उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)
Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary
आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा
स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंतत्त्वमसिप्रकरणम् २२९ चेतन (आत्मा) की स्वतः सिद्धि हो जाती है। क्योंकि उक्त स्मृति, अनुभव के बिना तो हो नहीं रही है, अतः करण, कर्म, कर्ता तीनों एक क्षण में ही पूर्व से सिद्ध ही हैं। एवं च अध्यक्ष स्वतः सिद्ध है ॥ १२८ ॥ प्रामाण्येऽपि स्मृतेः शैघ्याद्यौगपद्यं विभाव्यते। क्रमेण ग्रहणं पूर्वं स्मृतेः पश्चात्तथैव च ॥१२९॥ प्रामाण्येति—पूर्वपक्षी के इस कथन पर सिद्धान्ती कहता है कि स्मृति को प्रमाण मानने पर भी कर्त्ता, कर्म और करण का जो एक साथ अनुभव होना बता रहे हो, वह ठीक नहीं है, वस्तुतः उनके युगपत् अनुभव की प्रतीति तो शीघ्रता के कारण होती है। स्मृति के पूर्व जैसे क्रमशः अनुभव हुआ था, वैसे ही अनुभव के पश्चात् भी तदनुसार उनका स्मरण भी क्रमशः ही होगा ॥ १२९ ॥ हृदयस्पर्शिनी सिद्धान्ती पूर्वपक्षी की आशंका का निराकरण कर रहा है—पूर्वानुभव की गमक होने से स्मृति की प्रामा- णिकता रहने पर भी वह युगपत् त्रितयसिद्धि की गमक नहीं है, क्योंकि पूर्व (अनुभवकाल) में कर्त्रादिकों का ग्रहण क्रमशः हुआ था, ठीक उसी प्रकार उत्तर काल में स्मृति होती है। अतः कर्त्ता, कर्म, करण की प्रतीति क्रमशः होती हुई भी वह इतनी शीघ्र होती है कि युगपत् हुई-सी लगती है, वस्तुतः वह यौगपद्य-प्रतीति मिथ्या ही है। कर्त्रादि त्रिक की एकस्मृत्यवभास्यता निश्चित होनेपर तो यौगपद्य कहा जा सकता है, किन्तु अभी तो उसका निश्चय ही नहीं हो पाया है। क्योंकि 'अहमिदं जानामि' यह शब्दप्रयोग तो क्रमशः किया जा रहा है। अतः ग्राह्य स्फुरण में ग्राहक और ग्रहण की आकारता का संभव न रहने से ग्राह्यस्फुरणकाल में अन्य दोनों का भान होना संभव नहीं है। उसी तरह ग्राहक के स्फुरणकाल में ग्राह्य का स्फुरण होना भी संभव नहीं है। परस्पर विरुद्ध आकारवाले दोनों का भी एक प्रमाणज्ञान में स्फुरण होना संभव नहीं। उसी तरह विषय के साथ एकाकार हुआ ज्ञान जब स्फुरित होता है, तब उसके स्फुरण से ज्ञातृस्फूर्ति होती है। इस प्रकार क्रम से ही ज्ञात्रादि की सिद्धि होती है, यह पहले समझना चाहिये। अतः कमलदलशतभेदन में यौगपद्याभिमान के समान युगपत् स्मृति का केवल अभिमानमात्र है। अतः जिस प्रकार स्मृति से पूर्व उनका क्रमशः ग्रहण होता था, उसी प्रकार उसके पश्चात् भी होगा। किन्तु शीघ्रता के कारण उसका अनुभव नहीं हो पाता ॥ १२९ ॥ अज्ञासिषमिदं मां चेत्यपेक्षा जायते ध्रुवम् । विशेषोऽपेक्ष्यते यत्र तत्र नैवैककालता ॥१३०॥ अज्ञासिषमिति—यौगपद्य न होने में एक अन्य कारण और भी है। 'अज्ञासिषमिदं मां च'—मैंने इसे और अपने को जाना, इस ज्ञान में क्रम (पौर्वापर्य) की अपेक्षा का होना निश्चित ही है। जहाँ विशेष की अपेक्षा होती है, वहाँ यौगपद्य का होना संभव नहीं होता ॥ १३० ॥ हृदयस्पर्शिनी ज्ञात्रादि त्रिक के यौगपद्याभाव में एक अन्य कारण भी बताते हैं। 'अज्ञासिषमिदंमां च'—मैंने इसे और अपने को जाना—इस प्रकार के ज्ञान में निश्चित रूप से पौर्वापर्यरूप क्रम की अपेक्षा है, क्योंकि 'यह'—इदंवृत्ति का विषय है और 'अपने को'—अहंवृत्ति का विषय है। इस कारण उन दोनों का ज्ञान एक ही क्षण में एक साथ नहीं हो सकता। वस्तुतः जहाँ विशेष की अपेक्षा होती है, वहाँ एककालिकता नहीं हो सकती ॥ १३० ॥ आत्मनो ग्रहणे चाऽपि त्रयाणामिह संभवात् । आत्मन्यासक्तकर्तृत्वं न स्यात्करणकर्मणोः ॥१३१॥ आत्मन इति—विषय के ग्रहण में जैसे त्रिपुटी (कर्ता-कर्म-करण) की अपेक्षा रहती है, उसी तरह प्रमाता (आत्मा), प्रमेय और प्रमा आदि प्रत्येक के ग्रहण में भी त्रिपुटी (कर्ता, कर्म और करण) की अपेक्षा रहती है, किन्तु आत्मा में चरितार्थ होनेवाला कर्तृत्व, 'करण और कर्म' की सिद्धि में कारण नहीं होता है ॥ १३१ ॥