ब्रह्म है। इस श्रुति के कारण आत्मा से भिन्न उसके बाहर, भीतर या मध्य में अन्य कोई वस्तु है ही नहीं। अतः वह शुद्ध और स्वयंप्रकाश है ॥ ७० ॥ नेति नेत्यादिशास्त्रेभ्यः ‘प्रपञ्चोपशमोऽद्वयः’ । अविज्ञातादिशास्त्राच्च नैव ज्ञेयो ह्यतोऽन्यथा ॥७१॥ नेतीति—नेति-नेति इत्यादि शास्त्र से तथा अविज्ञातादि-शास्त्र से वह आत्मा प्रपञ्चशून्य एवं अद्वितीय है, इसके अतिरिक्त अन्य किसी रीति से वह ज्ञेय नहीं है॥ ७१ ॥ हृदयस्पर्शिनी आत्मा की सर्वप्रपञ्चसंस्पर्शशून्यता को शास्त्रान्तरों के द्वारा भी बता रहे हैं—प्रपञ्च के निषेध द्वारा ही आत्मा को जानना चाहिए, विषय के रूप में या प्रपञ्च संसृष्ट के रूप में नहीं। ‘आत्मा स्थूल नहीं है, सूक्ष्म शरीर भी नहीं है’, इत्यादि शास्त्र से तथा ‘वह स्वयं ज्ञात हुए बिना ही दूसरों का ज्ञाता है’ इस श्रुति से आत्मा प्रपञ्चशून्य एवं अद्वितीय है, वह इससे भिन्न प्रकार से ज्ञेय नहीं है। नेति-नेति शास्त्र अर्थात् प्रपञ्चनिषेध शास्त्र को बृहदारण्यक में बताया है—‘नेति नेति न ह्येतस्मादिति नेत्यन्यत्परमस्त्यथ नामधेयं सत्यस्य सत्यमिति’। ‘नेति-नेति’ यह ब्रह्म का संकेत है। ‘नेति’ ‘नेति’ से बढ़कर कोई उत्कृष्ट संकेत नहीं है। ‘सत्य का सत्य’ उसका नाम है²। उसी प्रकार गौड़पादकारिका में उसे प्रपञ्चोपशम अद्वयरूप बताया है³। केनोपनिषद् में कहा है कि ‘अन्यदेव तद्विदितादथो अविदितादधि’⁴—वह विदित से अन्य ही है तथा अविदित से भी परे है। तथा उसी में पुनः बताया है ‘यस्यामतं तस्य मतं मतं यस्य न वेद सः⁵—ब्रह्म जिसको ज्ञात नहीं है, उसी को ज्ञात है और जिसको है, वह उसे नहीं जानता है। बृहदारण्यक में कहा है ‘अविज्ञातं विज्ञातृ’⁶—बुद्धि का अविषय होने के कारण विज्ञात नहीं है, किन्तु स्वयं विज्ञानस्वरूप होने से विज्ञाता है। इस प्रकार उसकी सर्वप्रपञ्चशून्यता स्पष्ट हो रही है ॥ ७१ ॥ सर्वस्यात्माऽहमेवेति ब्रह्म चेद्विदितं परम्। स आत्मा सर्वभूतानामात्मा ह्येषाामिति श्रुतेः॥७२॥ सर्वस्येति—‘मैं ही सबका आत्मा हूँ’—इस प्रकार से यदि ब्रह्म का ज्ञान हो जाय तो वह समस्त प्राणियों का ‘आत्मा’ हो जाता है। इस तथ्य को भगवती श्रुति ने बताया है ॥ ७२ ॥ हृदयस्पर्शिनी “तस्मादेषां तन्न प्रियं यदेतन्मनुष्या विद्युः⁷”—इसलिये देवताओं को यह प्रिय नहीं है कि मनुष्य ब्रह्मतत्त्व को जानें—यह श्रुति बता रही है कि इस प्रकार अद्वयादि लक्षण आत्मा को जानने वालों की फलप्राप्ति में देवता लोग विघ्न पैदा करते हैं—यह शंका यदि कोई करे तो वह ठीक नहीं है, क्योंकि ‘मैं ही सब का आत्मा १. (बृ. उ. २।५।१९) २. (बृ. उ. २।३।६) ३. (गौ. का. २।३५) ४. (के. उ. १।३) ५. (के. उ. २।३) ६. (बृ. उ. ३।८।११) ७. (बृ. उ. १।४।१०)

१७६ | उपदेशसाहस्री हूँ' इस प्रकार यदि परब्रह्म का ज्ञान हो जाय तो वह समस्त प्राणिमात्र का आत्मा हो जाता है। वह विद्वान् ब्रह्म- ज्ञानी देवताओं का भी आत्मा होने से उस विघ्नप्रतिपादक श्रुति को अविद्वद्विषयक समझना चाहिये । "तस्य ह न देवाश्च ना भूत्या ईशते । आत्मा ह्येषां स भवति१"-उसके पराभव में देवता भी समर्थ नहीं होते, क्योंकि वह उनका आत्मा ही हो जाता है, यह बृहदारण्यक श्रुति बता रही है ॥ ७२ ॥ जीवश्चेत्परमात्मानं स्वात्मानं देवमञ्जसा । देवो [वेदो] पास्यः स देवानां पशुत्वाच्च निवर्तते ॥७३॥ जीवश्चेदिति-यदि जीव अपने को परमात्मस्वरूप जानने लगता है, तो वह शीघ्र ही देवताओं का भी उपास्य हो जाता है और देवताओं के पशुत्व से निवृत्त होता है ॥ ७३ ॥ हृदयस्पर्शिनी उक्त साधनसम्पन्न ब्रह्मात्मज्ञानवान् विद्वान् अपनी जीवित अवस्था में ही देवताओं का भी उपास्य बन जाता है, अतः उसके प्रति देवपशुत्व की शंका भी नहीं की जा सकती अर्थात् देवताओं के पशुत्व से वह निवृत्त हो जाता है। अतः उसे किसी से भी भय नहीं रहता । इसी अभिप्राय को श्रुति ने भी बताया है— "यदैव मनु पश्यत्यात्मानं देवमञ्जसा । ईशानं भूतभव्यस्य न तदा विजुगुप्सते२ ॥" तथा तैत्तिरीय उपनिषद् ने भी बताया है कि "सर्वैस्मै देवा बलिमावहन्ति३" उसी प्रकार तैत्तिरीय आरण्यक ने भी कहा है कि "तमेवं विद्वानमृत इह भवति४" ॥ ७३ ॥ अहमेव सदात्मज्ञः शून्यस्त्वन्यैरथाम्बरम् । इत्येवं सत्यसन्धत्वादसद्धाता* न बध्यते ॥७४॥ अह्मिति—'मैं ही सत्स्वरूप चेतन आत्मा हूँ, तथा आकाश के समान अन्य पदार्थों से रहित हूँ'-इस प्रकार सत्यसन्ध होने के कारण असत्य का त्याग करने वाला पुरुष, चोर के समान बद्ध नहीं होता है ॥ ७४ ॥ हृदयस्पर्शिनी यह जो पीछे कहा था कि "सत्यसन्धो विमुच्यते" उसी को स्पष्ट कर रहे हैं-मैं ही 'सत्' स्वरूप चेतन आत्मा हूँ, और आकाश के तुल्य अन्य पदार्थों से रहित हूँ। इस प्रकार सत्यसन्ध होने के कारण असत्य का त्याग करने वाला पुरुष, चोर के समान बन्धन को प्राप्त नहीं होता, या उसका वध नहीं किया जाता । 'सदात्मज्ञः' में कर्मधारय समास 'सदात्मा चासौ ज्ञश्च-सदात्मज्ञः' करना चाहिये । इसका उदाहरण 'तत्सत्यं स आत्मा५' यह श्रुति है। 'अन्यैः शून्यः' कहकर वाचारंभण श्रुति के अर्थ को बताया है। 'यथाम्बरम्' से दृश्यसंसर्गशून्य होने के कारण शुद्ध रहने में दृष्टान्त बताया है। 'असद्धाता' से अनृताभिसन्धि से रहित होने के कारण अतस्कर के समान बन्धनार्थहीन रहता है। इसके उदाहरण में “स यथा तत्र न दह्ये तैतदात्म्यमिदं सर्वम्६” यह श्रुति है। अथवा 'असत: हाता'—असद्धाता अर्थात् कार्यसहित अज्ञान का नाशयिता अर्थ करना चाहिये ॥ ७४ ॥ कृपणास्तेऽन्यथैवातो विदुर्ब्रह्म परं हि ये । स्वराड्चोऽनन्यदृक् स्वस्थस्तस्य देवा असन्वशे ॥७५॥ १. ( बृ. उ. १।४।१० ) २. ( कठ. उ. ४।६ ) ३. ( तै. उ. १।५ ) ४. ( तै. आ. ३।१।३ ) ५. ( छा. उ. ६।८।७ ) ६. ( छा. उ. ६।१६।३ )

  • ह्तानाज्ञ-पाठान्तरम् ।

सम्यङ्मतिप्रकरणम् १७७

कृपणा इति—वे लोग कृपण (दीन) हैं, जो 'आत्मा' को 'ब्रह्म' से भिन्न समझते हैं, परन्तु जो लोग 'ब्रह्म' और 'आत्मा' दोनों में अभेद देखते हैं, वे स्वयंप्रकाश और आत्मनिष्ठ कहलाते हैं। सम्पूर्ण देवतागण भी उसके वशंगत रहते हैं ।। ७५ ।। हृदयस्पर्शिनी इस प्रकार का ज्ञान न होने से अन्य प्राकृत लोग शोच्य रहते हैं, इसे दिखाते हुए "अथ येऽन्यथाऽतो विदुरन्यराजानस्ते क्षय्यलोका भवन्ति१” इस श्रुति के अर्थ को बता रहे हैं—जो लोग परब्रह्म को आत्मा से भिन्न अर्थात् अनात्मरूप जानते हैं, वे कृपण यानी दीन (शोच्य) ही हैं। किन्तु जो अभेददर्शी है, वह कृपण नहीं है। वह स्वयंप्रकाश और आत्मनिष्ठ रहता है, सम्पूर्ण देवगण उसके अधीन रहते हैं। छान्दोग्य श्रुति बता रही है— 'एवं विजानन्नात्मरतिरात्मक्रीड आत्ममिथुन आत्मानन्दः स स्वराड् भवति२' तथा “तस्य सर्वेषु लोकेषु कामचारो भवति"—इस प्रकार विशेषरूप से जानने वाला आत्मरत, आत्मक्रीड़, आत्ममिथुन और आत्मानन्द होता है, वह स्वराट् है, सम्पूर्ण लोकों में उसकी यथेच्छ गति होती है। 'आसम्' अर्थ में 'असन्' प्रयोग छान्दस है। "यस्त्वेवं ब्राह्मणो विद्यात् । तस्य देवा असन् वशे" इस तैत्तिरीय आरण्यक के मन्त्र में 'असन्' प्रयोग हुआ है। जो इस प्रकार का ब्रह्मनिष्ठ ब्राह्मण 'वेदाहमेतं पुरुषं महान्तम् ३' के अनुसार ब्रह्मात्मा को जानता है, देवता उस ब्रह्मनिष्ठ के वशवर्ती हो जाते हैं ।। ७५ ।। हित्वा जात्यादिसम्बन्धा *न्वाचोऽन्याः सह कर्मभिः । ओमित्येवं †स्वमात्मानं सर्वं शुद्धं प्रपद्यथ ॥७६॥ हित्वेति—जाति आदि सम्बन्धों का तथा कर्मकलाप के सहित अन्य समस्त वाक्यों का त्याग करके सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का आधारभूत 'ॐ' शब्द से वाच्य जो शुद्ध आत्मा है, उसी के शरण में जाओ ।। ७६ ।। हृदयस्पर्शिनी यथोक्त आत्मज्ञान से ही कृतकृत्यता हो पाती है, अतः मुमुक्षु को उसी के लिये यत्न करना चाहिये । जाति आदि सम्बन्ध तथा कर्मों के सहित अन्य समस्त वाक्यों का त्याग करके सर्वदा सब के आधारभूत ॐ शब्दवाच्य शुद्ध आत्मा के शरण जाओ । मुण्डक श्रुति कह रही है— "यस्मिन् द्यौः पृथिवी चान्तरिक्षमोतं मनः सह प्राणैश्च सर्वैः । तमेवैकं जानथ आत्मानमन्या वाचो विमुञ्चथामृतस्यैष सेतुः४ ।” “ओमित्येवं ध्यायथ आत्मानम्५"—जिसमें द्युलोक, पृथिवी, अन्तरिक्ष और सम्पूर्ण प्राणों के सहित मन ओत-प्रोत है, उस एक आत्मा को ही जानो, और सब बातों को छोड़ो, यही अमृत का सेतु (साधन) है। उस आत्मा का ॐ के रूप में ध्यान करो । इनके अतिरिक्त अन्य जो वाक्य हैं, वे सब अनात्मविषयक प्रवृत्तिपरक हैं। 'सर्वम्' का अर्थ सर्वाधारभूत और 'शुद्धम्' का अर्थ विविक्त अर्थात् निर्विशेष समझना चाहिये ।। ७६ ।। सेतुं सर्वव्यवस्थानामहोरात्रादिवर्जितम् । तिर्यगूर्ध्वमधः सर्वं सकृज्ज्योतिरनामयम् ॥७७॥ सेतुमिति—वह आत्मा वर्णाश्रमादि सभी मर्यादाओं का सेतु है, दिन-रात्रिरूप काल से भी परे है अर्थात् उसे काल का स्पर्श तक नहीं हो पाता । ऊपर-नीचे-पार्श्व भाग में यानी सभी ओर वह विद्यमान है। वही एक मात्र ज्योतिः- स्वरूप और निर्दोष (अनामय) है ।। ७७ ।।

