उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)
Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary
आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा
स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 238, कुल 364 में से
संदर्भ में पढ़ें२१२ उपदेशसाहस्री *अविक्रियत्वेऽपि तादात्म्यमध्यक्षस्य भवेद्यदि । आत्माध्यक्षो ममास्तीति सम्बन्धाग्रहणे न धीः ॥८१॥ अक्रियत्वे इति—यदि यह कहें कि साक्षी चेतन (अध्यक्ष) के अक्रिय होने पर भी उसका अहङ्कार के साथ तादात्म्य का उपदेश श्रुति करती है, तो सम्बन्ध का ग्रहण न होने पर ‘मेरा आत्मा साक्षी है’—यह बुद्धि भी नहीं होगी ॥ ८१ ॥ हृदयस्पर्शिनी पूर्वोक्त रीति के अनुसार सम्बन्धग्रहण भले ही न हो, अर्थात् सम्बन्धग्रहण का कर्तृत्वरूप विकार साक्षी में न रहने पर भी अहंकार के साथ साक्षी के तादात्म्यसम्बन्ध का उपदेश तो श्रुति ने किया ही है। अतः सम्बन्ध का ग्रहण यदि नहीं मानेंगे तो 'मेरा आत्मा साक्षी है, यह बुद्धि कैसे उत्पन्न हो सकेगी ? जैसे लोकव्यवहार में ‘घटस्य शौक्ल्यम्’- घट की शुक्लता कहने पर घट और शुक्लता का सम्बन्ध यदि न जाना जाय तो दोनों के तादात्म्य का ज्ञान होना संभव नहीं, वैसे ही 'ममात्मा अध्यक्षः अस्ति'—मेरा आत्मा साक्षी है, यहाँ पर भी अपना और आत्मा दोनों के सम्बन्ध का ज्ञान हुए बिना दोनों में तादात्म्य बुद्धि कैसे हो पायेगी ॥ ८१ ॥ सम्बन्धग्रहणं शास्त्रादिति चेन्मन्यसे न हि । पूर्वोक्ताः †स्युस्त्रिधा दोषा ग्रहो वा स्यान्ममेति च ॥८२॥ सम्बन्धेति—यदि यह कहें कि उनके सम्बन्ध का ज्ञान तो शास्त्र से ही हो जायगा, तो पूर्वोक्त तीन दोष ( १-अहंकार जड़ है, २-साक्षी निर्विकार है, ३-जड़ के प्रति श्रुति का बोधकत्व सिद्ध नहीं होना ) प्राप्त होंगे। तथा उसका ग्रहण भी 'मेरा आत्मा साक्षी है' इस प्रकार से ही हो सकेगा, यानी 'मैं साक्षी हूँ' ऐसा नहीं हो सकता ॥ ८२ ॥ हृदयस्पर्शिनी यदि कहें कि दोनों के (अहंकार और साक्षी) के सम्बन्ध का ज्ञान “एष म आत्मान्तर्हृदये अणीयान्”१, “एष म आत्मान्तर्हृदये एतद्ब्रह्म”२ इस शास्त्र से ही हो जायगा, तो पूर्वोक्त तीन दोष उपस्थित होंगे। (१) अहंकार तो जड़ है, अतः उससे सम्बन्ध का ग्रहण नहीं किया जा सकता। (२) आत्मा (साक्षी) निर्विकार है, इस कारण वह भी सम्बन्ध का ग्रहण नहीं कर सकता। (३) जड़ (अहंकार) के प्रति श्रुति का बोधन करना (बोधक होना) संभव नहीं। यदि कथंचित् सम्बन्धग्रहण की कल्पना कर भी लें तो भी तादात्म्याध्यास को न मानने के कारण ‘एष म आत्मान्तर्हृदये अणीयान्.........एतद् ब्रह्म”—यह मेरा सूक्ष्म आत्मा हृदय के अन्तर्गत है, यह ब्रह्म है, —इस श्रुति वाक्य में ‘मेरा आत्मा' ऐसा पद होने के कारण 'मैं साक्षी हूँ' यह ग्रहण नहीं हो सकता, किन्तु 'मेरा आत्मा साक्षी है' इस प्रकार ही हो सकता है। श्लोक गत 'च' से प्रतीत होता है कि ‘ममाध्यक्षः अस्ति’ यह ग्रहण भी नहीं हो सकता है, क्योंकि अहंकार तो जड़ है ॥ ८२ ॥ अदृशिर्दृशिरूपेण भाति बुद्धैर्यदा तदा । प्रत्यया अपि तस्याः स्युस्तप्तायोविस्फुलिङ्गवत् ॥८३॥ अदृशिरिति—चेतन का प्रतिबिम्ब पड़ने से जब अचेतन बुद्धि भी चेतन के समान प्रकाशयुक्त होती है, तो तप्त हुए लोहे के विस्फुलिङ्गों के समान उसकी वृत्तियाँ भी चेतनरूप हो जाती हैं ॥ ८३ ॥ हृदयस्पर्शिनी इस प्रकार आत्मा और अनात्मा का परपक्ष में सम्बन्ध ही नहीं बन सकता, यह बताकर अब अपने पक्ष में मिथ्या तादात्म्यसम्बन्ध की उपपत्ति को बनाते हैं, क्योंकि जड़ (अचेतन) बुद्धि, चेतन का प्रतिबिम्ब पड़ने से उसके १. ( छा. उ. ३।१४।३ ) २. ( छा. उ. ३।१४।४ ) * अक्रियस्वेऽपि०—पाठान्तरम् । † स्युस्त्रयो ०—पाठान्तरम् ।