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उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा

स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished364 पृष्ठ

तत्त्वमसिप्रकरणम् २२१ हृदयस्पर्शिनी इस प्रकार प्रमाणस्वरूपनिरूपण के द्वारा 'अहं ब्रह्मास्मि' इस ज्ञान का उपपादन करके अब प्रतिपत्तव्य ( ज्ञातव्य ) अर्थ के स्वरूपनिरूपण के द्वारा भी उसे बताना प्रारंभ कर रहे हैं। 'तत्त्वमसि' वाक्य के अर्थ का श्रवण करने के बाद 'अहमस्मि'-मैं सत् ही हूँ, ऐसा ज्ञान होता है, या अन्य कोई और ज्ञान होता है ? यदि 'अहम्' शब्द सत् ही है, तो सत् के साथ ही उसका मुख्य अर्थ समझना चाहिये। अर्थात् 'सत्' शब्द और 'अहम्' शब्द दोनों का एक ही अर्थ में पर्यवसान होने से 'एकात्मता' ही वाक्यार्थ है। 'संसर्ग' वाक्यार्थ नहीं है। इस प्रकार अपरोक्ष ज्ञान की सिद्धि हो जाती है ॥ १०५ ॥ अन्यच्चेत् *सदहंग्राहप्रतिपत्तिर्मृषैव सा। तस्मान्मुख्यग्रहे नास्ति वारणाऽवगतेरिह ॥१०६॥ अन्यदिति-यदि 'सत्' कोई अन्य वस्तु है, अर्थात् आत्मा से भिन्न वस्तु है, तो उसमें जो यह 'अहम्' इत्या- कारक ज्ञान होता है, उसे मिथ्या ही कहना होगा। इसलिये इस वाक्य का मुख्यर्थि ग्रहण करने में यथार्थ ज्ञान का निषेध नहीं होता है। तात्पर्य यह है कि 'मैं सत् हूँ' इस वाक्य का मुख्यार्थ ग्रहण करने पर इस वाक्य की सार्थकता हो पाती है, अन्यथा नहीं ॥ १०६ ॥ हृदयस्पर्शिनी यदि 'सत्', वस्तु, आत्मा से भिन्न कोई और है, तो उसमें यह 'अहंग्रहरूप जो प्रतिपत्ति' अर्थात् अहंग्ज्ञान है, वह संपदादि ज्ञान के समान मृषा (मिथ्या) ही होगा, तब वाक्य को अप्रमाण ही कहना पड़ेगा। प्रमाण-प्रमेय के स्वभाव की पर्यालोचना करने पर प्रतीत होता है कि अपरोक्ष फलवत् आत्मतत्त्वज्ञान वाक्य से ही उत्पन्न होता है। अतः इस वाक्य का मुख्य अर्थ ग्रहण करने में यथार्थ ज्ञान का निषेध नहीं होता। अर्थात् 'मैं सत् हूँ' इस वाक्य का मुख्यार्थ ग्रहण करने पर ही उसकी सार्थकता है, अर्थात् यथार्थ अनुभव का निवारण नहीं होता। और वही संसार- दुःख से पीड़ित हुए मुमुक्षु के लिये अभीष्ट भी है ॥ १०६ ॥ प्रत्ययी प्रत्ययश्चैव यदाभासौ तदर्थता। तयोरचितिमत्त्वाच्च चैतन्ये कल्प्यते फलम् ॥१०७॥ प्रत्ययीति- 'प्रत्ययी' (अन्तःकरण) और 'प्रत्यय' (उसकी वृत्तियाँ) जिनके आभास हैं, उसी के ये शेष- भूत भी हैं। इन दोनों के जड़ (अचेतन) होने के कारण इस वाक्य का फल (तात्पर्य) चैतन्य आत्मा में ही समझा जाता है ॥ १०७ ॥ हृदयस्पर्शिनी यदि यह कहें कि 'आत्मा' कूटस्थ होने के कारण ज्ञाता नहीं हो सकता, तब फलसम्बन्ध भी उपपन्न नहीं होगा। इस प्रकार आत्मज्ञानरूप यथार्थ ज्ञान का निवारण हो जायगा। किन्तु यह शंका उचित नहीं है, क्योंकि प्रत्ययी अर्थात् परिणामी अन्तःकरण और प्रत्यय अर्थात् उसकी वृत्तियाँ (परिणाम), जिस चिदात्मा के आभास हैं, उसी के ये शेषभूत भी हैं। इन दोनों के अचेतन (जड़) होने के कारण इस वाक्य का फल, चैतन्य आत्मा में ही माना जाता है। क्योंकि जड़ वस्तु फलस्वरूप अथवा फल का उपादान नहीं हो सकती। अतः अन्तःकरण और चिदाभास में फल संभव न होने के कारण निर्व्यापार होने पर भी उनके अधिष्ठानभूत चेतन आत्मा में ही उसका तात्पर्य प्रतीत होता है ॥ १०७ ॥ कूटस्थेऽपि फलं योग्यं राजनीव जयादिकम्। †तदन्तात्मत्वहेतुभ्यां क्रियायाः प्रत्ययस्य च ॥१०८॥

  • ग्राहि०-पाठन्तरम् । † तदनात्म०-पाठान्तरम् ।

२२२ उपदेशसाहस्री कूटस्थे इति—जिस प्रकार सेना के जय-पराजय का राजा पर आरोप किया जाता है, उसी प्रकार अन्तः- करण की 'अहम्' इत्याकारिका वृत्ति और चिदाभास 'अनात्मरूप' (जड़) होने से कूटस्थ आत्मा में ही फल समझना चाहिये ॥ १०८ ॥ हृदयस्पर्शिनी व्यापारशून्य का भी फल के साथ संबंध होने में दृष्टान्त बता रहे हैं। जिस प्रकार सेना के जय- पराजय का राजा पर आरोप किया जाता है, उसी प्रकार अन्तःकरण की अहमात्मिका वृत्ति और चिदाभास, ये दोनों अनात्मभूत जड़ होने के कारण कूटस्थ आत्मा में फल का संबंध समझना चाहिये। यहाँ यह शंका हो सकती है कि दृष्टान्त में तो स्व-स्वामिभावसम्बन्ध निमित्त हो सकता है, किन्तु प्रकृत में अध्यक्ष और अध्यक्ष्य में वैसा सम्बन्ध न दिखाई देने से उपर्युक्त दृष्टान्त कैसे संगत हो सकेगा ? उक्त शंका के समाधान में कहा गया है कि यहाँ भी अधिष्ठान-अधिष्ठेयभावरूप सम्बन्ध, फलसम्बन्ध होने में हेतु हो सकता है। मूल में उक्त 'हेतुभ्यां' को 'हेतुत्वाभ्यां' ऐसा भावप्रधान समझना चाहिये । उसी तरह 'क्रिया' को 'अहमात्मिका वृत्ति' समझनी चाहिये । और 'प्रत्यय' शब्द से 'प्रत्यर्थमयति' इस व्युत्पत्ति के अनुसार 'अन्तःकरणसाभास' अर्थात् वृत्ति और वृत्तिमान् का साभास समझना चाहिए । उसी तरह आत्मत्वं च हेतुत्वं च आत्महेतुत्वे, तस्य = फलस्य न आत्महेतुत्वे, तदनात्मत्वहेतुत्वे ताभ्यां तदनात्मत्वहेतुत्वाभ्याम् । तथाच जड़भूत क्रिया और प्रत्यय, दोनों फलस्वरूप न होने से और फल के उपादन भी न होने से तद्व्यापारनिबन्धन फल, उसके अधिष्ठानरूप कूटस्थ के निर्व्यापार रहने पर भी उसी में होगा। अतः दृष्टान्त यहाँ पर संगत हो जाता है ॥ १०८॥ आदर्शस्तु यदाभासो मुखाकारः स एव सः । यथैवं प्रत्ययादर्शो यदाभासस्तदा ह्यहम् ॥१०९॥ आदर्श इति—आदर्श (दर्पण) जिसके आभास से युक्त होता है, उसी का आकार भी प्रतीत होता है। जैसे जब दर्पण, मुख के आभास से युक्त होता है, तब उसमें ग्रीवास्थ मुख का आकार भी प्रतीत होता है, उसी प्रकार अहंकार जिस चेतन के प्रतिबिम्ब द्वारा प्रकाशित होता है, वह 'परमात्मा' ही है। अतः 'तत्त्वमसि' आदि महावाक्यों का फल चिदात्मा में होना योग्य ही है ॥ १०९ ॥ हृदयस्पर्शिनी शुद्ध आत्मा में प्रमातृत्व नहीं होने से ही यह कहा गया कि कूटस्थ में विशिष्ट प्रमातृकृत फल का उपचार किया जाता है। यह बात राजा के दृष्टान्त से बताई गई है। वस्तुतः स्वात्मा में अध्यस्त स्वोपाधि के व्यापार से चित्प्रतिबिम्ब में ही प्रमातृत्व रहता है। अतः प्रतिबिम्बभावनिबन्धन फलसम्बन्ध अविकृत चिदात्मा से ही होता है। इसे दृष्टान्त देकर बता रहे हैं—जैसे आदर्श (दर्पण) जिस मुख के आभास से विशिष्ट हुआ प्रतीत होता है, वही ग्रीवास्थ मुख का आकार भी होता है, उसी प्रकार अहंकार जिस चेतन के प्रतिबिम्ब द्वारा प्रकाशित है, वह परमात्मा ही है। अतः 'तत्त्वमसि' इत्यादि महावाक्यों का फल चिदात्मा में होना उचित ही है ॥ १०९ ॥ इत्येवं प्रतिपत्तिः स्यात्सदस्मीति च नान्यथा । तत्त्वमित्युपदेशोऽपि द्वाराभावादनर्थकः ॥११०॥ इतीति—चिदाभास का जब स्वीकार करते हैं, तभी 'मैं सत्स्वरूप हूँ'—यह ज्ञान होना संभव हो सकता है, अन्यथा नहीं । चिदाभास के स्वीकार न करने पर कोई रहेगा ही नहीं, तब 'तू सत्स्वरूप है'—यह उपदेश ही व्यर्थ हो जायगा ॥ ११० ॥ हृदयस्पर्शिनी इस रीति से चिदाभास का स्वीकार करने पर ही 'मैं सत्स्वरूप हूँ' यह ज्ञान हो सकता है, अन्यथा नहीं हो सकता । क्योंकि आभास को न मानने पर किसी के न रहने से 'तू सत्स्वरूप है' यह उपदेश भी व्यर्थ हो जायगा ॥ ११० ॥

तत्त्वमसिप्रकरणम् २२३ श्रोतुः स्यादुपदेशश्चेदर्थवत्त्वं *तथा भवेत् । अध्यक्षस्य न चेदिष्टं श्रोतृत्वं कस्य तद्भवेत् ॥१११॥ श्रोतुरिति—उपदेश, श्रोता को किये जाने पर ही सार्थक हो सकता है। यदि कूटस्थ साक्षी आत्मा में श्रोतृत्व न स्वीकार किया जाय तो वह और किसका हो सकता है ? ॥ १११ ॥ अध्यक्षस्य समीपे स्याद्बुद्धेरेवेति चेन्मतम् । न तत्कृतोपकारोऽस्ति काष्ठाद्यद्वन्न कल्प्यते ॥११२॥ अध्यक्षेति— यह कहें कि साक्षी के सन्निध रहने से 'बुद्धि' में ही श्रोतृत्व की कल्पना की जा सकती है किन्तु यह कथन उचित न होगा, क्योंकि जिस प्रकार काष्ठ के समीप रहने से 'बुद्धि' का कोई उपकार नहीं होता, उसी प्रकार 'साक्षी' के द्वारा भी कोई उपकार नहीं हो सकता ॥ ११२ ॥ हृदयस्पर्शिनी अध्यक्ष के लिये उपदेश को न मानने पर भी उसकी (उपदेश की) व्यर्थता कैसे हो सकती है ? हम, साक्षी का सान्निध्य होने से बुद्धि में ही श्रोतृत्व कहेंगे । इस प्रकार शंका करने पर शंका करनेवाले से यह पूछ सकते हैं कि बुद्धि का श्रोतृत्व, क्या अध्यक्ष की सन्निधि की सत्तामात्र की अपेक्षा करता है ? या उसके द्वारा किये गये उपकार की अपेक्षा करता है ? प्रथम पक्ष तो इसलिए ठीक नहीं कि सन्निहित रहनेवाले अध्यक्ष के द्वारा किया गया उपकाररूप कोई अतिशय बुद्धि में नहीं दिखाई देता । जिस प्रकार काष्ठ आदि की सन्निधि से बुद्धि का कोई उपकार नहीं होता है, उसी प्रकार साक्षी के द्वारा भी बुद्धि का कोई उपकार नहीं होता है ॥ ११२ ॥ बुद्धौ चेत्कृतः कश्चिन्नन्वेवं परिणामिता । आभासेऽपि च को दोषः सति श्रुत्याद्यनुग्रहे ॥११३॥ बुद्धाविति—यदि यह कहें कि 'साक्षी' के द्वारा 'बुद्धि' में कोई विशेषता उत्पन्न हो जाती है, तो 'साक्षी' को परिणामी कहना होगा । अतः श्रुतिप्रमाण के अनुरोध से 'चिदाभास' के स्वीकारने में क्या हानि है ? ॥ ११३ ॥ हृदयस्पर्शिनी द्वितीय पक्ष में भी दोष देते हैं। यदि यह कहें कि साक्षी के द्वारा बुद्धि में कोई विशेषता उत्पन्न होती है, अतः आभास स्वीकार करने की कोई आवश्यकता नहीं। किन्तु ऐसा कहने पर अध्यक्ष को परिणामी कहना होगा । ऐसी परिस्थिति में श्रुति प्रमाण का अवलम्ब कर 'चिदाभास' ही क्यों न माना जाय ? क्योंकि आभास पक्ष निर्दुष्ट है, अतः वही उपादेय है। अथवा अध्यक्ष की परिणामिता भी मान ली जाय तो भी श्रुतिप्रमाण से सिद्ध आभास को मान लेने में भी तुम्हारी कौन-सी हानि है ? ॥ ११३ ॥ आभासे परिणामश्चेन्न रज्ज्वादिन्निभत्ववत् । सर्पादिश्च तथाऽवोचमादर्शं च मुखत्ववत् ॥११४॥ आभासे इति—यदि यह कहें कि 'चिदाभास' को स्वीकार करने पर भी 'आत्मा' का परिणामित्व सिद्ध होता है, किन्तु यह कहना ठीक नहीं है, क्योंकि रज्जु आदि की समानता से जैसे सर्प आदि की कल्पना की जाती है, उसी तरह तथा आदर्श (शीशे) में मुख के प्रतिबिम्ब के समान उसे मिथ्या बता चुके हैं ॥ ११४ ॥ १. 'रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव' — (बृ. उ. २।५।१९ तथा कठ. उ. ५।९।१०) और 'एकधा बहुधा चैव दृश्यते जलचन्द्रवत् — (ब्रह्म बिन्दु उ. १२)

