उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)
Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary
आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा
स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२१४ उपदेशसाहस्री हृदयस्पर्शिनी यदि सिद्धान्ती के कथनानुसार आत्मा विकारी नहीं है, तो सन्तप्त लोहपिण्ड के विस्फुलिंग का दृष्टान्त क्यों बताया गया है ? वे तो विकार के रूप में प्रसिद्ध हैं, अतः यह दृष्टान्त तो दाष्ट्रान्तिक के अनुरूप नहीं हुआ । उत्तर में यह कहा जा रहा है कि कृष्णवर्ण के लोहे का लोहितवर्ण (लाल रंग) आभास मात्र है, अतः यह केवल दृष्टान्तमात्र है। जड़ बुद्धि में भी चैतन्य का आभास मात्र है। दृष्टान्त और दाष्ट्रान्त की सर्वथा (पूर्णरूप में) समानता कभी नहीं हुआ करती। अन्यथा अप्रकाशरूप मुख के लिये चन्द्र का दृष्टान्त ही नहीं दिया जायगा, किन्तु दिया जाता है, अतः आंशिक समानता ही विवक्षित होती है ॥ ८६ '। तथैव चेतनाभासं चित्तं चैतन्यवद्द्भवेत् । मुखाभासो यथाऽऽदर्शे आभासश्चोदितो मृषा ॥८७॥ तथैवेति—उसी प्रकार चिदाभासविशिष्ट चित्त चैतन्यवत् प्रतीत होता है तथा जिस प्रकार शीशे में मुख का प्रतिबिम्ब पड़ता है, उसी प्रकार उस चिदाभास को मिथ्या (असत्य) ही बताया गया है ॥ ८७ ॥ हृदयस्पर्शिनी दृष्टान्त में विवक्षित अंश बताकर दाष्ट्रान्तिक में भी उस प्रकार के अंश का प्रदर्शन करते हैं। जिसमें चेतना का आभासमात्र है, ऐसा जो चेतनाभास चित्त (बुद्धि) है, वह चैतन्य की तरह अर्थात् चेतन के तुल्य हो जाता है। निष्कर्ष यह है कि चिदाभासविशिष्ट चित्त चैतन्यवत् प्रतीत होने लगता है। जिस प्रकार दर्पण में मुखाभास विकृत है, उसी प्रकार यहाँ भी समझना चाहिये। उपाधिस्थ के रूप में आभास दिखाई देता है, अतः वह मृषा ( मिथ्या ) है। चिदाभास को मिथ्या बता ही चुके हैं ॥ ८७ ॥ चित्तं चेतनमित्येतच्छास्त्रयुक्तिविवर्जितम् । देहस्यापि प्रसङ्गः स्याच्चक्षुरादेस्तथैव च ॥८८॥ चित्तमिति—'चित्त' को चेतन बताना शास्त्र और युक्ति के विरुद्ध है। चित्त को चेतन कहने पर तो देह और चक्षुरादि इन्द्रियों को भी चेतन कहा जा सकेगा, किन्तु वह अभीष्ट नहीं है ॥ ८८ ॥ हृदयस्पर्शिनी यदि कोई कहे कि चिदाभास की व्याप्ति से चित्त को चेतन के तुल्य क्यों माना जाता है ? उसे (चित्त को) ही स्वतः चेतन मानने में क्या आपत्ति है। इसका उत्तर यह कि है उसे स्वतः (स्वयं) चेतन मानने में न कोई प्रमाण है, और न कोई न्याय ही है। अर्थात् चित्त को ही चेतन कहना शास्त्र और युक्ति के विरुद्ध है। क्योंकि चित्त तो अन्य- दृश्य होने से उत्पत्ति-विनाशशील है। चेतनता को चित्त का ही स्वभाव माना जाय तो चक्षुरादि इन्द्रियों को भी चेतन कहना पड़ेगा। इस प्रकार अतिप्रसंग होगा, जो दुष्परिहर होगा ॥ ८८ ॥ तदप्यस्त्विति चेत्तन्न लोकायतिकसङ्गतेः । न च धीर्दृशिरस्मीति यद्याभासो न चेतसि ॥८९॥ तदिति—देहेन्द्रियादि को चेतन समझना तो अनुचित होगा। अन्यथा चार्वाक मत का अंगीकार किया समझा जायगा। यदि चित्त में चिदाभास का अस्तित्व स्वीकार न किया जाय तो 'मैं चेतन हूँ'—यह बुद्धि (प्रतीति) न हो सकेगी ॥ ८९ ॥ हृदयस्पर्शिनी यदि इष्टापत्ति कहे तो वह उचित न होगी। क्योंकि जड़ चित्त को ही चेतन कहने पर चार्वाक के अवैदिक सिद्धान्त को मान लिया-सा होगा। चित्त में चिदाभास को यदि न माने तो किसी द्वार (माध्यम) के न होने से 'अहं