भारतकोश
उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा

स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished364 पृष्ठ

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२३६ उपदेशसाहस्री यदि द्वितीय पक्ष अर्थात् अभिन्न वस्तु की व्यावृत्ति को अपोह कहें तो सभी अभाव किसी प्रकार भी भेदक (व्यावृत्ति- बुद्धिजनक) अथवा विशेष (भावरूप) नहीं हो सकते। अभिप्राय यह है कि यदि अजत्व, अश्वत्वादिरूप किसी अभिन्न वस्तु की व्यावृत्ति ही अगोत्वाभाव है तो भेद्य और भेदक का भेद निश्चित न होने के कारण उससे न तो गो के साथ अन्योन्याभावरूप बुद्धि की ही उत्पत्ति हो सकती है और न वे किसी भावरूप खण्ड-मुण्डादि पदार्थ के ही बोधक हो सकते हैं ।। १४८ ।। नामजात्यादयो यद्वत्संविदस्तेऽविशेषतः ।।१४९।। नामेति - तुम्हारे सिद्धान्त के अनुसार जैसे निर्विशेष होने के कारण 'नाम' एवं 'जाति' आदि, 'विज्ञान' के विशेषण नहीं हो सकते, उसी तरह 'अगोत्वाभाव' अथवा 'खण्ड, मुण्डादि' भी 'गो' के विशेषण नहीं हो सकेंगे ।। १४९ ।। हृदयस्पर्शिनी अपोहवाद में 'खण्डा गौः' 'नीलमुत्पलम्' आदि विशिष्ट व्यवहार नहीं बन सकेगा। उसी तरह 'इयं गौः', इत्यादि असाधारण स्वरूपव्यवहार भी नहीं बन सकेगा। अतः अपोह को न मानना ही समुचित है। बौद्ध के मत में जिस प्रकार संविद् (विज्ञान) के निर्विशेष होने के कारण नाम, जाति आदि उस विज्ञान के विशेषण नहीं हुआ करते, उसी प्रकार अगोत्वाभाव अथवा खण्ड-मुण्डादि भी 'गो' के विशेषण नहीं होंगे, तब विशिष्ट व्यवहार का लोप ही हो जायगा, जिससे बौद्ध को जीना भी कठिन होगा ।। १४९ ।। प्रत्यक्षमनुमानं *च व्यवहारे यदिच्छसि । क्रियाकारकभेदैस्तदभ्युपेयं ध्रुवं भवेत् ।।१५०।। प्रत्यक्षमिति-सिद्धान्ती का कहना है कि तुमने प्रत्यक्ष और अनुमान प्रमाणों का जैसे स्वीकार किया है, वैसे ही क्रिया-कारक रूपभेद के सहित ही उन दोनों को अवश्य स्वीकार करना होगा ।। १५० ।। हृदयस्पर्शिनी प्रत्यक्ष और अनुमान इन दो प्रमाणों को तो बौद्ध स्वीकार करते हैं, किन्तु क्रिया-कारकरूप भेद को नहीं १ मानते। वस्तुतः इन दो प्रमाणों के द्वारा क्रिया-कारकरूप भेद का ही ज्ञान होता है। अतः विज्ञान में क्रिया-कारकरूप भेद नहीं है-यह बौद्ध कथन नितान्त अनुचित है। बौद्ध यदि लोकव्यवहार में प्रत्यक्ष, और अनुमान प्रमाण का स्वीकार करता है, तो उन्हें निश्चित रूप से क्रिया-कारकभेद के साथ ही विज्ञान का स्वीकार करना होगा ।। १५० ।। तस्मान्नीलं तथा पीतं घटादिर्वा विशेषणम् । संविदस्तदुपैयं स्याद्येन चाप्यनुभूयते ।।१५१।। तस्मादिति-इसलिये नील, पीत, घट आदि को अपने अभिमत 'विज्ञान' के विशेषण रूप में मानना ही होगा। उसी तरह उसके अनुभव करने वाले 'ज्ञाता' का भी स्वीकार करना होगा ।। १५१ ।। हृदयस्पर्शिनी संवेदन (विज्ञान) के अतिरिक्त वेद्य, वेत्ता के स्वरूप को स्वीकार करने की इच्छा न रहने पर भी उसे तुम्हें (बौद्ध को) हठात् (जबरदस्ती) स्वीकार करना होगा। अर्थात् नील, पीत, घट आदि को विज्ञान का विशेषण स्वीकार करना ही होगा। और जिसके द्वारा उनका अनुभव किया जाता है, उस अनुभवकर्ता ज्ञाता का भी स्वीकार करना होगा। अतः बौद्ध अपना हठ छोड़ दे, और हमारे कथन का स्वीकार कर ले ।। १५१ ।। रूपादीनां यथाऽन्यः स्याद्ग्राह्यत्वादग्राहकस्तथा । †प्रत्ययस्य तथाऽन्यः स्याद्व्यञ्जकत्वात्प्रदीपवत् ।।१५२।। १. ( "भूतिर्येषां क्रिया सैव"-उ. सा. १८।१४३ )

  • वा०-पाठान्तरम् + पाठान्तरम् । † प्रत्ययस्तथान्यः-पाठान्तरम् ।