उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)
Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary
आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा
स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१८२ उपदेशसाहस्री हृदयस्पर्शिनी यह ज्ञान अत्यन्त गोपनीय है, यह दुर्विज्ञेय होने से सभी कोई इसे पचा नहीं सकते अर्थात् यह दुर्धर है। अतः इस ज्ञान को धारण करने में समर्थ, विरक्त तथा अपने अनुगत शिष्य को ही देना चाहिए। अशान्त (चञ्चल) चित्त वाले व्यक्ति को नहीं देना चाहिए ॥ ८६ ॥ ददतश्चात्मनो ज्ञानं निष्क्रयोऽन्यो न विद्यते । *ज्ञानमिच्छंस्तरेत्तस्माद्युक्तः शिष्यगुणैः सदा ॥८७॥ ददतश्चेति—आत्मज्ञान का उपदेश करनेवाले श्री सद्गुरु का ऋण चुकाने का अन्य कोई उपाय नहीं है। अतः जिज्ञासु पुरुष के लिये यह आवश्यक है कि शिष्य होने के लिये जो अपेक्षित गुण हैं, उन गुणों को वह अपनावे, और उपदेश पाकर इस भवसागर से पार हो जाय ॥ ८७ ॥ हृदयस्पर्शिनी पूर्वोक्त प्रकार का परमपवित्र गोपनीय ज्ञान सुयोग्य शिष्य को देकर आचार्य स्वयं को उसी से कृतकृत्य समझ लेता है। अतः वह प्रलोभनादि से मोहित होकर जिस किसी को उस ज्ञान को देने के लिए प्रवृत्त नहीं होता है। उस कारण मुमुक्षु शिष्य को चाहिए कि वह अपने को अमानित्वादि१—शिष्यगुणों से युक्त बना ले, जिससे आचार्य उस शिष्य पर अनुग्रह कर कृपापूर्वक उसे विद्या प्रदान करे। आत्मज्ञान प्रदान करनेवाले गुरु का ऋणापाकरण करने का अन्य कोई उपाय नहीं है। इसलिए ज्ञान की इच्छा करनेवाला व्यक्ति सर्वदा शिष्य के गुणों से युक्त होकर इस संसारसागर से उत्तीर्ण हो जाय ॥ ८७ ॥ ज्ञानं ज्ञेयं तथा ज्ञाता यस्मादन्यन्न विद्यते । सर्वज्ञः सर्वशक्तिर्यस्तस्मै ज्ञानात्मने नमः ॥८८॥ ज्ञानमिति—ज्ञान, ज्ञेय, ज्ञाता सब कुछ वही (आत्मा) है, ये तीनों उससे भिन्न नहीं। तथा जो सर्वज्ञ और सर्वशक्तिमान् है, उस परब्रह्म को मेरा नमस्कार है ॥ ८८ ॥ हृदयस्पर्शिनी गुरुभक्ति विद्याप्राप्ति में अन्तरङ्ग साधन है, यह सूचित करने के लिये प्रारंभ के समान उपसंहार में भी देवता तथा आचार्य को प्रणाम करना चाहिये, यह बता रहे हैं। ज्ञान, ज्ञेय और ज्ञाता ये तीनों जिससे पृथक् (भिन्न) नहीं हैं, तथा जो सर्वज्ञ और सर्वशक्तिसम्पन्न है, उस ज्ञानरूप परब्रह्म को मेरा प्रमाण है ॥ ८८ ॥ विद्यया तारिताः स्मो यैर्जन्ममृत्युमहोदधिम् । सर्वज्ञेभ्यो नमस्तेभ्यो गुरुभ्योऽज्ञानसंकुलम् ॥८९॥ विद्ययेति—जिन सद्गुरुचरणों ने ज्ञानोपदेश के द्वारा इस अविद्यापूर्ण जन्म-मृत्युरूप महान् भवसागर से हमें तार दिया है, अर्थात् हमें उसके पार पहुँचा दिया है, उन सर्वज्ञ गुरुचरणों में हमारा प्रणाम है ॥ ८९ ॥ हृदयस्पर्शिनी अब आत्मविद्याप्रदायक गुरु को प्रणाम कर रहे हैं। जिसने ज्ञान के द्वारा हमें (हमारा) मिथ्याज्ञान- बहुल (अज्ञान पूर्ण) इस जन्म-मृत्युरूप संसार समुद्र से समुत्तीर्ण (उद्धार) करा दिया है, उस सर्वज्ञ गुरुदेव को सर्वदा हमारा प्रणाम है ॥ ८९ ॥ ॥ इति सप्तदशं सम्यङ्मतिप्रकरणं समाप्तम् ॥
- ज्ञानमिच्छन् भवेत्तस्मा०—पाठान्तरम् । १. "अमानित्वमदम्भित्वमहिंसाक्षान्तिरार्जवम् । आचार्योपासनं शौचं स्थैर्यमात्मविनिग्रहः ॥"—( भ. गी. १३।७ ) ।