  • तदा०—पाठान्तरम् ।

२२४ .उपदेशसाहस्री हृदयस्पर्शिनी यदि यह कहें कि चिदाभास मानने पर भी आत्मा परिणामी सिद्ध होगा, तो यह कथन ठीक नहीं है । क्योंकि रज्जु के अज्ञान से कल्पित सर्प में रज्जु की समानता के तुल्य तथा अनिदंरूप रजत में इदमात्मकता के तुल्य चिदात्मा के अज्ञान से कल्पित बुद्धि आदि में चित्तुल्यता मिथ्या ही है । मूलगत 'च' से अभोक्तृस्वरूप आत्मा में भोक्तृत्व का आभास भी मृषा ही है, यह सूचित किया गया है । अर्थात् उसे दर्पण में मुख के प्रतिबिम्ब के समान मिथ्या बता चुके हैं ॥ ११४ ॥ नाऽऽत्माभासत्वसिद्धिश्छेदात्मनो ग्रहणात्पृथक् । मुखादेश्च पृथक्सिद्धिर्हृ त्वन्योन्यसंश्रयः ॥११५॥ नात्मेति—शुद्ध आत्मा के ग्रहण करने से आत्मा के आभास की पृथक् सिद्धि यदि नहीं होती हो तो अन्योन्याश्रय दोष की उपस्थिति होगी । परन्तु यहाँ दृष्टान्त में तो शीशे में पड़े हुए प्रतिबिम्ब से ग्रीवा पर स्थित मुख की स्थिति पृथक् ही है । इसलिये अन्योन्याश्रय दोष के उपस्थित होने की कोई संभावना नहीं है ॥ ११५ ॥ हृदयस्पर्शिनी अहंकार को ही आत्मा समझनेवाला उसके चिन्नभिन्नत्व पर आक्षेप कर रहा है । केवल (शुद्ध) आत्मा का अवभास होते रहने से आत्मा के आभास की पृथक् सिद्धि न होगी, अर्थात् आभास के अवभास से ही यदि आत्मा का आभास कहा जाय तो अन्योन्याश्रय दोष उपस्थित होगा, तात्पर्य यह है कि अपनी-अपनी सिद्धि में एक दूसरे की अपेक्षा होगी । किन्तु दृष्टान्त में दर्पणगत प्रतिबिम्ब से ग्रीवास्थ मुख की सिद्धि पृथक् है, अतः दृष्टान्त विषम है । दृष्टान्त में अन्योन्याश्रय दोष नहीं है ॥ ११५ ॥ अध्यक्षस्य पृथक्सिद्धावाभासस्य तदीयता । आभासस्य तदीयत्वे ह्याध्यक्षव्यतिरिक्तता ॥११६॥ अध्यक्षस्येति—पूर्वपक्षी अन्योन्याश्रय दोष को स्पष्ट करते हुए कहता है कि साक्षी जब पृथक् सिद्ध रहेगा, तभी आभास का उससे सम्बन्ध हो पायगा; एवं आभास उसी का है, इस कारण साक्षी का पृथक्त्व सिद्ध हो पायेगा । यही अन्योन्याश्रय दोष का स्वरूप है ॥ ११६ ॥ हृदयस्पर्शिनी पूर्वपक्षी अन्योन्याश्रय दोष को स्पष्ट कर रहा है । साक्षी ( अध्यक्ष ) के पृथक सिद्ध होनेपर आभास का उससे सम्बन्ध; और आभास उसका है, इस कारण साक्षी का पृथक्त्व—इस प्रकार दोनों को परस्पर अपेक्षा रहने से अन्योन्याश्रय दोष होता है । अर्थात् अध्यक्ष की भेदप्रतीति होनेपर चिदाभास की सिद्धि और चिदाभास की सिद्धि होने- पर उससे अध्यक्ष की भेदसिद्धि होगी—यही अन्योन्याश्रय दोष का स्वरूप है । तथाच—'अहम्' के आकार में प्रतीयमान अहंकार ही चेतन आत्मा है ॥ ११६ ॥ नैवं स्वप्ने पृथक्सिद्धेः प्रत्ययस्य दृशेस्तथा । रथादेस्तत्र शून्यत्वात्प्रत्ययस्याऽऽत्मना ग्रहः ॥११७॥ नैवमिति—उस पर सिद्धान्ती कहता है कि तुम्हारा कहना उचित नहीं प्रतीत हो रहा है, क्योंकि स्वप्न में आत्मा और अन्तःकरण की सिद्धि पृथक् पृथक् प्रतीत होती है । तथापि स्वप्न में रथ आदि का अभाव होने से रथादि का ज्ञान केवल चेतन आत्मा के द्वारा ग्रहण किया जाता है ॥ ११७ ॥ हृदयस्पर्शिनी पूर्वपक्षी का उपर्युक्त कथन उचित नहीं है, क्योंकि स्वप्नावस्था में अहंकारात्मक अन्तःकरण दृश्य रूप में ही व्यवस्थित हो चुका है । अतः आत्मा आभासनिरपेक्ष ही सिद्ध होता है । अतः उक्त दृष्टान्त को असंगत कहना

तत्त्वमसिप्रकरणम् २२५ ठीक नहीं है। क्योंकि स्वप्न में भी आत्मा और अन्तःकरण की मुख और उसके प्रतिबिम्ब के समान परस्परनिरपेक्षता सिद्ध है। तथापि स्वप्नावस्था में रथादि का अभाव रहने से१ उन रथादि का ज्ञान ही उस स्वप्रकाश चैतन्यस्वरूप आत्मा के द्वारा गृहीत होता है। अर्थात् आत्मा से भिन्न अन्तःकरण तथा उसके विषयादि की सत्ता तो आत्मा के आश्रय से है, किन्तु आत्मा की सिद्धि के लिए किसी अन्य वस्तु की अपेक्षा नहीं है। अतः इनमें अन्योन्याश्रय दोष नहीं है। तथाच प्रत्ययसंवलनविनिर्मुक्त स्वप्रकाशतया भासमान आत्मा ही स्वप्न में विषयाकाराकारित प्रत्यय का साक्षी सिद्ध होता है। स्वप्न में 'प्रत्यय' ही ग्राह्य रहता है। क्योंकि अन्य विषय तो स्वप्न में रहते नहीं, अतः वासनात्मक अन्तःकरण ही आत्मा के अधीन रहने से उसी का ग्रहण होता है ।। ११७ ।। अवगत्या हि संव्याप्तः प्रत्ययो विषयाकृतिः । जायते स यदाकारः स बाह्यो विषयो मतः ।।११८।। अवगत्येति—अन्तःकरण की विषयाकार वृत्ति, आत्मचैतन्य के द्वारा व्याप्त होती है। वह वृत्ति जिस आकार की होती है, उसी को बाह्य विषय कहा जाता है ।। ११८ ।। हृदयस्पर्शिनी अन्तःकरण का साक्षी आत्मा ग्राह्य से भिन्न है, यह बताने के लिए ग्राह्य के स्वरूप को बता रहे हैं। पूर्व श्लोक के द्वारा स्वप्नावस्था में चिदात्मा का प्रत्यय से विवेक (भेद) बताया गया था, और अब जागरित अवस्था में भी उस भेद को बताते हैं। अन्तःकरण की विषयाकारावृत्ति आत्मचैतन्य द्वारा व्याप्त होती है, और वह जिस आकार की रहती है, वही बाह्य विषय माना जाता है। विषय के स्फुरण में यह क्रम हुआ करता है—प्रथमतः आत्माभास से युक्त हुई बुद्धि की वृत्ति इन्द्रियप्रणाली के द्वारा विषय के स्थान पर पहुँचती है। वहाँ पहुँचकर वह विषय को व्याप्त करके विषयाकार हो जाती है। इस प्रकार वह जिस-जिस विषय का आकार ग्रहण करती है, उसी का ज्ञान आत्म- चैतन्य के द्वारा हुआ करता है ।। ११८ ।। कर्मेप्सिततमत्वात्स तद्वान् कार्ये नियुज्यते । आकारो यत्र चार्प्येत करणं तदिहोच्यते ।।११९।। कर्मेति—वह विषय, कर्ता को ईप्सिततम रहने से 'कर्म' कहलाता है। उस कर्ता को उसकी इच्छा होती है, तब वह कार्य में नियुक्त ( प्रवृत्त ) होता है। उसी प्रकार जिस बुद्धिवृत्ति में विषय का आकार अर्पित होता है, उसे करण कहा जाता है ।। ११९ ।। हृदयस्पर्शिनी सम्प्रति कर्म, करण, कर्ता ये तीनों साक्षी से पृथक् हैं, यह बता रहे हैं। विषय, कर्ता का अत्यन्त इष्ट होने से 'कर्म' कहा जाता है। उसकी इच्छा से युक्त हुआ पुरुष कार्य में नियुक्त होता है, तथा जिस बुद्धिवृत्ति में विषय का आकार अर्पित होता है, वह करण कहलाता है। अर्थात् तत्तद्बाह्येन्द्रियविशेषिता तत्तदर्थाकारा बुद्धिवृत्ति, विषयप्रमिति (ज्ञान) के प्रति 'करण' कहलाती है ।। ११९ ।। यदाभासेन संव्याप्तः *स ज्ञातेति निगद्यते । त्रयमेतद्विविच्याऽत्र यो जानाति स आत्मवित् ।।१२०।। यदेति—जब अन्तःकरण चिदाभास से व्याप्त होता है, तब उसे ज्ञाता कहते हैं। एवं च ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय इन तीनों का विवेक करके जो व्यक्ति साक्षी आत्मा को जानता है, उसी को आत्मज्ञानी कहते हैं ।। १२० ।। १. "न तत्र रथा न रथयोगा न पन्थानो भवन्ति ।” ( बृ. उ. ४।३।१० )

