भारतकोश
उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा

स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished364 पृष्ठ

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पृष्ठ 249

तत्त्वमसिप्रकरणम् २२३ श्रोतुः स्यादुपदेशश्चेदर्थवत्त्वं *तथा भवेत् । अध्यक्षस्य न चेदिष्टं श्रोतृत्वं कस्य तद्भवेत् ॥१११॥ श्रोतुरिति—उपदेश, श्रोता को किये जाने पर ही सार्थक हो सकता है। यदि कूटस्थ साक्षी आत्मा में श्रोतृत्व न स्वीकार किया जाय तो वह और किसका हो सकता है ? ॥ १११ ॥ अध्यक्षस्य समीपे स्याद्बुद्धेरेवेति चेन्मतम् । न तत्कृतोपकारोऽस्ति काष्ठाद्यद्वन्न कल्प्यते ॥११२॥ अध्यक्षेति— यह कहें कि साक्षी के सन्निध रहने से 'बुद्धि' में ही श्रोतृत्व की कल्पना की जा सकती है किन्तु यह कथन उचित न होगा, क्योंकि जिस प्रकार काष्ठ के समीप रहने से 'बुद्धि' का कोई उपकार नहीं होता, उसी प्रकार 'साक्षी' के द्वारा भी कोई उपकार नहीं हो सकता ॥ ११२ ॥ हृदयस्पर्शिनी अध्यक्ष के लिये उपदेश को न मानने पर भी उसकी (उपदेश की) व्यर्थता कैसे हो सकती है ? हम, साक्षी का सान्निध्य होने से बुद्धि में ही श्रोतृत्व कहेंगे । इस प्रकार शंका करने पर शंका करनेवाले से यह पूछ सकते हैं कि बुद्धि का श्रोतृत्व, क्या अध्यक्ष की सन्निधि की सत्तामात्र की अपेक्षा करता है ? या उसके द्वारा किये गये उपकार की अपेक्षा करता है ? प्रथम पक्ष तो इसलिए ठीक नहीं कि सन्निहित रहनेवाले अध्यक्ष के द्वारा किया गया उपकाररूप कोई अतिशय बुद्धि में नहीं दिखाई देता । जिस प्रकार काष्ठ आदि की सन्निधि से बुद्धि का कोई उपकार नहीं होता है, उसी प्रकार साक्षी के द्वारा भी बुद्धि का कोई उपकार नहीं होता है ॥ ११२ ॥ बुद्धौ चेत्कृतः कश्चिन्नन्वेवं परिणामिता । आभासेऽपि च को दोषः सति श्रुत्याद्यनुग्रहे ॥११३॥ बुद्धाविति—यदि यह कहें कि 'साक्षी' के द्वारा 'बुद्धि' में कोई विशेषता उत्पन्न हो जाती है, तो 'साक्षी' को परिणामी कहना होगा । अतः श्रुतिप्रमाण के अनुरोध से 'चिदाभास' के स्वीकारने में क्या हानि है ? ॥ ११३ ॥ हृदयस्पर्शिनी द्वितीय पक्ष में भी दोष देते हैं। यदि यह कहें कि साक्षी के द्वारा बुद्धि में कोई विशेषता उत्पन्न होती है, अतः आभास स्वीकार करने की कोई आवश्यकता नहीं। किन्तु ऐसा कहने पर अध्यक्ष को परिणामी कहना होगा । ऐसी परिस्थिति में श्रुति प्रमाण का अवलम्ब कर 'चिदाभास' ही क्यों न माना जाय ? क्योंकि आभास पक्ष निर्दुष्ट है, अतः वही उपादेय है। अथवा अध्यक्ष की परिणामिता भी मान ली जाय तो भी श्रुतिप्रमाण से सिद्ध आभास को मान लेने में भी तुम्हारी कौन-सी हानि है ? ॥ ११३ ॥ आभासे परिणामश्चेन्न रज्ज्वादिन्निभत्ववत् । सर्पादिश्च तथाऽवोचमादर्शं च मुखत्ववत् ॥११४॥ आभासे इति—यदि यह कहें कि 'चिदाभास' को स्वीकार करने पर भी 'आत्मा' का परिणामित्व सिद्ध होता है, किन्तु यह कहना ठीक नहीं है, क्योंकि रज्जु आदि की समानता से जैसे सर्प आदि की कल्पना की जाती है, उसी तरह तथा आदर्श (शीशे) में मुख के प्रतिबिम्ब के समान उसे मिथ्या बता चुके हैं ॥ ११४ ॥ १. 'रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव' — (बृ. उ. २।५।१९ तथा कठ. उ. ५।९।१०) और 'एकधा बहुधा चैव दृश्यते जलचन्द्रवत् — (ब्रह्म बिन्दु उ. १२)

  • तदा०—पाठान्तरम् ।