उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)
Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary
आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा
स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसम्यङ्मतिप्रकरणम् १८१ आत्मप्रत्यायिका ह्येषा सर्ववेदान्तगोचरा । ज्ञात्वैतां हि विमुच्यन्ते सर्वसंसारबन्धनैः ॥८४॥ आत्मेति—समस्त वेदान्तशास्त्र के द्वारा निरूपित (प्रतिपादित) इस सम्यक् ज्ञान से आत्मा का अनुभव होता है। अतः इसे जानकर पुरुष सर्वविध भवबन्धनों से मुक्त होते हैं ॥८४ ॥ हृदयस्पर्शिनी कूटस्थ चैतन्यैकरस पूर्ण वस्तु का हान आदि संभव न रहने से अनायास ही ‘परं ब्रह्मैवास्मि’ मैं परब्रह्म ही हूँ यह ज्ञान ही सम्यग्ज्ञान है, क्योंकि समस्त वेदान्तवाक्यों से प्रतिपादित यह सम्यग्ज्ञान आत्मा का अनुभव कराने वाला है। यह स्वानुभवसिद्ध है। सर्व वेदान्तगोचर (विषय) होने से यह ज्ञान प्रामाणिक है—इस प्रकार का ज्ञान होनेपर पुरुष संसार के सम्पूर्ण बन्धनों से मुक्त अर्थात् कृत-कृत्य हो जाता है। भगवान् स्वयं कह रहे हैं— “इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयाऽनघ । एतद् बुद्ध्वा बुद्धिमान् स्यात् कृतकृत्यश्च भारत”१ ॥ हे निष्पाप अर्जुन ! इस तरह मेरे द्वारा कहा गया यह शास्त्र अत्यन्त गोपनीय है। इसे सद्गुरु की कृपा से भली-भाँति जानकर मनुष्य बुद्धिमान् और कृतकृत्य हो जाता है ॥८४॥ *रहस्यं सर्ववेदानां देवानां चापि †यत्परम् । पवित्रं परमं ह्येतत्तदेतत्संप्रकाशितम् ॥८५॥ रहस्यमिति—यह सम्यग्ज्ञान, सम्पूर्ण वेदों का गूढ़ रहस्य है, देवताओं को भी अतिप्रिय है, तथा यह सम्यक्- ज्ञानरूप तत्त्वज्ञान परम पवित्र है, इसीलिये उसे अच्छी तरह प्रकाशित किया है ॥८५॥ हृदयस्पर्शिनी अब प्रकरणोक्त ज्ञान की प्रशंसा करते हुए उसकी उपादेयता को सुदृढ़ कर रहे हैं—वह समस्त श्रुतियों (वेदों) का गूढ़ रहस्य है अर्थात् उपदेश के बिना वह अविज्ञेय रहता है अर्थात् अवगत नहीं किया जा सकता, क्योंकि ‘आचार्यवान् पुरुषो वेद२’, ‘सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति३’—यह श्रुति बता रही है। आचार्यवान् पुरुष ही ‘सत्’ को जानता है। सभी वेद उस पद का वर्णन करता है। ‘देवैरत्रापि विचिकित्सितं पुरा न हि सुविज्ञेयमणुरेष धर्मः४। पूर्वकाल में इस विषय में देवताओं को भी सन्देह हुआ था। क्योंकि यह सूक्ष्मधर्म, सुगमता से जानने योग्य नहीं है। यह विषय देवताओं के लिए भी रहस्यमय ही रहा है, यह ज्ञान परम पवित्र है। इसके सम्बन्ध में श्रुति कहती है—‘क्षीयन्ते चास्य कर्माणि’५, ‘एवंविदि पापं कर्म न श्लिष्यते’६। उस परावर (कारण-कार्यरूप) ब्रह्म का साक्षात्कार कर लेनेपर इसके कर्म क्षीण हो जाते हैं। जैसे कमलपत्र से जल का संबंध नहीं रहता तद्वत् ब्रह्मवित् के साथ पापकर्म का सम्बन्ध नहीं रहता। क्योंकि वह सम्यक् ज्ञान परमपुरुषार्थरूप है अर्थात् निरतिशयानन्द प्रकाशमय है। ऐसे उस परमपवित्र ज्ञान को इस प्रकरण में बताया गया है ॥८५ ॥ नैतद्देयमशान्ताय रहस्यं ज्ञानमुत्तमम् । विरक्ताय प्रदातव्यं शिष्यायानुगताय च ॥८६॥ नैतदिति—वेद का रहस्यभूत यह पवित्र उत्तम ज्ञान अशान्त चित्तवाले पुरुष को नहीं देना चाहिये। यह सम्यक्ज्ञान उसी शिष्य को देना चाहिये, जो विरक्त हो और अपना आज्ञापालक अनुगत हो ॥८६ ॥
- इदं रहस्यंवेदानां०—पाठान्तरम् । † दुर्लभं०—पाठान्तरम् । १. ( भ. गी. १५।२० ) २. ( छां. उ. ६।१४।२ ) ३. ( कठ उ. १।२।१५ ) ४. ( कठ उ. १।१।२१ ) ५. ( मुं. उ. २।२।८ ) ६. ( छां. उ. ४।१४।३ )