  • संजाता०—पाठान्तरम् । २९

२२६ उपदेशसाहस्री हृदयस्पर्शिनी विषय और करण को बताकर अब कर्ता को बता रहे हैं—जब अन्तःकरण चिदाभास से व्याप्त होता है तब वह ज्ञाता कहलाता है। अर्थात् जब चित्प्रतिबिम्ब के आभास से संव्याप्त हुआ अहंकार परिणत होता है, तब उसे चिदात्मप्रतिबिम्ब ‘ज्ञाता’ कहा जाता है। इस प्रकार ज्ञाता, ज्ञान, ज्ञेय तीनों का विवेचन करके जो साक्षी आत्मा को जानता है, वही आत्मवेत्ता है अर्थात् वह त्वंपद से लक्ष्य प्रत्यगात्मा का ज्ञानी कहलाता है। यही बात श्रीमद्भागवत में बताई गई है— “एकमेकतराभावे यदा नोपलभामहे । त्रितयं तत्र यो वेद स आत्मा स्वाश्रयाश्रयः ॥” (२।१०।९) श्रीमद्भागवत में अनेक स्थानों पर अनेक ग्रन्थियाँ हैं, जिनका भेदन करना सर्वसाधारण का कार्य नहीं है। उन ग्रन्थियों में से ही यह श्लोक भी एक ग्रन्थिरूप ही है। इस श्लोक का अर्थ, पूर्व श्लोकार्थ के ज्ञान के अधीन है। अतः उसी की व्याख्या प्रथमतः करते हैं। “योऽध्यात्मिकोऽयं पुरुषः सोऽसावेवाधिदैविकः । यस्तत्रोभयविच्छेदः स स्मृतो ह्याधिभौतिकः ॥ (श्री. भा. २।१०।८) जो यह आध्यात्मिक पुरुष, चक्षुरादि करणों (इन्द्रियों) का अभिमानी द्रष्टा जीव है, वही यह आधिदैविक पुरुष सूर्य आदि है। यहाँ पर पुरुष (जीव) की उपाधि होने से इन्द्रियादि में ‘पुरुष’ शब्द का प्रयोग किया गया है। क्योंकि “स वा पुरुषोऽन्नरसमयः”१—इत्यादि श्रुति बता रही है। जो यह अध्यात्म चक्षुरादि करण है, वही यह आधि- दैविक चक्षुरादि का अधिष्ठाता सूर्यादि पुरुष कहा गया है। क्योंकि इन्द्रिय और उनका अधिष्ठान दोनों ही सूर्यादि के अंशरूप होने से एकरूप हैं। एक ही में आध्यात्मिक और आधिदैविक दोनों का जो भेद (विच्छेद), जिससे प्रतीत हो रहा है, वह जो चक्षुर्गोलकादि से उपलक्षित दृश्य देह है, उसे ही आधिभौतिक पुरुष कहा गया है। करण और उसके अधिष्ठाता दोनों के अभिन्न रहनेपर भी उनमें भेद प्रतीति करानेवाला यह गोलक ही है। क्योंकि अन्यत्र करण की स्थिति न होने से भेद का बोधन नहीं होता है। एवंच ‘इन्द्रिय’ आध्यात्मिक है, ‘देवता’ आधिदैविक है, और ‘गोलक’ आधिभौतिक है, विषय भी आधिभौतिक है। अभिप्राय यह है—जो नेत्र आदि इन्द्रियों का अभिमानी द्रष्टा जीव है, वही इन्द्रियों के अधिष्ठातृ देवता सूर्य आदि के रूप में भी है, और जो नेत्र गोलक आदि से युक्त दृश्य देह है, वही उन दोनों को अलग-अलग करता है। अब प्रकृत श्लोक का अर्थ इस प्रकार होगा कि इन तीनों में यदि एक का भी अभाव हो जाय तो दूसरे दो की उपलब्धि नहीं हो सकती। अतः इन तीनों से अलग रहकर जो इन तीनों को जानता है, वही सबका अधिष्ठान ‘आश्रय’ तत्त्व है। उसका आश्रय वह स्वयं ही है, दूसरा कोई नहीं है ॥ १२० ॥ सम्यक्संशयमिथ्योक्ताः प्रत्यया व्यभिचारिणः । एकैवावगतिस्तेषु भेदस्तु प्रत्ययार्पितः ॥१२१॥ सम्यगिति—विवेक का प्रकार यह है—प्रत्यय को ही सम्यक् (यथार्थ), संशय और मिथ्या शब्द से कहते हैं। ये त्रिविध प्रत्यय आगमापायी होने से व्यभिचारी हैं। किन्तु उनमें ‘ज्ञान’ एकरूप ही है, केवल प्रत्ययों का भेद किया हुआ है ॥ १२१ ॥ आधिभेदाद्यथा भेदो मणेरवगतेस्तथा । अशुद्धिः परिणामश्च सर्वं प्रत्ययसंश्रयात् ॥१२२॥ आधीति—जिस प्रकार जपापुष्पादि उपाधियों के भेद से मणि में भेद प्रतीत होता है, उसी प्रकार समस्त अशुद्धि और परिणाम, प्रत्यय (अहंकार एवं चिदाभास) के सम्बन्ध से होते हैं ॥ १२२ ॥ १. (तै. उ. २।१)

तत्त्वमसिप्रकरणम् २२७ प्रथनं ग्रहणं सिद्धिः प्रत्ययानामिहाऽन्यतः । आपरोक्ष्यात्तदेवोक्तमनुमानं प्रदीपवत् ॥१२३॥ प्रथनमिति—व्यवहार दशा में प्रत्ययों की स्फूर्ति, ग्रहण और स्थिति, किसी अन्य अपरोक्ष स्वभाव वस्तु के कारण होती हैं। इस विषय में दीपक के समान कहकर अनुमान प्रमाण बताया गया है ॥ १२३ ॥ हृदयस्पर्शिनी ग्राह्य, ग्रहण और ग्राहक से अतिरिक्त आत्मा की सिद्धि में क्या प्रमाण है ? इस प्रश्न के उत्तर में कहते हैं कि जाग्रत्, स्वप्न अवस्थाओं के विषयाकार प्रत्ययों का स्फुरण (प्रथन) है। और ग्रहण का अर्थ है उपादान या स्थिति अथवा व्यवहार तथा सिद्धि का अर्थ है स्वरूपलाभ । ये तीनों तभी हो पाते हैं, जब कोई अन्य अपरोक्षस्वभाव वस्तु कारण हो । जिस प्रकार घट-पटादि पदार्थ दीपक के प्रकाश से प्रकाशित होते हैं, उसी प्रकार जड़ होने के कारण बुद्धि की वृत्तियाँ भी किसी स्वयंप्रकाश वस्तु से प्रकाशित होनी चाहिये। जिससे वे प्रकाशित होती हैं, वही स्वयंप्रकाश आत्मा है। समस्त प्रत्यय उसीमें अध्यस्त हैं और उसी के अधीन उनकी सत्ता भी है। आत्मातिरिक्त समस्त वस्तु आगमापायी होने से अचित्स्वभाव है। यह बात अनुमान-प्रमाण से सिद्ध हो रही है। अनुमान का आकार इस प्रकार होगा— “विमताः प्रत्ययाः स्वविलक्षणानाधीनप्रथनग्रहणसिद्धिकाः अचित्स्वभावत्वात् प्रदीपवत् ।” इस प्रकार तो सामान्य दृष्टांतनुमान से “अत्रायं पुरुषः स्वयं ज्योतिः१”, “आत्मैवास्य ज्योतिः२”, तस्य भासा सर्वमिदं विभाति३” इत्यादि श्रुतियों में प्रसिद्ध स्वप्रकाश आत्मा की संभावना सिद्ध होती है ॥ १२३ ॥ किमन्यद्ग्राहयेत्कश्चित् प्रमाणेन तु केनचित् । विनैव तु प्रमाणेन निवृत्त्याऽन्यस्य शेषतः ॥१२४॥ किमिति—वह वादी समस्त अनात्म (जड़) पदार्थों का प्रतिषेध करके अवशिष्ट के रूप में आत्मा का ग्रहण करता है, तो वह किसी प्रमाण के द्वारा करता है अथवा किसी प्रमाण के विना ही करता है ? ॥ १२४ ॥ हृदयस्पर्शिनी इस प्रकार अनुमान प्रमाण द्वारा विधिमुख से आत्मा की सिद्धि बतायी है। अब जो लोग निषेधमुख से ही प्रमाण के द्वारा आत्मा की सिद्धि कहते हैं, विधिमुख से नहीं, उनके मत के निराकरणार्थ विकल्प प्रस्तुत कर रहे हैं— मूल में प्रथम 'तु' शब्द 'एव' के अर्थ में है और द्वितीय 'तु' शब्द 'वा' के अर्थ में है। क्या निषेधमुखवादी अनात्म पदार्थों का निषेध करके अवशिष्टरूप से आत्मा का ग्रहण किसी प्रमाण के द्वारा कराता है, अथवा किसी प्रमाण के बिना ही अर्थात् अन्य की निवृत्ति होने के कारण परिशेषात् ही आत्मा की सिद्धि करता है ? ॥ १२४ ॥ शब्देनैव प्रमाणेन निवृत्तिश्चेदिहोच्यते । अध्यक्षस्या*प्रसिद्धत्वाच्छून्यतैव प्रसज्यते ॥१२५॥ शब्देनैवेति—यदि केवल शब्द प्रमाण से ही अनात्म (जड़) वस्तु का प्रतिषेध कहते हैं तो साक्षी की प्रसिद्धि न होने से शून्यता की ही प्रसक्ति होती है ॥ १२५ ॥ हृदयस्पर्शिनी विधिमुख से ही प्रमाण की प्रवृत्ति होती है, इस प्रथम पक्ष के स्वीकार करने पर इष्टहानि स्पष्ट ही है, अतः द्वितीय पक्ष को लेकर कहते हैं—यदि केवल शब्दप्रमाण से ही अनात्म वस्तु की निवृत्ति (निषेध) कही जा १. ( बृ. उ. ४।३।९ ) २. ( बृ. उ. ४।३।६ ) ३. ( कठ. उ. ५।१५, श्वे. उ. ६।१४, मुं. उ. २।२।१० )

  • प्रसिद्धित्वा ०— पाठान्तरम् ।

२२८ उपदेशसाहस्री रही है, तो अध्यक्ष (साक्षी) का सद्भाव, अन्य किसी प्रमाण से प्रसिद्ध न होने के कारण परिशेष की असिद्धि है, तब शून्यता ही अवशिष्ट रहती है, आत्मा नहीं ॥ १२५ ॥ चेतनस्त्वं कथं देह इति चेन्नाप्रसिद्धितः । चेतनस्याऽन्यतः सिद्धावेवं स्यादन्यहानतः ॥१२६॥ चेतन इति—तू चेतन आत्मा है, तब तुझे अचेतन देह कैसे कह सकते हैं ? अर्थात् चेतन का अचेतन होना संभव नहीं है। किन्तु अभी किसी प्रमाण से चेतन तत्त्व की सिद्धि ही कहाँ हो पाई है ? अतः तुम्हारा उपर्युक्त कथन ठीक नहीं है। चेतन तत्त्व की किसी प्रमाण के द्वारा सिद्धि हो जाने पर ही अन्य अचेतन पदार्थों का निषेध करते-करते अवशिष्ट का निर्देश कर सकते हो ॥ १२६ ॥ हृदयस्पर्शिनी चेतन और अचेतन विरुद्ध स्वभाववाले हैं, इस कथन से अचेतन का बाध (अन्यनिवृत्ति) शब्द के द्वारा किया गया है। अतः अचेतन के विरुद्ध स्वभाववाला चेतन अवशिष्ट रह जाता है। इस रीति से शून्यता का प्रसंग नहीं होगा। निषेधमुखवादी के इस प्रकार कहने पर सिद्धान्ती उत्तर दे रहा है कि प्रतियोगीरूप धर्मी के सिद्ध होनेपर 'अयं, अयं न भवति' ऐसा तादात्म्यनिषेध करने से विरुद्धरूपता का उपदेश होना संभव हो सकता है, किन्तु अद्यापि चेतन पदार्थ पृथक् सिद्ध ही नहीं है। निषेधमुख से ही सिद्ध कर रहे हो, और उसके सिद्ध होने पर ही (अयं, अयं न भवति) इत्याकारक तादात्म्यनिषेध कर पाओगे, ऐसी स्थिति में अन्योन्याश्रय दोष होगा ॥ १२६ ॥ अध्यक्षः स्वयमस्त्येव चेतनस्याऽपरोक्षतः । तुल्य एवं प्रबोधः स्यादन्यस्याऽसत्त्ववादिना ॥१२७॥ अध्यक्ष इति—पूर्व पक्षी कहता है कि चेतन तत्त्व तो अपरोक्ष ही है, अतः साक्षी स्वयं ही सिद्ध है। उस पर सिद्धान्ती कहता है कि इस प्रकार तो बौद्ध विद्वान् भी शून्य को स्वयं सिद्ध ही बताते हैं। अतएव वे आत्मा को शून्यरूप ही मानते हैं ॥ १२७ ॥ हृदयस्पर्शिनी इस पर निषेधमुखवादी पुनः शंका करता है कि आत्मा अत्यन्त अप्रसिद्ध नहीं है। वह तो स्वतः सिद्ध है। अर्थात् वह स्वतः अपरोक्ष है। तब सिद्धान्ती कहता है कि तुम्हारा यह कथन तो शून्यवादी बौद्ध के समान ही है, क्योंकि वह भी शून्य को स्वतः सिद्ध ही मानता है। अर्थात् जैसे वह प्रमाण के बिना ही शून्य को स्वतः सिद्ध मानकर 'शून्यम् आत्मा' कहता है, जिससे प्रबोध (ज्ञान) रूप आत्मा सिद्ध नहीं होता है, उसी प्रकार तुम्हारा कथन (चेतन अपरोक्ष होने के कारण साक्षी तो स्वयं सिद्ध ही है) भी बौद्धसमकक्ष ही है ॥ १२७ ॥ अहमज्ञासिषं चेदमिति लोकस्मृतेरिह । करणं कर्म कर्ता च सिद्धास्त्वेकक्षणे किल ॥१२८॥ अहमिति—'मैं इसे जानता था'—इस प्रकार लोगों को स्मरण हुआ करता है। अतः लोकव्यवहार में करण, कर्म और कर्त्ता की एक क्षण में ही युगपत् सिद्धि हो जाती है। इस रीति से प्रमाता यानी आत्मा की सिद्धि बताई जा सकती है ॥ १२८ ॥ हृदयस्पर्शिनी इसपर पूर्वपक्षी पुनः स्मृतिबल से स्वतः सिद्ध अध्यक्ष की सिद्धि की आशंका कर रहा है—वह कहता है कि अनुभूत विषय की ही स्मृति हुआ करती है—यह नियम है। लोकव्यवहार में कहते भी हैं कि 'अहमिदमज्ञासिषम्' 'मैं इसे जानता था'—इस स्मरणात्मक वाक्य में कर्ता, कर्म और करण की युगपत् प्रतीति होती है, अतः इसी से प्रमाता

