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उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा

स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished364 पृष्ठ

२४२ उपदेशसाहस्री की इच्छा न रहने पर भी उसका मन अविवेक के अधीन होकर ही इधर-उधर भटकता रहता है। अर्थात् सूक्ष्म देह से अविवेक रहने के कारण होने वाले दुःख का ब्रह्मात्मज्ञान से समूल बाध हो जाता है ॥ १६८ ॥ तदा तु दृश्यते दुःखं नैश्चल्ये नैव तस्य तत् । प्रत्यगात्मनि तस्मात्तद्दुःखं नैवोपपद्यते ॥१६९॥ तदेति—किन्तु विवेक के द्वारा मन के निश्चल हो जाने पर वह दुःख आत्मा में नहीं दिखाई पड़ता। अतः प्रत्यगात्मा में दुःख का होना संभव ही नहीं है ॥ १६९ ॥ त्वंसतोस्तुल्यनोडत्वान्नीलोत्पलइवविदं भवेत् ॥१७०॥ त्वमिति—'त्वम्' और 'सत्' ये दोनों पद, एक ही अर्थ में अन्वित होते हैं। अतः यह वाक्य 'नील-अश्व' के समान है ॥ १७० ॥ हृदयस्पर्शिनी उपर्युक्त युक्तियों से निर्दुःख स्वभाववाला आत्मा है, यह सिद्ध होने पर वेदान्तवाक्य से ही 'मैं ब्रह्म हूँ' यह अपरोक्ष ज्ञान हो जाता है। 'त्वं और सत्' ये पद, एक ही अर्थ (वस्तु) में अन्वित होते हैं। अतः 'तत्त्वमसि' यह वाक्य, 'नील अश्व' के तुल्य है। यद्यपि इस दृष्टान्त में यह प्रश्न उपस्थित किया जा सकता है कि 'नील अश्व' में 'नील' गुण है और 'अश्व' गुणी (द्रव्य) है, और दोनों का 'संसर्ग' उसका अर्थ है। किन्तु 'तत्त्वमसि' में 'तत्' और 'त्वम्' पद की 'अखण्डार्थता' ही वाक्यार्थ है। अतः यह दृष्टान्त देना उचित नहीं है। किन्तु इसका समाधान यह है कि यद्यपि उक्त दृष्टि से इनकी समानता नहीं है, तथापि एकद्रव्यपर्यवसायित्वरूप सामानाधिकरण्य तो है ही। इस प्रकार सामानाधिकरण्य बताने में ही दृष्टान्त देने का तात्पर्य है ॥ १७० ॥ निर्दुःखावाचिना योगात् त्वंशब्दस्य तदर्थता । प्रत्यगात्माभिधानेन तच्छब्दस्य युतेस्तथा ॥१७१॥ निर्दुःखेति—निर्दुःखवाचक 'सत्' शब्द के साथ 'त्वम्' शब्द का सामानाधिकरण्य है। इसलिये उसका अर्थ 'सत्' है। उसी तरह प्रत्यगात्मा के वाचक 'त्वम्' पद के साथ 'सत्' पद का सामानाधिकरण्य है। अतः उसका 'अपरोक्षत्व' सिद्ध होता है ॥ १७१ ॥ हृदयस्पर्शिनी 'तत्' और 'त्वम्' दोनों पदों का एकार्थनिष्ठत्व किस प्रकार है, उसे बता रहे हैं। निर्दुःखवाची 'सत्' शब्द के साथ सामानाधिकरण्य होने से 'त्वं' शब्द में 'सत्' शब्द की अर्थता है अर्थात् 'त्वम्' शब्द, 'सत्' शब्द का अर्थ है, और प्रत्यगात्मा के वाचक 'त्वं' शब्द के साथ 'तत्' शब्द (सत् शब्द) का सामानाधिकरण्य होने से 'तत्' (सत्) शब्द, 'त्वम्' शब्द का अर्थ है। अतः 'तत्' (सत्) का अपरोक्षत्व सिद्ध हो जाता है ॥ १७१ ॥ दशमस्त्वमसीत्येवं वाक्यं स्यात्प्रत्यगात्मनि ॥१७२॥ दशमस्त्वमिति—अतः 'दसवां (दशम) तू है' इस वाक्य के समान 'तत्त्वमसि' वाक्य का तात्पर्य 'प्रत्यगात्मा' में ही समझना चाहिये ॥ १७२ ॥ हृदयस्पर्शिनी वाक्य भी अपरोक्ष वस्तु का प्रतिपादक होता है, उसे दृष्टान्त देकर बता रहे हैं। जैसे दस मनुष्य किसी समय देशान्तर जा रहे थे। रास्ते में एक नदी थी। तैरते हुए जब उस नदी के पार पहुँच गये, तब यह जानने के लिये कि कोई डूब तो नहीं गया या बह तो नहीं गया ? यह जानने के लिये आपस में वे गिनने लगे। प्रत्येक ने सबको गिना,

