उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)
Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary
आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा
स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंतत्त्वमसिप्रकरणम् २३५ अपोहरूप नाश की सिद्धि होना यही अन्योऽन्याश्रय दोष का स्वरूप है। ‘सामान्य’ (जाति) का स्वीकार न करते हुए बौद्ध ने ‘अगोव्यावृत्तिः’ गोलक्षणम् स्वीकार किया है, अर्थात् ‘तद्भिन्न-भिन्नत्वरूप अपोह’ को माना है। वह भी ठीक नहीं है, क्योंकि उसमें भी वैसा ही अन्योन्याश्रय दोष स्थित है। ‘गो’ से अन्य अश्वत्वादि ही अगोपद के अभिधेय होंगे, उनका असत्त्व (निवृत्ति अर्थात् अभाव) ही ‘गोत्व’ है, यह तुम्हारा मत है, तदनुसार ‘गोभिन्न-भिन्नत्व’ ही गोत्व है अर्थात् ‘गो’ का लक्षण है, यह सिद्ध होता है। उसी तरह ‘अश्व’ का लक्षण भी गोत्वव्यावृत्तिरूप रहने से परस्परसापेक्षता रूप अन्योन्याश्रयदोष रहता है। किन्तु हमारे मत में ‘गो’ के लक्षणों से युक्त होना ही ‘गो’ का लक्षण है, अतः हमारे मत में कोई दोष नहीं है ॥ १४५ ॥ क्षणवाच्योऽपि योऽर्थः स्यात्सोऽप्यन्याभाव एव ते ॥१४६॥ क्षणवाच्योऽपीति—जो पदार्थ ‘क्षण’ शब्द का वाच्य है, वह भी तुम्हारे मत के अनुसार क्षणिकाभाव (अन्याभाव अर्थात् अक्षण का अभाव) रूप ही होगा। अतः क्षणिकताविरोधी ‘स्थिर पदार्थ’ (अक्षणिकता) को भी तुमने स्वीकार कर लिया, यह कहा जायगा ॥ १४६ ॥ भेदाभावेऽप्यभावस्य भेदो नामभिरिष्यते । नामभेदैरनेकत्वमेकस्य स्यात्कथं तव ॥१४७॥ भेदेति—बौद्ध का कहना है कि ‘अभाव’ में भेद का अभाव रहने पर भी नामों के कारण उसका भेद माना जाता है, किन्तु तुम्हारे मत के अनुसार नामभेद के कारण एक ही वस्तु का अनेकत्व कैसे हो सकेगा ? ॥ १४७॥ हृदयस्पर्शिनी इस पर बौद्ध पुनः शंका करता है कि हमने अभाव को सत् की निवृत्तिरूप नहीं माना है। यदि वैसा मानते तो आपका अतिप्रसंग देना उचित होता। हम तो ‘निरुपाख्य’ को ही अन्यव्यावृत्ति के रूप में कहते हैं। अभाव में भेद का अभाव होने पर भी (स्वरूपतः भेदाभाव के रहने पर भी) अगोत्व ही अश्वत्व है, अनश्वत्व ही गोत्व है इत्यादि नामों (संज्ञाओं) के कारण ही स्वरूपभेद माना जाता है। इसपर सिद्धान्ती दोष दे रहा है कि तुम्हारे मत से नामभेद के कारण एक ही वस्तु का अनेकत्व कैसे हो सकता है ? अर्थात् निःस्वभाव वाले एक ही अभाव का निरर्थक भिन्न-भिन्न संज्ञाओं (नामभेदों) से समान रूप से अनेक पदार्थों की व्यावृत्ति के रूप में अनेकत्व कैसे संगत हो सकता है ? ॥ १४७ ॥ अपोहो यदि भिन्नानां वृत्तिस्तस्य कथं गवि । नाऽभावा भेदकाः सर्वे विशेषा वा कथंचन ॥१४८॥ अपोह इति—दूसरी बात यह है कि ‘अपोह’ शब्द का अर्थ क्या है ? ‘भिन्न पदार्थों का व्यावर्तन’ है, या ‘अभिन्न पदार्थों का व्यावर्तन, ? यदि प्रथम पक्ष का नाम ‘अपोह’ है, तो उस अगोत्वाभाव की ‘गोव्यक्ति’ में किस प्रकार वृत्ति हो सकती है ? और द्वितीय पक्ष का नाम ‘अपोह’ है, तो सभी अभाव किसी प्रकार भी भेदक (व्यावृत्तिबोधक) अथवा विशेष (भावरूप) नहीं हो सकते ॥ १४८ ॥ हृदयस्पर्शिनी सिद्धान्ती पूछता है कि ‘अपोह’ का अर्थ भिन्न पदार्थों की व्यावृत्ति है या अभिन्न पदार्थों की व्यावृत्ति है ? यदि भिन्न पदार्थों की व्यावृत्ति को ‘अपोह’ मानते हो तो किसी शब्द का अर्थ उसके प्रतियोगी का अभाव ही है तो ‘गो’ शब्द से अगोत्व का अभाव ही समझना चाहिए। ‘गो’ शब्द से भिन्न-भिन्न वस्तुओं की व्यावृत्ति होती है तो अनन्त (अगणित) प्रतियोगी होने के कारण अगोत्वाभाव की वृत्ति ‘गो’ व्यक्ति में नहीं हो सकती। क्योंकि भेद के अनन्त प्रतियोगियों का ज्ञान हुए बिना उनके अपोह का ज्ञान होना संभव नहीं। उस स्थिति में वह अपोह ‘गो’ में कैसे रहेगा ? अपोह के न रह सकने पर किसी का भी अभाव कहीं भी सुलभ रहने से व्यवहार अनियमित हो जायगा। निष्कर्ष यह हुआ कि अगोत्वाभाव की गोव्यक्ति में वृत्ति न हो सकने से भिन्न वस्तुओं की व्यावृत्ति को अपोह नहीं कह सकते। अब