तत्त्वमसिप्रकरणम् २२९ चेतन (आत्मा) की स्वतः सिद्धि हो जाती है। क्योंकि उक्त स्मृति, अनुभव के बिना तो हो नहीं रही है, अतः करण, कर्म, कर्ता तीनों एक क्षण में ही पूर्व से सिद्ध ही हैं। एवं च अध्यक्ष स्वतः सिद्ध है ॥ १२८ ॥ प्रामाण्येऽपि स्मृतेः शैघ्याद्यौगपद्यं विभाव्यते। क्रमेण ग्रहणं पूर्वं स्मृतेः पश्चात्तथैव च ॥१२९॥ प्रामाण्येति—पूर्वपक्षी के इस कथन पर सिद्धान्ती कहता है कि स्मृति को प्रमाण मानने पर भी कर्त्ता, कर्म और करण का जो एक साथ अनुभव होना बता रहे हो, वह ठीक नहीं है, वस्तुतः उनके युगपत् अनुभव की प्रतीति तो शीघ्रता के कारण होती है। स्मृति के पूर्व जैसे क्रमशः अनुभव हुआ था, वैसे ही अनुभव के पश्चात् भी तदनुसार उनका स्मरण भी क्रमशः ही होगा ॥ १२९ ॥ हृदयस्पर्शिनी सिद्धान्ती पूर्वपक्षी की आशंका का निराकरण कर रहा है—पूर्वानुभव की गमक होने से स्मृति की प्रामा- णिकता रहने पर भी वह युगपत् त्रितयसिद्धि की गमक नहीं है, क्योंकि पूर्व (अनुभवकाल) में कर्त्रादिकों का ग्रहण क्रमशः हुआ था, ठीक उसी प्रकार उत्तर काल में स्मृति होती है। अतः कर्त्ता, कर्म, करण की प्रतीति क्रमशः होती हुई भी वह इतनी शीघ्र होती है कि युगपत् हुई-सी लगती है, वस्तुतः वह यौगपद्य-प्रतीति मिथ्या ही है। कर्त्रादि त्रिक की एकस्मृत्यवभास्यता निश्चित होनेपर तो यौगपद्य कहा जा सकता है, किन्तु अभी तो उसका निश्चय ही नहीं हो पाया है। क्योंकि 'अहमिदं जानामि' यह शब्दप्रयोग तो क्रमशः किया जा रहा है। अतः ग्राह्य स्फुरण में ग्राहक और ग्रहण की आकारता का संभव न रहने से ग्राह्यस्फुरणकाल में अन्य दोनों का भान होना संभव नहीं है। उसी तरह ग्राहक के स्फुरणकाल में ग्राह्य का स्फुरण होना भी संभव नहीं है। परस्पर विरुद्ध आकारवाले दोनों का भी एक प्रमाणज्ञान में स्फुरण होना संभव नहीं। उसी तरह विषय के साथ एकाकार हुआ ज्ञान जब स्फुरित होता है, तब उसके स्फुरण से ज्ञातृस्फूर्ति होती है। इस प्रकार क्रम से ही ज्ञात्रादि की सिद्धि होती है, यह पहले समझना चाहिये। अतः कमलदलशतभेदन में यौगपद्याभिमान के समान युगपत् स्मृति का केवल अभिमानमात्र है। अतः जिस प्रकार स्मृति से पूर्व उनका क्रमशः ग्रहण होता था, उसी प्रकार उसके पश्चात् भी होगा। किन्तु शीघ्रता के कारण उसका अनुभव नहीं हो पाता ॥ १२९ ॥ अज्ञासिषमिदं मां चेत्यपेक्षा जायते ध्रुवम् । विशेषोऽपेक्ष्यते यत्र तत्र नैवैककालता ॥१३०॥ अज्ञासिषमिति—यौगपद्य न होने में एक अन्य कारण और भी है। 'अज्ञासिषमिदं मां च'—मैंने इसे और अपने को जाना, इस ज्ञान में क्रम (पौर्वापर्य) की अपेक्षा का होना निश्चित ही है। जहाँ विशेष की अपेक्षा होती है, वहाँ यौगपद्य का होना संभव नहीं होता ॥ १३० ॥ हृदयस्पर्शिनी ज्ञात्रादि त्रिक के यौगपद्याभाव में एक अन्य कारण भी बताते हैं। 'अज्ञासिषमिदंमां च'—मैंने इसे और अपने को जाना—इस प्रकार के ज्ञान में निश्चित रूप से पौर्वापर्यरूप क्रम की अपेक्षा है, क्योंकि 'यह'—इदंवृत्ति का विषय है और 'अपने को'—अहंवृत्ति का विषय है। इस कारण उन दोनों का ज्ञान एक ही क्षण में एक साथ नहीं हो सकता। वस्तुतः जहाँ विशेष की अपेक्षा होती है, वहाँ एककालिकता नहीं हो सकती ॥ १३० ॥ आत्मनो ग्रहणे चाऽपि त्रयाणामिह संभवात् । आत्मन्यासक्तकर्तृत्वं न स्यात्करणकर्मणोः ॥१३१॥ आत्मन इति—विषय के ग्रहण में जैसे त्रिपुटी (कर्ता-कर्म-करण) की अपेक्षा रहती है, उसी तरह प्रमाता (आत्मा), प्रमेय और प्रमा आदि प्रत्येक के ग्रहण में भी त्रिपुटी (कर्ता, कर्म और करण) की अपेक्षा रहती है, किन्तु आत्मा में चरितार्थ होनेवाला कर्तृत्व, 'करण और कर्म' की सिद्धि में कारण नहीं होता है ॥ १३१ ॥

२३० उपदेशसाहस्री हृदयस्पर्शिनी विषय और स्वरूप की दृष्टि से त्रिक स्मृति का यौगपद्य संभव न होने से कर्त्रादि की सिद्धि हो जाने मात्र से उनके ऐक्य का अनुमान नहीं किया जा सकता, यह बता चुके । अब कर्त्रादिकों का युगपत् अनुभवसाधन न होने से भी उनकी युगपत्सिद्धि की संभावना नहीं है, यह बता रहे हैं। जैसे विषय ग्रहण में कर्ता, कर्म, करण इन तीनों की अपेक्षा रहती है, उसी तरह कर्त्रादि प्रत्येक के ग्रहण में भी तीनों की अपेक्षा होती है। तथाच प्रमाता, प्रमेय प्रमाणज्ञान के ग्रहण में भी कर्त्रादि तीनों की अपेक्षा रहना संभव है। अन्यथा तत्तत्कर्त्रादिस्फुरण के बिना तत्तदर्थ के अनुभूत होने का नियम न हो पाने से कर्त्रादि की अनवस्था प्राप्त होगी। क्योंकि आत्मा में चरितार्थ होने वाला कर्तृत्व तो करण और कर्म की सिद्धि में कारण नहीं हो सकता । जो क्रिया के करने में स्वतन्त्र होता है, उसे कर्ता कहते हैं । वही सब कारकों का प्रयोक्ता माना जाता है। अतः उसकी सत्ता पहले होनी चाहिये, उसके पश्चात् अन्य कारकों की सत्ता रहेगी । अतः कर्ता, कर्म और करण की सत्ता एकसाथ सिद्ध नहीं हो सकती, उसमें क्रम का होना नितान्त आवश्यक है । एवं च कर्त्रादि त्रिक का युगपदनुभवसाधन करना कभी संभव ही नहीं है ॥ १३१ ॥ व्याप्तुमिष्टं च यत्कर्तुः क्रियया कर्म तत्स्मृतम् । अतो हि कर्तृतन्त्रत्वं तस्येष्टं नाऽन्यतन्त्रता ॥ १३२॥ व्याप्तुमिति—कर्ता की क्रिया द्वारा व्याप्त करने के लिये जो इष्टतम होता है, उसे कर्म कहा गया है१। अतः उसका सकलकारकप्रयोक्ता स्वतन्त्र कर्त्ता के अधीन रहना ही इष्ट है। उससे भिन्न किसी अध्यक्ष के अधीन रहना इष्ट नहीं है ॥ १३२ ॥ शब्दाद्वाऽनुमितेर्वाऽपि प्रमाणाद्वा ततोऽन्यतः । सिद्धिः सर्वपदार्थानां स्यादज्ञं प्रति नाऽन्यथा ॥ १३३॥ शब्दाद्वेति—इसलिये आत्मतत्त्व की सिद्धि विधिरूप से प्रवृत्त होने वाले शब्द प्रमाण अथवा अनुमान प्रमाण से ही होना उचित है। क्योंकि समस्त पदार्थों की सिद्धि, शब्द अथवा अनुमान प्रमाण से ही होती है। इन प्रमाणों से भिन्न प्रत्यक्षादि प्रमाणों से किसी वस्तु की सिद्धि तो अज्ञानियों के प्रति की जाती है ॥ १३३ ॥ अध्यक्षस्यापि सिद्धिः स्यात्प्रमाणेने विनैव वा । विना स्वस्य प्रसिद्धेस्तु नाज्ञं प्रत्युपयुज्यते ॥ १३४॥ अध्यक्षस्येति—भले ही जड़ वस्तुओं की सिद्धि प्रमाण से ही हो, किन्तु चेतन आत्मा तो स्वयंप्रकाश है, अतः प्रमाण के बिना भी उसकी सिद्धि हो सकती है। क्योंकि प्रमाण के अधीन तो केवल जड़ वस्तुओं की सिद्धि है। अतएव ग्रंथकार ने विकल्प उपस्थित करके पूछा है कि अज्ञानी के प्रति साक्षी की सिद्धि भी किसी प्रमाण से ही होगी अथवा प्रमाण के बिना भी हो जायगी ? किन्तु प्रमाण रहित आत्मसिद्धि, अज्ञानी के उपयुक्त नहीं है। अर्थात् स्वरूपभूत चैतन्य की सिद्धि में प्रमाण की आवश्यकता न रहने पर उसके साक्षित्व की सिद्धि में तो प्रमाण की आवश्यकता है ही ॥१३४॥ तस्यैवाऽज्ञत्वमिष्टं चेज्ज्ञानत्वेऽन्या मतिर्भवेत् । अन्यस्यैवाऽज्ञतायां च तद्विज्ञाने ध्रुवा भवेत् ॥१३५॥ तस्यैवाज्ञत्वमिति—अब अध्यक्ष के स्वरूप में भी विकल्प उपस्थित कर उसकी प्रमाणाधीन सिद्धि का प्रदर्शन करते हुए प्रथम पक्ष को बताते हैं। यदि ज्ञानस्वरूप आत्मा की अज्ञता (जड़ता) ही इष्ट हो तो उसके ज्ञानत्व (चेतनत्व) के विषय में किसी अन्य अर्थात् प्रमाणजनित मति की अपेक्षा होगी, किन्तु अज्ञता (जड़ता) तो जड़ (अचेतन) अहंकार आदि की ही होने से उस अध्यक्ष (आत्मतत्त्व) के विज्ञान में अन्य मति अर्थात् शास्त्र प्रमाण से ही निश्चित बुद्धि हो जायेगी। दोनों प्रकार से अध्यक्ष की सिद्धि, विधिमुख प्रमाणाधीन ही है ॥ १३५ ॥ १. 'कर्तुरीप्सिततमं कर्म'—( पा. सू. १।४।४९ )

