भारतकोश
उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा

स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished364 पृष्ठ

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तत्त्वमसिप्रकरणम् २४१ अस्पर्शत्वाददेहत्वान्नाहं दाह्यो यतः सदा । तस्मान्मिथ्याभिमानोत्थं मृते पुत्रे मृतिर्यथा ॥१६४॥ अस्पर्शत्वादिति—'आत्मा' को स्पर्श न कर सकने के कारण वह 'अस्पृश्य' है, और वह अदेह (देह से भिन्न) भी है। इसलिये वह दाह्य भी नहीं है। फिर भी पुत्र के मरने पर उसे अपने ही मरण के समान जो दाहजनित दुःख होता है, वह मिथ्या अभिमान के कारण ही होता है ॥ १६४ ॥ हृदयस्पर्शिनी आत्मा को कोई छू नहीं सकता इसलिये वह अस्पृश्य है, और वह देह से भिन्न भी है, इस कारण आत्मा दाह्य (दाह के योग्य) भी नहीं है। तथापि पुत्र के मरने पर अपने ही मरण के तुल्य यह दाहजनित दुःख तो मिथ्या- भिमान से ही होता है, वास्तविक नहीं है ॥ १६४॥ कुण्डल्यहमिति ह्येतद्बाध्येतैव विवेकिना । दुःखीति प्रत्ययस्तद्वत् केवलाहंधिया *सह ॥१६५॥ कुण्डल्यहमिति—जैसे विवेकी पुरुष 'मैं कुण्डली हूँ'—इस ज्ञान का बाध कर देता है, वैसे ही शुद्ध ब्रह्म में अहं- बुद्धि के सहित 'मैं दुःखी हूँ'—इस ज्ञान का भी बाध हो जाता है ॥ १६५ ॥ सिद्धे दुःखित्व इष्टं स्यात् तच्छक्तिश्छन्दसाऽऽत्मनः । मिथ्याभिमानतो दुःखी तेनाऽर्थापादन†क्षयः ॥१६६॥ सिद्धे इति—'आत्मा' का दुःखी होना (दुःखित्व ) सिद्ध होने पर, इच्छानुसार उसकी दुःखित्वशक्ति भी इष्ट हो सकती है। वह तो मिथ्या अभिमान के कारण ही दुःखी होता है और उसी से वह दुःखित्वशक्ति का सम्पादन करने में समर्थ रहता है ॥ १६६ ॥ हृदयस्पर्शिनी दुःखरहित के लिये मोक्षोपदेश अनुपपन्न होने से आत्मा में दुःखित्व की प्रतीति हो सकती है, उस कारण उस प्रकार की प्रतीति के लिये उसमें शक्तिमत्त्व की प्रतीति माननी होगी। अतः अन्यगत निमित्त से ही वह दुःखी नहीं है, किन्तु सुषुप्ति आदि अवस्थाओं में भी स्वतः ही उसमें शक्तिमत्त्व मानना होगा, उसका निवारण कैसे हो सकता है ? इस प्रश्न के समाधान में कह रहे हैं कि किसी भी अवस्था में उस केवल शुद्ध आत्मा में दुःखित्व यदि प्रमाण से सिद्ध हो तो अपनी इच्छा के अनुसार उसमें दुःखित्वशक्ति की कल्पना भी की जाय। किन्तु वैसी कल्पना नहीं कर सकते। क्योंकि उसमें जो दुःखदर्शन होता है, उसकी अन्यथा उपपत्ति भी लगायी जा सकती है। वह तो मिथ्या अभिमान के कारण ही दुःखी है और उसी से वह दुःखित्वशक्ति सम्पादन करने में समर्थ हो जाता है। अर्थात् मिथ्याभिमान के कारण ही उसे दुःखित्व का अनुभव होता है ॥ १६६ ॥ अस्पर्शोऽपि यथा स्पर्शमचलश्चलनादि च । अविवेकात्तथा दुःखं मानसं चात्मनीक्षते ॥१६७॥ अस्पर्शोऽपीति—जैसे अविवेक से परवश होकर आत्मा, स्पर्शरहित रहने पर भी अपने को स्पर्शयुक्त एवं अचल रहने पर भी चलनादि धर्म से युक्त समझता है, वैसे ही मन में होनेवाले दुःख को अपने में देखता है ॥ १६७ ॥ विवेकात्मधिया दुःखं नुद्यते चलनादिवत् । अविवेकस्वभावेन मनो गच्छत्यनिच्छतः ॥१६८॥ विवेकात्मेति—जिस प्रकार स्थूल देह से आत्मा की भिन्नता का ज्ञान होने पर उसमें चलनादि क्रिया की निवृत्ति होती है, उसी प्रकार विवेकरूप आत्मज्ञान के द्वारा दुःखादि सूक्ष्मदेहधर्म की भी निवृत्ति हो जाती है। मनुष्य

  • सदा—पाठान्तरम् । † क्षमः—पाठान्तरम् । ३१