  • सम्बन्धं—पाठान्तरम् । † सदात्मानं— पाठान्तरम् । १. ( छां. उ. ७।२५।२ ) २. ( छां. उ. ७।२५।२ ) ३. ( तै. आ. ३।१३ ) ४. ( मु. उ. २।२।५ ) ५. ( मु. उ. २।२।६ ) २३

यहाँ दिए गए पृष्ठ का संपूर्ण पाठ (transcription) प्रस्तुत है:

१७८ उपदेशसाहस्री —वह शरण्य (प्रतिपत्तव्य) आत्मा समस्त वर्णाश्रमादि मर्यादाओं का सेतु (विधारक) है। छान्दोग्य श्रुति बता रही है—"अथ य आत्मा स सेतुर्विधृतिरेषां लोकानामसंभेदाय नैतं सेतुमहोरात्रे तरतः............ सकृद्विभातो ह्येवैष ब्रह्मलोकः।"१ जो आत्मा है, वह इन लोकों के पारस्परिक असंघर्ष (असंभेद) के लिये इन्हें विशेष- रूप से धारण करने वाला सेतु है। दिन और रात्रि (अहोरात्र) भी इस सेतु का अतिक्रमण नहीं कर पाते। इस सेतु को न जरा, न मृत्यु, न शोक और न सुकृत या दुष्कृत ही प्राप्त हो सकते हैं। संपूर्ण पाप इससे निवृत्त हो जाते हैं, क्योंकि यह ब्रह्मलोक पापशून्य है। यह ब्रह्मलोक सर्वदा प्रकाशस्वरूप है। तात्पर्य यह है कि मुक्ति प्राप्ति में यह आत्मरूप सेतु रात्रि-दिवसादि से रहित और ऊपर-नीचे, इधर-उधर सब ओर विद्यमान, एकमात्र ज्योतिःस्वरूप और अनामय (दोषरहित) है ॥ ७७ ॥ धर्माधर्मविनिर्मुक्तं भूतभव्यात्कृताकृतात् । स्वमात्मानं परं विद्याद्विमुक्तं सर्वबन्धनैः ॥७८॥ धर्माधर्मेति—धर्म और अधर्म से भी रहित (विनिर्मुक्त) तथा भूत-भविष्य और कार्य-कारण से भिन्न और सभी प्रकार के बन्धनों से मुक्त रहने वाले अपने आत्मा को जानना चाहिये ॥ ७८ ॥ हृदयस्पर्शिनी वह शरण्य आत्मा, धर्माऽधर्म से शून्य, भूत-भविष्य और कार्य-कारण से भिन्न तथा सर्वविध समस्त बन्धनों से मुक्त है, ऐसा समझते रहना चाहिये। काठक श्रुति कह रही है—"अन्यत्र धर्मादन्यत्राधर्मादन्यत्रास्मात्कृता- कृतात् । अन्यत्र भूताच्च भव्याच्च यत्तत्पश्यसि तद्वद२।" जो धर्म से पृथक्, अधर्म से पृथक् तथा इस कार्य-कारणरूप प्रपञ्च से भी पृथक् है, और जो भूत एवं भविष्य से भी अन्य है—ऐसा आप जिसे देखते हैं, वही मुझे बताइये। इसी श्रुत्यर्थ को श्लोक के द्वारा बताया गया है। 'कृताऽकृतात्' का अर्थ कार्य-कारण से है ॥ ७८ ॥ अकुर्वन्सर्वकृच्छुद्धस्तिष्ठन्नत्येति धावतः । मायया सर्वशक्तित्वादजः सन् बहुधा मतः ॥७९॥ अकुर्वन्निति—वह आत्मा कुछ न करता हुआ भी सब कुछ करता है, वह शुद्ध है, वह स्थित रहता हुआ भी तेजी से दौड़नेवाले मन से भी आगे निकल जाता है, वह अजन्मा रहने पर भी माया के कारण सर्वशक्तिसम्पन्न होने से उसको अनेक प्रकार का भी कहा गया है ॥ ७९ ॥ हृदयस्पर्शिनी आत्मा को कर्ता, भोक्ता आदि कहने के कारण उसे बन्धनों से सर्वथा मुक्त कैसे कह सकते हैं? यह शंका हो सकती है, किन्तु उसके कर्तृत्व श्रवण के साथ ही उसका अकर्तृत्व भी सुना जाता है, तब एक ही वस्तु में दो विरुद्ध स्वभावों का सम्बन्ध हो नहीं सकता, अतः कहना होगा कि स्वभाव से प्राप्त कर्तृत्वादिक तो मायामय है, और अकर्तृत्वादिक प्रमाणसिद्ध है, वह आत्मस्वभाव है, यही दोनों में अन्तर है, इसी को बताने वाली अर्थात् विरुद्धधर्मवादिनी श्रुतियां हैं। श्लोकगत 'अकुर्वन्' से 'अनेजदेकं मनसो जवीयः३' इस मन्त्रभाग के अर्थ को बताया गया है। उसी तरह 'शुद्धः' से 'शुद्धमपापविद्धम्' का अर्थ बताया है। 'तिष्ठन्' से 'तद्धावतोऽन्यानत्येति तिष्ठत्'४ का अर्थ बताया है। 'अजः सन् बहुधा मतः' से 'अजायमानो बहुधा विकायते'५ का अर्थ बताया है। उपर्युक्त सभी में 'मायया सर्वशक्तित्वात्' हेतु दिया है, अर्थात् माया के लिये कोई बात असंभव नहीं है, माया तो 'अघटितघटना- १. (छां. उ. ८।४।१-२) २. (कठ. उ. २।१४) ३. (ई. उ. ४।) ४. (कठ. उ. २।१४) ५. (तै. आ. ३।१३)

सम्यङ्मतिप्रकरणम् १७९

पटीयसी' कहलाती है। निष्कर्ष यह है कि वह कुछ न करते हुए भी सब कुछ करनेवाला है, शुद्ध है, स्थित रहते हुए भी दौड़नेवाले मन आदि से आगे निकल जाता है, तथा माया के द्वारा सर्वशक्तिसम्पन्न होने के कारण वह अजन्मा होते हुए भी अनेक प्रकार से माना जाता है। मन, प्राण आदि अत्यन्त वेगवान् हैं, इनसे अधिक वेगवान् संसार में अन्य कोई नहीं देखा गया है, किन्तु इस आत्मा का वेग उनसे भी कहीं अधिक है, वह उनका भी उल्लंघन कर जाता है। क्योंकि जहाँ कहीं मन, प्राण आदि पहुँचते हैं, वहाँ सर्वत्र पहले से ही आत्मचैतन्य अभिव्यक्त हुआ पाया जाता है। अतः आत्मा स्थिर स्थित रहता हुआ भी चलता हुआ-सा (गच्छतीव) प्रतीत होता है ॥ ७९ ॥

राजवत्साक्षिमात्रत्वात्सांनिध्याद्भ्रामको यथा । भ्रामयञ्जगदात्मानं निष्क्रियोऽकारकोऽद्वयः ॥८०॥

राजवदिति—चुम्बक जैसे अपने सान्निध्यमात्र से लोहखण्ड का परिभ्रामक होता है, वैसे ही समस्त जगत् को घुमाता हुआ भी मैं (आत्मा) राजा के समान साक्षिमात्र हूँ, अतः मैं निष्क्रिय, अकर्ता और अद्वितीय हूँ ॥ ८० ॥

हृदयस्पर्शिनो

निष्क्रिय में भी क्रियावान् का जो उपचार किया गया है, उसी को दृष्टान्त देकर बताया जा रहा है। जैसे चुम्बक अपनी सन्निधिमात्र से लोहखण्ड को नचा देता है, वैसे ही समस्त जगत् को परिभ्रमण कराता हुआ भी यह आत्मा राजा के समान साक्षिमात्र है, अतः वह मैं आत्मा, निष्क्रिय, कर्तृत्वरहित और अद्वितीय हूँ ॥ ८० ॥

निर्गुणं निष्क्रियं नित्यं निर्द्वन्द्वं यन्निरामयम् । शुद्धं बुद्धं तथा मुक्तं तद्ब्रह्मास्मीति धारयेत् ॥८१॥

निर्गुणमिति—जो निर्गुण, निष्क्रिय, निर्द्वन्द्व, निरामय और शुद्ध, बुद्ध, मुक्त स्वरूप ब्रह्म है, वही 'मैं' हूँ—यह निश्चित रूप से समझना चाहिये ॥ ८१ ॥

हृदयस्पर्शिनो

जबकि आत्मा स्वयं (स्वतः) नित्य शुद्धस्वभाव का है और यह बात शास्त्र तथा न्याय से अवगत होती है, इस कारण उस आत्मा को उसी तरह जाना जाय' अन्यथा नहीं। जो निर्गुण, निष्क्रिय, निर्द्वन्द्व, निरामय एवं शुद्ध, बुद्ध,मुक्तस्वरूप ब्रह्म है, वही मैं हूँ—ऐसा दृढ़ निश्चय करना चाहिए। इन श्लोकों में यद्यपि पुनरुक्ति दृष्टिगोचर होती है, तथापि वह दोषावह नहीं है¹। क्योंकि प्रतिपाद्य बहुत दुर्बोध है, उस कारण मुमुक्षु पर उपकार करने के लिए परम कारुणिक आचार्य कभी शास्त्र के द्वारा, कभी फल बताकर, कभी विद्वानों के अनुभवों को बताकर पुनः पुनः उसी बात को बताया करते हैं। 'भूयोऽपि पथ्यं वक्तव्यम्' यह नियम है ॥ ८१ ॥

