उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)
Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary
आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा
स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२२४ .उपदेशसाहस्री हृदयस्पर्शिनी यदि यह कहें कि चिदाभास मानने पर भी आत्मा परिणामी सिद्ध होगा, तो यह कथन ठीक नहीं है । क्योंकि रज्जु के अज्ञान से कल्पित सर्प में रज्जु की समानता के तुल्य तथा अनिदंरूप रजत में इदमात्मकता के तुल्य चिदात्मा के अज्ञान से कल्पित बुद्धि आदि में चित्तुल्यता मिथ्या ही है । मूलगत 'च' से अभोक्तृस्वरूप आत्मा में भोक्तृत्व का आभास भी मृषा ही है, यह सूचित किया गया है । अर्थात् उसे दर्पण में मुख के प्रतिबिम्ब के समान मिथ्या बता चुके हैं ॥ ११४ ॥ नाऽऽत्माभासत्वसिद्धिश्छेदात्मनो ग्रहणात्पृथक् । मुखादेश्च पृथक्सिद्धिर्हृ त्वन्योन्यसंश्रयः ॥११५॥ नात्मेति—शुद्ध आत्मा के ग्रहण करने से आत्मा के आभास की पृथक् सिद्धि यदि नहीं होती हो तो अन्योन्याश्रय दोष की उपस्थिति होगी । परन्तु यहाँ दृष्टान्त में तो शीशे में पड़े हुए प्रतिबिम्ब से ग्रीवा पर स्थित मुख की स्थिति पृथक् ही है । इसलिये अन्योन्याश्रय दोष के उपस्थित होने की कोई संभावना नहीं है ॥ ११५ ॥ हृदयस्पर्शिनी अहंकार को ही आत्मा समझनेवाला उसके चिन्नभिन्नत्व पर आक्षेप कर रहा है । केवल (शुद्ध) आत्मा का अवभास होते रहने से आत्मा के आभास की पृथक् सिद्धि न होगी, अर्थात् आभास के अवभास से ही यदि आत्मा का आभास कहा जाय तो अन्योन्याश्रय दोष उपस्थित होगा, तात्पर्य यह है कि अपनी-अपनी सिद्धि में एक दूसरे की अपेक्षा होगी । किन्तु दृष्टान्त में दर्पणगत प्रतिबिम्ब से ग्रीवास्थ मुख की सिद्धि पृथक् है, अतः दृष्टान्त विषम है । दृष्टान्त में अन्योन्याश्रय दोष नहीं है ॥ ११५ ॥ अध्यक्षस्य पृथक्सिद्धावाभासस्य तदीयता । आभासस्य तदीयत्वे ह्याध्यक्षव्यतिरिक्तता ॥११६॥ अध्यक्षस्येति—पूर्वपक्षी अन्योन्याश्रय दोष को स्पष्ट करते हुए कहता है कि साक्षी जब पृथक् सिद्ध रहेगा, तभी आभास का उससे सम्बन्ध हो पायगा; एवं आभास उसी का है, इस कारण साक्षी का पृथक्त्व सिद्ध हो पायेगा । यही अन्योन्याश्रय दोष का स्वरूप है ॥ ११६ ॥ हृदयस्पर्शिनी पूर्वपक्षी अन्योन्याश्रय दोष को स्पष्ट कर रहा है । साक्षी ( अध्यक्ष ) के पृथक सिद्ध होनेपर आभास का उससे सम्बन्ध; और आभास उसका है, इस कारण साक्षी का पृथक्त्व—इस प्रकार दोनों को परस्पर अपेक्षा रहने से अन्योन्याश्रय दोष होता है । अर्थात् अध्यक्ष की भेदप्रतीति होनेपर चिदाभास की सिद्धि और चिदाभास की सिद्धि होने- पर उससे अध्यक्ष की भेदसिद्धि होगी—यही अन्योन्याश्रय दोष का स्वरूप है । तथाच—'अहम्' के आकार में प्रतीयमान अहंकार ही चेतन आत्मा है ॥ ११६ ॥ नैवं स्वप्ने पृथक्सिद्धेः प्रत्ययस्य दृशेस्तथा । रथादेस्तत्र शून्यत्वात्प्रत्ययस्याऽऽत्मना ग्रहः ॥११७॥ नैवमिति—उस पर सिद्धान्ती कहता है कि तुम्हारा कहना उचित नहीं प्रतीत हो रहा है, क्योंकि स्वप्न में आत्मा और अन्तःकरण की सिद्धि पृथक् पृथक् प्रतीत होती है । तथापि स्वप्न में रथ आदि का अभाव होने से रथादि का ज्ञान केवल चेतन आत्मा के द्वारा ग्रहण किया जाता है ॥ ११७ ॥ हृदयस्पर्शिनी पूर्वपक्षी का उपर्युक्त कथन उचित नहीं है, क्योंकि स्वप्नावस्था में अहंकारात्मक अन्तःकरण दृश्य रूप में ही व्यवस्थित हो चुका है । अतः आत्मा आभासनिरपेक्ष ही सिद्ध होता है । अतः उक्त दृष्टान्त को असंगत कहना