उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)
Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary
आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा
स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२३८ उपदेशसाहस्री विषय) के साथ सम्बन्ध बताने के लिये बुद्धि की विषयव्याप्ति को दृष्टान्त देकर बताते हैं—जिस प्रकार घट-पटादि में प्रकाशादि की व्याप्ति होती है, उसी प्रकार अभिव्यञ्जक होने के कारण उन दृश्य बाह्य पदार्थों में (घटादि में) बुद्धि की भी व्याप्ति होती है ॥ १५५ ॥ आलोकस्थो घटो यद्वद्बुद्धयारूढो भवेत्तथा । धीव्याप्तिः स्याद्घटारोहो धियो व्याप्तौ क्रमो भवेत् ॥१५६॥ आलोकस्थ इति—प्रकाश स्थित घट जैसे 'बुद्धि' में आरूढ़ होता है, वैसे ही बुद्धिनिष्ठ घट भी बुद्धि में आरूढ़ होता है। बुद्धि के द्वारा घट की व्याप्ति ही 'घटारोह' है। किन्तु बुद्धि की व्याप्ति में क्रम रहता है, और आत्मव्याप्ति में कोई क्रम नहीं रहता ॥ १५६ ॥ हृदयस्पर्शिनी उपर्युक्त बात को ही अधिक स्पष्ट कर रहे हैं। जैसे आलोकनिविष्ट (प्रकाशस्थित) घट आलोकारूढ़ होता है, वैसे ही बुद्धिनिविष्ट (बुद्धिनिष्ठ—स्थित) घट भी बुद्ध्यारूढ़ होता है। यहाँ पर 'आरूढ़' का अर्थ अश्व और अश्वारोही के समान आधाराधेयभाव नहीं है। यहाँ तो बुद्धि के द्वारा घट की व्याप्ति ही घटारोह है। यदि विषय- व्याप्तिमात्र ही बुद्धि की विषयव्यञ्जकता है, तो आत्मा और बुद्धि दोनों में अन्तर क्या है ? उत्तर यही होगा कि बुद्धि की व्याप्ति में क्रम रहता है और आत्मव्याप्ति में कोई क्रम नहीं रहता ॥ १५६ ॥ *पूर्वा स्यात्प्रत्ययव्याप्तिस्ततोऽनुग्रह आत्मनः । कृत्स्नाध्यक्षस्य नो युक्तः कालाकाशादिवत्क्रमः ॥१५७॥ पूर्वमिति—'विषय' में 'बुद्धि' की व्याप्ति प्रथम होती है, और उसके पश्चात् 'आत्मा' का अनुग्रह होता है । किन्तु काल और आकाश आदि के समान व्यापक आत्मा की व्याप्ति में कोई क्रम नहीं होता ॥ १५७ ॥ हृदयस्पर्शिनी प्रथमतः विषय में बुद्धि की व्याप्ति होती है। तदनन्तर आत्मा का अनुग्रह होता है। अर्थात् बुद्धि जब विषयाकार हो जाती है, तब उस आकार में आत्मा का प्रतिबिम्ब पड़ता है। उसके बल पर बुद्धि, विषय को अभिव्यक्त कर पाती है। इस रीति से बुद्धि में क्रमशः द्रष्टृत्व और अन्यशेषत्व सिद्ध होता है । एवंच बुद्धि की विषय में व्याप्ति क्रमशः होती है । किन्तु काल और आकाशादि के समान व्यापक आत्मा की व्याप्ति में कोई क्रम नहीं है। निष्कर्ष यह है कि प्रत्येक विषय (अर्थ) के प्रति बुद्धि के भिन्न-भिन्न परिणाम होकर वह विषय की अभिव्यंजक हुआ करती है, अतः क्रम तो बुद्धि का ही मानना उचित होगा। सर्वत्र अनुगतप्रकाशरूप अपरिच्छिन्न आत्मा का क्रम मानना उचित नहीं है ॥ १५७ ॥ विषयग्रहणं यस्य †कारणापेक्षया भवेत् । सत्येव ग्राह्यशेषे च परिणामी स चित्तवत् ॥१५८॥ विषयेति—किन्तु 'बुद्धि' के समान 'आत्मा' परिणामी नहीं है। क्योंकि ग्राह्य विषय के अवशिष्ट रहते हुए जिसे 'कारक' की अपेक्षा से 'विषय' का ग्रहण होता है, वह पदार्थ 'चित्त' के समान परिणामी होता है ॥ १५८ ॥ हृदयस्पर्शिनी यदि कोई कहे कि भोग्य विषय का अवभासक होने से बुद्धि की तरह अध्यक्ष (साक्षी आत्मा) का भी परिणाम होगा, तो उसका उत्तर यह है कि बुद्धि की तरह आत्मा परिणामी नहीं है। क्योंकि अपने से असंसृष्ट ग्राह्य विषय के अवशिष्ट रहते हुए जो कर्तादि कारकों की अपेक्षा करके विषय का ग्रहण कर पाता है, वह पदार्थ चित्त के समान परिणामी कहा जाता है। आत्मा को जो विषयावभास होता है, वह इस रीति से नहीं होता,
- पूर्वं०—पाठान्तरम् । † करणा०—पाठान्तरम् ।