बन्धं मोक्षं च सर्वं यत इदमुभयं हेयमेकं द्वयं च *ज्ञेयाज्ञेयाभ्यतीतं परममधिगतं तत्त्वमेकं विशुद्धम् । विज्ञायतैद्यथावच्छ्रुतिमुनिगदितं शोकमोहावतीतः सर्वज्ञः सर्वकृत्स्याद्भवभयरहितो ब्राह्मणोऽवाप्तकृत्यः ॥८२॥

बन्धमिति—बन्ध-मोक्ष और ये दोनों जिन कारणों (अज्ञान-ज्ञान) से उपलब्ध होते हैं, उनको भी तथा एक (कारण) और अनेक (कार्य) रूप विषयों को भी त्याज्य समझकर, तथा श्रुति और मुनियों के द्वारा प्रतिपादित जो समस्त ज्ञेय हैं, उससे भी अतीत (परे) एक विशुद्ध आत्मतत्त्व है, उसका सम्यक् अनुभव करके ब्रह्मज्ञानी पुरुष शोक-मोह से अतीत (वह सर्वज्ञ, सर्वकृत्, संसारभय से रहित) और कृत-कृत्य हो जाता है ॥ ८२ ॥


१. "पौनरुक्त्यं न दोषोऽत्र शब्देनार्थेन वा भवेत् । अभ्यासेन गरीयस्त्वमर्थस्य प्रतिपाद्यते ॥" [ मानसोल्लास-८।४—इससे तुलना करिये ।] * ज्ञेयं

१८० उपदेशसाहस्री उक्त प्राकरणिक अर्थ का अनायास ज्ञान कराने के निमित्त संक्षेप में बता रहे हैं—बन्ध और मोक्ष कायथा- वत् ज्ञान प्राप्त करके भव-भय से रहित होना चाहिए। प्रमातृत्व (ज्ञातृत्व), कर्तृत्ववादि का प्रतिभास होते रहना ही 'बन्ध' है और ब्रह्मस्वरूप में अवस्थित रहना ही 'मोक्ष' है। ये दोनों (बन्ध और मोक्ष) जिन हेतुओं (अज्ञान और ज्ञान) से होते हैं, उन्हें भी जानना चाहिए। अर्थात् बन्ध-मोक्ष और उनके कारणों को, उसी तरह एक अर्थात् कारण और द्वय यानी अनेक (कार्य) अर्थात् कार्य-कारणात्मक विषय को हेय (बाध्य) जानकर तथा श्रुति-मुनिगदित अर्थात् श्रुति- वाक्य के द्वारा गुरु (मुनि) ने जिसका उपदेश किया है और वेदान्तवाक्यों में उपलब्ध होनेवाले तथा समस्त ज्ञेय वर्ग से परे एक विशुद्ध परतत्त्व है, उसे यथार्थरूप से अनुभव कर अर्थात् अनात्म पदार्थों से उसे पृथक् समझकर आत्मतत्त्व- निष्ठ होनेवाला मुमुक्षु शोक, मोह से अतीत, सर्वज्ञ, सर्वकर्मा, संसारभय से रहित और कृत-कृत्य हो जाता है। इसी अभिप्राय को ईशावास्योपनिषद् ने भी बताया है१। सर्वात्मकता तो एकमात्र ब्रह्म में है, उसे जानकर कौन सर्वज्ञ नहीं होगा। उसी तरह अपनी आत्मा में समस्त को एक करनेवाला ही सर्वकृत् समझने योग्य होता है। श्रुति भी ऐसे मुक्त के विषय में बता रही है—'अहं विश्वं भुवनमभ्यभवा३म्'२। इस श्रुति में दीर्घता का प्रयोग गाने के लिये किया गया है। (अभ्यभवम् का अर्थ मैंने 'अपने स्वाधीन' कर लिया है।) भवभयरहित होने में 'न बिभेति कुतश्चन'३ श्रुति प्रमाण है। उक्त पद्य में 'ब्राह्मण' शब्द का अर्थ मुख्य वृत्ति से ब्राह्मण ही समझना चाहिए। क्योंकि बृहदारण्यक श्रुति कह रही है—'अमौनं च मौनं च निर्विद्याथ ब्राह्मणः४ और 'अथ य एतदक्षरं गार्गि विदित्वास्माल्लोकात्प्रैति स ब्राह्मणः'५। उक्त दो श्रुतियों का अर्थ क्रमशः इस प्रकार है—अमौन और मौन का पूर्णतया संपादन करके ब्राह्मण कृतकृत्य हो जाता है। तथा हे गार्गी ! जो इस अक्षर को जानकर इस लोक से मरकर जाता है, वह ब्राह्मण है। मुमुक्षु की अवाप्तकृत्यता में यह श्रुति है—'सोऽश्नुते सर्वान् कामान् सह । ब्रह्मणा विपश्चिता'६। इसी अभिप्राय को स्मृति भी कह रही है—'एतद्बुध्वा बुद्धिमान् स्यात् कृतकृत्यश्च भारत'७—ब्रह्मभूत विद्वान् ब्रह्मस्वरूप से ही एक साथ सम्पूर्ण भोगों को प्राप्त करता है। अन्य लोगों के समान क्रम से नहीं। समस्त कर्मफल उसे प्राप्त हुए रहते हैं ॥ ८२ ॥ न स्वयं स्वस्य *नान्यश्च नान्यस्यात्मा च हेयगः । उपादेयो न चाप्येवमिति सम्यङ्मतिः स्मृता ॥८३॥ न स्वयमिति—स्वयं आत्मा न अपना हेय है और न उपादेय है, उसी तरह परमात्मा (अन्य) भी न अपना हेय है और न उपादेय है, इस प्रकार की निष्ठा को ही सम्यक् ज्ञान कहा गया है ॥ ८३ ॥ हृदयस्पर्शिनो पूर्वोक्त आत्मज्ञानी की कृतकृत्यता को ही स्पष्ट कर रहे हैं—आत्मा (स्वयं) अपना हेय या उपादेय नहीं है, क्योंकि एक ही में कर्म-कर्तृत्व का होना संभव नहीं। और स्वरूप की स्थिति या नाश होने पर स्वविषय का हान (त्याग)-उपादान नहीं हो सकता। और उसी प्रकार अन्य (परमात्मा) भी अपना हेय या उपादेय नहीं है। क्योंकि अद्वैत रहने पर अन्य का अभाव ही है। उसी कारण वह उपादेय भी नहीं। उसी तरह अन्य के द्वारा भी यह उपादेय अथवा हेय नहीं हो सकता, क्योंकि आत्मान्तर है ही नहीं। और अनात्मा तो बाधित ही है, और वह अचेतन्य भी है। इस प्रकार की निष्ठा को ही सम्यग् ज्ञान कहा गया है। तस्मात् इस प्रकार जाननेवाला कृत-कृत्य हो जाता है ॥ ८३ ॥

  • नान्यस्य नान्यश्चात्मा — पाठान्तरम्। १. (ई. उ. ७) २. (तै. उ. ३।१०) ३. (तै. उ. २।९) ४. (बृ. उ. ३।५।१) ५. (बृ. उ. ३।८।१०) ६. (तै. उ. २।१) ७. (भ. गी. १५।२०)

सम्यङ्मतिप्रकरणम् १८१ आत्मप्रत्यायिका ह्येषा सर्ववेदान्तगोचरा । ज्ञात्वैतां हि विमुच्यन्ते सर्वसंसारबन्धनैः ॥८४॥ आत्मेति—समस्त वेदान्तशास्त्र के द्वारा निरूपित (प्रतिपादित) इस सम्यक् ज्ञान से आत्मा का अनुभव होता है। अतः इसे जानकर पुरुष सर्वविध भवबन्धनों से मुक्त होते हैं ॥८४ ॥ हृदयस्पर्शिनी कूटस्थ चैतन्यैकरस पूर्ण वस्तु का हान आदि संभव न रहने से अनायास ही ‘परं ब्रह्मैवास्मि’ मैं परब्रह्म ही हूँ यह ज्ञान ही सम्यग्ज्ञान है, क्योंकि समस्त वेदान्तवाक्यों से प्रतिपादित यह सम्यग्ज्ञान आत्मा का अनुभव कराने वाला है। यह स्वानुभवसिद्ध है। सर्व वेदान्तगोचर (विषय) होने से यह ज्ञान प्रामाणिक है—इस प्रकार का ज्ञान होनेपर पुरुष संसार के सम्पूर्ण बन्धनों से मुक्त अर्थात् कृत-कृत्य हो जाता है। भगवान् स्वयं कह रहे हैं— “इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयाऽनघ । एतद् बुद्ध्वा बुद्धिमान् स्यात् कृतकृत्यश्च भारत”१ ॥ हे निष्पाप अर्जुन ! इस तरह मेरे द्वारा कहा गया यह शास्त्र अत्यन्त गोपनीय है। इसे सद्गुरु की कृपा से भली-भाँति जानकर मनुष्य बुद्धिमान् और कृतकृत्य हो जाता है ॥८४॥ *रहस्यं सर्ववेदानां देवानां चापि †यत्परम् । पवित्रं परमं ह्येतत्तदेतत्संप्रकाशितम् ॥८५॥ रहस्यमिति—यह सम्यग्ज्ञान, सम्पूर्ण वेदों का गूढ़ रहस्य है, देवताओं को भी अतिप्रिय है, तथा यह सम्यक्- ज्ञानरूप तत्त्वज्ञान परम पवित्र है, इसीलिये उसे अच्छी तरह प्रकाशित किया है ॥८५॥ हृदयस्पर्शिनी अब प्रकरणोक्त ज्ञान की प्रशंसा करते हुए उसकी उपादेयता को सुदृढ़ कर रहे हैं—वह समस्त श्रुतियों (वेदों) का गूढ़ रहस्य है अर्थात् उपदेश के बिना वह अविज्ञेय रहता है अर्थात् अवगत नहीं किया जा सकता, क्योंकि ‘आचार्यवान् पुरुषो वेद२’, ‘सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति३’—यह श्रुति बता रही है। आचार्यवान् पुरुष ही ‘सत्’ को जानता है। सभी वेद उस पद का वर्णन करता है। ‘देवैरत्रापि विचिकित्सितं पुरा न हि सुविज्ञेयमणुरेष धर्मः४। पूर्वकाल में इस विषय में देवताओं को भी सन्देह हुआ था। क्योंकि यह सूक्ष्मधर्म, सुगमता से जानने योग्य नहीं है। यह विषय देवताओं के लिए भी रहस्यमय ही रहा है, यह ज्ञान परम पवित्र है। इसके सम्बन्ध में श्रुति कहती है—‘क्षीयन्ते चास्य कर्माणि’५, ‘एवंविदि पापं कर्म न श्लिष्यते’६। उस परावर (कारण-कार्यरूप) ब्रह्म का साक्षात्कार कर लेनेपर इसके कर्म क्षीण हो जाते हैं। जैसे कमलपत्र से जल का संबंध नहीं रहता तद्वत् ब्रह्मवित् के साथ पापकर्म का सम्बन्ध नहीं रहता। क्योंकि वह सम्यक् ज्ञान परमपुरुषार्थरूप है अर्थात् निरतिशयानन्द प्रकाशमय है। ऐसे उस परमपवित्र ज्ञान को इस प्रकरण में बताया गया है ॥८५ ॥ नैतद्देयमशान्ताय रहस्यं ज्ञानमुत्तमम् । विरक्ताय प्रदातव्यं शिष्यायानुगताय च ॥८६॥ नैतदिति—वेद का रहस्यभूत यह पवित्र उत्तम ज्ञान अशान्त चित्तवाले पुरुष को नहीं देना चाहिये। यह सम्यक्ज्ञान उसी शिष्य को देना चाहिये, जो विरक्त हो और अपना आज्ञापालक अनुगत हो ॥८६ ॥

