भारतकोश
उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा

स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished364 पृष्ठ

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पृष्ठ 260

२३४ उपदेशसाहस्री न कश्चिच्चेष्यते धर्म इति चेत्पक्षहानता। नन्वस्तित्वादयो धर्मा नास्तित्वादिनिवृत्तयः। न भूतेस्तर्हि नाशित्वं स्वालक्षण्यं मतं हि ते ॥१४४॥ नेति—यदि उसका कोई धर्म तुम्हें अभिमत नहीं है तो तुम्हारे पक्ष की हानि होती है। उस पर बौद्ध कहता है—'अस्तित्वादि धर्म' तो 'नास्तित्वादि धर्म' की निवृत्ति ही हैं। उस पर सिद्धान्ती कहता है—तब तो तुम्हारे कथनानुसार 'क्षणिकत्वादि' को अनुभूति का लक्षण नहीं कह सकते ॥ १४४ ॥ हृदयस्पार्शिनी यदि उसका सत्त्वादि कोई भी धर्म अभीष्ट नहीं है जो क्षणिकत्व पक्ष का ही भंग हो जाता है। इसपर यदि बौद्ध कहे कि हम लोग विज्ञान का क्षणिकत्वादि कोई धर्म नहीं मानते, किन्तु अक्षणिकत्वाद्यपोहरूप ही हमारा क्षणिकत्व है अर्थात् अस्तित्वादि धर्म तो नास्तित्व की निवृत्तिमात्र ही है। उस पर सिद्धान्ती कहता है कि तब तो अनु- भूति का विनाशित्व सिद्ध नहीं हो सकेगा। क्योंकि तुम्हारे मत में अनुभूति की स्वलक्षणता (स्वालक्षण्य) मानी गई है। स्वेनैव लक्ष्यते ज्ञायते इति स्वलक्षणं, तस्य भावः स्वालक्षण्यम् अर्थात् निर्विकल्पमात्रम्। उसका फल यह होगा कि सविकल्पता होने से, अक्षणिकत्व के न रहने से, नाशित्व-अज्ञत्व आदि की व्यावृत्ति होने से और अनुभूति, सविकल्पज्ञान की गोचर (विषय) न होने से सत्त्व-नाशवत्त्वादि धर्म की सिद्धि नहीं हो पायेगी। अर्थात् तुम्हारे सिद्धान्त के अनुसार क्षणिकत्वादि को अनुभूति का लक्षण नहीं कहा जा सकेगा ॥ १४४ ॥ स्वलक्षणावधिर्नाशोनाशोऽनाशनिवृत्तिता । अगोरसत्त्वं गोत्वं ते न तु तद्गोत्वलक्षणम् ॥१४५॥ स्वलक्षणेति—स्वलक्षण हो (स्व-स्वरूप हो) जिसकी अवधि है, उसे 'नाश' कहते हैं। किन्तु तुम्हारे मत में तो 'अनाश' की निवृत्ति को 'नाश' कहते हैं। और 'गोत्व' से भिन्न (अश्वत्व आदि) का अभाव ही 'गोत्व' है। गौ के लक्षणों से युक्त 'गौ' नहीं है ॥ १४५ ॥ हृदयस्पार्शिनी स्वरूपमात्र को ही स्वलक्षण कहते हैं। वह स्वलक्षण ही जिसकी अवधि है, उसे नाश कहते हैं। नष्ट होनेवाला कार्य निरवधि अर्थात् बिना अपनी अवधि के नष्ट नहीं होता, क्योंकि इदमत्र नास्ति—यह वस्तु यहाँ नहीं है, अमुक वस्तु अब नहीं है, नष्ट हो चुकी है, इस प्रकार नाश के विषय में लोकव्यवहार हुआ करता है। अतः विनाश का अवधिभूत कोई अविनाशी, अनुत्पन्न एवं स्वतःसिद्ध पदार्थ स्वीकार करना ही होगा। अतएव कहा गया है कि स्वलक्षण ही जिसकी अवधि है, उसे नाश कहते हैं। स्वरूपमेव लक्षणं प्रमाणं धर्मो वा यस्य सः—स्वलक्षणः, सः अवधिः सीमा यस्य विनाशस्य सः इति विग्रहः। एवं च तुम्हारे मत में आविर्भाव, तिरोभाव का अवधिभूत कोई स्थिर पदार्थ न होने से सत्त्व और विनाश दोनों की सिद्धि नहीं होगी। दूसरी बात यह है कि अपोह पक्ष में अन्योन्याश्रय दोष प्रसक्त होगा। जैसे—नाश के सिद्ध होनेपर उसके विरोधी अनाश की सिद्धि और अनाश के सिद्ध होने पर उसके वही बुद्धि अन्य ज्ञातता या अन्य संस्कार को पैदा नहीं करती। उसी प्रकार कर्म भी एकत्र विभाग को पैदा कर विभागान्तर को पुनः पैदा नहीं करता। ४. योगसूत्र ४।२० के भाष्य में कहा है कि "क्षणिकवादिनः यद्भवन्, सैव क्रिया, तदेव च कारकं—इत्यभ्युपगमः। ""क्षणिक- वादी के मत में वस्तु की जो उत्पत्ति है, वही क्रिया (कार्य) है और वही उसका कर्त्रादिकारक वर्ग है। इसके मत में समस्त वस्तु का उत्पत्तिमात्र फल है, और वह निर्हेतुक अर्थात् स्वयमेव होता है, यह क्षणिकवादी का सिद्धान्त है" ऐसा वार्तिक में लिखा है।