तत्त्वमसिप्रकरणम् २४३ लेकिन वह स्वयं को गिनना भूल जाता था, अर्थात् केवल नौ लोगों को ही गिनता था। तब वे यह समझने लगे कि हम दस में से एक बह गया या डूब गया, और शोकग्रस्त होकर रोने लगे। उसी समय एक बुद्धिमान् आदमी वहाँ आ पहुँचा। और उसने दस में से एक के डूबने का समाचार उनसे सुना, तब उसने कहा 'दशम' दसवाँ भी है, वह न डूबा है और न बह गया है। और दसों को गिनकर यह भी दिखा दिया कि वह 'दशम' दसवा आदमी, स्वयं गणना करने- वाला ही है। अतः जिस प्रकार 'दशमस्त्वमसि' दसवा तू ही है—इस वाक्य का तात्पर्य स्वयं गणना करनेवाले में ही है, उसी प्रकार 'तू ब्रह्म है' इस वाक्य का तात्पर्य भी प्रत्यगात्मा में ही है। 'तत्त्वमसि' वाक्य का तात्पर्य 'दशमस्त्वमसि' वाक्य के समान प्रत्यगात्मा में ही है ॥ १७२ ॥ स्वार्थस्य ह्यप्रहाणेन विशिष्टार्थसमर्पकौ । प्रत्यगात्मावगत्यन्तौ नान्योऽर्थोऽर्थाद्विरोध्यतः ॥१७३॥ स्वार्थस्येति—अपने वाच्यार्थ का त्याग न करने से तो ये विशिष्ट अर्थ के द्योतक होते हैं। किन्तु अन्ततोगत्वा इनका पर्यवसान ( तात्पर्य) प्रत्यगात्मा में ही होता है। इस अखण्डार्थ का विरोधी अन्य अर्थ, वेदान्त शास्त्र में नहीं बताया गया है। 'त्वम्' पद से वाच्य जो 'जीव' है, वह प्रत्यक्ष और अल्पज्ञ है। तथा 'तत्' पद से वाच्य जो 'ईश्वर' है, वह परोक्ष और सर्वज्ञ है। उनके इन विशेष गुणों का बाध कर देने पर 'शुद्ध' चेतन अवशिष्ट रह जाता है। वही 'तत्त्वमसि' महा- वाक्य का अखण्ड अर्थ है ॥ १७३ ॥ हृदयस्पर्शिनी 'तत्' और 'त्वम्' पदों का यदि एक ही अर्थ में पर्यवसान होता है तो घट-कलश आदि के समान उन्हें पर्याय कहना होगा, तब उनका सहप्रयोग (एकसाथ प्रयोग) नहीं किया जा सकता। ऐसी शंका नहीं करनी चाहिये, क्योंकि उन दोनों की प्रवृत्ति के भिन्न-भिन्न निमित्त (प्रवृत्तिनिमित्त भेद) होने से उन्हें पर्याय नहीं कह सकते। ये 'तत् और त्वम्' दोनों पद, अपने वाच्यार्थ (परोक्षत्व और प्रत्यक्षत्व) का त्याग न करने के कारण ही विशिष्ट अर्थ के प्रकाशक होते हैं। अतः वाच्यार्थ के भिन्न होने से दोनों को पर्याय नहीं कह सकते। अन्ततोगत्वा उन दोनों का तात्पर्य प्रत्यगात्मा में ही है। अर्थात् शुद्ध साक्षी का ज्ञान कराने में ही उन पदों का तात्पर्य है। निष्कर्ष यह है कि तत्-त्वम् पदों के सुनाई देनेवाले सामानाधिकरण्य का तात्पर्य परस्परविरुद्ध वाच्यार्थों के संसर्ग (संबन्ध) में अथवा अन्यतरविशिष्ट हुए अन्यतर में हैं। किन्तु—'सोऽयं देवदत्तः' के समान भेदपरामर्श के कल्पित होने से लक्षण के द्वारा परोक्षत्व-अपरोक्षत्वादि अंश के समाप्त होने पर अखण्डस्वरूपमात्र में उनका पर्यवसान होता है। एवंच प्रत्यगात्मा का ज्ञान कराने के लिये ही तत्-त्वं शब्द कहे गये हैं। तथापि पुनः जिज्ञासा होती है कि तत्-त्वम् पदों के सामानाधिकरण्य की उपपत्ति