  • इदं रहस्यंवेदानां०—पाठान्तरम् । † दुर्लभं०—पाठान्तरम् । १. ( भ. गी. १५।२० ) २. ( छां. उ. ६।१४।२ ) ३. ( कठ उ. १।२।१५ ) ४. ( कठ उ. १।१।२१ ) ५. ( मुं. उ. २।२।८ ) ६. ( छां. उ. ४।१४।३ )

१८२ उपदेशसाहस्री हृदयस्पर्शिनी यह ज्ञान अत्यन्त गोपनीय है, यह दुर्विज्ञेय होने से सभी कोई इसे पचा नहीं सकते अर्थात् यह दुर्धर है। अतः इस ज्ञान को धारण करने में समर्थ, विरक्त तथा अपने अनुगत शिष्य को ही देना चाहिए। अशान्त (चञ्चल) चित्त वाले व्यक्ति को नहीं देना चाहिए ॥ ८६ ॥ ददतश्चात्मनो ज्ञानं निष्क्रयोऽन्यो न विद्यते । *ज्ञानमिच्छंस्तरेत्तस्माद्युक्तः शिष्यगुणैः सदा ॥८७॥ ददतश्चेति—आत्मज्ञान का उपदेश करनेवाले श्री सद्गुरु का ऋण चुकाने का अन्य कोई उपाय नहीं है। अतः जिज्ञासु पुरुष के लिये यह आवश्यक है कि शिष्य होने के लिये जो अपेक्षित गुण हैं, उन गुणों को वह अपनावे, और उपदेश पाकर इस भवसागर से पार हो जाय ॥ ८७ ॥ हृदयस्पर्शिनी पूर्वोक्त प्रकार का परमपवित्र गोपनीय ज्ञान सुयोग्य शिष्य को देकर आचार्य स्वयं को उसी से कृतकृत्य समझ लेता है। अतः वह प्रलोभनादि से मोहित होकर जिस किसी को उस ज्ञान को देने के लिए प्रवृत्त नहीं होता है। उस कारण मुमुक्षु शिष्य को चाहिए कि वह अपने को अमानित्वादि१—शिष्यगुणों से युक्त बना ले, जिससे आचार्य उस शिष्य पर अनुग्रह कर कृपापूर्वक उसे विद्या प्रदान करे। आत्मज्ञान प्रदान करनेवाले गुरु का ऋणापाकरण करने का अन्य कोई उपाय नहीं है। इसलिए ज्ञान की इच्छा करनेवाला व्यक्ति सर्वदा शिष्य के गुणों से युक्त होकर इस संसारसागर से उत्तीर्ण हो जाय ॥ ८७ ॥ ज्ञानं ज्ञेयं तथा ज्ञाता यस्मादन्यन्न विद्यते । सर्वज्ञः सर्वशक्तिर्यस्तस्मै ज्ञानात्मने नमः ॥८८॥ ज्ञानमिति—ज्ञान, ज्ञेय, ज्ञाता सब कुछ वही (आत्मा) है, ये तीनों उससे भिन्न नहीं। तथा जो सर्वज्ञ और सर्वशक्तिमान् है, उस परब्रह्म को मेरा नमस्कार है ॥ ८८ ॥ हृदयस्पर्शिनी गुरुभक्ति विद्याप्राप्ति में अन्तरङ्ग साधन है, यह सूचित करने के लिये प्रारंभ के समान उपसंहार में भी देवता तथा आचार्य को प्रणाम करना चाहिये, यह बता रहे हैं। ज्ञान, ज्ञेय और ज्ञाता ये तीनों जिससे पृथक् (भिन्न) नहीं हैं, तथा जो सर्वज्ञ और सर्वशक्तिसम्पन्न है, उस ज्ञानरूप परब्रह्म को मेरा प्रमाण है ॥ ८८ ॥ विद्यया तारिताः स्मो यैर्जन्ममृत्युमहोदधिम् । सर्वज्ञेभ्यो नमस्तेभ्यो गुरुभ्योऽज्ञानसंकुलम् ॥८९॥ विद्ययेति—जिन सद्गुरुचरणों ने ज्ञानोपदेश के द्वारा इस अविद्यापूर्ण जन्म-मृत्युरूप महान् भवसागर से हमें तार दिया है, अर्थात् हमें उसके पार पहुँचा दिया है, उन सर्वज्ञ गुरुचरणों में हमारा प्रणाम है ॥ ८९ ॥ हृदयस्पर्शिनी अब आत्मविद्याप्रदायक गुरु को प्रणाम कर रहे हैं। जिसने ज्ञान के द्वारा हमें (हमारा) मिथ्याज्ञान- बहुल (अज्ञान पूर्ण) इस जन्म-मृत्युरूप संसार समुद्र से समुत्तीर्ण (उद्धार) करा दिया है, उस सर्वज्ञ गुरुदेव को सर्वदा हमारा प्रणाम है ॥ ८९ ॥ ॥ इति सप्तदशं सम्यङ्मतिप्रकरणं समाप्तम् ॥

  • ज्ञानमिच्छन् भवेत्तस्मा०—पाठान्तरम् । १. "अमानित्वमदम्भित्वमहिंसाक्षान्तिरार्जवम् । आचार्योपासनं शौचं स्थैर्यमात्मविनिग्रहः ॥"—( भ. गी. १३।७ ) ।

पद्यभाग १८: तत्त्वमसिप्रकरणम्

तत्त्वमसिप्रकरणम्* येनात्मना विलीयन्ते उद्भवन्ति च वृत्तयः। नित्यावगतये तस्मै नमो †धीप्रत्ययात्मने ॥१॥ येनेति—अन्तःकरण की वृत्तियाँ जिस आत्मचैतन्य से उत्पन्न होती हैं और उसी में लीन हो जाती हैं, उस आत्मचैतन्य के लिए मेरा प्रणाम है। वह आत्मचैतन्य, बुद्धिवृत्तियों का अधिष्ठान और नित्यज्ञानस्वरूप है ॥१॥ हृदयस्पर्शिनी आक्षेप—ब्रह्मात्मविषयक अपरोक्ष (प्रत्यक्ष) ज्ञान, मोक्ष का साधन है, और वह वेदान्तवाक्यों से होता है, यह पूर्व- प्रकरण में कहा गया है। किन्तु वह ठीक नहीं है, क्योंकि वेदान्तवाक्य भी स्वर्गकामादि वाक्यों के तुल्य ही परोक्षज्ञान ही कराते हैं, अपरोक्षज्ञान तो प्रसंख्यान से ही होता है। अतः प्रसंख्यान के लिये ही प्रयत्न करना चाहिये, ऐसा कुछ लोग कहते हैं। समाधान—उनके कथन का निराकरण करने के लिये पूर्वकथित अपने सम्पूर्ण सिद्धान्त को वेदानुकूल एवं तर्कपूर्ण प्रतिपादन करने की इच्छा से प्रकारणान्तर का प्रारंभ करते हुए देवतानमस्कारात्मक मङ्गल करने के व्याज (बहाने) से अन्तःकरण की वृत्तियों के भाव-अभाव का साक्षी, कूटस्थ चिदेकतान (ज्ञानरुप) नित्य अपरोक्ष ब्रह्म है, ऐसा प्रतिपादन करनेवाले वेदान्तवाक्य 'ब्रह्म' का परोक्ष ज्ञान नहीं कराते हैं। वह अपरोक्ष ब्रह्म ही इस प्रकरण का प्रतिपाद्य है। जिस आत्मस्वरूप से अन्तःकरण को वृत्तियाँ उत्पन्न होती हैं, विलीन होती रहती हैं, उन बुद्धिवृत्तियों के अधिष्ठानभूत नित्यज्ञानस्वरूप आत्मा को प्रणाम है। ये वृत्तियाँ साभास बुद्धि की परिणामरूप हैं ॥ १ ॥ प्रमथ्य वज्रोपमयुक्तिसंभृतैः श्रुतेररातीञ्शतशो ‡वचोऽसिभिः। ररक्ष वेदार्थनिधिं विशालधीः नमो यतीन्द्राय गुरोर्गरीयसे ॥२॥ प्रमथ्येति—उन यतिराज परमगुरुचरणों (श्रीगौड़पादाचार्य) को मेरा प्रणाम है, जिन महान् मेधावी गुरुचरणों ने वज्रोपम अकाट्य युक्तियों से और खड्गरूप सैकड़ों वेदान्तवाक्यों से भगवती श्रुतिमाता के शत्रुओं का पराभव कर वेदार्थरूप निधि (कोष) की रक्षा की है ॥ २ ॥ हृदयस्पर्शिनी अब अपने द्वारा प्रतिपादन किये जानेवाले अर्थ में मुमुक्षुओं का विश्वास उत्पन्न कराने हेतु स्वाचार्य के गुणों का वर्णन करते हुए सम्प्रदायशुद्धि को बता रहे हैं—जिस अप्रतिहत विशाल बुद्धिवाले ने वज्रतुल्य अभेद्य (अकाट्य) तर्कों से और खड्गरूप सैकड़ों (शतशः) वेदान्तवाक्यों द्वारा श्रुति (वेद) के शत्रुओं (अरातियों) का संहार कर वेदार्थरूप कोष (जो वेदान्तमञ्जूषा में रखा हुआ है, उस अद्वय ब्रह्मात्मतत्त्व रूप कोष) की सुरक्षा की है, उस यतिशिरोमणि परमगुरुदेव श्रीगौड़पादाचार्य को मेरा प्रणाम है ॥ २ ॥ नित्यमुक्तः सदेवास्मोत्येवं चेन्न भवेन्मतिः। किमर्थं श्रावयत्येवं मातृवच्छ्रुतिरादृता§ ॥३॥ नित्यमिति—वेदान्तवाक्यों से 'मैं नित्यमुक्त सत् ही हूँ'—यह अपरोक्ष ज्ञान यदि नहीं होता, तो माँ के तुल्य हितकामना करनेवाली भगवती श्रुति, आदरपूर्वक उनको क्यों सुना रही है ? ॥ ३ ॥ हृदयस्पर्शिनी इस प्रकार प्रणाम के व्याज (मिष) से प्रकरणार्थ और स्वसम्प्रदायशुद्धि को बताकर, अब 'तत्त्वमस्यादि वाक्य' से ही आत्मा का अपरोक्षज्ञान (प्रत्यक्षज्ञान) होता है इस प्रकरणसिद्धान्त को कह रहे हैं। वेदान्तवाक्य से 'सदेवास्मि' मैं नित्यमुक्त सत् ही हूँ, यह अपरोक्ष ज्ञान यदि न होता, तो माता के समान पुत्रहितैषिणी श्रुति सिद्धवत् निर्देश के समान उसे आदर पूर्वक श्रवण ही क्यों कराती ? ॥ ३ ॥

  • तत्त्वमति.—पाठान्तरम् । † धीप्रत्यगात्मने—पाठान्तरम् । ‡ वचोबलैः—पाठान्तरम् । § रादरात्—पाठान्तरम् ।

