उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)
Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary
आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा
स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२२६ उपदेशसाहस्री हृदयस्पर्शिनी विषय और करण को बताकर अब कर्ता को बता रहे हैं—जब अन्तःकरण चिदाभास से व्याप्त होता है तब वह ज्ञाता कहलाता है। अर्थात् जब चित्प्रतिबिम्ब के आभास से संव्याप्त हुआ अहंकार परिणत होता है, तब उसे चिदात्मप्रतिबिम्ब ‘ज्ञाता’ कहा जाता है। इस प्रकार ज्ञाता, ज्ञान, ज्ञेय तीनों का विवेचन करके जो साक्षी आत्मा को जानता है, वही आत्मवेत्ता है अर्थात् वह त्वंपद से लक्ष्य प्रत्यगात्मा का ज्ञानी कहलाता है। यही बात श्रीमद्भागवत में बताई गई है— “एकमेकतराभावे यदा नोपलभामहे । त्रितयं तत्र यो वेद स आत्मा स्वाश्रयाश्रयः ॥” (२।१०।९) श्रीमद्भागवत में अनेक स्थानों पर अनेक ग्रन्थियाँ हैं, जिनका भेदन करना सर्वसाधारण का कार्य नहीं है। उन ग्रन्थियों में से ही यह श्लोक भी एक ग्रन्थिरूप ही है। इस श्लोक का अर्थ, पूर्व श्लोकार्थ के ज्ञान के अधीन है। अतः उसी की व्याख्या प्रथमतः करते हैं। “योऽध्यात्मिकोऽयं पुरुषः सोऽसावेवाधिदैविकः । यस्तत्रोभयविच्छेदः स स्मृतो ह्याधिभौतिकः ॥ (श्री. भा. २।१०।८) जो यह आध्यात्मिक पुरुष, चक्षुरादि करणों (इन्द्रियों) का अभिमानी द्रष्टा जीव है, वही यह आधिदैविक पुरुष सूर्य आदि है। यहाँ पर पुरुष (जीव) की उपाधि होने से इन्द्रियादि में ‘पुरुष’ शब्द का प्रयोग किया गया है। क्योंकि “स वा पुरुषोऽन्नरसमयः”१—इत्यादि श्रुति बता रही है। जो यह अध्यात्म चक्षुरादि करण है, वही यह आधि- दैविक चक्षुरादि का अधिष्ठाता सूर्यादि पुरुष कहा गया है। क्योंकि इन्द्रिय और उनका अधिष्ठान दोनों ही सूर्यादि के अंशरूप होने से एकरूप हैं। एक ही में आध्यात्मिक और आधिदैविक दोनों का जो भेद (विच्छेद), जिससे प्रतीत हो रहा है, वह जो चक्षुर्गोलकादि से उपलक्षित दृश्य देह है, उसे ही आधिभौतिक पुरुष कहा गया है। करण और उसके अधिष्ठाता दोनों के अभिन्न रहनेपर भी उनमें भेद प्रतीति करानेवाला यह गोलक ही है। क्योंकि अन्यत्र करण की स्थिति न होने से भेद का बोधन नहीं होता है। एवंच ‘इन्द्रिय’ आध्यात्मिक है, ‘देवता’ आधिदैविक है, और ‘गोलक’ आधिभौतिक है, विषय भी आधिभौतिक है। अभिप्राय यह है—जो नेत्र आदि इन्द्रियों का अभिमानी द्रष्टा जीव है, वही इन्द्रियों के अधिष्ठातृ देवता सूर्य आदि के रूप में भी है, और जो नेत्र गोलक आदि से युक्त दृश्य देह है, वही उन दोनों को अलग-अलग करता है। अब प्रकृत श्लोक का अर्थ इस प्रकार होगा कि इन तीनों में यदि एक का भी अभाव हो जाय तो दूसरे दो की उपलब्धि नहीं हो सकती। अतः इन तीनों से अलग रहकर जो इन तीनों को जानता है, वही सबका अधिष्ठान ‘आश्रय’ तत्त्व है। उसका आश्रय वह स्वयं ही है, दूसरा कोई नहीं है ॥ १२० ॥ सम्यक्संशयमिथ्योक्ताः प्रत्यया व्यभिचारिणः । एकैवावगतिस्तेषु भेदस्तु प्रत्ययार्पितः ॥१२१॥ सम्यगिति—विवेक का प्रकार यह है—प्रत्यय को ही सम्यक् (यथार्थ), संशय और मिथ्या शब्द से कहते हैं। ये त्रिविध प्रत्यय आगमापायी होने से व्यभिचारी हैं। किन्तु उनमें ‘ज्ञान’ एकरूप ही है, केवल प्रत्ययों का भेद किया हुआ है ॥ १२१ ॥ आधिभेदाद्यथा भेदो मणेरवगतेस्तथा । अशुद्धिः परिणामश्च सर्वं प्रत्ययसंश्रयात् ॥१२२॥ आधीति—जिस प्रकार जपापुष्पादि उपाधियों के भेद से मणि में भेद प्रतीत होता है, उसी प्रकार समस्त अशुद्धि और परिणाम, प्रत्यय (अहंकार एवं चिदाभास) के सम्बन्ध से होते हैं ॥ १२२ ॥ १. (तै. उ. २।१)