भारतकोश
उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा

स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished364 पृष्ठ

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पृष्ठ 247

तत्त्वमसिप्रकरणम् २२१ हृदयस्पर्शिनी इस प्रकार प्रमाणस्वरूपनिरूपण के द्वारा 'अहं ब्रह्मास्मि' इस ज्ञान का उपपादन करके अब प्रतिपत्तव्य ( ज्ञातव्य ) अर्थ के स्वरूपनिरूपण के द्वारा भी उसे बताना प्रारंभ कर रहे हैं। 'तत्त्वमसि' वाक्य के अर्थ का श्रवण करने के बाद 'अहमस्मि'-मैं सत् ही हूँ, ऐसा ज्ञान होता है, या अन्य कोई और ज्ञान होता है ? यदि 'अहम्' शब्द सत् ही है, तो सत् के साथ ही उसका मुख्य अर्थ समझना चाहिये। अर्थात् 'सत्' शब्द और 'अहम्' शब्द दोनों का एक ही अर्थ में पर्यवसान होने से 'एकात्मता' ही वाक्यार्थ है। 'संसर्ग' वाक्यार्थ नहीं है। इस प्रकार अपरोक्ष ज्ञान की सिद्धि हो जाती है ॥ १०५ ॥ अन्यच्चेत् *सदहंग्राहप्रतिपत्तिर्मृषैव सा। तस्मान्मुख्यग्रहे नास्ति वारणाऽवगतेरिह ॥१०६॥ अन्यदिति-यदि 'सत्' कोई अन्य वस्तु है, अर्थात् आत्मा से भिन्न वस्तु है, तो उसमें जो यह 'अहम्' इत्या- कारक ज्ञान होता है, उसे मिथ्या ही कहना होगा। इसलिये इस वाक्य का मुख्यर्थि ग्रहण करने में यथार्थ ज्ञान का निषेध नहीं होता है। तात्पर्य यह है कि 'मैं सत् हूँ' इस वाक्य का मुख्यार्थ ग्रहण करने पर इस वाक्य की सार्थकता हो पाती है, अन्यथा नहीं ॥ १०६ ॥ हृदयस्पर्शिनी यदि 'सत्', वस्तु, आत्मा से भिन्न कोई और है, तो उसमें यह 'अहंग्रहरूप जो प्रतिपत्ति' अर्थात् अहंग्ज्ञान है, वह संपदादि ज्ञान के समान मृषा (मिथ्या) ही होगा, तब वाक्य को अप्रमाण ही कहना पड़ेगा। प्रमाण-प्रमेय के स्वभाव की पर्यालोचना करने पर प्रतीत होता है कि अपरोक्ष फलवत् आत्मतत्त्वज्ञान वाक्य से ही उत्पन्न होता है। अतः इस वाक्य का मुख्य अर्थ ग्रहण करने में यथार्थ ज्ञान का निषेध नहीं होता। अर्थात् 'मैं सत् हूँ' इस वाक्य का मुख्यार्थ ग्रहण करने पर ही उसकी सार्थकता है, अर्थात् यथार्थ अनुभव का निवारण नहीं होता। और वही संसार- दुःख से पीड़ित हुए मुमुक्षु के लिये अभीष्ट भी है ॥ १०६ ॥ प्रत्ययी प्रत्ययश्चैव यदाभासौ तदर्थता। तयोरचितिमत्त्वाच्च चैतन्ये कल्प्यते फलम् ॥१०७॥ प्रत्ययीति- 'प्रत्ययी' (अन्तःकरण) और 'प्रत्यय' (उसकी वृत्तियाँ) जिनके आभास हैं, उसी के ये शेष- भूत भी हैं। इन दोनों के जड़ (अचेतन) होने के कारण इस वाक्य का फल (तात्पर्य) चैतन्य आत्मा में ही समझा जाता है ॥ १०७ ॥ हृदयस्पर्शिनी यदि यह कहें कि 'आत्मा' कूटस्थ होने के कारण ज्ञाता नहीं हो सकता, तब फलसम्बन्ध भी उपपन्न नहीं होगा। इस प्रकार आत्मज्ञानरूप यथार्थ ज्ञान का निवारण हो जायगा। किन्तु यह शंका उचित नहीं है, क्योंकि प्रत्ययी अर्थात् परिणामी अन्तःकरण और प्रत्यय अर्थात् उसकी वृत्तियाँ (परिणाम), जिस चिदात्मा के आभास हैं, उसी के ये शेषभूत भी हैं। इन दोनों के अचेतन (जड़) होने के कारण इस वाक्य का फल, चैतन्य आत्मा में ही माना जाता है। क्योंकि जड़ वस्तु फलस्वरूप अथवा फल का उपादान नहीं हो सकती। अतः अन्तःकरण और चिदाभास में फल संभव न होने के कारण निर्व्यापार होने पर भी उनके अधिष्ठानभूत चेतन आत्मा में ही उसका तात्पर्य प्रतीत होता है ॥ १०७ ॥ कूटस्थेऽपि फलं योग्यं राजनीव जयादिकम्। †तदन्तात्मत्वहेतुभ्यां क्रियायाः प्रत्ययस्य च ॥१०८॥

  • ग्राहि०-पाठन्तरम् । † तदनात्म०-पाठान्तरम् ।