अंशांशिभाव को मानकर भी हो सकती है, तब अखण्डार्थ में ही इतना पक्षपात क्यों है ? उत्तर यह है कि अखण्डार्थ का विरोधी कोई अन्य अर्थ वेदान्त में नहीं बताया गया है। कहने का अभिप्राय यह है कि सुवर्ण-कुण्डल के समान तत्-त्वम् के अर्थों में कार्य-कारणभाव से संसर्ग का होना संभव नहीं है। क्योंकि “अन्यत्रास्मात्कृताकृतात्”१ श्रुति से विरोध होगा। और भूमि-ऊषरादि के सामान अंशांशिभाव से भी उनका संसर्ग होना संभव नहीं है, क्योंकि “निष्कलं निष्क्रियम्”२ इत्यादि कूटस्थ एकरस की प्रतिपादक श्रुति से विरोध होगा। उसी तरह 'नीलम्-उत्पलम्' में जैसे गुण-गुणिभाव से संसर्ग होता है, वैसा संपर्क भी यहाँ नहीं हो सकता, क्योंकि निर्गुणत्वश्रुति से विरोध होगा। और जाति-व्यक्ति-विशिष्ट स्वरूपादि प्रकार से भी यहां संसर्ग नहीं बन सकता, क्योंकि “एकमेवाद्वितीयम्”३, “असङ्गोहायं पुरुषः४” इत्यादि श्रुतियों से विरोध होगा। तस्मात् विशिष्टसंसर्गविरोधी वस्तुमात्र में स्थित रहना, यही वाक्य की अखण्डार्थता का तात्पर्य है। तथाच अनुमान का आकार यह होगा— १. ( कठ उ. २।१४ ) २. ( श्वे. उ. ६।१९ ) ३. ( छां. उ. ६।२।१८ ) ४. ( बृ. उ. ४।३।१५-१६ )

२४४ उपदेशसाहस्री 'विमतं अखण्डार्थनिष्ठम्, उपाधिपरामर्शमन्तरेणाविभाव्यमानभेदवस्तुनिष्ठत्वात् 'सोऽयं देवदत्तः', खं छिद्रम्' इत्यादि वाक्यवत् ॥ १७३ ॥ नवबुद्ध्यपहाराद्धि स्वात्मानं दशपूरणम् । अपश्यञ्ज्ञातुमेवेच्छेत् स्वमात्मानं जनस्तथा ॥१७४॥ नवेति—'हम नौ मनुष्य हैं'—इस भ्रान्त बुद्धि से (यथार्थ ज्ञान के न रहने से) दशम संख्या की पूर्ति करने वाले स्वयं अपने को वह जानना चाहता है। क्योंकि वह अपने-आप को ही भूल बैठा था ॥ १७४ ॥ हृदयस्पर्शिनी वाक्य की अखण्डार्थनिष्ठता रहने पर भी केवल उसमें ही उसका तात्पर्य (पर्यवसान) मानना उचित नहीं है। क्योंकि केवल ज्ञानमात्र से फलप्राप्ति नहीं होती। अतः यत्नान्तर का अन्वेषण करना चाहिये, इसलिये क्रिया- पर्यवसायिता क्यों नहीं मानी जाती ? उत्तर देते हैं कि जो अर्थ जिज्ञासित रहता है, उसी अर्थ की कल्पना की जाती है। जिज्ञासित अर्थ को छोड़कर अर्थान्तर में तात्पर्य की कल्पना यदि की जायेगी तो अबुभुत्सित अर्थ होने से वाक्य ही अप्रमाण हो जायेगा। 'हम नौ मनुष्य हैं' इस बुद्धि के भ्रम से यथार्थ ज्ञान तिरोहित हो जाने से दशम संख्या की पूर्ति करनेवाला व्यक्ति स्वयं अपने को न जानने के कारण उसे केवल जानना ही चाहता है। उसके अतिरिक्त और कुछ करना नहीं चाहता। इस दृष्टान्त के अनुसार मुमुक्षु व्यक्ति भी स्वयं अपने को किसी कारण से भूल गया था, अतः उसे केवल जानना ही चाहता है, जिससे भ्रम दूर हो जाय। एवंच भ्रमनिवृत्तिरूप फल के लिये ही वह केवल अपने आप को जानना ही चाह रहा है। अतः क्रियापरत्व की कल्पना करने का अवसर ही कहाँ है ? ॥ १७४ ॥ अविद्याबद्धचक्षुष्ट्वात्कामापहृतधीः सदा । विविक्तं दृशिमात्मानं नैक्षते दशमं यथा ॥१७५॥ अविद्याबद्धेति—अपना ही विस्मरण होने से जैसे दसवें व्यक्ति का ज्ञान नहीं हुआ था, वैसे ही अनादि अविद्या के द्वारा विवेकदृष्टि के आच्छादित होने के कारण नानाविध कामना (तृष्णा) ओं से कुण्ठित बुद्धि वाला पुरुष, दृश्य वर्ग से पृथक्भूत ज्ञानस्वरूप आत्मा का साक्षात्कार नहीं कर पाता ॥ १७५ ॥ दशमस्त्वमसीत्येवं तत्त्वमस्यादिवाक्यतः । स्वमात्मानं विजानाति कृत्स्नान्तःकरणेक्षणम् ॥१७६॥ दशमस्त्वमिति—'दशमस्त्वमसि' के समान 'तत्त्वमसि' इत्यादि वाक्य से मुमुक्षु पुरुष सम्पूर्ण अन्तःकरण के साक्षी आत्मा का ज्ञान प्राप्त कर लेता है ॥ १७६ ॥ इदं पूर्वमिदं पश्चात् पदं वाक्यं भवेदिति । नियमो नैव वेदेऽस्ति पदसाङ्गत्यमर्थतः । अन्वयव्यतिरेकाभ्यां ततो वाक्यार्थबोधनम् ॥१७७॥ इदमिति—'तत्त्वमसि', 'अहं ब्रह्मास्मि' इन वाक्यों में 'त्वम्', 'अहम्' आदि पदों को पहले और 'तत्' 'ब्रह्म' आदि पदों को पीछे रखकर वाक्य बनाया जाता है। तब अन्वय-व्यतिरेक से वाक्यार्थ का बोध होता है। किन्तु व्यावहारिक नियम के अनुसार 'उद्देश्य' को पहले और 'विधेय' को बाद में रखा जाता है। किन्तु 'तत्त्वमसि' वाक्य में विधेय जो 'तत्' पद है, उसे पहले रखा गया है, और उद्देश्य जो 'त्वम्' पद है, उसे बाद में रखा गया है। उस पर सिद्धान्ती कहता है कि 'पाठक्रम' की अपेक्षा 'अर्थक्रम' को प्रबल मानने का सिद्धान्त मीमांसा शास्त्र ने बताया है। अतः अन्वय-व्यतिरेक रूप प्रमाण के सहारे उनका अर्थ के अनुसार अन्वय समझना चाहिये ॥ १७७ ॥

तत्त्वमसिप्रकरणम् २४५ हृदयस्पर्शिनी पुनरपि एक जिज्ञासा जागरित होती है कि लोकव्यवहार में सर्वत्र यह नियम देखा जाता है कि वाक्य में प्रथमतः उद्देश्य रखा जाता है, पीछे विधेय रखा जाता है । “यच्छब्दः योगः प्राथम्यमित्याद्युद्देश्यलक्षणम् । तच्छब्द एवकारश्च स्यादुपादेयलक्षणम्¹ ।। इस न्याय में प्रथमनिर्दिष्ट उद्देश्य और चरमानिर्दिष्ट उपादेय (विधेय) होता है। प्रकृत में उसका पालन नहीं हुआ है। ‘तत्त्वमसि’ वाक्य में ‘तत्’ पद जो विधेय है, उसका प्रथम निर्देश हुआ है। और ‘त्वम्’ पद जो उद्देश्य है, उसका पश्चात् निर्देश हुआ है। अर्थात् ‘तत्त्वम्’ में तदर्थ का प्राथम्य सुनाई देता है और ‘अहं ब्रह्मास्मि’ में त्वमर्थ का प्राथम्य ज्ञात हो रहा है। अतः उद्देश्य-विधेय के नियम की यहाँ रक्षा नहीं हो पायी। तब सिद्धान्ती उत्तर देते हैं कि वेद में पाठक्रम के अनुसार अर्थ करने का ही कोई नियम नहीं है। पाठक्रम की अपेक्षा अर्थक्रम की प्रबलता मानी गई है। अतः अनेक स्थलों में अर्थक्रम के अनुसार ही अनुष्ठान किया जाता है। 'आहर पात्रम्', 'पात्रमाहर' के समान अर्थ- नियम की विवक्षा की गई है। अन्वय-व्यतिरेक प्रमाण के द्वारा अर्थ के अनुसार अन्वय किया जाता है। 