भारतकोश
उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा

स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished364 पृष्ठ

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पृष्ठ 256

२३० उपदेशसाहस्री हृदयस्पर्शिनी विषय और स्वरूप की दृष्टि से त्रिक स्मृति का यौगपद्य संभव न होने से कर्त्रादि की सिद्धि हो जाने मात्र से उनके ऐक्य का अनुमान नहीं किया जा सकता, यह बता चुके । अब कर्त्रादिकों का युगपत् अनुभवसाधन न होने से भी उनकी युगपत्सिद्धि की संभावना नहीं है, यह बता रहे हैं। जैसे विषय ग्रहण में कर्ता, कर्म, करण इन तीनों की अपेक्षा रहती है, उसी तरह कर्त्रादि प्रत्येक के ग्रहण में भी तीनों की अपेक्षा होती है। तथाच प्रमाता, प्रमेय प्रमाणज्ञान के ग्रहण में भी कर्त्रादि तीनों की अपेक्षा रहना संभव है। अन्यथा तत्तत्कर्त्रादिस्फुरण के बिना तत्तदर्थ के अनुभूत होने का नियम न हो पाने से कर्त्रादि की अनवस्था प्राप्त होगी। क्योंकि आत्मा में चरितार्थ होने वाला कर्तृत्व तो करण और कर्म की सिद्धि में कारण नहीं हो सकता । जो क्रिया के करने में स्वतन्त्र होता है, उसे कर्ता कहते हैं । वही सब कारकों का प्रयोक्ता माना जाता है। अतः उसकी सत्ता पहले होनी चाहिये, उसके पश्चात् अन्य कारकों की सत्ता रहेगी । अतः कर्ता, कर्म और करण की सत्ता एकसाथ सिद्ध नहीं हो सकती, उसमें क्रम का होना नितान्त आवश्यक है । एवं च कर्त्रादि त्रिक का युगपदनुभवसाधन करना कभी संभव ही नहीं है ॥ १३१ ॥ व्याप्तुमिष्टं च यत्कर्तुः क्रियया कर्म तत्स्मृतम् । अतो हि कर्तृतन्त्रत्वं तस्येष्टं नाऽन्यतन्त्रता ॥ १३२॥ व्याप्तुमिति—कर्ता की क्रिया द्वारा व्याप्त करने के लिये जो इष्टतम होता है, उसे कर्म कहा गया है१। अतः उसका सकलकारकप्रयोक्ता स्वतन्त्र कर्त्ता के अधीन रहना ही इष्ट है। उससे भिन्न किसी अध्यक्ष के अधीन रहना इष्ट नहीं है ॥ १३२ ॥ शब्दाद्वाऽनुमितेर्वाऽपि प्रमाणाद्वा ततोऽन्यतः । सिद्धिः सर्वपदार्थानां स्यादज्ञं प्रति नाऽन्यथा ॥ १३३॥ शब्दाद्वेति—इसलिये आत्मतत्त्व की सिद्धि विधिरूप से प्रवृत्त होने वाले शब्द प्रमाण अथवा अनुमान प्रमाण से ही होना उचित है। क्योंकि समस्त पदार्थों की सिद्धि, शब्द अथवा अनुमान प्रमाण से ही होती है। इन प्रमाणों से भिन्न प्रत्यक्षादि प्रमाणों से किसी वस्तु की सिद्धि तो अज्ञानियों के प्रति की जाती है ॥ १३३ ॥ अध्यक्षस्यापि सिद्धिः स्यात्प्रमाणेने विनैव वा । विना स्वस्य प्रसिद्धेस्तु नाज्ञं प्रत्युपयुज्यते ॥ १३४॥ अध्यक्षस्येति—भले ही जड़ वस्तुओं की सिद्धि प्रमाण से ही हो, किन्तु चेतन आत्मा तो स्वयंप्रकाश है, अतः प्रमाण के बिना भी उसकी सिद्धि हो सकती है। क्योंकि प्रमाण के अधीन तो केवल जड़ वस्तुओं की सिद्धि है। अतएव ग्रंथकार ने विकल्प उपस्थित करके पूछा है कि अज्ञानी के प्रति साक्षी की सिद्धि भी किसी प्रमाण से ही होगी अथवा प्रमाण के बिना भी हो जायगी ? किन्तु प्रमाण रहित आत्मसिद्धि, अज्ञानी के उपयुक्त नहीं है। अर्थात् स्वरूपभूत चैतन्य की सिद्धि में प्रमाण की आवश्यकता न रहने पर उसके साक्षित्व की सिद्धि में तो प्रमाण की आवश्यकता है ही ॥१३४॥ तस्यैवाऽज्ञत्वमिष्टं चेज्ज्ञानत्वेऽन्या मतिर्भवेत् । अन्यस्यैवाऽज्ञतायां च तद्विज्ञाने ध्रुवा भवेत् ॥१३५॥ तस्यैवाज्ञत्वमिति—अब अध्यक्ष के स्वरूप में भी विकल्प उपस्थित कर उसकी प्रमाणाधीन सिद्धि का प्रदर्शन करते हुए प्रथम पक्ष को बताते हैं। यदि ज्ञानस्वरूप आत्मा की अज्ञता (जड़ता) ही इष्ट हो तो उसके ज्ञानत्व (चेतनत्व) के विषय में किसी अन्य अर्थात् प्रमाणजनित मति की अपेक्षा होगी, किन्तु अज्ञता (जड़ता) तो जड़ (अचेतन) अहंकार आदि की ही होने से उस अध्यक्ष (आत्मतत्त्व) के विज्ञान में अन्य मति अर्थात् शास्त्र प्रमाण से ही निश्चित बुद्धि हो जायेगी। दोनों प्रकार से अध्यक्ष की सिद्धि, विधिमुख प्रमाणाधीन ही है ॥ १३५ ॥ १. 'कर्तुरीप्सिततमं कर्म'—( पा. सू. १।४।४९ )