भारतकोश
उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा

स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished364 पृष्ठ

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पृष्ठ 257

तत्त्वमसिप्रकरणम् २३१ ज्ञातता स्वात्मलाभो वा सिद्धिः स्यादन्यदेव वा । ज्ञातत्वेऽनन्तरोक्तौ त्वं पक्षौ संस्मर्तुमर्हसि ॥१३६॥ ज्ञाततेति—अध्यक्ष ( साक्षी ) सिद्ध स्वरूप है, उसकी सिद्धि के लिये किसी अन्य प्रमाण की आवश्यकता नहीं है। अतः 'सिद्धि' शब्द से क्या विवक्षित है ? क्या 'सिद्धि' शब्द से ज्ञान अभिप्रेत है या स्वरूपलाभ ? अथवा कोई अन्य वस्तु ? यदि 'सिद्धि' शब्द से 'ज्ञान' अर्थ अभिप्रेत हो तो पूर्व श्लोक में कहे हुए ("तस्यैवाज्ञत्वमिष्टं चेत्") को दोनों पक्षों को याद रखना चाहिये। अर्थात् पूर्वोक्त विकल्प दूषण आदि को देखने से प्रथम कल्प तो उचित नहीं है ॥ १३६ ॥ सिद्धिः स्यात्स्वात्मलाभश्चेत्तत्तस्तत्र निरर्थकः । सर्वलोकप्रसिद्धत्वात् स्वहेतुभ्यस्तु वस्तुतः ॥१३७॥ सिद्धिरिति—अब द्वितीय कल्प को दूषित कर रहे हैं—यदि 'सिद्धि' शब्द से स्वात्मलाभ अभिप्रेत हो तो उसके लिये प्रयत्न (प्रमातृ-प्रमाण प्रयास ) करना व्यर्थ है, क्योंकि किसी भी वस्तु का अपने कारण से होना तो सर्वत्र लोक- प्रसिद्ध है ॥ १३७ ॥ ज्ञानज्ञेयादिवादेऽतः *सिद्धिर्ज्ञातत्वमुच्यते । अध्यक्षाध्यक्षयोः सिद्धिर्ज्ञेयत्वं नाऽऽत्मलाभता ॥१३८॥ ज्ञानेति—अतः ज्ञान-ज्ञेयादिवाद में ( ज्ञान-ज्ञेय-ज्ञाता का विचार करने वालों के मत में) 'ज्ञातत्व' को ही 'सिद्धि' शब्द से कहा गया है। अतः अध्यक्ष्य और अध्यक्ष ( साक्ष्य और साक्षी ) का ज्ञेयत्व ही उनकी 'सिद्धि' है। स्वरूप लाभ का नाम 'सिद्धि' नहीं है। अर्थात् जड़ या चेतन की स्थिति को 'सिद्धि' नहीं कहते। अपितु प्रमाण के बलपर प्रमाता का विषय होना ही उनकी सिद्धि है ॥ १३८ ॥ हृदयस्पर्शिनी अब तृतीय पक्ष तो अप्रसिद्धि के कारण ही पराहत हुआ जानकर वक्ष्यमाण पक्षविशेष का ज्ञापन करने के लिये उक्त पक्ष का निगमन करते हैं। जिस मत से ज्ञान, ज्ञेय, ज्ञाता का विचार है, उस मत में 'सिद्धि' शब्द से 'ज्ञातत्व' अर्थ ही अभिप्रेत रहता है। अर्थात् साक्ष्य और साक्षी (अध्यक्ष्य और अध्यक्ष) का ज्ञेयत्व ही उनके मत में 'सिद्धि' शब्द का अर्थ है, 'स्वरूपलाभ' नहीं। अभिप्राय यह है—जड़ वस्तु हो या चेतन हो, उसकी स्थिति को 'सिद्धि' शब्द से नहीं कहा जाता, अपितु प्रमाण के द्वारा प्रमाता का विषय होना ही उनकी सिद्धि है। "अध्यक्षस्यापि"— (१८ प्र., १३४ श्लो.) पद्य की एक अन्य प्रकार से भी योजना हो सकती है। “अहं अज्ञासिषं चेदम्”-(१८।१२८) इस पद्य से आरंभ कर यहाँ तक के ग्रन्थ से कर्तृ-कर्म-करण की सिद्धि विधिमुख से प्रवृत्त होने वाले प्रमाणों के द्वारा ही हो सकती है, अन्यथा नहीं, इस प्रासंगिक सन्दर्भ का उपपादन और उपसंहार करके 'अध्यक्ष भी एक वस्तु है अतः विधिमुख से प्रवृत्त होने वाले प्रमाण से ही उसकी भी सिद्धि होती है'—इसी बात को "अध्यक्षस्यापि" पद्य से कहा गया है। मूलगत 'वा' शब्द से पूर्वपक्षी पर कटाक्ष किया गया है। अर्थात् क्या अध्यक्ष (द्रष्टा) की भी बिना प्रमाण के ही सिद्धि हो जायगी ? अर्थात् कभी नहीं होगी। इस पर यदि यह कहा जाय कि अध्यक्ष तो चेतन पदार्थ है, उसकी सिद्धि बिना प्रमाण के क्यों नहीं होगी ? इस आशंका का समाधान यह है कि बिना प्रमाण के वस्तु की प्रसिद्धि तो ज्ञान में होती है, क्योंकि ज्ञान के स्वरूपस्फुरण में ही प्रमाण की अपेक्षा नहीं हुआ करती। ज्ञाता (अध्यक्ष) के स्वरूपस्फुरण में तो प्रमाण की अपेक्षा रहती है। अन्यथा तुमको बताना होगा कि क्या अध्यक्ष ही अज्ञ (जड़) होता हुआ बिना प्रमाण के ही अर्थ सिद्धी कर लेगा या किसी अन्य अन्तःकरण आदि के द्वारा अर्थसिद्धि की जायगी ? चेतन अध्यक्ष को ही यदि ज्ञानरूप कहें तो 'अहं अध्यक्षः' ऐसी बुद्धि होगी और उसे यदि ज्ञानवान् (ज्ञानाश्रय) कहें तो दूसरी बुद्धि होगी। अर्थात् प्रवृत्त प्रमाणजन्या मति (बुद्धि) होगी। क्योंकि आगन्तुक सिद्धि अन्य निमित्त से हुआ करती है। द्वितीय कल्प की दृष्टि से यदि विचार करें कि अध्यक्ष का ज्ञान अन्तःकरण को होता है, तो प्रमाण- जन्य अन्य बुद्धि निश्चितरूप से माननी होगी। दोनों प्रकार से विधिमुख से प्रवृत्त होनेवाले प्रमाण से ही अध्यक्ष की

  • ज्ञातत्व—पाठान्तरम् ।