१८४ उपदेशसाहस्री सिद्धादेवाहमित्यस्माद्युष्मद्धर्मो निषिध्यते । रज्ज्वामिवाहिर्धीर्युक्त्या तत्त्वमित्यादिशासनैः ॥४॥ सिद्धादेवेति—रज्जु में भ्रमवश होनेवाली सर्पबुद्धि जैसे दूर हो जाती है, वैसे ही युक्तिपूर्वक ‘तत् त्वम् असि’—तू वह ब्रह्म है—इत्यादि गुरुपदेश के द्वारा ‘अहम्’ पद का लक्ष्य जो आत्मा, उससे ‘अहंकारादि’ अनात्मधर्मों का निषेध किया जाता है ॥ ४ ॥ हृदयस्पशिनी नित्य अपरोक्षस्वभाव आत्मस्वरूप ब्रह्म का अपरोक्षज्ञान वेदान्तवाक्यों से ही प्राप्त करने पर आरोपित अनर्थ की निवृत्ति हो जाती है । जिस प्रकार रज्जु पर आरोपित हुई सर्पबुद्धि निवृत्त हो जाती है, उसी प्रकार तर्कपूर्वक ‘तू वह (ब्रह्म) है’ इत्यादि वेदान्तवाक्योपदेशों से ‘अहं’ पद के लक्ष्य आत्मा से अहंकारादि अनात्मधर्मों का निषेध किया जाता है । अर्थात् ‘अहम् ब्रह्मास्मि’ इस अनुभव में ‘अहं’ शब्द से लक्षित, अपरोक्षतया स्वतःसिद्ध आत्मा में तत्-त्वम् पदार्थ का शोधन कर ‘तत्त्वमसि’ के उपदेश से युष्मद्धर्म (तू का धर्म) अहंकारादि पराक् अर्थ का निषेध किया जाता है । निष्कर्ष यह है कि भ्रम से पारोक्ष्य सदृश्यता के आकार का जो ग्रहण हुआ था, उसका विलापन कर आत्मतत्त्व का प्रतिपादन किया जाता है ॥ ४ ॥ शास्त्रप्रामाण्यतो ज्ञेया धर्मादेरस्तिता यथा । विषापोहो यथा ध्यानाद् *ह्रुतिः स्यात्पाप्मनस्तथा ॥५॥ शास्त्रेति—शास्त्रप्रमाण के द्वारा ‘धर्मादि’ के अस्तित्व का जिस प्रकार ज्ञान होता है, तथा गारुडादि मन्त्र बीज के ध्यान (जप) से ‘विष’ की निवृत्ति होती है, उसी प्रकार वेदान्तवाक्यों से उत्पन्न होनेवाले तत्त्वज्ञान से ‘अज्ञान’ रूप पाप की निवृत्ति होती है ॥ ५ ॥ हृदयस्पशिनी अनर्थनिवृत्ति को दो दृष्टान्त देकर स्पष्ट करते हैं, अथवा नित्य अपरोक्ष आत्मा ही ब्रह्म है और उसका अवगम (ज्ञान) अनर्थनिवृत्ति का कारण है, इसे यथाक्रम दो दृष्टान्तों से सिद्ध करते हैं—जिस प्रकार शास्त्रप्रमाण से धर्मादि के अस्तित्व का ज्ञान होता है, अथवा गारुड़ादि मन्त्रबीज के स्मरण से सद्यः (तत्काल) विषनिवृत्ति होती है, उसी प्रकार वेदान्तवाक्य से उत्पन्न हुए तत्त्वज्ञान से अज्ञानरूप पाप का विनाश होता है। ब्रह्म ही आत्मा के रूप में विद्यमान है, उसकी अस्तिता (विद्यमानता) में ‘अनेन जीवेनात्मनानुप्रविश्य’१, ‘तत्त्वमसि’२ इत्यादि शास्त्रप्रामाण्य से समझनी चाहिये । उस ‘सत्सञ्ज्ञक’ देवता ने ईक्षण किया, मैं इस जीवात्मा के रूप से इन तीनों देवताओं में अनुप्रवेश कर नाम और रूप की अभिव्यक्ति करूँ । वह जो यह अणिमा है, तद्रूप ही यह सब है। वह सत्य है, वह आत्मा है। हे श्वेतकेतो ! ‘वही तू है’, तब आरुणि के इस प्रकार कहने पर श्वेतकेतु बोला—‘भगवन् ! मुझे पुनः समझाइये । तब आरुणि ने कहा—‘अच्छा सौम्य ! ॥ ५ ॥ सद्ब्रह्माहं करोमीति प्रत्ययावात्मसाक्षिकौ । तयोरज्ञानजस्यैव त्यागो युक्ततरो मतः ॥६॥ सदिति—‘मैं सत्स्वरूप ब्रह्म हूँ’ और ‘मैं करता हूँ’ ये दोनों ही ज्ञान ‘आत्मा’ के साक्षित्व में होते हैं । इन दोनों ज्ञानों में से ‘मैं करता हूँ’—यह जो अज्ञान से होनेवाला प्रत्यय है, उसी का त्याग अधिक उचित माना जाता है ॥ ६ ॥

  • निवृत्तिः पा. —पाठान्तरम् । १. (छां. उ. ६।३।२) ‘सेयं देवतैक्षत हन्ताहमिमास्तिस्रो देवता अनेन जीवेनात्मनानुप्रविश्य नामरूपे व्याकरवाणीति ॥ २ ॥ २. (छां. उ. ६।८।७) ‘स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिद ँ सर्वं तत्सत्य ँ स आत्मा “तत्त्वमसि” श्वेतकेतो इति भूय एव मा भगवान्विज्ञापयत्विति तथा सोम्येति होवाच ॥ ७ ॥

तत्त्वमसिप्रकरणम् १८५ हृदयस्पर्शिनी 'तत्त्वमसि' वाक्य से उत्पन्न 'अहं ब्रह्मास्मि' प्रत्यय (ज्ञान) की तरह 'अहं करोमि' यह प्रत्यय भी हुआ करता है, यह अनुभवसिद्ध है, इस प्रकार विरोध रहने से 'अहं ब्रह्मास्मि' प्रत्यय की प्रतिष्ठा कैसे हो सकेगी ? अर्थात् 'अहं ब्रह्मास्मि' प्रत्यय से 'अहं करोमि' प्रत्यय का ही बाध होता है, यह कैसे समझा जाय ? अतः नियामक हेतु देकर उत्तर दे रहे हैं—'मैं सत्स्वरूप ब्रह्म हूँ, 'मैं करता हूँ' ये दोनों ही ज्ञान आत्मा के साक्षित्व में होते हैं। उनमें से 'अहं करोमि' यह ज्ञान (प्रत्यय) 'अज्ञान' से उत्पन्न हुआ है। अतः उसी का त्याग करना अधिक सयुक्तिक कहा जाता है। 'युक्ततरो मतः' यहाँ पर 'तरप्' प्रत्यय है, उससे यह अर्थ प्रतीत हुआ कि जैसे पूर्वप्रवृत्त यागविनियोजक श्रुति से पश्चात्प्रवृत्त लिङ्गादि अप्राप्त होने पर भी बाधित हो जाते हैं। अथवा प्रकृति से विकृति में पूर्व ही अतिदिष्ट हुए अंगों का पश्चात् उपस्थित किये गये विकृतिगत विशेषोपदेश से बाध किया जाता है, इस प्रकार उचित रहने पर भी बाध्य-बाधक भाव में पूर्वापरीभाव का नियम नहीं है। किन्तु यहाँ तो नियम है। अतः 'अहं ब्रह्मास्मि' इस प्रत्यय से ही 'अहं करोमि' प्रत्यय का बाध किया जाता है ॥ ६ ॥ सदस्मीति प्रमाणोत्था धीरन्या तन्निभोद्भवा । प्रत्यक्षादिनिभा वाऽपि बाध्यते दिग्भ्रमादिवत् ॥७॥ सदस्मीति—'मैं सत्स्वरूप हूँ'—यह जो ज्ञान है, वह 'प्रमाण' से उत्पन्न हुआ है। किन्तु 'मैं करता हूँ'— यह ज्ञान, किसी प्रमाण से जनित नहीं है, अर्थात् यह ज्ञान, प्रमाणाभाव से जनित है। अतः जिस प्रकार प्रत्यक्ष से प्रतीत होनेवाला 'दिग्-विभ्रम', आप्तवाक्य से निवृत्त हो जाता है, उसी प्रकार 'मैं करता हूँ'—यह ज्ञान प्रत्यक्षवत् सत्य प्रतीत होने पर भी श्रुतिप्रमाणजनित 'आत्मज्ञान' से बाधित हो जाता है ॥ ७ ॥ हृदयस्पर्शिनी अब प्रमाण से उत्पन्न होने वाला और अज्ञान से उत्पन्न होने वाला प्रत्यय कौन-सा है ? 'तत्त्वमसि' इस निर्दुष्ट वाक्यप्रमाण से उत्पन्न हुआ 'मैं सत्स्वरूप हूँ' यह ज्ञान है और इससे भिन्न 'अहं कर्ता' यह ज्ञान, प्रमाणाभास- जनित है। क्योंकि अविवेकादि दोष से वह युक्त है। अतः प्रत्यक्षादिवत् होने पर भी वह दिग्भ्रमादि के समान बाधित हो जाता है। जैसे प्रत्यक्षवत् प्रतीत होने वाला भ्रम आप्तवाक्य से दूर हो जाता है, वैसे ही 'अहं करोमि' मैं करता हूँ, यह ज्ञान यद्यपि प्रत्यक्षवत् सत्य प्रतीत होता है, तथापि श्रुतिप्रमाण से उत्पन्न हुए आत्मज्ञान से उसका बाध हो जाता है ॥ ७ ॥ *कर्ता भोक्तेति यच्छास्त्रं लोकबुद्ध्यनुवादि तत् । सदस्मीति श्रुतेर्जाता †बाध्यतेऽन्यैतयैव धीः ॥८॥ कुर्विति—'धर्मं चर', 'सत्यं वद'—धर्म का अनुष्ठान करो, 'सत्य भाषण करो', 'स हि कर्ता भोक्तेत्याहु- र्मनोषिणः'—वह कर्ता है, भोक्ता है, ये शास्त्रवाक्य तो लोकबुद्धि के अनुवादक हैं। इसलिए 'मैं सत् हूँ' इस श्रुतिवचन से उत्पन्न होनेवाली बुद्धि के द्वारा पूर्वोक्त कर्तृत्व भोक्तृत्व बुद्धि का बाध हो जाता है ॥ ८ ॥ हृदयस्पर्शिनी 'ब्रह्मास्मि' ज्ञान की तरह कर्तृत्वादिबुद्धि भी शास्त्रसिद्ध है, क्योंकि "सत्यं वद । धर्मं चर१", "स हि कर्ता२" "भोक्तेत्याहुर्मनीषिणः३" इत्यादि वचनों से उसकी शास्त्रसिद्धता स्पष्ट है। जब कि दोनों ज्ञानों की शास्त्रसिद्धता समान है, तब कर्तृत्वादिबुद्धि का बाध कैसे होगा ? जो शास्त्रानभिज्ञ रहते हैं तथा शास्त्र के ज्ञाताओं की संगति से जो हीन रहते हैं, उनमें ही 'मैं कर्ता, भोक्ता हूँ' यह बुद्धि रहती है, अतः 'कुरु' = करो इत्यादि शास्त्र, लोकसिद्ध अर्थ का अनुवाद मात्र

