भारतकोश
उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा

स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished364 पृष्ठ

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तत्त्वमसिप्रकरणम् २१३ (चेतन के) समान दृशिरूप से (प्रकाशयुक्त) भासित होती है। अतः अति सन्तप्त हुए लोहे के स्फुलिंगों के (चिनगारियों के) समान उसकी (बुद्धि की) वृत्तियाँ भी चेतनरूप हो जाती हैं। तात्पर्य यह है कि दाह करना अग्नि का कार्य है, किन्तु जिस समय अयःपिण्ड में अग्नि का तादात्म्य हो जाता है, तब 'अयो दहति'—लोहा जलाता है, ऐसा कहते हैं। उसी प्रकार चिदाभास से व्याप्त हुई बुद्धि की जो वृत्तियाँ हैं, उनमें जो ज्ञानकर्तृत्व है, वह चिदाभास का ही धर्म है, बुद्धि में तो अविवेक के कारण उसका आरोप मात्र किया जाता है ॥ ८३ ॥ आभासस्तदभावश्च दृशेः सीम्नो न चान्यथा । लोकस्य युक्तितः स्यातां तद्ग्रहश्च तथा सति ॥८४॥ आभास इति—समस्त वस्तुओं की अवधि 'आत्मा' ही है। उस अवधिभूत आत्मा के प्रति लोक का आभास तथा अभाव का होना युक्ति से सिद्ध हो सकता है, उसकी सिद्धि अन्य किसी प्रकार से नहीं हो सकती। ऐसी स्थिति में ही 'मैं हूँ' इस प्रकार 'आत्मा' का ग्रहण हो सकता है ॥ ८४ ॥ हृदयस्पर्शिनी इस पक्ष में लौकिक-वैदिक व्यवहार की सिद्धि भी सहज उपपन्न हो पाती है। सबके अवधिभूत चिदात्मा (दृशि) से ही लोक का आभास तथा उसका अभाव (प्रत्यय और उसका अभाव) युक्ति से सिद्ध हो सकता है, उसे सिद्ध करने का अन्य कोई प्रकार नहीं है। तथा इस अवस्था में ही 'मैं हूँ' इस प्रकार आत्मा का ग्रहण हो सकता है। निष्कर्ष यह है कि 'आत्मा' समस्त वस्तुओं की परमावधि है, क्योंकि समस्त वस्तुओं का निषेध कर देने पर एकमात्र आत्मा ही शेष रह जाता है। और उसका निषेध भी नहीं किया जा सकता। लोक का आभास तथा उसका अभाव बुद्धिवृत्तिरूप है, किन्तु वे बुद्धिवृत्तियाँ न तो जड़ बुद्धि की ही विषय हो सकती हैं और न निर्विकार आत्मा की ही विषय हो सकती हैं। अतः उनकी सिद्धि के लिये चिदाभास को स्वीकार करना ही होगा। उसीके द्वारा आत्मा, बुद्धि- वृत्तियों का साक्षी होता है, और उसी से 'अहमस्मि'—मैं हूँ—इस प्रकार विशेषरूप से आत्मसत्ता का ग्रहण होता है ॥ ८४ ॥ नन्वेवं दृशिसंक्रान्तिरयःपिण्डेऽग्निवद्भवेत् । मुखाभासवदित्येतदादर्शं तन्निराकृतम् ॥८५॥ नन्विति—पूर्वपक्षो का कहना है कि इस प्रकार लोहे के गोले में अग्नि के समान बुद्धि में आत्मा का प्रवेश (संक्रमण) सिद्ध होता है। उस पर सिद्धान्ती का कहना है कि ऐसी बात नहीं है। शीशे में मुख के प्रतिबिम्ब के समान अर्थात् बुद्धि में आत्मा का जो आभास पड़ता है उसके समान—यह दृष्टान्त बताया है। इस दृष्टान्त के द्वारा पूर्वपक्षी के कथन का निराकरण कर दिया गया है ॥ ८५ ॥ हृदयस्पर्शिनी 'प्रतप्त लोहपिण्ड में अग्नस्फुलिङ्ग के समान' इस दृष्टान्त के बताने से आत्मा के विकारी होने की शंका होती है कि बुद्धि (अहंकार) में आत्मा का प्रवेश (सङ्क्रमण) सिद्ध होता है। अर्थात् तप्त लोहपिण्ड में अग्नि का जैसे प्रवेश होता है, वैसे ही बुद्धि में दृशिसङ्क्रान्तिरूप विकार (आत्मा का संक्रमण = प्रवेशरूप विकार) होगा। तब सिद्धान्ती ने उत्तरार्ध के द्वारा उत्तर दिया कि आदर्श (दर्पण) में मुखाभास (मुखप्रतिबिम्ब) के समान बुद्धि में आत्मा का आभास (प्रतिबिम्ब) पड़ता है। अर्थात् आदर्श में प्रतिबिम्बित मुख, आदर्शस्थत्वेन रूपेण मिथ्या है, उसी प्रकार बुद्धि में प्रतिबिम्बित हुआ आत्मा का प्रतिबिम्ब, बुद्धिधर्मत्वेन रूपेण मिथ्या है, इस तरह शंका का निराकरण हो जाता है। अतः आत्मा के विकारी होने की शंका नहीं करनी चाहिये ॥ ८५ ॥ कृष्णायो लोहिताभासमित्येतद्दृष्टमुच्यते । दृष्टदृष्टान्ततुल्यत्वं न तु सर्वात्मना क्वचित् ॥८६॥ कृष्णेति—काले लोहे में लाल वर्ण का आभास होता है। इसलिये वह केवल दृष्टान्त मात्र है। दृष्टान्त और दाष्ट्रान्त की सर्वथा (पूर्ण रूप से) समानता नहीं हुआ करती ॥ ८६ ॥