उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)
Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary
आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा
स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२२८ उपदेशसाहस्री रही है, तो अध्यक्ष (साक्षी) का सद्भाव, अन्य किसी प्रमाण से प्रसिद्ध न होने के कारण परिशेष की असिद्धि है, तब शून्यता ही अवशिष्ट रहती है, आत्मा नहीं ॥ १२५ ॥ चेतनस्त्वं कथं देह इति चेन्नाप्रसिद्धितः । चेतनस्याऽन्यतः सिद्धावेवं स्यादन्यहानतः ॥१२६॥ चेतन इति—तू चेतन आत्मा है, तब तुझे अचेतन देह कैसे कह सकते हैं ? अर्थात् चेतन का अचेतन होना संभव नहीं है। किन्तु अभी किसी प्रमाण से चेतन तत्त्व की सिद्धि ही कहाँ हो पाई है ? अतः तुम्हारा उपर्युक्त कथन ठीक नहीं है। चेतन तत्त्व की किसी प्रमाण के द्वारा सिद्धि हो जाने पर ही अन्य अचेतन पदार्थों का निषेध करते-करते अवशिष्ट का निर्देश कर सकते हो ॥ १२६ ॥ हृदयस्पर्शिनी चेतन और अचेतन विरुद्ध स्वभाववाले हैं, इस कथन से अचेतन का बाध (अन्यनिवृत्ति) शब्द के द्वारा किया गया है। अतः अचेतन के विरुद्ध स्वभाववाला चेतन अवशिष्ट रह जाता है। इस रीति से शून्यता का प्रसंग नहीं होगा। निषेधमुखवादी के इस प्रकार कहने पर सिद्धान्ती उत्तर दे रहा है कि प्रतियोगीरूप धर्मी के सिद्ध होनेपर 'अयं, अयं न भवति' ऐसा तादात्म्यनिषेध करने से विरुद्धरूपता का उपदेश होना संभव हो सकता है, किन्तु अद्यापि चेतन पदार्थ पृथक् सिद्ध ही नहीं है। निषेधमुख से ही सिद्ध कर रहे हो, और उसके सिद्ध होने पर ही (अयं, अयं न भवति) इत्याकारक तादात्म्यनिषेध कर पाओगे, ऐसी स्थिति में अन्योन्याश्रय दोष होगा ॥ १२६ ॥ अध्यक्षः स्वयमस्त्येव चेतनस्याऽपरोक्षतः । तुल्य एवं प्रबोधः स्यादन्यस्याऽसत्त्ववादिना ॥१२७॥ अध्यक्ष इति—पूर्व पक्षी कहता है कि चेतन तत्त्व तो अपरोक्ष ही है, अतः साक्षी स्वयं ही सिद्ध है। उस पर सिद्धान्ती कहता है कि इस प्रकार तो बौद्ध विद्वान् भी शून्य को स्वयं सिद्ध ही बताते हैं। अतएव वे आत्मा को शून्यरूप ही मानते हैं ॥ १२७ ॥ हृदयस्पर्शिनी इस पर निषेधमुखवादी पुनः शंका करता है कि आत्मा अत्यन्त अप्रसिद्ध नहीं है। वह तो स्वतः सिद्ध है। अर्थात् वह स्वतः अपरोक्ष है। तब सिद्धान्ती कहता है कि तुम्हारा यह कथन तो शून्यवादी बौद्ध के समान ही है, क्योंकि वह भी शून्य को स्वतः सिद्ध ही मानता है। अर्थात् जैसे वह प्रमाण के बिना ही शून्य को स्वतः सिद्ध मानकर 'शून्यम् आत्मा' कहता है, जिससे प्रबोध (ज्ञान) रूप आत्मा सिद्ध नहीं होता है, उसी प्रकार तुम्हारा कथन (चेतन अपरोक्ष होने के कारण साक्षी तो स्वयं सिद्ध ही है) भी बौद्धसमकक्ष ही है ॥ १२७ ॥ अहमज्ञासिषं चेदमिति लोकस्मृतेरिह । करणं कर्म कर्ता च सिद्धास्त्वेकक्षणे किल ॥१२८॥ अहमिति—'मैं इसे जानता था'—इस प्रकार लोगों को स्मरण हुआ करता है। अतः लोकव्यवहार में करण, कर्म और कर्त्ता की एक क्षण में ही युगपत् सिद्धि हो जाती है। इस रीति से प्रमाता यानी आत्मा की सिद्धि बताई जा सकती है ॥ १२८ ॥ हृदयस्पर्शिनी इसपर पूर्वपक्षी पुनः स्मृतिबल से स्वतः सिद्ध अध्यक्ष की सिद्धि की आशंका कर रहा है—वह कहता है कि अनुभूत विषय की ही स्मृति हुआ करती है—यह नियम है। लोकव्यवहार में कहते भी हैं कि 'अहमिदमज्ञासिषम्' 'मैं इसे जानता था'—इस स्मरणात्मक वाक्य में कर्ता, कर्म और करण की युगपत् प्रतीति होती है, अतः इसी से प्रमाता