  • कुरु० — पाठान्तरम् । † बाध्यतेऽन्या तथैव० — पाठान्तरम् । १. (तै. उ. १।११) २. (बृ. उ. ४।३।१०) ३. (कठ. उ. ३।४) २४

१८६ उपदेशसाहस्री करता है, वह अनधिगत अर्थ का बोधक नहीं होता। किन्तु 'सदस्मि' में सत् हूँ, यह बुद्धि अनन्यसिद्ध अर्थ की श्रुति से उत्पन्न हुई है। अतः 'सदस्मि' श्रुति से उत्पन्न 'ब्रह्मास्मि' बुद्धि निरवकाश है, और अनुवादक वाक्य से उत्पन्न 'कर्ता, भोक्ता' बुद्धि सावकाश है। इसलिये निरवकाश से सावकाश का बाध होना ही उचित है। अर्थात् 'धर्मानुष्ठान करो' 'आत्मा भोक्ता है' यह शास्त्र तो लोकबुद्धि का अनुवादक है। इस कारण 'मैं सत् हूँ' इस श्रुति से उत्पन्न होने वाली बुद्धि से लोकबुद्धि के अनुवादक शास्त्र का बाध हो जाता है ॥ ८ ॥ सदेव त्वमसीत्युक्ते नात्मनो मुक्तता स्थिरा । प्रवर्त्तते प्रसंख्यानतो युक्त्याऽनुचिन्तयेत् ॥ ९॥ सदेवेति—'त्वं सदेव असि'—तू सत् ही है—इस उपदेश के श्रवणमात्र से 'आत्मा' की मुक्ति का स्थिर निश्चय नहीं है। इस उपदेश से तो प्रसंख्यान (मनन-निदिध्यासन) में प्रवृत्ति होती है। अतः उस उपदेश का युक्तिपूर्वक सतत, मनन-निदिध्यासन करते रहना चाहिए ॥ ९ ॥ हृदयस्पर्शिनी तत्त्वमस्यादि वाक्य से ही आत्मविषयक अपरोक्ष ज्ञान उत्पन्न होता है। 'तू सत् ही है' ऐसा कहने पर तो आत्मा की मुक्ति निश्चितरूप से नहीं होती, इससे तो प्रसंख्यान अर्थात् शब्दावृत्ति (वाक्य का अनुचिन्तन) की प्रवृत्ति होती है। अतः उस अनुचिन्तन का युक्तिपूर्वक निरन्तर चिन्तन (विचार) करते रहना चाहिये। अर्थात् 'त्वं तदेव' इस वाक्य से ही निर्विचिकित्स ब्रह्मात्मप्रतिपत्ति होती है ॥ ९ ॥ सकृदुक्तं न गृह्णाति वाक्यार्थज्ञोऽपि यो भवेत् । अपेक्षतेऽत एवान्यदवोचाम द्वयं हि तत् ॥१०॥ सकृदिति—जो पुरुष वाक्य के अर्थ को नहीं जानता, वह एक बार के सुनने मात्र उसे ग्रहण नहीं कर पाता, उसे अन्य सहायक साधनों की आवश्यकता होती है। अतएव हमने पूर्व श्लोक में वाक्यानुचिन्तन और युक्तिपूर्वक विचार इन दो साधनों को बताया था ॥ १० ॥ हृदयस्पर्शिनी जो व्यक्ति 'सदस्मि' वाक्य के अर्थ को नहीं जानता, उसके न जानने में कारण वाक्य का असामर्थ्य नहीं, अपितु अवान्तरवाक्यार्थ के ज्ञान न हो पाने से वह नहीं जानता। क्योंकि पदार्थज्ञान के बिना वाक्यार्थज्ञान नहीं हो सकता, इस आशंका के उत्तर में कहा गया है कि जो व्यक्ति अवान्तर वाक्य से तदर्थभूत पदार्थ को भी जानता है, उसे भी 'तत्त्वमसि' वाक्य के एक बार कहने मात्र से वाक्यार्थज्ञान नहीं हो पाता। इसीलिये वह महावाक्य, स्वार्थबोध कराने के लिये अन्य सहकारी कारण की अपेक्षा रखता है। अतएव पूर्वश्लोक में वाक्यानुचिन्तन और युक्तिपूर्वक विचार ये दो सहकारी कारण बताये गये हैं ॥ १० ॥ नियोगोऽप्रतिपन्नतत्वात्कर्मणां स यथा भवेत् । अविरुद्धो भवेत्ताऽवद्यावत्संवेद्यता दृढा ॥११॥ नियोग इति—जब तक ज्ञान की परिपक्वता नहीं हो पाती है, तब तक निजस्वरूप की उपलब्धि नहीं होती। अतः उन व्यक्तियों के लिए कर्म करने की जो आज्ञा दी गयी है, वह भी विरुद्ध नहीं है, अर्थात् आत्मसाक्षात्कार के पूर्व उसके लिए कर्म करना अत्यन्त आवश्यक है ॥ ११ ॥ हृदयस्पर्शिनी 'तत्त्वमसि' आदि वाक्यों में विधि की उपलब्धि तो है नहीं। ब्रह्मात्मभाव की स्वतः सिद्धि हो जाने से मुमुक्षु के लिये नियोग (विधान) भी उपपन्न नहीं हो रहा है। इस आशंका पर यह समाधान दे रहे हैं कि जब तक ज्ञान दृढ़ नहीं रहता, तबतक स्वरूपसाक्षात्कार न हो सकने के कारण उस मुमुक्षु के लिये कर्मों का नियोग (विधि) भी विरुद्ध नहीं है। निष्कर्ष यह है कि आत्मसाक्षात्कार से पूर्व उसके लिये वैदिक कर्म की विधि उचित ही है ॥ ११ ॥

तत्त्वमसिप्रकरणम् १८७ चेष्टितं च *यतो मिथ्या स्वच्छन्दः प्रतिपद्यते । प्रसङ्ख्यानमतः कार्यं यावदात्मानुभूयते ॥ १२॥ चेष्टितमिति—स्वेच्छाचारी पुरुष को भी यदि ब्रह्मात्मैक्यज्ञान हो सकता है, तो यम-नियमादि साधनों का अनुष्ठान जो बताया गया है, वह व्यर्थ ही रहेगा। अतः यह समझना चाहिए कि जब तक आत्मसाक्षात्कार न हो तबतक प्रसंख्यान (वाक्यानुचिन्तन) का अभ्यास आवश्यक ही है ॥ १२ ॥ हृदयस्पर्शिनी बिना विधि (यम-नियमादि) के अर्थात् स्वेच्छा से वाक्यार्थ ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है, तो अनुष्ठान किये हुए यम-नियमादि साधन व्यर्थ कहलायेंगे। अतः जब तक आत्मसाक्षात्कार न हो, तब तक प्रसंख्यान का अभ्यास नियोगवशात् करना ही चाहिये ॥ १२ ॥ सदस्मीति च विज्ञानमक्षजो बाधते ध्रुवम् । शब्दोत्थं दृढसंस्कारो दोषैश्चाकृष्यते बहिः ॥१३॥ सदिति—प्रसंख्यानका अभ्यास इसलिए भी आवश्यक है कि 'मैं सत्स्वरूप हूँ' इस शब्दजनित ज्ञान का इन्द्रिय-जनित दृढ़ संस्कार के द्वारा अभिभूत हो जाना निश्चित है। जब वह शब्दजनित ज्ञान अभिभूत हो जाता है, तब रागादि दोष उस मुमुक्षु को बहिर्मुख कर देते हैं ॥ १३ ॥ हृदयस्पर्शिनी इसके अतिरिक्त 'मैं सत्स्वरूप हूँ' इस शब्दजनित ज्ञान को इन्द्रियजनित कर्तृत्व-भोक्तृत्वरूप दृढ़ संस्कार का निश्चय पराभूत (अभिभूत) भी कर सकता है। क्योंकि दृढ़ संस्कार के कारण वह इन्द्रियजन्य ज्ञान (अक्षज ज्ञान), शब्दजनित ज्ञान से प्रबल है। और रागादि दोष मुमुक्षु को बहिर्मुख भी कर दिया करते हैं। अतः प्रसंख्यान का अभ्यास दोषनिवृत्त्यर्थ करना उचित ही है ॥ १३ ॥ श्रुतानुमानजन्मानौ सामान्यविषयौ यतः । प्रत्ययावक्षजोऽवश्यं विशेषार्थो निवारयेत् ॥१४॥ श्रुतेति—शब्द और अनुमान प्रमाण से होनेवाला ज्ञान, सामान्य विषय को अपना विषय बनाता है। अतः विशेषविषयक प्रत्यक्ष, पूर्वोक्त ज्ञानों का बाध अवश्य कर सकता है ॥ १४ ॥ हृदयस्पर्शिनी अक्षज ज्ञान (प्रत्यक्ष ज्ञान) चिरनिरूढ़वासनाघटित (दृढ़संस्कारनिश्चय) होने मात्र से ही प्रबल नहीं है, अपितु विशेषविषयक होने से भी उसकी प्रबलता है। शब्दजनित ज्ञान और अनुमानजनित ज्ञान, सामान्यविषयविषयक होते हैं। अतः विशेषविषयक प्रत्यक्ष, उनको अवश्य बाधित कर देगा। श्रुत (शब्द) से तथा अनुमान (लिङ्गज्ञान) से होनेवाले ज्ञानों में विप्रलिप्सा (वंचना, प्रतारणा) एवं भ्रान्ति की भी संभावना हो सकती है, तथा वह ज्ञान उपायान्तर से भी हो सकता है। किन्तु प्रत्यक्ष में यह सब कुछ न हो सकने से वह, उनसे प्रबल समझा जाता है। किंच- 'अग्नि' शब्द को श्रवण कर अथवा धूम को देखकर होने वाला अग्निज्ञान, सामान्य ज्ञान (अग्निसामान्य का ज्ञान) होता है; किन्तु अग्नि के साथ इन्द्रियसन्निकर्ष होने पर होने वाला अग्निज्ञान, विशेष-ज्ञान (अग्निविशेष का ज्ञान) कहलाता है। विशेषज्ञान, सामान्यज्ञान से प्रबल कहा जाता है। अतः 'मैं देह हूँ'—यह प्रत्यक्ष ज्ञान, 'मैं सत्स्वरूप हूँ'—इस शब्दजनित ज्ञान का बाधक कहा जा सकता है ॥ १४ ॥ वाक्यार्थप्रत्ययो कश्चिन्निर्दुःखो नोपलभ्यते । यदि वा दृश्यते कश्चिद्वाक्यार्थश्रुतिमात्रतः ॥१५॥

