उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)
Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary
आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा
स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंतत्त्वमसिप्रकरणम् २२५ ठीक नहीं है। क्योंकि स्वप्न में भी आत्मा और अन्तःकरण की मुख और उसके प्रतिबिम्ब के समान परस्परनिरपेक्षता सिद्ध है। तथापि स्वप्नावस्था में रथादि का अभाव रहने से१ उन रथादि का ज्ञान ही उस स्वप्रकाश चैतन्यस्वरूप आत्मा के द्वारा गृहीत होता है। अर्थात् आत्मा से भिन्न अन्तःकरण तथा उसके विषयादि की सत्ता तो आत्मा के आश्रय से है, किन्तु आत्मा की सिद्धि के लिए किसी अन्य वस्तु की अपेक्षा नहीं है। अतः इनमें अन्योन्याश्रय दोष नहीं है। तथाच प्रत्ययसंवलनविनिर्मुक्त स्वप्रकाशतया भासमान आत्मा ही स्वप्न में विषयाकाराकारित प्रत्यय का साक्षी सिद्ध होता है। स्वप्न में 'प्रत्यय' ही ग्राह्य रहता है। क्योंकि अन्य विषय तो स्वप्न में रहते नहीं, अतः वासनात्मक अन्तःकरण ही आत्मा के अधीन रहने से उसी का ग्रहण होता है ।। ११७ ।। अवगत्या हि संव्याप्तः प्रत्ययो विषयाकृतिः । जायते स यदाकारः स बाह्यो विषयो मतः ।।११८।। अवगत्येति—अन्तःकरण की विषयाकार वृत्ति, आत्मचैतन्य के द्वारा व्याप्त होती है। वह वृत्ति जिस आकार की होती है, उसी को बाह्य विषय कहा जाता है ।। ११८ ।। हृदयस्पर्शिनी अन्तःकरण का साक्षी आत्मा ग्राह्य से भिन्न है, यह बताने के लिए ग्राह्य के स्वरूप को बता रहे हैं। पूर्व श्लोक के द्वारा स्वप्नावस्था में चिदात्मा का प्रत्यय से विवेक (भेद) बताया गया था, और अब जागरित अवस्था में भी उस भेद को बताते हैं। अन्तःकरण की विषयाकारावृत्ति आत्मचैतन्य द्वारा व्याप्त होती है, और वह जिस आकार की रहती है, वही बाह्य विषय माना जाता है। विषय के स्फुरण में यह क्रम हुआ करता है—प्रथमतः आत्माभास से युक्त हुई बुद्धि की वृत्ति इन्द्रियप्रणाली के द्वारा विषय के स्थान पर पहुँचती है। वहाँ पहुँचकर वह विषय को व्याप्त करके विषयाकार हो जाती है। इस प्रकार वह जिस-जिस विषय का आकार ग्रहण करती है, उसी का ज्ञान आत्म- चैतन्य के द्वारा हुआ करता है ।। ११८ ।। कर्मेप्सिततमत्वात्स तद्वान् कार्ये नियुज्यते । आकारो यत्र चार्प्येत करणं तदिहोच्यते ।।११९।। कर्मेति—वह विषय, कर्ता को ईप्सिततम रहने से 'कर्म' कहलाता है। उस कर्ता को उसकी इच्छा होती है, तब वह कार्य में नियुक्त ( प्रवृत्त ) होता है। उसी प्रकार जिस बुद्धिवृत्ति में विषय का आकार अर्पित होता है, उसे करण कहा जाता है ।। ११९ ।। हृदयस्पर्शिनी सम्प्रति कर्म, करण, कर्ता ये तीनों साक्षी से पृथक् हैं, यह बता रहे हैं। विषय, कर्ता का अत्यन्त इष्ट होने से 'कर्म' कहा जाता है। उसकी इच्छा से युक्त हुआ पुरुष कार्य में नियुक्त होता है, तथा जिस बुद्धिवृत्ति में विषय का आकार अर्पित होता है, वह करण कहलाता है। अर्थात् तत्तद्बाह्येन्द्रियविशेषिता तत्तदर्थाकारा बुद्धिवृत्ति, विषयप्रमिति (ज्ञान) के प्रति 'करण' कहलाती है ।। ११९ ।। यदाभासेन संव्याप्तः *स ज्ञातेति निगद्यते । त्रयमेतद्विविच्याऽत्र यो जानाति स आत्मवित् ।।१२०।। यदेति—जब अन्तःकरण चिदाभास से व्याप्त होता है, तब उसे ज्ञाता कहते हैं। एवं च ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय इन तीनों का विवेक करके जो व्यक्ति साक्षी आत्मा को जानता है, उसी को आत्मज्ञानी कहते हैं ।। १२० ।। १. "न तत्र रथा न रथयोगा न पन्थानो भवन्ति ।” ( बृ. उ. ४।३।१० )
- संजाता०—पाठान्तरम् । २९