भारतकोश
उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा

स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished364 पृष्ठ

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तत्त्वमसिप्रकरणम् २३३ अनुभविता भी अनुभवात्मक ज्ञानरूप ही है अर्थात् अनुभूतिरूप ही है । उसके पृथक् होने में कोई प्रमाण नहीं है ।। १४१ ।। अभिन्नोऽपि हि बुद्ध्यात्मा विपर्यासितदर्शनैः । ग्राह्यग्राहकसंवित्तिभेदवानिव लक्ष्यते ॥१४२॥ अभिन्न इति- यद्यपि विज्ञानात्मा अभिन्न ही है, तथापि भ्रान्त हुए पुरुषों को वह ग्राह्य-ग्राहक और ग्रहण के रूप में भेदवान्-सा दिखाई पड़ता है ।। १४२ ।। हृदयस्पर्शिनी इसपर यदि कहें कि अनुभूति, अनुभविता और अनुभव्य ये भेददर्शन क्यों होता है ? ऐसी शंका करते पर वह कहता है कि विज्ञानरूप आत्मा विज्ञान से अभिन्न ही है, उससे भिन्न नहीं है अर्थात् विज्ञान और आत्मा एक ही है । किन्तु जिनकी दृष्टि विपरीत है अर्थात् जिनकी बुद्धि में भ्रम हो गया है, वे लोग¹ उसे ग्राह्य, ग्राहक, ग्रहण (संवित्ति-ज्ञान) इन भेदों से युक्त हुआ-सा समझते हैं ।। १४२ ।। भूतिर्येषां क्रिया सैव कारकं सैव चोच्यते । सत्त्वं नाशित्वमस्याश्चेत् सकर्तृत्वं तथेष्यताम् ॥१४३॥ भूतिरिति-जो लोग 'अनुभूति' को ही क्रिया और कारण भी मानते हैं, उनके अनुसार यदि उसकी सत्ता और विनाश हैं, तो उसका सकर्तृत्व भी उन्हें स्वीकार करना चाहिये ।। १४३ ।। हृदयस्पर्शिनी सिद्धान्ती के द्वारा उक्त मत का खण्डन किया जा रहा है- बुद्धि में कारकत्व का स्वीकार न करने के कारण उसे कर्ता आदि की अपेक्षा नहीं है। जिनके मत में अनुभूति ही क्रिया है और वही कारक भी है,² उनके सिद्धान्त के अनुसार यदि उसकी सत्ता (स्वरूपसत्ता) और विनाश है, तो उसी प्रकार उसका सकर्तृत्व भी उन्हें स्वीकार करना चाहिए। क्योंकि वहां अनुभव का भी सद्भाव है ही। क्षणभंगुर (विनाशी) होने के कारण विरम्य (रुक-रुककर) व्यापार तो होगा नहीं³, अतः उनके मत में उसे अपने से अतिरिक्त किसकी अपेक्षा होगी⁴ ? ।। १४३ ।। १. श्लोक सं० १४२ का द्वितीयपाद "विपर्यासितदर्शनैः" दिया गया है। उसीको बृहदारण्यवार्तिक ४।३।४७६ में "विपर्या- सितबुद्धिभिः" कर दिया है। उसकी टीका में आनन्दज्ञान ने उसे 'कीर्ति' का वाक्य बताया है। श्लोकवार्तिक के शून्यवाद की १६ वीं कारिका के न्यायरत्नाकर में तथा सर्वदर्शनसंग्रह के बौद्धदर्शन में भी यह कारिका कुछ पाठान्तर के रूप में उपलब्ध होती है। दोनों में प्रथम पाद "अविभागोऽपि बुद्ध्यात्मा" दिया गया है। वाचस्पति मिश्र ने भी इस कारिका को योग सूत्र ४।२३ की तत्त्ववैशारदी में उद्धृत किया है। वहीं पर वार्तिककार ने भी "विपर्यासिति दर्शने" इस पाठान्तर के रूप में उसे उद्धृत किया है। २. "क्षणिकाः सर्वं संस्काराः अस्थिराणां कुतः क्रियाः । भूतिर्येषां क्रिया सैव कारकं सैव चोच्यते ।।" बृहदारण्यकोपनिषद्वातिक ४।३।४९४ की टीका में आनन्दज्ञान ने कर्तृ नाम का निर्देश किये बिना ही इस संपूर्ण कारिका को दिया है। वार्तिककार ने भी ४।३।५८६ श्लोक में प्रथम पाद के द्वारा उसे वैसे ही उद्धृत किया है। इस कारिका के द्वितीयार्ध को वाचस्पति मिश्र ने ब्रह्मसूत्र २।२।२० की भामती में तथा योगसूत्र ४।२० की तत्त्ववैशारदी में वैसा ही रखा है। सुरेश्वराचार्य ने धर्मकीर्ति का साक्षात् नामनिर्देश भी बृहदारण्यकवार्तिक ४।३।७५३ श्लोक में किया है। उक्त कारिका के प्रथमार्ध को तन्त्रवार्तिक १।३।१० में एकवचनान्त के रूप में पाठभेद कर के उद्धृत किया है। प्रज्ञाकरमति-विरचित बोधि- चर्यावतार पञ्जिका ९।६ में सम्पूर्ण कारिका दी गई है। ३. 'शब्दबुद्धिकर्मणां विरम्य व्यापाराभावात्'- यह न्याय है। इस न्याय का अर्थ यह है कि एक ज्ञान कराकर शब्द, विरतव्यापार हो जाता है, वह पुनः दूसरा शाब्दबोध नहीं कराता। उसी तरह बुद्धि भी एक पदार्थ में ज्ञातता अथवा संस्कार पैदा कर पुनः ३०

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