उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)
Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary
आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा
स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंतत्त्वमसिप्रकरणम् २३७ रूपेति—'रूप' आदि ग्राह्य पदार्थ हैं, अतः उनका कोई अन्य ग्राहक भी माना जाता है, तथा 'प्रत्यय' भी ग्राह्य होता है, अतः उसका भी कोई अन्य ग्राहक होता है। उसी प्रकार दीपक के तुल्य प्रकाशक होने के कारण ग्राहक की सत्ता को 'ग्राह्य' पदार्थ से भिन्न मानना ही होगा ॥ १५२ ॥ हृदयस्पर्शिनी अब संवित्साक्षी में अनुमान प्रमाण बताते हैं। बौद्धों के समक्ष तो अनुमान प्रयोग इस प्रकार करना होगा— 'यद्ग्राह्यं, तत्स्वान्यग्राह्यं, यथा रूपादि, ग्राह्या च संवित्' उसी तरह 'अवभासकः अवभास्यादन्यः, व्यञ्जकत्वात्, घटादेः प्रदीपवत्'– यह अनुमान प्रयोग आस्तिकों के समक्ष करना होगा । जैसे रूप आदि पदार्थों की ग्राह्यता होने से उनका ग्राहक कोई अन्य होता है, उसी तरह दीपक के समान प्रकाशक होने के कारण ग्राहक की सत्ता, ग्राह्य से पृथक् ही माननी चाहिए । प्रत्यय, ग्राह्य होने से उसका ग्राहक कोई अन्य होगा, उसी तरह ग्राहक भी ग्राह्य से कोई अन्य होगा ॥ १५२ ॥ अध्यक्षस्य दृशेः कीदृक्संबन्धः संभविष्यति । अध्यक्ष्येण तु दृश्येन मुक्त्वाऽन्यो द्रष्टृदृश्यताम् ॥१५३॥ अध्यक्षस्येति—साक्षी से सम्बन्धित प्रत्ययवर्ग के साथ 'द्रष्टा आत्मा' का 'द्रष्टृ-दृश्यत्व' सम्बन्ध के अतिरिक्त अन्य कौन सम्बन्ध हो सकता है ? ॥ १५३ ॥ हृदयस्पर्शिनी अब प्रत्ययवर्ग और अध्यक्ष (साक्षी) का सम्बन्ध बताते हैं। द्रष्टा और दृश्य का सम्बन्ध मान लेने पर आभास को तो मानना ही होगा। प्रत्यय (अध्यक्ष्य) के साथ आत्मा (दृशि) का सम्बन्ध पारमार्थिक है, या अपार- मार्थिक ? प्रथम विकल्प मानने पर दृशि में परिणामादि विकार का प्रसंग प्राप्त होगा । अतः यह प्रथम पक्ष सावद्य (निन्दित) है। तात्पर्य यह कि साक्षी से सम्बन्धित प्रत्ययवर्ग के साथ द्रष्टा आत्मा का द्रष्टृ-दृश्यत्वरूप सम्बन्ध को छोड़कर अन्य कौन-सा सम्बन्ध हो सकता है ? ॥ १५३ ॥ अध्यक्षेण कृता दृष्टिर्दृश्यं व्याप्नोत्यथाऽपि वा । नित्याध्यक्षकृतः कश्चिदुपकारो भवेद्धियाम् ॥१५४॥ अध्यक्षेणेति—द्रष्टा की दृष्टि, 'दृश्य' को व्याप्त करतो है या नहीं ? नित्य साक्षी के द्वारा 'बुद्धि' का कोई उपकार तो होना ही चाहिये । 'साक्ष्य' के साथ 'साक्षी' का सम्बन्ध पारमार्थिक है या अपारमार्थिक है ? इस विकल्प में आचार्य, द्वितीय पक्ष का स्वीकार करते हैं ॥ १५४ ॥ हृदयस्पर्शिनी द्रष्टा (अध्यक्ष) की दृष्टि, दृश्य को व्याप्त करती है या नहीं ? जो नित्य साक्षी है, उसके द्वारा बुद्धि पर कोई उपकार तो होना ही चाहिए ॥ १५४ ॥ स चोक्तस्तन्निभत्वं प्राक्संव्याप्तिश्च घटादिषु । यथाऽऽलोकादिसंव्याप्तिर्व्यञ्जकत्वाद्धियस्तथा ॥१५५॥ स चेति—साक्षीकृत बुद्धि के उपकार का वर्णन मुखाभास का दृष्टान्त देकर किया जा चुका है। जिस प्रकार घट आदि में प्रकाश आदि की व्याप्ति होती है, उसी प्रकार अभिव्यञ्जक होने के कारण उसमें बुद्धि की भी व्याप्ति होती है ॥ १५५ ॥ हृदयस्पर्शिनी उस नित्य अध्यक्ष साक्षी के द्वारा बुद्धि पर किये गये उपकार (चिन्निभत्व = चित् की समानता) का वर्णन, पहले मुख-प्रतिबिम्ब के दृष्टान्त से किया जा चुका है। उसी प्रतिबिम्ब (आभास) के द्वारा आत्मा का दृश्य (बाह्य