तत्त्वमसिप्रकरणम् २३१ ज्ञातता स्वात्मलाभो वा सिद्धिः स्यादन्यदेव वा । ज्ञातत्वेऽनन्तरोक्तौ त्वं पक्षौ संस्मर्तुमर्हसि ॥१३६॥ ज्ञाततेति—अध्यक्ष ( साक्षी ) सिद्ध स्वरूप है, उसकी सिद्धि के लिये किसी अन्य प्रमाण की आवश्यकता नहीं है। अतः 'सिद्धि' शब्द से क्या विवक्षित है ? क्या 'सिद्धि' शब्द से ज्ञान अभिप्रेत है या स्वरूपलाभ ? अथवा कोई अन्य वस्तु ? यदि 'सिद्धि' शब्द से 'ज्ञान' अर्थ अभिप्रेत हो तो पूर्व श्लोक में कहे हुए ("तस्यैवाज्ञत्वमिष्टं चेत्") को दोनों पक्षों को याद रखना चाहिये। अर्थात् पूर्वोक्त विकल्प दूषण आदि को देखने से प्रथम कल्प तो उचित नहीं है ॥ १३६ ॥ सिद्धिः स्यात्स्वात्मलाभश्चेत्तत्तस्तत्र निरर्थकः । सर्वलोकप्रसिद्धत्वात् स्वहेतुभ्यस्तु वस्तुतः ॥१३७॥ सिद्धिरिति—अब द्वितीय कल्प को दूषित कर रहे हैं—यदि 'सिद्धि' शब्द से स्वात्मलाभ अभिप्रेत हो तो उसके लिये प्रयत्न (प्रमातृ-प्रमाण प्रयास ) करना व्यर्थ है, क्योंकि किसी भी वस्तु का अपने कारण से होना तो सर्वत्र लोक- प्रसिद्ध है ॥ १३७ ॥ ज्ञानज्ञेयादिवादेऽतः *सिद्धिर्ज्ञातत्वमुच्यते । अध्यक्षाध्यक्षयोः सिद्धिर्ज्ञेयत्वं नाऽऽत्मलाभता ॥१३८॥ ज्ञानेति—अतः ज्ञान-ज्ञेयादिवाद में ( ज्ञान-ज्ञेय-ज्ञाता का विचार करने वालों के मत में) 'ज्ञातत्व' को ही 'सिद्धि' शब्द से कहा गया है। अतः अध्यक्ष्य और अध्यक्ष ( साक्ष्य और साक्षी ) का ज्ञेयत्व ही उनकी 'सिद्धि' है। स्वरूप लाभ का नाम 'सिद्धि' नहीं है। अर्थात् जड़ या चेतन की स्थिति को 'सिद्धि' नहीं कहते। अपितु प्रमाण के बलपर प्रमाता का विषय होना ही उनकी सिद्धि है ॥ १३८ ॥ हृदयस्पर्शिनी अब तृतीय पक्ष तो अप्रसिद्धि के कारण ही पराहत हुआ जानकर वक्ष्यमाण पक्षविशेष का ज्ञापन करने के लिये उक्त पक्ष का निगमन करते हैं। जिस मत से ज्ञान, ज्ञेय, ज्ञाता का विचार है, उस मत में 'सिद्धि' शब्द से 'ज्ञातत्व' अर्थ ही अभिप्रेत रहता है। अर्थात् साक्ष्य और साक्षी (अध्यक्ष्य और अध्यक्ष) का ज्ञेयत्व ही उनके मत में 'सिद्धि' शब्द का अर्थ है, 'स्वरूपलाभ' नहीं। अभिप्राय यह है—जड़ वस्तु हो या चेतन हो, उसकी स्थिति को 'सिद्धि' शब्द से नहीं कहा जाता, अपितु प्रमाण के द्वारा प्रमाता का विषय होना ही उनकी सिद्धि है। "अध्यक्षस्यापि"— (१८ प्र., १३४ श्लो.) पद्य की एक अन्य प्रकार से भी योजना हो सकती है। “अहं अज्ञासिषं चेदम्”-(१८।१२८) इस पद्य से आरंभ कर यहाँ तक के ग्रन्थ से कर्तृ-कर्म-करण की सिद्धि विधिमुख से प्रवृत्त होने वाले प्रमाणों के द्वारा ही हो सकती है, अन्यथा नहीं, इस प्रासंगिक सन्दर्भ का उपपादन और उपसंहार करके 'अध्यक्ष भी एक वस्तु है अतः विधिमुख से प्रवृत्त होने वाले प्रमाण से ही उसकी भी सिद्धि होती है'—इसी बात को "अध्यक्षस्यापि" पद्य से कहा गया है। मूलगत 'वा' शब्द से पूर्वपक्षी पर कटाक्ष किया गया है। अर्थात् क्या अध्यक्ष (द्रष्टा) की भी बिना प्रमाण के ही सिद्धि हो जायगी ? अर्थात् कभी नहीं होगी। इस पर यदि यह कहा जाय कि अध्यक्ष तो चेतन पदार्थ है, उसकी सिद्धि बिना प्रमाण के क्यों नहीं होगी ? इस आशंका का समाधान यह है कि बिना प्रमाण के वस्तु की प्रसिद्धि तो ज्ञान में होती है, क्योंकि ज्ञान के स्वरूपस्फुरण में ही प्रमाण की अपेक्षा नहीं हुआ करती। ज्ञाता (अध्यक्ष) के स्वरूपस्फुरण में तो प्रमाण की अपेक्षा रहती है। अन्यथा तुमको बताना होगा कि क्या अध्यक्ष ही अज्ञ (जड़) होता हुआ बिना प्रमाण के ही अर्थ सिद्धी कर लेगा या किसी अन्य अन्तःकरण आदि के द्वारा अर्थसिद्धि की जायगी ? चेतन अध्यक्ष को ही यदि ज्ञानरूप कहें तो 'अहं अध्यक्षः' ऐसी बुद्धि होगी और उसे यदि ज्ञानवान् (ज्ञानाश्रय) कहें तो दूसरी बुद्धि होगी। अर्थात् प्रवृत्त प्रमाणजन्या मति (बुद्धि) होगी। क्योंकि आगन्तुक सिद्धि अन्य निमित्त से हुआ करती है। द्वितीय कल्प की दृष्टि से यदि विचार करें कि अध्यक्ष का ज्ञान अन्तःकरण को होता है, तो प्रमाण- जन्य अन्य बुद्धि निश्चितरूप से माननी होगी। दोनों प्रकार से विधिमुख से प्रवृत्त होनेवाले प्रमाण से ही अध्यक्ष की

  • ज्ञातत्व—पाठान्तरम् ।

२३२ -उपदेशसाहस्री सिद्धि होती है। ज्ञातता (ज्ञानवत्ता) को ही सिद्धि कहने के पक्ष में “तस्यैवाज्ञत्वमिष्टं चेत्”-(१८।१३५) इस पूर्व श्लोक में जो विकल्पदूषणप्रसर प्रदर्शित किया गया है, उसका निवारण नहीं हो पायगा ॥ १३८ ॥ स्पष्टत्वं कर्मकर्त्रादेः सिद्धिता यदि कल्प्यते । स्पष्टताऽस्पष्टते स्यातामन्यस्यैव न चाऽऽत्मनः ॥ १३९॥ स्पष्टत्वमिति-ज्ञातता और स्वरूपलाभ के अतिरिक्त भाट्टमतानुयायी विद्वान् 'स्पष्टता' को भी 'सिद्धि' शब्द से कहते हैं, किन्तु भगवान् भाष्यकार उसका खण्डन कर रहे हैं- यदि कर्ता, कर्म आदि की स्पष्टता को सिद्धि शब्द से कहें तो वह स्पष्टता-अस्पष्टता, जड़ पदार्थों की ही हो सकेगी, चेतन आत्मा की नहीं होगी ॥ १३९ ॥ हृदयस्पर्शिनी इस पर भाट्ट पक्ष की ओर से यह आशंका हो सकती है कि ज्ञातता तो आत्मलाभ (स्वरूपलाभ) के अतिरिक्त भी हो सकती है किन्तु स्पष्टता तो 'सिद्धि' ही है, अतः पक्षान्तर को अप्रसिद्ध नहीं कह सकते। इस आशंका का समाधान यह है कि यदि कर्त्ता, कर्म आदि की स्पष्टता को ही सिद्धि कहा जाय तो वह स्पष्टता-अस्पष्टता भी चिदाभासजनन के कारण कर्त्रादिविलक्षण किसी अन्य साक्षी की ही होगी, अर्थात् जड़ पदार्थ की ही होगी, आत्मा की नहीं, क्योंकि कर्त्रादिस्वरूप तो जड़ होता है ॥ १३९ ॥ अद्रष्टुर्नेव चान्धस्य स्पष्टीभावो घटस्य तु । कर्त्रादेः स्पष्टतेष्टा चेद्द्रष्टृताऽध्यक्षकर्तृका ॥१४०॥ अद्रष्टुरिति-देखने में असमर्थ अन्ध व्यक्ति को 'घट' की स्पष्टता नहीं हो सकती। यदि कर्त्ता आदि की स्पष्टता अभीष्ट हो तो 'द्रष्टृत्व' को कर्तृत्वादिशून्य साक्षी का कार्य मानना होगा ॥ १४० ॥ हृदयस्पर्शिनी इसी को व्यतिरेक प्रदर्शन से स्पष्ट कर रहे हैं-दर्शनशक्तिशून्य अन्धे पुरुष के प्रति घटादि विषय की स्पष्टता, भाट्टमत में ज्ञानविषयता के अतिरिक्त तो हो नहीं सकती। तब कर्ता आदि की स्पष्टता, प्राकट्यरूप इष्ट हो तो उससे विलक्षण अध्यक्षकर्तृक द्रष्टृता भाट्टमतानुयायी को अवश्य माननी होगी। अर्थात् द्रष्टृत्व (कर्तृत्ववादि से शून्य) को साक्षी का कार्य मानना होगा। तस्मात् कर्मादि जड़ पदार्थ की प्रकाशापरपर्याय स्पष्टता का संभव न रहने से 'सिद्धि' शब्द का अर्थ 'स्पष्टता' नहीं है। किन्तु ज्ञानविषयता ही सिद्धि शब्द का अर्थ है। अतः कर्त्रादिगत चित् के आभासन द्वारा उसके अधिष्ठानभूत चिदात्मा को प्रदीपादि दृष्टान्त से युक्त अनुमानादि विधिमुख प्रमाण से ही जानना चाहिये ॥ १४० ॥ अनुभूतेः किमन्यस्मिन् स्यात्तवाऽपेक्षया वद । अनुभवितरीष्टा स्यात् सोऽप्यनुभूतिरेव नः ॥१४१॥ अनुभूतेरिति-अनुभूति के विषय में कर्त्ता आदि किसी अन्य पदार्थ की अपेक्षा करने से तुम्हें क्या लाभ होगा ? उसे बताओ। यदि तुम्हें अनुभविता में ही अनुभूति को मानना इष्ट हो तो हमारे मतानुसार तो वह (अनुभविता) भी अनुभव रूप ही है ॥ १४१ ॥ हृदयस्पर्शिनी इसपर विज्ञानवादी बौद्ध कहता है कि कर्तृ-कर्मविहीन प्रत्यय ही अपनी महिमा से भासित होता है। अनुभूतिज्ञान के विषय में किसी अन्य कर्त्ता आदि की अपेक्षा क्यों कर रहे हो, उससे कौन-सा प्रयोजन सिद्ध होगा ? अर्थात् कोई प्रयोजन (फल) सिद्ध नहीं होगा। क्योंकि वह अनुभूतिज्ञान तो स्वप्रकाश है। यदि तुम्हें आश्रयभूत अनुभविता में ही अनुभूति अभीष्ट है, क्योंकि वह अनुभूति उस अनुभविता के अधीन होती है ऐसा कहो, तो हमारे सिद्धान्तानुसार वह

तत्त्वमसिप्रकरणम् २३३ अनुभविता भी अनुभवात्मक ज्ञानरूप ही है अर्थात् अनुभूतिरूप ही है । उसके पृथक् होने में कोई प्रमाण नहीं है ।। १४१ ।। अभिन्नोऽपि हि बुद्ध्यात्मा विपर्यासितदर्शनैः । ग्राह्यग्राहकसंवित्तिभेदवानिव लक्ष्यते ॥१४२॥ अभिन्न इति- यद्यपि विज्ञानात्मा अभिन्न ही है, तथापि भ्रान्त हुए पुरुषों को वह ग्राह्य-ग्राहक और ग्रहण के रूप में भेदवान्-सा दिखाई पड़ता है ।। १४२ ।। हृदयस्पर्शिनी इसपर यदि कहें कि अनुभूति, अनुभविता और अनुभव्य ये भेददर्शन क्यों होता है ? ऐसी शंका करते पर वह कहता है कि विज्ञानरूप आत्मा विज्ञान से अभिन्न ही है, उससे भिन्न नहीं है अर्थात् विज्ञान और आत्मा एक ही है । किन्तु जिनकी दृष्टि विपरीत है अर्थात् जिनकी बुद्धि में भ्रम हो गया है, वे लोग¹ उसे ग्राह्य, ग्राहक, ग्रहण (संवित्ति-ज्ञान) इन भेदों से युक्त हुआ-सा समझते हैं ।। १४२ ।। भूतिर्येषां क्रिया सैव कारकं सैव चोच्यते । सत्त्वं नाशित्वमस्याश्चेत् सकर्तृत्वं तथेष्यताम् ॥१४३॥ भूतिरिति-जो लोग 'अनुभूति' को ही क्रिया और कारण भी मानते हैं, उनके अनुसार यदि उसकी सत्ता और विनाश हैं, तो उसका सकर्तृत्व भी उन्हें स्वीकार करना चाहिये ।। १४३ ।। हृदयस्पर्शिनी सिद्धान्ती के द्वारा उक्त मत का खण्डन किया जा रहा है- बुद्धि में कारकत्व का स्वीकार न करने के कारण उसे कर्ता आदि की अपेक्षा नहीं है। जिनके मत में अनुभूति ही क्रिया है और वही कारक भी है,² उनके सिद्धान्त के अनुसार यदि उसकी सत्ता (स्वरूपसत्ता) और विनाश है, तो उसी प्रकार उसका सकर्तृत्व भी उन्हें स्वीकार करना चाहिए। क्योंकि वहां अनुभव का भी सद्भाव है ही। क्षणभंगुर (विनाशी) होने के कारण विरम्य (रुक-रुककर) व्यापार तो होगा नहीं³, अतः उनके मत में उसे अपने से अतिरिक्त किसकी अपेक्षा होगी⁴ ? ।। १४३ ।। १. श्लोक सं० १४२ का द्वितीयपाद "विपर्यासितदर्शनैः" दिया गया है। उसीको बृहदारण्यवार्तिक ४।३।४७६ में "विपर्या- सितबुद्धिभिः" कर दिया है। उसकी टीका में आनन्दज्ञान ने उसे 'कीर्ति' का वाक्य बताया है। श्लोकवार्तिक के शून्यवाद की १६ वीं कारिका के न्यायरत्नाकर में तथा सर्वदर्शनसंग्रह के बौद्धदर्शन में भी यह कारिका कुछ पाठान्तर के रूप में उपलब्ध होती है। दोनों में प्रथम पाद "अविभागोऽपि बुद्ध्यात्मा" दिया गया है। वाचस्पति मिश्र ने भी इस कारिका को योग सूत्र ४।२३ की तत्त्ववैशारदी में उद्धृत किया है। वहीं पर वार्तिककार ने भी "विपर्यासिति दर्शने" इस पाठान्तर के रूप में उसे उद्धृत किया है। २. "क्षणिकाः सर्वं संस्काराः अस्थिराणां कुतः क्रियाः । भूतिर्येषां क्रिया सैव कारकं सैव चोच्यते ।।" बृहदारण्यकोपनिषद्वातिक ४।३।४९४ की टीका में आनन्दज्ञान ने कर्तृ नाम का निर्देश किये बिना ही इस संपूर्ण कारिका को दिया है। वार्तिककार ने भी ४।३।५८६ श्लोक में प्रथम पाद के द्वारा उसे वैसे ही उद्धृत किया है। इस कारिका के द्वितीयार्ध को वाचस्पति मिश्र ने ब्रह्मसूत्र २।२।२० की भामती में तथा योगसूत्र ४।२० की तत्त्ववैशारदी में वैसा ही रखा है। सुरेश्वराचार्य ने धर्मकीर्ति का साक्षात् नामनिर्देश भी बृहदारण्यकवार्तिक ४।३।७५३ श्लोक में किया है। उक्त कारिका के प्रथमार्ध को तन्त्रवार्तिक १।३।१० में एकवचनान्त के रूप में पाठभेद कर के उद्धृत किया है। प्रज्ञाकरमति-विरचित बोधि- चर्यावतार पञ्जिका ९।६ में सम्पूर्ण कारिका दी गई है। ३. 'शब्दबुद्धिकर्मणां विरम्य व्यापाराभावात्'- यह न्याय है। इस न्याय का अर्थ यह है कि एक ज्ञान कराकर शब्द, विरतव्यापार हो जाता है, वह पुनः दूसरा शाब्दबोध नहीं कराता। उसी तरह बुद्धि भी एक पदार्थ में ज्ञातता अथवा संस्कार पैदा कर पुनः ३०