  • तथा—पाठान्तरम् ।

१८८ उपदेशसाहस्री निर्दुःखोऽतीतदेहेषु कृतभावोऽनुमीयते । चर्या नोऽशास्त्रसंवेद्या स्यादनिष्टं तथा सति ॥१६॥ वाक्यार्थप्रत्ययोति—केवल वाक्यार्थ का ज्ञान रखने वाला कोई पुरुष, दुःख से रहित भी नहीं दीखता, और यदि कदाचित् कोई पुरुष, वाक्यार्थ श्रवण करने मात्र से ही दुःखरहित दिखाई देता भी हो ... ॥ १५ ॥ निर्दुःख इति—तो पूर्व-पूर्वतर जन्मों में उस पुरुष ने प्रसंख्यान (वाक्यार्थानुचिन्तन) का अभ्यास अवश्य किया होगा, यह अनुमान किया जाता है। अन्यथा संन्यास धर्म का आचरण करना शास्त्र नहीं बताता, और उसके न बताने पर महान् अनिष्ट होता ॥ १६ ॥ हृदयस्पर्शनी यदि वाक्यार्थज्ञान होने मात्र से किसी को कृतकृत्य हुआ देखा जाय, तो प्रसंख्यान की कल्पना करना ही व्यर्थ होगा, किन्तु वैसा कृतकृत्य हुआ कोई दिखाई नहीं देता। अतः प्रसंख्यान आवश्यक है। वाक्यार्थश्रवणमात्र से ही यदि कोई दुःखहीन दिखाई देता है तो उसने पूर्वजन्म में प्रसंख्यान का अभ्यास किया होगा, ऐसा अनुमान होता है। वामदेवादि महात्मा वाक्यार्थज्ञानमात्र से ही कृतकृत्य हो चुके हैं। अतः कार्य से कारण का अनुमान कर लेना चाहिये। यदि ऐसा न माना जाय तो हमारा संन्यासधर्माचरण (परमहंसआश्रमआचार) अशास्त्रसंवेद्य (शास्त्रविहित नहीं) होगा। और वैसा होने पर महान् अनिष्ट होगा अर्थात् संन्यास (यति) आश्रमचर्या का परित्याग करने पर भी आरूढ-पतितता नहीं हो सकेगी, यह अनिष्ट प्रसंग होगा। क्योंकि संन्यासी यदि संन्यासचर्या का परित्याग करता है तो वह ‘आरूढपतित’ कहा जाता है। “तद्धैतत्पश्यन् ऋषिर्वामदेवः प्रतिपेदे”१, “तद्धास्य विजज्ञौ”२ ॥ १५-१६ ॥ सदसीति फलं चोक्त्वा विधेयं साधनं यतः । न तदन्यत्प्रसङ्ख्यानात्प्रसिद्धार्थमिहेष्यते ॥१७॥ सदिति—क्योंकि 'तू सत् स्वरूप है' यह फल निर्देश करके उसके साधन का विधान कर्तव्य है। अतः प्रथमतः वेदान्तवाक्य का उपदेश किया जाता है। वेदान्तप्रसिद्ध अर्थ को अभिव्यक्त करने के 'लिए 'प्रसंख्यान' से पृथक् कोई अन्य साधन नहीं है ॥ १७ ॥ हृदयस्पर्शनी प्रसंख्यानविधिपक्ष में सिद्धब्रह्म के उपदेश करने का फल क्या होगा ? इस प्रश्न के उत्तर में कह रहे हैं कि ‘त्वं सद्ब्रह्मासि’ ‘तू सत्स्वरूप ब्रह्म है’। यह फल बताकर उसके साधन का विधान करना है—यही कारण है कि सर्वत्र फल बताकर पश्चात् उसका साधन बताया जाता है। अतः ब्रह्मात्मैक्य की इच्छा रखने वाला प्रसंख्यान करे— इस प्रकार से यह विधि सार्थक होती है। इसीलिये प्रथमतः वेदान्तवाक्य का उपदेश किया जाता है। तथा वेदान्त- प्रसिद्ध अर्थ की अभिव्यक्ति के लिये प्रसंख्यान से भिन्न और कोई साधन उपयुक्त नहीं है। उपदेश का यह क्रम होता है कि प्रथमतः फल बताकर पश्चात् साधन बताना। अतः वेदान्तसम्प्रदाय में जो महावाक्योपदेश का क्रम है, वह फल निर्देश के लिये है। उसके पश्चात् प्रसंख्यानरूप साधन अवश्य कर्तव्य है। प्रसंख्यान से भिन्न अग्निहोत्रादि कर्म इसके उपयुक्त नहीं हैं, वे तो केवल चित्तशुद्धि के साधन हैं। यही कारण है कि अग्निहोत्रादि, ज्योतिष्टोमादि कर्मों का ब्रह्मभाव के लिये विधान नहीं किया गया है। अर्थात् ज्योतिष्टोमादि कर्मों में सिद्धब्रह्म का अभिव्यञ्जन करने की सामर्थ्य नहीं है ॥ १७ ॥ तस्मादनुभवायैव प्रसंचक्षीत यत्नतः । त्यजत्साधनतत्साध्यविरुद्धं शमनादिमान् ॥१८॥ १. (बृ. उ. १।४।१०) २. (छां. उ. ६।७।६, ६।१६।३)

तत्त्वमसिप्रकरणम् १८९ तस्मादिति-इसलिए शमादिषट्सम्पत्तिमान् पुरुष को 'प्रसंख्यान' से निष्पन्न होनेवाले ब्रह्मात्मैक्य के विरुद्ध जो कर्मनिष्ठता है, उसका त्याग करके आत्मस्वरूप के अनुभवार्थ प्रयत्नपूर्वक प्रसंख्यान का ही अभ्यास करना चाहिए ॥ १८॥ हृदयस्पर्शिनी अतः शम-दमादि से सम्पन्न व्यक्ति को, प्रसंख्यानरूप साधन और उससे होने वाले ब्रह्मात्मैक्यरूप साध्य के विरोधी कर्मनिष्ठत्व का त्याग कर आत्मसाक्षात्कार के लिये प्रयत्नपूर्वक प्रसंख्यान का ही अभ्यास करना चाहिये । अर्थात् प्रसंख्यानरूप साधन और तत्साध्य (फल) आत्मैक्यसाक्षात्कार इन दोनों का विरोधी जो कर्मनिष्ठत्व है, उसका त्याग करे । यह सब वही कर सकता है, जो शम-दम-उपरति आदि षड्गुणों से युक्त होता है ॥ १८ ॥ नैतदेवं रहस्यानां नेति नेत्यवसानतः । क्रियासाध्यं पुरा श्राव्यं न मोक्षो नित्यसिद्धतः ॥१९॥ नैतदिति—उपर्युक्त पूर्व पक्ष के उपस्थित होने पर सिद्धान्ती का कहना है कि तुम जैसा समझ रहे हो, वैसी बात नहीं है, क्योंकि उपनिषद् वाक्यों का तात्पर्य, दृश्य पदार्थों के निषेध को अवधि जहाँ समाप्त हो जाता है, उस 'परब्रह्म' में है। अतः प्रसंख्यान-विधि में उनका तात्पर्य नहीं है। क्रिया (कर्म) से साध्य होनेवाले फल को वेद के पूर्वकाण्ड ने बता दिया है। 'मोक्ष' तो नित्य सिद्ध फल है। अतः उसे क्रियासाध्य नहीं कह सकते ॥ १९ ॥ हृदयस्पर्शिनी इस प्रकार पूर्वपक्ष करने पर सिद्धान्ती उत्तर देता है-आप जैसा कह रहे हैं वैसी बात नहीं है, क्योंकि उपनिषद्ववाक्यों के तात्पर्य का पर्यवसान दृश्य का निषेध करते हुए उसके अवधिभूत परब्रह्म में होता है, प्रसंख्यान विधि में नहीं। जो फल, क्रिया (कर्म) से प्राप्य होने वाला है, उसका उल्लेख वेद के पूर्वकाण्ड में किया गया है, वहीं वह सुनाई देता है। उपनिषदों में उसका उल्लेख नहीं है। मोक्ष तो नित्यसिद्ध है, उसकी प्राप्ति कर्मानुष्ठान से नहीं हो सकती। पूर्वपक्षी बताये कि वेदान्तवाक्यों में प्रसंख्यान का साक्षात् विधान है या वर्तमानोपदेश होने से फलवचना- नुपत्या विधान की कल्पना की जाती है? प्रथम पक्ष का स्वीकार करना उचित न होगा क्योंकि रहस्यभूत उपनिषद्ववाक्यों की विध्यर्थता तो हो नहीं सकती, उन वेदान्तवाक्यों के द्वारा दृश्य का निषेध करते-करते निषेधावधिभूत ब्रह्मात्मस्वरूप में उन वाक्यों का पर्यवसान होता है। द्वितीय पक्ष इसलिये उचित न होगा, जो क्रियासाध्य फल है, वह पुरा (पूर्वं) काण्ड में श्राव्य है, उपनिषदों में नहीं। उपनिषदों में श्रूयमाण मोक्ष, क्रियासाध्य नहीं है, क्योंकि वह तो नित्यसिद्ध है, नित्यसिद्ध होने से वह साध्य नहीं है ॥ १९ ॥ पुत्रदुःखं यथाऽध्यस्तं पित्राऽदुःखे स्व आत्मनि । *अहंकर्त्रा तथाऽध्यस्तो नित्यादुःखे स्व आत्मनि ॥२०॥ पुत्रेति-जिस प्रकार पिता के द्वारा अपने दुःखरहित आत्मा में पुत्र के दुःख का आरोप कर लिया जाता है, उसी प्रकार प्रत्येक मनुष्य अपने दुःखरहित आत्मा में 'मैं कर्ता हूँ' यह आरोप (अध्यास) कर लेता है ॥ २० ॥ हृदयस्पर्शिनी तत्त्वमस्यादि वाक्य, अपरोक्ष, अद्वितीय ब्रह्मात्मज्ञान द्वारा उस अज्ञान की और उसके द्वारा अध्यस्त हुए दुःखित्वादि संसार की निवृत्ति कराता है, यह बताने के लिये अज्ञान से अध्यस्त दुःखादि के विषय में दृष्टान्त बता रहे हैं-जिस प्रकार पिता अपने ज्वरादिदुःखरहित आत्मा में पुत्र के दुःख का आरोप कर लेता है, उसी प्रकार यह मानव प्राणी अपने नित्य दुःखरहित अर्थात् सर्वदा दुःखादिसंसाररहित अपने स्वरूपभूत निरुपाधिक आत्मा में 'मैं कर्ता हूँ'-ऐसा अध्यास करता रहता है। क्योंकि इसने अपने स्वरूपभूत आत्मा को साभास अन्तःकरण से अविविक्त समझ लिया है। अर्थात् अविवेकलक्षण अविद्या से उसे दुःखादिधर्मवाला मान लिया है। इस पद्य में आनन्दगिरि ने 'अहं कर्ता' पाठ लिया है, अतः 'स्वे आत्मनि' दुःखादिः, जोड़ लेना चाहिये । रामतीर्थ ने 'अहं कर्ता' पाठ रखा है।

