भारतकोश
उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा

स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished364 पृष्ठ

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२३२ -उपदेशसाहस्री सिद्धि होती है। ज्ञातता (ज्ञानवत्ता) को ही सिद्धि कहने के पक्ष में “तस्यैवाज्ञत्वमिष्टं चेत्”-(१८।१३५) इस पूर्व श्लोक में जो विकल्पदूषणप्रसर प्रदर्शित किया गया है, उसका निवारण नहीं हो पायगा ॥ १३८ ॥ स्पष्टत्वं कर्मकर्त्रादेः सिद्धिता यदि कल्प्यते । स्पष्टताऽस्पष्टते स्यातामन्यस्यैव न चाऽऽत्मनः ॥ १३९॥ स्पष्टत्वमिति-ज्ञातता और स्वरूपलाभ के अतिरिक्त भाट्टमतानुयायी विद्वान् 'स्पष्टता' को भी 'सिद्धि' शब्द से कहते हैं, किन्तु भगवान् भाष्यकार उसका खण्डन कर रहे हैं- यदि कर्ता, कर्म आदि की स्पष्टता को सिद्धि शब्द से कहें तो वह स्पष्टता-अस्पष्टता, जड़ पदार्थों की ही हो सकेगी, चेतन आत्मा की नहीं होगी ॥ १३९ ॥ हृदयस्पर्शिनी इस पर भाट्ट पक्ष की ओर से यह आशंका हो सकती है कि ज्ञातता तो आत्मलाभ (स्वरूपलाभ) के अतिरिक्त भी हो सकती है किन्तु स्पष्टता तो 'सिद्धि' ही है, अतः पक्षान्तर को अप्रसिद्ध नहीं कह सकते। इस आशंका का समाधान यह है कि यदि कर्त्ता, कर्म आदि की स्पष्टता को ही सिद्धि कहा जाय तो वह स्पष्टता-अस्पष्टता भी चिदाभासजनन के कारण कर्त्रादिविलक्षण किसी अन्य साक्षी की ही होगी, अर्थात् जड़ पदार्थ की ही होगी, आत्मा की नहीं, क्योंकि कर्त्रादिस्वरूप तो जड़ होता है ॥ १३९ ॥ अद्रष्टुर्नेव चान्धस्य स्पष्टीभावो घटस्य तु । कर्त्रादेः स्पष्टतेष्टा चेद्द्रष्टृताऽध्यक्षकर्तृका ॥१४०॥ अद्रष्टुरिति-देखने में असमर्थ अन्ध व्यक्ति को 'घट' की स्पष्टता नहीं हो सकती। यदि कर्त्ता आदि की स्पष्टता अभीष्ट हो तो 'द्रष्टृत्व' को कर्तृत्वादिशून्य साक्षी का कार्य मानना होगा ॥ १४० ॥ हृदयस्पर्शिनी इसी को व्यतिरेक प्रदर्शन से स्पष्ट कर रहे हैं-दर्शनशक्तिशून्य अन्धे पुरुष के प्रति घटादि विषय की स्पष्टता, भाट्टमत में ज्ञानविषयता के अतिरिक्त तो हो नहीं सकती। तब कर्ता आदि की स्पष्टता, प्राकट्यरूप इष्ट हो तो उससे विलक्षण अध्यक्षकर्तृक द्रष्टृता भाट्टमतानुयायी को अवश्य माननी होगी। अर्थात् द्रष्टृत्व (कर्तृत्ववादि से शून्य) को साक्षी का कार्य मानना होगा। तस्मात् कर्मादि जड़ पदार्थ की प्रकाशापरपर्याय स्पष्टता का संभव न रहने से 'सिद्धि' शब्द का अर्थ 'स्पष्टता' नहीं है। किन्तु ज्ञानविषयता ही सिद्धि शब्द का अर्थ है। अतः कर्त्रादिगत चित् के आभासन द्वारा उसके अधिष्ठानभूत चिदात्मा को प्रदीपादि दृष्टान्त से युक्त अनुमानादि विधिमुख प्रमाण से ही जानना चाहिये ॥ १४० ॥ अनुभूतेः किमन्यस्मिन् स्यात्तवाऽपेक्षया वद । अनुभवितरीष्टा स्यात् सोऽप्यनुभूतिरेव नः ॥१४१॥ अनुभूतेरिति-अनुभूति के विषय में कर्त्ता आदि किसी अन्य पदार्थ की अपेक्षा करने से तुम्हें क्या लाभ होगा ? उसे बताओ। यदि तुम्हें अनुभविता में ही अनुभूति को मानना इष्ट हो तो हमारे मतानुसार तो वह (अनुभविता) भी अनुभव रूप ही है ॥ १४१ ॥ हृदयस्पर्शिनी इसपर विज्ञानवादी बौद्ध कहता है कि कर्तृ-कर्मविहीन प्रत्यय ही अपनी महिमा से भासित होता है। अनुभूतिज्ञान के विषय में किसी अन्य कर्त्ता आदि की अपेक्षा क्यों कर रहे हो, उससे कौन-सा प्रयोजन सिद्ध होगा ? अर्थात् कोई प्रयोजन (फल) सिद्ध नहीं होगा। क्योंकि वह अनुभूतिज्ञान तो स्वप्रकाश है। यदि तुम्हें आश्रयभूत अनुभविता में ही अनुभूति अभीष्ट है, क्योंकि वह अनुभूति उस अनुभविता के अधीन होती है ऐसा कहो, तो हमारे सिद्धान्तानुसार वह