२३४ उपदेशसाहस्री न कश्चिच्चेष्यते धर्म इति चेत्पक्षहानता। नन्वस्तित्वादयो धर्मा नास्तित्वादिनिवृत्तयः। न भूतेस्तर्हि नाशित्वं स्वालक्षण्यं मतं हि ते ॥१४४॥ नेति—यदि उसका कोई धर्म तुम्हें अभिमत नहीं है तो तुम्हारे पक्ष की हानि होती है। उस पर बौद्ध कहता है—'अस्तित्वादि धर्म' तो 'नास्तित्वादि धर्म' की निवृत्ति ही हैं। उस पर सिद्धान्ती कहता है—तब तो तुम्हारे कथनानुसार 'क्षणिकत्वादि' को अनुभूति का लक्षण नहीं कह सकते ॥ १४४ ॥ हृदयस्पार्शिनी यदि उसका सत्त्वादि कोई भी धर्म अभीष्ट नहीं है जो क्षणिकत्व पक्ष का ही भंग हो जाता है। इसपर यदि बौद्ध कहे कि हम लोग विज्ञान का क्षणिकत्वादि कोई धर्म नहीं मानते, किन्तु अक्षणिकत्वाद्यपोहरूप ही हमारा क्षणिकत्व है अर्थात् अस्तित्वादि धर्म तो नास्तित्व की निवृत्तिमात्र ही है। उस पर सिद्धान्ती कहता है कि तब तो अनु- भूति का विनाशित्व सिद्ध नहीं हो सकेगा। क्योंकि तुम्हारे मत में अनुभूति की स्वलक्षणता (स्वालक्षण्य) मानी गई है। स्वेनैव लक्ष्यते ज्ञायते इति स्वलक्षणं, तस्य भावः स्वालक्षण्यम् अर्थात् निर्विकल्पमात्रम्। उसका फल यह होगा कि सविकल्पता होने से, अक्षणिकत्व के न रहने से, नाशित्व-अज्ञत्व आदि की व्यावृत्ति होने से और अनुभूति, सविकल्पज्ञान की गोचर (विषय) न होने से सत्त्व-नाशवत्त्वादि धर्म की सिद्धि नहीं हो पायेगी। अर्थात् तुम्हारे सिद्धान्त के अनुसार क्षणिकत्वादि को अनुभूति का लक्षण नहीं कहा जा सकेगा ॥ १४४ ॥ स्वलक्षणावधिर्नाशोनाशोऽनाशनिवृत्तिता । अगोरसत्त्वं गोत्वं ते न तु तद्गोत्वलक्षणम् ॥१४५॥ स्वलक्षणेति—स्वलक्षण हो (स्व-स्वरूप हो) जिसकी अवधि है, उसे 'नाश' कहते हैं। किन्तु तुम्हारे मत में तो 'अनाश' की निवृत्ति को 'नाश' कहते हैं। और 'गोत्व' से भिन्न (अश्वत्व आदि) का अभाव ही 'गोत्व' है। गौ के लक्षणों से युक्त 'गौ' नहीं है ॥ १४५ ॥ हृदयस्पार्शिनी स्वरूपमात्र को ही स्वलक्षण कहते हैं। वह स्वलक्षण ही जिसकी अवधि है, उसे नाश कहते हैं। नष्ट होनेवाला कार्य निरवधि अर्थात् बिना अपनी अवधि के नष्ट नहीं होता, क्योंकि इदमत्र नास्ति—यह वस्तु यहाँ नहीं है, अमुक वस्तु अब नहीं है, नष्ट हो चुकी है, इस प्रकार नाश के विषय में लोकव्यवहार हुआ करता है। अतः विनाश का अवधिभूत कोई अविनाशी, अनुत्पन्न एवं स्वतःसिद्ध पदार्थ स्वीकार करना ही होगा। अतएव कहा गया है कि स्वलक्षण ही जिसकी अवधि है, उसे नाश कहते हैं। स्वरूपमेव लक्षणं प्रमाणं धर्मो वा यस्य सः—स्वलक्षणः, सः अवधिः सीमा यस्य विनाशस्य सः इति विग्रहः। एवं च तुम्हारे मत में आविर्भाव, तिरोभाव का अवधिभूत कोई स्थिर पदार्थ न होने से सत्त्व और विनाश दोनों की सिद्धि नहीं होगी। दूसरी बात यह है कि अपोह पक्ष में अन्योन्याश्रय दोष प्रसक्त होगा। जैसे—नाश के सिद्ध होनेपर उसके विरोधी अनाश की सिद्धि और अनाश के सिद्ध होने पर उसके वही बुद्धि अन्य ज्ञातता या अन्य संस्कार को पैदा नहीं करती। उसी प्रकार कर्म भी एकत्र विभाग को पैदा कर विभागान्तर को पुनः पैदा नहीं करता। ४. योगसूत्र ४।२० के भाष्य में कहा है कि "क्षणिकवादिनः यद्भवन्, सैव क्रिया, तदेव च कारकं—इत्यभ्युपगमः। ""क्षणिक- वादी के मत में वस्तु की जो उत्पत्ति है, वही क्रिया (कार्य) है और वही उसका कर्त्रादिकारक वर्ग है। इसके मत में समस्त वस्तु का उत्पत्तिमात्र फल है, और वह निर्हेतुक अर्थात् स्वयमेव होता है, यह क्षणिकवादी का सिद्धान्त है" ऐसा वार्तिक में लिखा है।

तत्त्वमसिप्रकरणम् २३५ अपोहरूप नाश की सिद्धि होना यही अन्योऽन्याश्रय दोष का स्वरूप है। ‘सामान्य’ (जाति) का स्वीकार न करते हुए बौद्ध ने ‘अगोव्यावृत्तिः’ गोलक्षणम् स्वीकार किया है, अर्थात् ‘तद्भिन्न-भिन्नत्वरूप अपोह’ को माना है। वह भी ठीक नहीं है, क्योंकि उसमें भी वैसा ही अन्योन्याश्रय दोष स्थित है। ‘गो’ से अन्य अश्वत्वादि ही अगोपद के अभिधेय होंगे, उनका असत्त्व (निवृत्ति अर्थात् अभाव) ही ‘गोत्व’ है, यह तुम्हारा मत है, तदनुसार ‘गोभिन्न-भिन्नत्व’ ही गोत्व है अर्थात् ‘गो’ का लक्षण है, यह सिद्ध होता है। उसी तरह ‘अश्व’ का लक्षण भी गोत्वव्यावृत्तिरूप रहने से परस्परसापेक्षता रूप अन्योन्याश्रयदोष रहता है। किन्तु हमारे मत में ‘गो’ के लक्षणों से युक्त होना ही ‘गो’ का लक्षण है, अतः हमारे मत में कोई दोष नहीं है ॥ १४५ ॥ क्षणवाच्योऽपि योऽर्थः स्यात्सोऽप्यन्याभाव एव ते ॥१४६॥ क्षणवाच्योऽपीति—जो पदार्थ ‘क्षण’ शब्द का वाच्य है, वह भी तुम्हारे मत के अनुसार क्षणिकाभाव (अन्याभाव अर्थात् अक्षण का अभाव) रूप ही होगा। अतः क्षणिकताविरोधी ‘स्थिर पदार्थ’ (अक्षणिकता) को भी तुमने स्वीकार कर लिया, यह कहा जायगा ॥ १४६ ॥ भेदाभावेऽप्यभावस्य भेदो नामभिरिष्यते । नामभेदैरनेकत्वमेकस्य स्यात्कथं तव ॥१४७॥ भेदेति—बौद्ध का कहना है कि ‘अभाव’ में भेद का अभाव रहने पर भी नामों के कारण उसका भेद माना जाता है, किन्तु तुम्हारे मत के अनुसार नामभेद के कारण एक ही वस्तु का अनेकत्व कैसे हो सकेगा ? ॥ १४७॥ हृदयस्पर्शिनी इस पर बौद्ध पुनः शंका करता है कि हमने अभाव को सत् की निवृत्तिरूप नहीं माना है। यदि वैसा मानते तो आपका अतिप्रसंग देना उचित होता। हम तो ‘निरुपाख्य’ को ही अन्यव्यावृत्ति के रूप में कहते हैं। अभाव में भेद का अभाव होने पर भी (स्वरूपतः भेदाभाव के रहने पर भी) अगोत्व ही अश्वत्व है, अनश्वत्व ही गोत्व है इत्यादि नामों (संज्ञाओं) के कारण ही स्वरूपभेद माना जाता है। इसपर सिद्धान्ती दोष दे रहा है कि तुम्हारे मत से नामभेद के कारण एक ही वस्तु का अनेकत्व कैसे हो सकता है ? अर्थात् निःस्वभाव वाले एक ही अभाव का निरर्थक भिन्न-भिन्न संज्ञाओं (नामभेदों) से समान रूप से अनेक पदार्थों की व्यावृत्ति के रूप में अनेकत्व कैसे संगत हो सकता है ? ॥ १४७ ॥ अपोहो यदि भिन्नानां वृत्तिस्तस्य कथं गवि । नाऽभावा भेदकाः सर्वे विशेषा वा कथंचन ॥१४८॥ अपोह इति—दूसरी बात यह है कि ‘अपोह’ शब्द का अर्थ क्या है ? ‘भिन्न पदार्थों का व्यावर्तन’ है, या ‘अभिन्न पदार्थों का व्यावर्तन, ? यदि प्रथम पक्ष का नाम ‘अपोह’ है, तो उस अगोत्वाभाव की ‘गोव्यक्ति’ में किस प्रकार वृत्ति हो सकती है ? और द्वितीय पक्ष का नाम ‘अपोह’ है, तो सभी अभाव किसी प्रकार भी भेदक (व्यावृत्तिबोधक) अथवा विशेष (भावरूप) नहीं हो सकते ॥ १४८ ॥ हृदयस्पर्शिनी सिद्धान्ती पूछता है कि ‘अपोह’ का अर्थ भिन्न पदार्थों की व्यावृत्ति है या अभिन्न पदार्थों की व्यावृत्ति है ? यदि भिन्न पदार्थों की व्यावृत्ति को ‘अपोह’ मानते हो तो किसी शब्द का अर्थ उसके प्रतियोगी का अभाव ही है तो ‘गो’ शब्द से अगोत्व का अभाव ही समझना चाहिए। ‘गो’ शब्द से भिन्न-भिन्न वस्तुओं की व्यावृत्ति होती है तो अनन्त (अगणित) प्रतियोगी होने के कारण अगोत्वाभाव की वृत्ति ‘गो’ व्यक्ति में नहीं हो सकती। क्योंकि भेद के अनन्त प्रतियोगियों का ज्ञान हुए बिना उनके अपोह का ज्ञान होना संभव नहीं। उस स्थिति में वह अपोह ‘गो’ में कैसे रहेगा ? अपोह के न रह सकने पर किसी का भी अभाव कहीं भी सुलभ रहने से व्यवहार अनियमित हो जायगा। निष्कर्ष यह हुआ कि अगोत्वाभाव की गोव्यक्ति में वृत्ति न हो सकने से भिन्न वस्तुओं की व्यावृत्ति को अपोह नहीं कह सकते। अब

