उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)
Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary
आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा
स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२४२ उपदेशसाहस्री की इच्छा न रहने पर भी उसका मन अविवेक के अधीन होकर ही इधर-उधर भटकता रहता है। अर्थात् सूक्ष्म देह से अविवेक रहने के कारण होने वाले दुःख का ब्रह्मात्मज्ञान से समूल बाध हो जाता है ॥ १६८ ॥ तदा तु दृश्यते दुःखं नैश्चल्ये नैव तस्य तत् । प्रत्यगात्मनि तस्मात्तद्दुःखं नैवोपपद्यते ॥१६९॥ तदेति—किन्तु विवेक के द्वारा मन के निश्चल हो जाने पर वह दुःख आत्मा में नहीं दिखाई पड़ता। अतः प्रत्यगात्मा में दुःख का होना संभव ही नहीं है ॥ १६९ ॥ त्वंसतोस्तुल्यनोडत्वान्नीलोत्पलइवविदं भवेत् ॥१७०॥ त्वमिति—'त्वम्' और 'सत्' ये दोनों पद, एक ही अर्थ में अन्वित होते हैं। अतः यह वाक्य 'नील-अश्व' के समान है ॥ १७० ॥ हृदयस्पर्शिनी उपर्युक्त युक्तियों से निर्दुःख स्वभाववाला आत्मा है, यह सिद्ध होने पर वेदान्तवाक्य से ही 'मैं ब्रह्म हूँ' यह अपरोक्ष ज्ञान हो जाता है। 'त्वं और सत्' ये पद, एक ही अर्थ (वस्तु) में अन्वित होते हैं। अतः 'तत्त्वमसि' यह वाक्य, 'नील अश्व' के तुल्य है। यद्यपि इस दृष्टान्त में यह प्रश्न उपस्थित किया जा सकता है कि 'नील अश्व' में 'नील' गुण है और 'अश्व' गुणी (द्रव्य) है, और दोनों का 'संसर्ग' उसका अर्थ है। किन्तु 'तत्त्वमसि' में 'तत्' और 'त्वम्' पद की 'अखण्डार्थता' ही वाक्यार्थ है। अतः यह दृष्टान्त देना उचित नहीं है। किन्तु इसका समाधान यह है कि यद्यपि उक्त दृष्टि से इनकी समानता नहीं है, तथापि एकद्रव्यपर्यवसायित्वरूप सामानाधिकरण्य तो है ही। इस प्रकार सामानाधिकरण्य बताने में ही दृष्टान्त देने का तात्पर्य है ॥ १७० ॥ निर्दुःखावाचिना योगात् त्वंशब्दस्य तदर्थता । प्रत्यगात्माभिधानेन तच्छब्दस्य युतेस्तथा ॥१७१॥ निर्दुःखेति—निर्दुःखवाचक 'सत्' शब्द के साथ 'त्वम्' शब्द का सामानाधिकरण्य है। इसलिये उसका अर्थ 'सत्' है। उसी तरह प्रत्यगात्मा के वाचक 'त्वम्' पद के साथ 'सत्' पद का सामानाधिकरण्य है। अतः उसका 'अपरोक्षत्व' सिद्ध होता है ॥ १७१ ॥ हृदयस्पर्शिनी 'तत्' और 'त्वम्' दोनों पदों का एकार्थनिष्ठत्व किस प्रकार है, उसे बता रहे हैं। निर्दुःखवाची 'सत्' शब्द के साथ सामानाधिकरण्य होने से 'त्वं' शब्द में 'सत्' शब्द की अर्थता है अर्थात् 'त्वम्' शब्द, 'सत्' शब्द का अर्थ है, और प्रत्यगात्मा के वाचक 'त्वं' शब्द के साथ 'तत्' शब्द (सत् शब्द) का सामानाधिकरण्य होने से 'तत्' (सत्) शब्द, 'त्वम्' शब्द का अर्थ है। अतः 'तत्' (सत्) का अपरोक्षत्व सिद्ध हो जाता है ॥ १७१ ॥ दशमस्त्वमसीत्येवं वाक्यं स्यात्प्रत्यगात्मनि ॥१७२॥ दशमस्त्वमिति—अतः 'दसवां (दशम) तू है' इस वाक्य के समान 'तत्त्वमसि' वाक्य का तात्पर्य 'प्रत्यगात्मा' में ही समझना चाहिये ॥ १७२ ॥ हृदयस्पर्शिनी वाक्य भी अपरोक्ष वस्तु का प्रतिपादक होता है, उसे दृष्टान्त देकर बता रहे हैं। जैसे दस मनुष्य किसी समय देशान्तर जा रहे थे। रास्ते में एक नदी थी। तैरते हुए जब उस नदी के पार पहुँच गये, तब यह जानने के लिये कि कोई डूब तो नहीं गया या बह तो नहीं गया ? यह जानने के लिये आपस में वे गिनने लगे। प्रत्येक ने सबको गिना,