उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)
Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary
आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा
स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंतत्त्वमसिप्रकरणम् २११ अविविच्येति—आत्मा और अहङ्कार दोनों का विवेक न करके यदि श्रुति ऐसा कहती है तो उक्त वाक्य के अर्थ का ग्रहण हो सकता है, और यदि अहमर्थ (शुद्ध चेतन) से अहंकार का विवेक करके उसके विषय में 'तत् त्वमसि तू वह (ब्रह्म) है, इस प्रकार श्रुति, यदि ब्रह्म का अहङ्कारनिष्ठत्व बताती है तो उक्त दोष (मिथ्याभाषण का दोष) का प्रसङ्ग प्राप्त होता है ॥ ७८ ॥ हृदयस्पर्शिनी चिदाभास के अनभ्युपगमपक्ष में बन्ध-मोक्ष की अनुपपत्ति बताकर अपने पक्ष में उसकी उपपत्ति बताते हैं। यदि श्रुति, आत्मा और अहंकार दोनों का विवेक न करके ऐसा कहती है, तब तो इस वाक्य के अर्थ का ग्रहण हो सकता है। 'तत्त्वमसि' तू ब्रह्म है—इस प्रकार का श्रुति का कथन चिदाभास के द्वारा आत्मा और अहंकार का अविवेक होने पर ही सार्थक हो सकता है। क्योंकि संसारदुःख से दुःखी हुआ अहंकार ही मोक्ष की इच्छा कर सकता है और आत्मज्ञान द्वारा उसी का मोक्ष होना संभव हो सकता है। यदि अहमर्थ (शुद्ध चेतन) से अहंकार का विवेक कर उसके विषय में 'तू वह (ब्रह्म) है' इस प्रकार ब्रह्म का अहंकारनिष्ठत्व श्रुति ने बताया हो तो उपर्युक्त मिथ्या भाषण का दोष आता है। तात्पर्य यह है कि यदि 'आत्मा' शब्द से अहंकार को मानकर उसे ब्रह्मरूप कहते हैं तो श्रुति को मिथ्या कहना पड़ेगा। अतः श्रुति का यह 'तत्त्वमसि' उपदेश उसी के लिये है, जिसने अध्यास के द्वारा अविवेकवशात् अहंकार के दुःखित्वादि का आत्मा में आरोप किया है। अर्थात् सांख्य का कहना है कि अहंकार को ही श्रोता मान लिया जाय तो आत्माभास के स्वीकार करने की क्या आवश्यकता है ? उसपर कहते हैं कि यदि श्रुतिवाक्य प्रत्यक्चैतन्य से अहंकार को, पाते से गन्ने के समान पृथक् करके केवल अहंकार को 'तू ही ब्रह्म है' इस प्रकार श्रुतिद्वारा आचार्य यदि कहें, तब तो 'तत्त्वमसि' श्रुति के अहंकारनिष्ठ होने से मिथ्यावादित्व का दोष प्रसक्त हो सकेगा, अन्यथा नहीं ॥ ७८ ॥ त्वमित्यध्यक्षनिष्ठश्चेदहमध्यक्षयोः कथम्। सम्बन्धो वाच्य एवात्र येन त्वमिति लक्ष्येत् ॥७९॥ त्वमिति—'त्वम्' पद अहङ्कार का वाचक होने पर भी उसे साक्षोपरक भी यदि स्वीकार कर लिया जाय तो यह बताना होगा कि साक्षी और अहङ्कार का सम्बन्ध किस प्रकार का है, जिससे कि 'त्वम्' पद 'साक्षी' को लक्षित कर सकेगा ॥ ७९ ॥ हृदयस्पर्शिनी अहङ्कर्तृविषयक 'त्वं' शब्द से अध्यक्ष (साक्षी) लक्ष्यमाण होने से यह अहङ्कर्तृविषयक उपदेश तो अध्यक्ष (साक्षी) में ही पर्यवसित होगा, आभास को मानने की क्या आवश्यकता है ? इस शंका का समाधान कर रहे हैं—यदि यह कहें कि 'त्वं' यह पद अहंकारवाचक होकर अध्यक्ष को बोधित करता है, तथापि अहंकार और अध्यक्ष दोनों के सम्बन्धग्रह के बिना वाक्यार्थबोध का होना संभव नहीं। अहं और अध्यक्ष का सम्बन्ध तो बताना ही होगा। जिस संबंध से त्वं-पद अध्यक्ष को लक्षित कर सके, वह सम्बन्ध कैसे उपपन्न होगा ? अतः सम्बन्ध बताना आवश्यक है ॥ ७९ ॥ द्रष्टृदृश्यत्वसम्बन्धो यद्यध्यक्षेऽक्रिये कथम् ॥८०॥ द्रष्ट्रीति—यदि दोनों का 'द्रष्टृ-दृश्यत्व' सम्बन्ध कहा जाय तो साक्षी में उस सम्बन्ध का ग्रहण कैसे होगा ? क्योंकि वह अक्रिय है ॥ ८० ॥ हृदयस्पर्शिनी इस पर यदि पूर्वपक्षी कहे कि 'हाँ, सम्बन्ध है', तो उसकी शंका को दूर करते हैं। यदि अहंकार और अध्यक्ष (साक्षी) का द्रष्टृ-दृश्यत्वरूप सम्बन्ध कहें तो वह भी संभव नहीं है। क्योंकि साक्षी (अध्यक्ष) तो विकाररहित (निर्विकार) है, उस कारण उसमें सम्बन्धग्रहणकर्तृत्वरूप धर्म (विकार) नहीं रह सकता। तथा अहंकार जड़ हैं, उस कारण वह भी उस सम्बन्ध का ग्रहण नहीं कर सकता। अतः उक्त सम्बन्ध अनुपपन्न है ॥ ८० ॥