  • अहं कर्ता० - पाठान्तरम् ।

१९० उपदेशसाहस्री आत्मा तो सदा ही दुःखशून्य है, वह दुःखादि का साक्षी है, परिशुद्ध है, ऐसा रहने पर भी अविवेक (अज्ञान) के कारण दुःखादि उसमें कल्पित किये जाते हैं ॥ २० ॥ सोऽध्यासो नेति नेतीति प्राप्तवत्प्रतिषिध्यते । भूयोऽध्यासविधिः कश्चित्कुतश्चिन्नोपपद्यते ॥२१॥ स इति—प्राप्त हुई वस्तु के समान उस अध्यास का 'यह स्थूल देह आत्मा नहीं है, यह सूक्ष्म देह भी आत्मा नहीं है'—इस प्रकार 'नेति-नेति' श्रुति से निषेध किया जाता है। इस परिस्थिति में किसी प्रकार के अध्यास के लिए पुनः विधि करना किसी तरह भी उपपन्न नहीं हो सकता ॥ २१ ॥ हृदयस्पर्शिनी अपरोक्ष ब्रह्मात्मा में अज्ञान से प्राप्त हुए अध्यास की ब्रह्मात्मविषयक विज्ञान से अज्ञाननिवृत्तिपूर्वक निवृत्ति की जाती है। तात्पर्य यह है कि आत्मा ब्रह्मस्वरूप है, यह ज्ञान न रहने से अध्यस्त हुआ संसार, उसके स्वरूप का ज्ञान होते ही, जो ज्ञान 'नेति नेति' और 'तत्त्वमसि' शास्त्र से उत्पन्न हुआ है, उससे निवृत्त होता है। तब आत्मा की समस्त क्रियाओं के अधिकार की निवृत्ति हो जाने से सुषुप्ति के समान पुनः अध्यासबीज के न होने से कृतकृत्य होने वाले उसे प्रसंख्यान विधि का अवसर ही नहीं है। 'प्राप्तवत्' यहाँ पर 'वति' प्रयोग करने से वस्तुवृत्त्या प्राप्ति का अभाव रहने से आरोपितत्व दृढ़ किया गया है। उस अध्यास को प्राप्त हुई वस्तु के समान यह स्थूल देह आत्मा नहीं है, यह सूक्ष्म देह आत्मा नहीं है, इस क्रम से निषेध किया जाता है—ऐसी अवस्था में पुनः किसी प्रकार के अध्यास के लिये विधि करना तो किसी तरह भी युक्तियुक्त नहीं है ॥ २१ ॥ आत्मनीह यथाऽध्यासः प्रतिषेधस्तथैव च। मलाध्यासनिषेधौ खे क्रियेते च यथाऽबुधैः ॥२२॥ आत्मनीति—जिस प्रकार आत्मा में देह और उसके जरामरणादि धर्म का अध्यास और प्रतिषेध होता है तथा जिस प्रकार प्राकृत अज्ञानी लोग इन्द्रियों के अविषयभूत आकाश में मलिनता का आरोप और निषेध करते हैं, उसी प्रकार अविषयभूत प्रत्यगात्मा ब्रह्म में भी संसार का अध्यास और निषेध किया जा सकता है ॥ २२ ॥ हृदयस्पर्शिनी किन्तु यह शंका हो सकती है कि सामने उपस्थित विषयभूत शुक्तिका आदि में रजतादि का अध्यास होता देखा जाता है, किन्तु अविषयभूत प्रत्यगात्मा ब्रह्म में विषय के दुःखित्वादि धर्म का अध्यास कैसे हो सकता है ? यह शंका करना उचित नहीं है, क्योंकि जिस प्रकार देहातिरिक्त आत्मवादी नैयायिकों के मतानुसार आत्मा में देह और उसके जरा- मरणादि धर्मों का अध्यास और प्रतिषेध होता है, अथवा जिस प्रकार अज्ञानी लोग इन्द्रियों के अविषयभूत आकाश में मलिनता का आरोप एवं निषेध करते हैं, उसी प्रकार अविषयभूत प्रत्यगात्मा ब्रह्म में भी संसार का अध्यास और निषेध हो सकता है। मूल पद्य में 'यथाऽध्यासः' के स्थान पर यदि 'तथाऽध्यासः' पाठ उपलब्ध हो तो वहाँ पूर्वार्द्ध का दार्ष्टान्त और उत्तरार्ध का दृष्टान्तपरक अर्थ करना चाहिये । अध्यास में अधिष्ठानस्वरूप का स्फुरणमात्र अपेक्षित रहता है। उसका विषयत्वेन स्फुरण अपेक्षित नहीं होता। स्वप्रकाश आत्मा में वह स्वतः सिद्ध है। अतः कोई अनुपपत्ति नहीं है ॥ २२ ॥ प्राप्तश्चेत्प्रतिषिध्येत मोक्षोऽनित्यो भवेद्ध्रुवम् । अतोऽप्राप्तनिषेधोऽयं दिव्यग्निचयनादिवत् ॥२३॥ प्राप्तेति—आत्मा में प्राप्त हुए बन्ध का प्रतिषेध यदि माना जाय तो उसका मोक्ष अवश्य ही अनित्य सिद्ध होगा। इसलिए आकाश में अग्निचयनादि के प्रतिषेध के समान इसे अप्राप्त बन्ध का प्रतिषेध कहना चाहिए ॥ २३ ॥ हृदयस्पर्शिनी यदि आत्मा में प्राप्त हुए बन्ध का प्रतिषेध माना जाय तो संसारबन्धनिवृत्तिरूप जो मोक्ष है, वह आगन्तुक हो जाने से अनित्य सिद्ध होगा, यह निश्चित है। अतः आकाश में अग्निचयनादि के प्रतिषेध के समान यह अप्राप्तबन्ध का

तत्त्वमसिप्रकरणम् १९१ प्रतिषेध है। तात्पर्य यह है कि यदि प्राप्त बन्ध का प्रतिषेध किया जायगा, तो सादि होने के कारण मोक्ष की अनित्यता का प्रसंग उपस्थित होगा। किन्तु ऐसा कोई नियम नहीं है कि प्राप्त वस्तु का ही प्रतिषेध किया जाता हो। 'नान्तरिक्षे न दिवि अग्निश्चेतव्यः' इससे अन्तरिक्ष और आकाश में अप्राप्त अग्निचयन का ही प्रतिषेध किया जाता है। उसी प्रकार आकाश में नीलिमा, रज्जु में सर्प, तथा शुक्ति में रजत भी अप्राप्त हैं। अतः आत्मा में भी अप्राप्त बन्ध की ही निवृत्ति की जाती है। उस कारण आत्मा की नित्य मुक्तरूपता सिद्ध होती है। सबका निष्कर्ष यह है कि संसार यदि प्रमाणसिद्ध हो तो प्राप्तवत् प्रतिषेध हो सकता है, उससे मोक्ष को अनित्य कहना होगा। परमार्थवृत्ति से (वस्तुतः) आत्मगत बन्ध की परमार्थतः (वास्तविक) ही निवृत्ति कहने पर उस आत्मा में अवस्थान्तर की आपत्ति होगी, जिससे उसे विकारी कहना होगा और विकारी होने से उसे अनित्य भी अवश्य मानना होगा। तथा अनादि भावरूप बन्ध को पारमार्थिक कहने पर उसकी निवृत्ति असंभव ही रहेगी। यदि बन्ध को सादि कहें तो वह आत्मा के द्वारा अपने आप ही कृत होने से पुनः उसमें निवृत्तसजातीय (निवृत्त हुए के तुल्य) दूसरे बन्ध की उत्पत्ति होगी, जिससे मोक्ष की अनित्यता अवश्य ही प्रसक्त होगी। अतः बन्ध को आविद्यक ही अवश्य मानना चाहिये। और उस आविद्यक बन्ध की निवृत्ति तो ज्ञान से ही हो जायगी, इसलिये प्रसंख्यान निरर्थक है—इस अभिप्राय से उपसंहार कर रहे हैं कि यह अप्राप्तनिषेध है। जैसे—"नान्तरिक्षे न दिव्यानिश्चेतव्यः"¹—कहकर पृथिवी के तुल्य अन्तरिक्षादि में अग्निचयन का आरोप करने से अप्राप्त का ही प्रतिषेध किया जा रहा है। उसी तरह संसारबन्ध से रहित आत्मा में उसका आरोप और निषेध किये जा रहे हैं ॥ २३ ॥ संभाव्यो गोचरे शब्दः प्रत्ययो वा न चान्यथा । न संभाव्यौ तदात्मत्वादहंकर्तुस्तथैव च ॥२४॥ संभाव्य इति—शब्द से तथा प्रत्यक्षादि प्रमाण से होनेवाला ज्ञान, किसी विषय का ही हो सकता है। वह अन्यथा अर्थात् निर्विषयक नहीं होगा। इसलिए ब्रह्मस्वरूप होने के कारण अहंकर्ता (प्रमाता) को ब्रह्मविषयक ज्ञान, शब्द से अथवा प्रत्यक्षादि किसी प्रमाण से होना असम्भव है। क्योंकि 'ब्रह्म' तो किसी का विषय नहीं है ॥ २४ ॥ हृदयस्पर्शिनी आत्मा में बन्ध के सम्बन्ध का बोधक प्रमाण न होने से भी उस आत्मा का बन्ध वास्तविक नहीं है। क्योंकि आत्मा के बन्ध के सम्बन्ध का बोधक प्रमाण 'शब्द' होगा या कोई 'अन्य प्रमाण' होगा ? अर्थात् शब्दजन्य ज्ञान अथवा प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, अर्थापत्ति और अनुपलब्धिजनित ज्ञान, किसी न किसी विषय के ही आश्रय से हो सकते हैं, विषयरहित नहीं हो सकते। किन्तु 'ब्रह्म' किसी का विषय नहीं है। शब्द की प्रवृत्ति के हेतु (निमित्त) भूत जाति, गुण, क्रिया आदि का अभाव होने के कारण उसमें शब्द की प्रवृत्ति नहीं हो सकती, जिससे 'यह आत्मा संसारी है'—ऐसा बोध शब्द से हो पायेगा। रूपादि से रहित (हीन) होने के कारण उसे बाह्य इन्द्रियों का भी विषय नहीं कहा जा सकता। किसी अनुमापक लिङ्गविशेष के न होने के कारण उसका अनुमान भी नहीं किया जा सकता। अवयवरहित (निरवयव) होने के कारण वह उपमानप्रमाण का भी विषय नहीं हो सकता। अविकारी (विकारशून्य) होने से उसे अर्थापत्तिप्रमाणगम्य भी नहीं कह सकते। और भावरूप होने से उसे अनुपलब्धिप्रमाण का भी विषय नहीं कहा जायगा। अतः परिशेषात् प्रतीतिमात्र वह रहता है, इसलिये उसमें बन्धसंबंध प्रमाणसिद्ध नहीं है। इसके अतिरिक्त 'प्रमाता' जो अहंकर्ता है, वह भी 'ब्रह्म' में ही अध्यस्त है। अतः अपने अधिष्ठानरूप 'ब्रह्म' को वह विषयरूप से नहीं जान सकता। तात्पर्य यह है कि शब्दज्ञान तथा प्रत्यक्षादि प्रमाणजन्य ज्ञान, विषय में ही हो सकते हैं, अन्यथा अर्थात् अविषय में नहीं हो सकते। अतः ब्रह्मस्वरूप होने के कारण अहंकर्ता (प्रमाता) को ब्रह्मविषयक शब्द या प्रत्यक्षादि अन्य ज्ञान का होना संभव ही नहीं है। क्योंकि ब्रह्म तो विषय होने योग्य ही नहीं है। आत्मा का ज्ञान, शब्द से या अन्य किसी भी प्रमाण से नहीं हो सकता। क्योंकि वे सभी आत्मरूप ही हैं। चिदात्मा का स्वरूप उनसे पृथक् नहीं है ॥ २४ ॥ १. (तै० सं० ५।२।७) अयमभिप्रायः—प्रसक्तमेव सर्वत्र निषेध्यं भवति, नाऽप्रसक्तम् । यत्तु क्वचिदप्रसक्तस्यापि निषेधो दृश्यते, यथा—"नान्तरिक्षे न दिवि" इत्यत्र, तत्र गत्यन्तराभावः । वस्तुतः तत्रापि निषेधपरत्वं नास्ति, अर्थवादोऽयं रुक्मोपधानस्य,—"रुक्ममुपदधाति" इत्यनेन एकवाक्यत्वात् । तस्माद्यथा कथंचन तत्स्तुतावेव तात्पर्यम् । अत्र तु द्वैतनिषेधपरत्वमिति वैषम्यम् । तदिहापि प्रसक्तद्वैतप्रपंचनिषेधपरत्वं युक्तं, नाऽप्रसक्तेश्वरनानात्वनिषेधपरत्वमिति ॥