२३६ उपदेशसाहस्री यदि द्वितीय पक्ष अर्थात् अभिन्न वस्तु की व्यावृत्ति को अपोह कहें तो सभी अभाव किसी प्रकार भी भेदक (व्यावृत्ति- बुद्धिजनक) अथवा विशेष (भावरूप) नहीं हो सकते। अभिप्राय यह है कि यदि अजत्व, अश्वत्वादिरूप किसी अभिन्न वस्तु की व्यावृत्ति ही अगोत्वाभाव है तो भेद्य और भेदक का भेद निश्चित न होने के कारण उससे न तो गो के साथ अन्योन्याभावरूप बुद्धि की ही उत्पत्ति हो सकती है और न वे किसी भावरूप खण्ड-मुण्डादि पदार्थ के ही बोधक हो सकते हैं ।। १४८ ।। नामजात्यादयो यद्वत्संविदस्तेऽविशेषतः ।।१४९।। नामेति - तुम्हारे सिद्धान्त के अनुसार जैसे निर्विशेष होने के कारण 'नाम' एवं 'जाति' आदि, 'विज्ञान' के विशेषण नहीं हो सकते, उसी तरह 'अगोत्वाभाव' अथवा 'खण्ड, मुण्डादि' भी 'गो' के विशेषण नहीं हो सकेंगे ।। १४९ ।। हृदयस्पर्शिनी अपोहवाद में 'खण्डा गौः' 'नीलमुत्पलम्' आदि विशिष्ट व्यवहार नहीं बन सकेगा। उसी तरह 'इयं गौः', इत्यादि असाधारण स्वरूपव्यवहार भी नहीं बन सकेगा। अतः अपोह को न मानना ही समुचित है। बौद्ध के मत में जिस प्रकार संविद् (विज्ञान) के निर्विशेष होने के कारण नाम, जाति आदि उस विज्ञान के विशेषण नहीं हुआ करते, उसी प्रकार अगोत्वाभाव अथवा खण्ड-मुण्डादि भी 'गो' के विशेषण नहीं होंगे, तब विशिष्ट व्यवहार का लोप ही हो जायगा, जिससे बौद्ध को जीना भी कठिन होगा ।। १४९ ।। प्रत्यक्षमनुमानं *च व्यवहारे यदिच्छसि । क्रियाकारकभेदैस्तदभ्युपेयं ध्रुवं भवेत् ।।१५०।। प्रत्यक्षमिति-सिद्धान्ती का कहना है कि तुमने प्रत्यक्ष और अनुमान प्रमाणों का जैसे स्वीकार किया है, वैसे ही क्रिया-कारक रूपभेद के सहित ही उन दोनों को अवश्य स्वीकार करना होगा ।। १५० ।। हृदयस्पर्शिनी प्रत्यक्ष और अनुमान इन दो प्रमाणों को तो बौद्ध स्वीकार करते हैं, किन्तु क्रिया-कारकरूप भेद को नहीं १ मानते। वस्तुतः इन दो प्रमाणों के द्वारा क्रिया-कारकरूप भेद का ही ज्ञान होता है। अतः विज्ञान में क्रिया-कारकरूप भेद नहीं है-यह बौद्ध कथन नितान्त अनुचित है। बौद्ध यदि लोकव्यवहार में प्रत्यक्ष, और अनुमान प्रमाण का स्वीकार करता है, तो उन्हें निश्चित रूप से क्रिया-कारकभेद के साथ ही विज्ञान का स्वीकार करना होगा ।। १५० ।। तस्मान्नीलं तथा पीतं घटादिर्वा विशेषणम् । संविदस्तदुपैयं स्याद्येन चाप्यनुभूयते ।।१५१।। तस्मादिति-इसलिये नील, पीत, घट आदि को अपने अभिमत 'विज्ञान' के विशेषण रूप में मानना ही होगा। उसी तरह उसके अनुभव करने वाले 'ज्ञाता' का भी स्वीकार करना होगा ।। १५१ ।। हृदयस्पर्शिनी संवेदन (विज्ञान) के अतिरिक्त वेद्य, वेत्ता के स्वरूप को स्वीकार करने की इच्छा न रहने पर भी उसे तुम्हें (बौद्ध को) हठात् (जबरदस्ती) स्वीकार करना होगा। अर्थात् नील, पीत, घट आदि को विज्ञान का विशेषण स्वीकार करना ही होगा। और जिसके द्वारा उनका अनुभव किया जाता है, उस अनुभवकर्ता ज्ञाता का भी स्वीकार करना होगा। अतः बौद्ध अपना हठ छोड़ दे, और हमारे कथन का स्वीकार कर ले ।। १५१ ।। रूपादीनां यथाऽन्यः स्याद्ग्राह्यत्वादग्राहकस्तथा । †प्रत्ययस्य तथाऽन्यः स्याद्व्यञ्जकत्वात्प्रदीपवत् ।।१५२।। १. ( "भूतिर्येषां क्रिया सैव"-उ. सा. १८।१४३ )

  • वा०-पाठान्तरम् + पाठान्तरम् । † प्रत्ययस्तथान्यः-पाठान्तरम् ।

तत्त्वमसिप्रकरणम् २३७ रूपेति—'रूप' आदि ग्राह्य पदार्थ हैं, अतः उनका कोई अन्य ग्राहक भी माना जाता है, तथा 'प्रत्यय' भी ग्राह्य होता है, अतः उसका भी कोई अन्य ग्राहक होता है। उसी प्रकार दीपक के तुल्य प्रकाशक होने के कारण ग्राहक की सत्ता को 'ग्राह्य' पदार्थ से भिन्न मानना ही होगा ॥ १५२ ॥ हृदयस्पर्शिनी अब संवित्साक्षी में अनुमान प्रमाण बताते हैं। बौद्धों के समक्ष तो अनुमान प्रयोग इस प्रकार करना होगा— 'यद्ग्राह्यं, तत्स्वान्यग्राह्यं, यथा रूपादि, ग्राह्या च संवित्' उसी तरह 'अवभासकः अवभास्यादन्यः, व्यञ्जकत्वात्, घटादेः प्रदीपवत्'– यह अनुमान प्रयोग आस्तिकों के समक्ष करना होगा । जैसे रूप आदि पदार्थों की ग्राह्यता होने से उनका ग्राहक कोई अन्य होता है, उसी तरह दीपक के समान प्रकाशक होने के कारण ग्राहक की सत्ता, ग्राह्य से पृथक् ही माननी चाहिए । प्रत्यय, ग्राह्य होने से उसका ग्राहक कोई अन्य होगा, उसी तरह ग्राहक भी ग्राह्य से कोई अन्य होगा ॥ १५२ ॥ अध्यक्षस्य दृशेः कीदृक्संबन्धः संभविष्यति । अध्यक्ष्येण तु दृश्येन मुक्त्वाऽन्यो द्रष्टृदृश्यताम् ॥१५३॥ अध्यक्षस्येति—साक्षी से सम्बन्धित प्रत्ययवर्ग के साथ 'द्रष्टा आत्मा' का 'द्रष्टृ-दृश्यत्व' सम्बन्ध के अतिरिक्त अन्य कौन सम्बन्ध हो सकता है ? ॥ १५३ ॥ हृदयस्पर्शिनी अब प्रत्ययवर्ग और अध्यक्ष (साक्षी) का सम्बन्ध बताते हैं। द्रष्टा और दृश्य का सम्बन्ध मान लेने पर आभास को तो मानना ही होगा। प्रत्यय (अध्यक्ष्य) के साथ आत्मा (दृशि) का सम्बन्ध पारमार्थिक है, या अपार- मार्थिक ? प्रथम विकल्प मानने पर दृशि में परिणामादि विकार का प्रसंग प्राप्त होगा । अतः यह प्रथम पक्ष सावद्य (निन्दित) है। तात्पर्य यह कि साक्षी से सम्बन्धित प्रत्ययवर्ग के साथ द्रष्टा आत्मा का द्रष्टृ-दृश्यत्वरूप सम्बन्ध को छोड़कर अन्य कौन-सा सम्बन्ध हो सकता है ? ॥ १५३ ॥ अध्यक्षेण कृता दृष्टिर्दृश्यं व्याप्नोत्यथाऽपि वा । नित्याध्यक्षकृतः कश्चिदुपकारो भवेद्धियाम् ॥१५४॥ अध्यक्षेणेति—द्रष्टा की दृष्टि, 'दृश्य' को व्याप्त करतो है या नहीं ? नित्य साक्षी के द्वारा 'बुद्धि' का कोई उपकार तो होना ही चाहिये । 'साक्ष्य' के साथ 'साक्षी' का सम्बन्ध पारमार्थिक है या अपारमार्थिक है ? इस विकल्प में आचार्य, द्वितीय पक्ष का स्वीकार करते हैं ॥ १५४ ॥ हृदयस्पर्शिनी द्रष्टा (अध्यक्ष) की दृष्टि, दृश्य को व्याप्त करती है या नहीं ? जो नित्य साक्षी है, उसके द्वारा बुद्धि पर कोई उपकार तो होना ही चाहिए ॥ १५४ ॥ स चोक्तस्तन्निभत्वं प्राक्संव्याप्तिश्च घटादिषु । यथाऽऽलोकादिसंव्याप्तिर्व्यञ्जकत्वाद्धियस्तथा ॥१५५॥ स चेति—साक्षीकृत बुद्धि के उपकार का वर्णन मुखाभास का दृष्टान्त देकर किया जा चुका है। जिस प्रकार घट आदि में प्रकाश आदि की व्याप्ति होती है, उसी प्रकार अभिव्यञ्जक होने के कारण उसमें बुद्धि की भी व्याप्ति होती है ॥ १५५ ॥ हृदयस्पर्शिनी उस नित्य अध्यक्ष साक्षी के द्वारा बुद्धि पर किये गये उपकार (चिन्निभत्व = चित् की समानता) का वर्णन, पहले मुख-प्रतिबिम्ब के दृष्टान्त से किया जा चुका है। उसी प्रतिबिम्ब (आभास) के द्वारा आत्मा का दृश्य (बाह्य

२३८ उपदेशसाहस्री विषय) के साथ सम्बन्ध बताने के लिये बुद्धि की विषयव्याप्ति को दृष्टान्त देकर बताते हैं—जिस प्रकार घट-पटादि में प्रकाशादि की व्याप्ति होती है, उसी प्रकार अभिव्यञ्जक होने के कारण उन दृश्य बाह्य पदार्थों में (घटादि में) बुद्धि की भी व्याप्ति होती है ॥ १५५ ॥ आलोकस्थो घटो यद्वद्बुद्धयारूढो भवेत्तथा । धीव्याप्तिः स्याद्घटारोहो धियो व्याप्तौ क्रमो भवेत् ॥१५६॥ आलोकस्थ इति—प्रकाश स्थित घट जैसे 'बुद्धि' में आरूढ़ होता है, वैसे ही बुद्धिनिष्ठ घट भी बुद्धि में आरूढ़ होता है। बुद्धि के द्वारा घट की व्याप्ति ही 'घटारोह' है। किन्तु बुद्धि की व्याप्ति में क्रम रहता है, और आत्मव्याप्ति में कोई क्रम नहीं रहता ॥ १५६ ॥ हृदयस्पर्शिनी उपर्युक्त बात को ही अधिक स्पष्ट कर रहे हैं। जैसे आलोकनिविष्ट (प्रकाशस्थित) घट आलोकारूढ़ होता है, वैसे ही बुद्धिनिविष्ट (बुद्धिनिष्ठ—स्थित) घट भी बुद्ध्यारूढ़ होता है। यहाँ पर 'आरूढ़' का अर्थ अश्व और अश्वारोही के समान आधाराधेयभाव नहीं है। यहाँ तो बुद्धि के द्वारा घट की व्याप्ति ही घटारोह है। यदि विषय- व्याप्तिमात्र ही बुद्धि की विषयव्यञ्जकता है, तो आत्मा और बुद्धि दोनों में अन्तर क्या है ? उत्तर यही होगा कि बुद्धि की व्याप्ति में क्रम रहता है और आत्मव्याप्ति में कोई क्रम नहीं रहता ॥ १५६ ॥ *पूर्वा स्यात्प्रत्ययव्याप्तिस्ततोऽनुग्रह आत्मनः । कृत्स्नाध्यक्षस्य नो युक्तः कालाकाशादिवत्क्रमः ॥१५७॥ पूर्वमिति—'विषय' में 'बुद्धि' की व्याप्ति प्रथम होती है, और उसके पश्चात् 'आत्मा' का अनुग्रह होता है । किन्तु काल और आकाश आदि के समान व्यापक आत्मा की व्याप्ति में कोई क्रम नहीं होता ॥ १५७ ॥ हृदयस्पर्शिनी प्रथमतः विषय में बुद्धि की व्याप्ति होती है। तदनन्तर आत्मा का अनुग्रह होता है। अर्थात् बुद्धि जब विषयाकार हो जाती है, तब उस आकार में आत्मा का प्रतिबिम्ब पड़ता है। उसके बल पर बुद्धि, विषय को अभिव्यक्त कर पाती है। इस रीति से बुद्धि में क्रमशः द्रष्टृत्व और अन्यशेषत्व सिद्ध होता है । एवंच बुद्धि की विषय में व्याप्ति क्रमशः होती है । किन्तु काल और आकाशादि के समान व्यापक आत्मा की व्याप्ति में कोई क्रम नहीं है। निष्कर्ष यह है कि प्रत्येक विषय (अर्थ) के प्रति बुद्धि के भिन्न-भिन्न परिणाम होकर वह विषय की अभिव्यंजक हुआ करती है, अतः क्रम तो बुद्धि का ही मानना उचित होगा। सर्वत्र अनुगतप्रकाशरूप अपरिच्छिन्न आत्मा का क्रम मानना उचित नहीं है ॥ १५७ ॥ विषयग्रहणं यस्य †कारणापेक्षया भवेत् । सत्येव ग्राह्यशेषे च परिणामी स चित्तवत् ॥१५८॥ विषयेति—किन्तु 'बुद्धि' के समान 'आत्मा' परिणामी नहीं है। क्योंकि ग्राह्य विषय के अवशिष्ट रहते हुए जिसे 'कारक' की अपेक्षा से 'विषय' का ग्रहण होता है, वह पदार्थ 'चित्त' के समान परिणामी होता है ॥ १५८ ॥ हृदयस्पर्शिनी यदि कोई कहे कि भोग्य विषय का अवभासक होने से बुद्धि की तरह अध्यक्ष (साक्षी आत्मा) का भी परिणाम होगा, तो उसका उत्तर यह है कि बुद्धि की तरह आत्मा परिणामी नहीं है। क्योंकि अपने से असंसृष्ट ग्राह्य विषय के अवशिष्ट रहते हुए जो कर्तादि कारकों की अपेक्षा करके विषय का ग्रहण कर पाता है, वह पदार्थ चित्त के समान परिणामी कहा जाता है। आत्मा को जो विषयावभास होता है, वह इस रीति से नहीं होता,

  • पूर्वं०—पाठान्तरम् । † करणा०—पाठान्तरम् ।

तत्त्वमसिप्रकरणम् २३९ किन्तु वह आत्मा नित्यसिद्धप्रकाशस्वरूप होने से उसे अपने में अध्यस्त (आरोपित) समस्त विषयों का युगपत् अवभासन होता है, इसलिये उसके परिणामी होने की शंका ही नहीं की जा सकती ॥ १५८ ॥ अध्यक्षोऽहमिति ज्ञानं बुद्धेरेव विनिश्चयः । *नाध्यक्षस्याविशेषत्वान्न तस्यास्ति परो यतः ॥१५९॥ अध्यक्षेति—'मैं साक्षी हूँ' यह ज्ञान, चिदाभासविशिष्ट बुद्धि का ही निश्चय है, 'साक्षी' का नहीं। क्योंकि वह 'निर्विशेष' है, और उससे भिन्न उसका कोई 'द्रष्टा' भी नहीं है ॥ १५९ ॥ हृदयस्पर्शिनी यद्यपि उक्त रीति से आत्मा का भोग्यविषय के आकार में कोई परिणाम न हो, तथापि ब्रह्मज्ञान के आकार में तो परिणाम होता ही है। क्योंकि ब्रह्म यद्यपि स्वात्मा के रूप में ही है, तथापि उसके आकार का अवभास होने में आगन्तुक ज्ञान की अपेक्षा होती है। अतः ब्रह्म को परिणामी कह सकते हैं। इस आशंका का समाधान इस प्रकार किया जाता है कि 'तत्त्वमसि' आदि वाक्यों से अनुभव में आने वाला 'मैं ब्रह्म (परमात्मा) ही हूँ', इत्याकारक जो ज्ञान है, वह अध्यक्ष (साक्षी) का परिणाम नहीं है। क्योंकि आत्मा तो विशेषरहित है, क्योंकि निरवयव, असंग आत्मा में स्वतः अथवा परतः किसी भी प्रकार का कोई विशेष होने की संभावना ही नहीं है। अपितु साभास बुद्धि की ही निश्चयात्मिका विशेष अवस्था हुआ करती है। 'मैं साक्षी हूँ' यह ज्ञान चिदाभासविशिष्ट बुद्धि का ही निश्चय है, साक्षी का नहीं। क्योंकि वह निर्विशेष है। उससे भिन्न उसका कोई द्रष्टा भी नहीं है। निष्कर्ष यह है कि अनेक जन्मानुष्ठित यज्ञ-यागादि से उत्पन्न अदृष्टादि दोषों की निवृत्ति के संस्कार से युक्त हुई, सगुणब्रह्मोपासना के द्वारा जिसकी चञ्चलता का निराभरण हो चुका है, सम्प्रति विवेक-वैराग्य-शमादि गुणों से सुसंस्कृत हुई और 'तत्' और 'त्वम्' इन दो पदार्थों के परिशोधन से उत्पन्न हुए ज्ञान के कारण जिसमें ब्रह्मात्मैक्य के संस्कार सुदृढ़ हो गये हैं, ऐसी जो ब्रह्मात्मनिश्चयात्मिका बुद्धि है, उसी की कोई अखण्डाकारा अवस्था हुआ करती है, जो 'तत्त्वमसि' वाक्योपदेशश्रवण के समानान्तर शोधित तत्-त्वम् पदार्थ में परिकल्पित भेद का तिरोधान कर देती है। तब अखण्डा- कार अवस्था हो जाती है, उस अवस्था में प्रतिबिम्बित चिदात्मा, उस अखण्डाकार वृत्ति से अपने को अविविक्त समझता हुआ 'अहं'=मैं, इस प्रकार से परामर्श करने लगता है। तब उपाध्यंश का अपोह होने से अपने विविक्ताकार स्वरूप को ही अर्थात् ब्रह्म को प्राप्त हो जाता है। उसमें कोई किसी प्रकार की नवीन विशेषता पैदा नहीं होती। उस चिदात्मा में किसी प्रकार की कोई विशेषता (परिणाम) मानने पर, परिणामी चित्त के समान 'स्वान्यवेद्यत्व' नियम के अनुसार चिदात्मा का भी कोई अन्य साक्षी मानना होगा। किन्तु अनवस्था और प्रमाणरहित कल्पना करना उचित नहीं है। अतः यही स्वीकार करना होगा कि उसका कोई साक्षी नहीं है ॥ १५९ ॥ कर्त्ता चेदहमित्येवमनुभूयेत मुक्तता । सुखदुःखविनिर्मोको नाहंकर्तरि युज्यते ॥१६०॥ कर्तेति—यदि 'कर्ता'—मैं मुक्त हूँ— ऐसा मानकर 'मुक्तता' का अनुभव कर सकता है तो अहंकारातीत आत्मा में 'सुख-दुःख' की निवृत्ति नहीं रहनी चाहिये थी, किन्तु सुख-दुःख रूप फल की प्राप्ति तो आत्मा को ही हुआ करती है। वह क्यों होती है ? क्योंकि मुक्त होने पर तो 'क्रिया' के सहित 'कर्ता' भी नहीं रहता, इसलिये उसे उसके फल की प्राप्ति नहीं हो सकती ॥ ॥ १६० ॥ हृदयस्पर्शिनी यद्यपि अन्तःकरणका ही ज्ञानाकार (वृत्त्याकार) परिणाम होता है, तथापि उसे उसके सुख-दुःख- निवृत्तिरूप फल की प्राप्ति नहीं होती, वह फलप्राप्ति तो आत्मा को ही हुआ करती है। किन्तु अहंकर्ता के साथ फल का संबंध मानने पर दोष बताते हैं। कर्ता अर्थात् विकारी, 'अहं मुक्तः' मैं मुक्त हूँ—इस प्रकार मुक्तता का अनुभव यदि करे तो निरहंकार आत्मा में सुख-दुःख की निवृत्ति नहीं रहनी चाहिये थी। क्योंकि मुक्त होने पर तो

  • नाध्यक्षस्या०—पाठान्तरम्।

२४० उपदेशसाहस्री क्रिया के सहित कर्ता भी नहीं रहता । इस कारण उसे फल की प्राप्ति कैसे हो सकेगी ? अतः आत्मा के साथ फल का कोई सम्बन्ध नहीं है ॥ १६० ॥ देहादावभिमानोत्थो दुःखीति प्रत्ययो ध्रुवम् । कुण्डलीप्रत्ययो यद्वत्प्रत्यगात्माभिमानिना ॥१६१॥ देहादाविति–'प्रत्यगात्मा' में अभिमान करने वाले व्यक्ति का जैसे 'मैं कुण्डल वाला हूँ'—यह प्रत्यय निवृत्त ( बाधित ) हो जाता है, क्योंकि कुण्डल का सम्बन्ध तो स्थूल शरीर से है। उससे अपना पार्थक्य ज्ञान ( भिन्नता का ज्ञान ) हो जाता है, तब वह अपने से उसका सम्बन्ध नहीं मानता। उसी प्रकार 'विवेक ज्ञान' के द्वारा उसका 'मैं दुःखी हूँ'—यह देहाभिमान से उत्पन्न हुआ अविवेकमय प्रत्यय भी निश्चित रूप से बाधित हो जाता है ॥ १६१ ॥ हृदयस्पर्शिनी प्रत्यगात्मा में अभिमान रखने वाले पुरुष का 'मैं कुण्डलवाला हूँ'—यह प्रत्यय बाधित हो जाता है, क्योंकि कुण्डल का सम्बन्ध तो स्थूल शरीर से ही रहता है। जब स्थूल शरीर से अपने को भिन्न समझने लगता है, तब वह उसे अपने से सम्बन्धित नहीं मानता। उसी प्रकार जब विवेकज्ञान हो जाता है तब 'मैं दुःखी हूँ'—यह देहाभिमान से उत्पन्न हुआ अविवेकमय प्रत्यय भी निश्चितरूप से बाधित हो जाता है ॥ १६१ ॥ बाध्यते प्रत्ययेनेह विवेकेनाऽविवेकवान् । विपर्यासेऽसदन्तं स्यात्प्रमाणस्याप्रमाणतः ॥१६२॥ बाध्यते इति—अविवेक से विवेक का बाध क्यों नहीं होता ? इस शंका का समाधान यह है कि विपर्यास मानने पर प्रमाण का अप्रामाण्य हो जाने के कारण सभी कुछ 'शून्यमय' हो जायगा। अतः 'अविवेक' से 'विवेक' की निवृत्ति नहीं हुआ करती ॥ १६२ ॥ हृदयस्पर्शिनी यदि विवेकज्ञान से अविवेक की निवृत्ति हो जाती है, तो अविवेक के द्वारा विवेक की भी निवृत्ति हो सकती है। इस प्रकार शंका करने पर समाधान देते हैं कि इस प्रकार विपरीत मानने पर प्रमाण का अप्रामाण्य हो जायगा, तब सभी शून्यमय हो जायगा। अतः अविवेक से विवेक की निवृत्ति मानना उचित नहीं है ॥ १६२ ॥ दाहच्छेदविनाशेषु दुःखित्वं नान्यथाऽऽत्मनः । नैव ह्यन्यस्य दाहादावन्यो दुःखी भवेत्क्वचित् ॥१६३॥ दाहेति–देहाभिमान के रहने से अनुभूयमान दाह, छेदन और मरण होने के लिये अविवेक के अतिरिक्त अन्य कोई कारण नहीं। अतः 'आत्मा' का दुःखी होना सम्भव नहीं है। क्योंकि अन्य के दाहादि में कोई अन्य कभी दुःखी नहीं होता है ॥ १६३ ॥ हृदयस्पर्शिनी विवेक से अविवेक की निवृत्ति (बाध) होती है, यह पहले बता चुके हैं, उसे और अधिक स्पष्ट कर रहे हैं। दुःख का जो अनुभव होता है, वह दाहादि देहोपघात के कारण ही होता है, अन्यथा नहीं। वह अनुभव देहाभिमाननिबन्धन ही है, अन्यथा सुषुप्ति में भी होना चाहिये। अतः देहाभिमान के कारण अनुभूयमान दाह, छेदन, मरण आदि से होनेवाले दुःखानुभव में अविवेक के अतिरिक्त और कोई कारण नहीं है। इसीलिये आत्मा का दुःखी होना असंभव ही है। क्योंकि किसी दूसरे के दाहादि होने पर कोई अन्य कभी दुःखी नहीं होता अर्थात् 'अहं दुःखी अस्मि' मैं दुःखी हूँ—ऐसा ज्ञान नहीं हुआ करता। आत्मा भी देह से भिन्न है, यह प्रमाणसिद्ध है। 'अहं दुःखी अस्मि' यह जो अनुभव होता है, वह अध्यासनिबन्धन है ॥ १६३ ॥