'तत्त्वमसि', 'अहं ब्रह्मास्मि' इत्यादि वाक्यों में यह 'त्वम्' 'अहम्' आदि पद पहले और 'तत्' 'ब्रह्म' आदि पद पीछे रहने से वाक्य बनाता है। अतः पश्चात् अन्वय-व्यतिरेक के द्वारा वाक्यार्थ का ज्ञान होता है। क्योंकि पाठ का नियम न रहने पर भी 'प्रसिद्ध- मुद्दिश्य अनूद्य अप्रसिद्धो बोध्यते'—इस न्याय से प्रसिद्धार्थक त्वम्, अहम् आदि पदों को पहले और ‘इदम्’ अप्रसिद्धार्थक ब्रह्म, सत् आदि पदों को पश्चात्—इस रीति से विन्यस्त किये गये को वाक्य कहा जा सकता है—इस प्रकार अन्वय- व्यतिरेक के द्वारा जानकर पश्चात् वाक्यार्थ का बोधन (ज्ञान) अर्थात् त्वमर्थ की तदर्थात्मता का ज्ञान हो सकता है ।। १७७ ।। वाक्ये हि श्रूयमाणानां पदानामर्थसंस्मृतिः ।। १७८।। वाक्ये इति—वेदवाक्य में जो श्रूयमाण पद हैं, उनमें अर्थस्मृतिरूप नियम नहीं है। वहाँ अर्थ के अनुसार पदों की संगति लगानी होती है ।। १७८ ।। हृदयस्पर्शिनी क्योंकि वाक्य के अन्तर्गत श्रुत हुए पदों का अर्थस्मृतिरूप नियम नहीं है। वहाँ अर्थ के अनुसार पदों की संगति लगाई जाती है ।। १७८ ।। यदा नित्येषु वाक्येषु पदार्थस्तु विविच्यते । वाक्यार्थज्ञानसंक्रान्त्यै तदा प्रश्नो न युज्यते ।। १७९।। यदेति—जब वाक्यार्थ के ज्ञान का संचार करने के लिये नित्यवाक्य में प्रयुक्त पद के अर्थ का विवेचन कर दिया जाता है, तब शिष्य का कोई प्रश्न करना उचित नहीं है ।। १७९ ।। हृदयस्पर्शिनी कोई प्रश्नकर्ता पुनः कहता है कि ‘तू ब्रह्म है’—इस प्रकार गुरु के उपदेश करने पर भी शिष्य कह सकता है कि 'मैं तो परिच्छिन्न हूँ', तब मैं अपरिच्छिन्न तथा नित्य ब्रह्म कैसे हो सकता हूँ ?—इस स्थिति में केवल वाक्यार्थ मात्र से पदार्थज्ञान की उत्पत्ति कैसे मानी जा सकती है ? अतः तदन्यथानुपपत्त्या कहा जा सकता है कि वाक्य, साक्षात् बोध- जननसमर्थ नहीं है। इस पर सिद्धान्ती उत्तर देता है कि जिस समय गुरु, वाक्य के पदों का वास्तविक अर्थ बताकर शिष्य के अन्तःकरण में वाक्यार्थ का संचार कर देता है, उस समय शिष्य को पुनः कोई शंका नहीं हो सकती। शंका १. वरदराज ने अवयव निरूपण के प्रसंग पर ‘तार्किकरक्षा’ नामक ग्रन्थ में इस कारिका को उद्धृत किया है। विद्यारण्य ने भी ‘विवरण प्रमेय संग्रह’ में सू. १ के द्वितीय वर्णक में इसे उद्धृत किया है।

२४६ उपदेशसाहस्री तो तभी तक होती है, जब तक उसे पदार्थ का बोध नहीं होता है। पदार्थ का बोध हो जाने पर शिष्य को कोई शंका नहीं रहती ॥ १७९॥ अन्वयव्यतिरेकोक्तिः पदार्थस्मरणाय तु । स्मृत्यभावे न वाक्यार्थो ज्ञातुं शक्यो हि केनचित् ॥१८०॥ अन्वयेति—श्लोक १७७ 'इदं पूर्वमिदं' में अन्वय-व्यतिरेक के विषय में जो बताया गया है, वह पदों के अर्थ का स्मरण रखने के लिये कहा गया है। क्योंकि उनके स्मरण के बिना कोई भी व्यक्ति वाक्यार्थ को जानने में समर्थ नहीं हो सकता क्योंकि वाक्यार्थ का बोध तो पदों के अर्थज्ञान की स्मृति पर ही निर्भर रहता है ॥ १८० ॥ हृदयस्पर्शिनी पदार्थतत्व से अनभिज्ञ पुरुष ही प्रश्न करता है। जो अभिज्ञ है, उसके सभी प्रश्न शान्त हो जाते हैं। पूर्वगत १७७ वे श्लोक में अन्वय-व्यतिरेक के सम्बन्ध में जो कहा गया है, वह पदों के अर्थों को स्मरण रखने के लिये कहा गया है, क्योंकि उनकी स्मृति के बिना वाक्य का अर्थ किसी के समझ में नहीं आ सकता। अवान्तर वाक्य और तदनुकूल तर्क के द्वारा आत्मानात्म-विवेचन ही पूर्वोक्त अन्वय-व्यतिरेक शब्द से कहा गया है। लोकानुभव से यह स्पष्ट है कि पदार्थस्मृति ही पदोपस्थापित वाक्यार्थ का ज्ञान कराने में कारण हुआ करती है ॥ १८० ॥ तत्त्वमस्यादिवाक्येषु त्वंपदार्थाविवेकतः । व्यज्यते नैव वाक्यार्थो नित्यमुक्तोऽहमित्यतः ॥१८१॥ तत्त्वमिति—'तत्त्वमसि' इत्यादि वाक्यों में 'त्वम्' पदार्थ का विवेक न होने से 'मैं नित्य मुक्तस्वरूप हूँ'—यह वाक्यार्थ अभिव्यक्त नहीं हो पाता ॥ १८१ ॥ हृदयस्पर्शिनी 'तत्त्वमसि' इत्यादि वाक्यों में 'त्वं' पद के अर्थ का विवेक न होने के कारण 'मैं नित्य मुक्त स्वरूप हूँ' यह वाक्यार्थ अभिव्यक्त नहीं हो पाता। इसलिये 'त्वं' पदार्थ के विवेक करने में अत्यन्त प्रयत्न करना चाहिये ॥१८१॥ अन्वयव्यतिरेकोक्तिस्तद्विवेकाय नान्यथा । त्वंपदार्थविवेके हि पाणावर्पितबिल्ववत् ॥१८२॥ अन्वयेति—अन्वय-व्यतिरेक का जो उल्लेख किया गया था, वह उसी का विवेक कराने के लिये ही है, उसका कोई अन्य प्रयोजन नहीं है। 'त्वम्' पदार्थ का विवेक हो जाने पर हथेली पर रखे हुए बिल्व फल के समान...॥ १८२॥ वाक्यार्थो व्यज्यते चैवं केवलोऽहंपदार्थतः । दुःखीत्येतदपोहेन प्रत्यगात्मविनिश्चयात् ॥१८३॥ वाक्यार्थ इति—वाक्यार्थ की अभिव्यक्ति हो जाती है। 'मैं दुःखी हूँ'—इस प्रकार के प्रत्यय का 'अहम्' पद के अर्थ से बाध हो जाने पर प्राप्त हुए प्रत्यगात्मा का निश्चय हो जाता है ॥ १८३॥ हृदयस्पर्शिनी उपर्युक्त अन्वय-व्यतिरेक का उल्लेख उसी का विवेक कराने के लिये है, किसी अन्य प्रयोजन के लिये नहीं है। 'त्वं' पद के अर्थ का विवेक हो जानेपर 'अहं' के अर्थ से 'मैं दुःखी हूँ' इस प्रकार के प्रत्यय का बाध कर देने पर प्राप्त हुए प्रत्यगात्मा के निश्चय से हथेली पर रखे हुए बेलफल के तुल्य वाक्यार्थ की अभिव्यक्ति हो जाती है। 'तत्त्वमसि' महावाक्य का श्रुत अर्थ तो अखण्डार्थ है, अर्थात् माया और अज्ञान के संसर्ग से रहित ब्रह्म और आत्मा की एकता है, तथा अश्रुत अर्थ 'संसर्गादि' है, जिसमें जीव और ईश्वर की स्वरूपगत एकता न होकर केवल चैतन्यरूप से उनकी समानता स्वीकार की जाती है ॥ १८२-१८३ ॥

तत्त्वमसिप्रकरणम् २४७ तत्रैवं संभवत्यर्थे श्रुतहानाश्रुतार्थधीः । नैव कल्पयितुं युक्ता पदवाक्यार्थकोविदैः ॥१८४॥ तत्रेति—इस रीति से ‘तत्त्वमसि’ महावाक्य का पूर्वोक्त अर्थ संभव होने पर पद और वाक्य का रहस्य जानने वालों को श्रुत अर्थ का त्याग और अश्रुत अर्थ की कल्पना करनी उचित नहीं है ॥ १८४ ॥ प्रत्यक्षादीनि बाधेरन् कृष्णलादिषु पाकवत् । अक्षजादिनिभैरेतैः कथं स्याद्वाक्यबाधनम् ॥१८५॥ प्रत्यक्षादीनीति—पूर्वपक्षी का कहना है कि जैसे कृष्णल ( सुवर्ण खण्ड ) आदि का पाक नहीं हो सकता, वैसे ही प्रत्यक्षादि प्रमाणों से उक्त अखण्डार्थ का बाध हो जायगा । उस पर सिद्धान्ती कहता है कि इन प्रत्यक्षाभासादि प्रमाणों से उक्त महावाक्य के अखण्डार्थ का बाध कैसे हो पायगा ? ॥ १८५ ॥ हृदयस्पर्शिनी प्रत्यक्षादिविरुद्ध अर्थ में वाक्य का बाधदर्शन होने से पूर्ववादी दृष्टान्त देकर शंका कर रहा है । जैसे 'कृष्णलान् श्रपयेत्'१ वाक्य से कृष्णल (सुवर्णमय कण) का पाक श्रुत रहनेपर भी प्रत्यक्ष प्रमाण से उसका बाध किया जाता है, क्योंकि सुवर्ण कणों में विक्लित्ति होना संभव ही नहीं है । अतः पाकक्रियासाध्य संस्कारमात्र ही अदृष्टफल के लिये किया जाता है । उसी तरह यहाँ भी भेदग्राहक प्रत्यक्षादि प्रमाण, वाक्य की अखण्डार्थता का बाध कर देंगे । आत्मा का ब्रह्मत्व श्रुत रहने पर भी उसमें पूर्णता नहीं दिखाई देती । इसलिये प्रसंख्यान होने से वाक्य को आत्म- संस्कारार्थ ही मान लिया जाय । तब सिद्धान्ती उत्तर देता है कि प्रत्यक्षादि प्रमाणों से कर्तृत्ववादि का प्रतिभास यदि होता हो तो आपके कथनानुसार हो भी सकता है, किन्तु प्रत्यक्षादि प्रमाणों से कर्तृत्ववादि का ज्ञान (प्रतिभास) नहीं होता । क्योंकि आत्मा में दुःखित्वादि धर्मों की प्रतीति, अध्यस्त अहंकार आदि के सम्बन्ध से ही होती है । दुःखित्वादि धर्म, स्वतः आत्मा के नहीं हैं । अतः प्रत्यक्षाभासादि प्रमाणाभासों से प्रमाणभूत वाक्य का बाध कैसे किया जा सकता है ? अर्थात् उसका बाध कभी नहीं किया जा सकेगा । तथा 'प्रयाजे कृष्णलं जुहोति'२ के समान ब्रह्मज्ञान में संस्कृत हुए आत्मा का अन्यत्र विनियोग भी नहीं है, इसलिये वाक्य को संस्कारार्थ भी नहीं कहा जा सकता । और आत्मा की पूर्णता अर्थात् तत्काल ब्रह्मत्व, जो उसमें नहीं प्रतीत होता है, वह पदार्थ की दृढ़ बुद्धि न होने से है । तात्पर्य यह है कि प्रमाणाभास से महावाक्य का बाध नहीं होगा ॥ १८५ ॥ दुःख्यस्मीति सति ज्ञाने निर्दुःखोति न जायते । प्रत्यक्षादिनिभत्वेऽपि वाक्यान्न व्यभिचारतः ॥१८६॥ दुःखीति—पूर्वपक्षी कहता है कि आपके कथनानुसार दुःखित्वाभिमान का प्रत्यक्षाभासत्व सिद्ध रहने पर भी 'मैं दुःखी हूँ' यह ज्ञान होने पर उक्त वाक्य से 'मैं दुःखरहित हूँ' यह ज्ञान नहीं होता । उस पर सिद्धान्ती कहता है कि तुम ऐसा नहीं कह सकते, क्योंकि 'दुःखित्वज्ञान' का व्यभिचार दिखाई देता है ॥ १८६ ॥ हृदयस्पर्शिनी पूर्वपक्षी पुनः शंका करता है कि दुःखित्वाभिमान का प्रत्यक्षाभासत्व सिद्ध होने पर भी 'मैं दुःखी हूँ' यह ज्ञान तो होता है, किन्तु वाक्य से 'मैं दुःखहीन हूँ' यह ज्ञान नहीं होता । तब सिद्धान्ती कहता है कि ऐसी बात नहीं है, क्योंकि इस दुःखित्वज्ञान का व्यभिचार दिखाई देता है । पूर्वपक्षी के कहने का अभिप्राय यह है कि विरोधिता- लक्षण अप्रामाण्य के न रहने पर भी अनुपपत्तिलक्षण अप्रामाण्य तो वाक्य में है ही । प्रत्यक्ष तो पूर्व से ही सिद्ध रहने से असंजातविरोधी है, इसलिये वही प्रबल है, वाक्य प्रबल नहीं है । तब सिद्धान्ती व्यभिचारप्रदर्शन कर रहा है ॥ १८६ ॥ १. ( जै. सू. १०।१।१-३, २।१-२ ) २. ( तै. सं. २।३।२।३ )

२४८ उपदेशसाहस्री स्वप्ने दुःख्यहमध्यासं दाहच्छेदादिहेतुतः । तत्कालभाविभिर्वाक्यैर्न बाधः क्रियते यदि ॥१८७॥ स्वप्न इति—व्यभिचार इस प्रकार है कि स्वप्नावस्था में मैं दाह-छेदन आदि कारणों से दुःखी था, उसके बाद आप्त जनों के उपदेश से दुःखरहित हो गया—यह अनुभव रहने से समझ में आता है कि दुःखित्व धर्म 'आत्मा' का नहीं है। यदि स्वप्न के वाक्यों से उसका बाध न भी हुआ हो तो......॥ १८७ ॥ हृदयस्पर्शिनी उसी व्यभिचार को दिखा रहे हैं—स्वप्नावस्था में दाह-छेदनादि कारणों से मैं दुःखी था । पश्चात् आप्त के उपदेश से दुःखहीन हो गया—यह अनुभव होता है, उस कारण यह दुःखित्व, आत्मा का धर्म नहीं है ॥१८७॥ समाप्तेस्तर्हि दुःखस्य प्राक्च तद्बाध इष्यताम् । न हि दुःखस्य सन्तानो भ्रान्तेर्वा दृश्यते क्वचित् ॥१८८॥ समाप्तेरिति—उस दुःख की समाप्ति में और उससे पूर्व उसके बाध का स्वीकार करो। क्योंकि शुक्ति-रजतादि के भ्रम के समान आत्मा में दुःखपरम्परा का रहना भी किसी ने देखा नहीं है ॥ १८८ ॥ हृदयस्पर्शिनी तथापि पूर्वपक्षी के अभिनिवेश के अनुसार कहें कि स्वप्नावस्था के वाक्यों से उसका बाध न भी किया गया हो तो उस दुःख की समाप्ति में और उससे पूर्व उसका बाध स्वीकार करना ही चाहिये, क्योंकि दुःख के पूर्व और उसकी समाप्ति में तो दुःख का अभाव ही है। शुक्तिरजतादि भ्रम के तुल्य आत्मा में दुःखपरम्परा के भी कभी दर्शन नहीं होते । वह भी आरोपित ही है। अतः उसे आत्मा का स्वरूप नहीं कह सकते, क्योंकि वह आगन्तुक है किन्तु आत्मा नित्यसिद्ध है। इसलिये वाक्य के असामर्थ्य की शंका भी नहीं की जा सकती है ॥ १८८ ॥ प्रत्यगात्मन आत्मत्वं दुःख्यस्मीत्यस्य बाधया । दशमं नवमस्येव वेद चेदविरुद्धता ॥१८९॥ प्रत्यगात्मनेति—जिस प्रकार लोक में नवम का बाध करके दशम व्यक्ति का ज्ञान होता है, उसी प्रकार यदि महावाक्य से 'मैं दुःखी हूँ' इस ज्ञान का बाध करके प्रत्यगात्मा के आत्मत्व का अनुभव हो जाता है, तब भी वाक्यार्थ के प्रबल रहने में कोई विरोध नहीं हो सकता ॥ १८९ ॥ हृदयस्पर्शिनी जिस प्रकार लोकव्यवहार में नवम का बाध करके दशम पुरुष का ज्ञान होता है, उसी प्रकार यदि महावाक्य द्वारा 'मैं दुःखी हूँ' इस ज्ञान का बाध करके प्रत्यगात्मा के आत्मत्व का अनुभव हो जाता है, तथापि वाक्यार्थ की प्रबलता में कोई विरोध नहीं हो सकता । अतः वाक्य को प्रत्यक्ष से दुर्बल नहीं कह सकते ॥ १८९ ॥ नित्यमुक्तत्वविज्ञानं वाक्याद्भवति नान्यतः । वाक्यार्थस्यापि विज्ञानं पदार्थस्मृतिपूर्वकम् ॥१९०॥ नित्येति—विस्तार से कहे गये न्यायार्थ को चार श्लोकों के द्वारा संक्षेप में कह रहे हैं। आत्मा के नित्य- मुक्तत्व का ज्ञान भी वाक्य से ही होता है, किसी अन्य प्रमाण से नहीं। तथा वाक्यार्थ का ज्ञान भी पदों के अर्थ की स्मृति के द्वारा ही हो सकता है ॥ १९० ॥ अन्वयव्यतिरेकाभ्यां पदार्थः स्मर्यते ध्रुवम् । एवं निर्दुःखमात्मानमक्रियं प्रतिपद्यते ॥१९१॥

अन्वयेति—और पदों के अर्थ का स्मरण अन्वय-व्यतिरेक से ही होता है। इस रीति से दुःखहीन तथा निष्क्रिय आत्मा की प्राप्ति होती है ॥ १९१ ॥ सदेवेत्यादिवाक्येभ्यः प्रमा स्फुटतरा भवेत् । दशमस्त्वमसीत्यस्माद्यथैवं प्रत्यगात्मनि ॥१९२॥ सदेवेति—जिस प्रकार 'दशमस्त्वमसि' वाक्य से अपरोक्ष (प्रत्यक्ष) ज्ञान होता है, उसी प्रकार 'सदेव सोम्येद्- मग्र आसीत्' इत्यादि वाक्यों द्वारा प्रत्यगात्मा का अपरोक्ष ज्ञान होता है ॥ १९२ ॥ प्रबोधेन यथा स्वाप्नं सर्वदुःखं निवर्तते । प्रत्यगात्मधिया तद्वद्दुःखित्वं सर्वदाऽऽत्मनः ॥१९३॥ प्रबोधेनेति—जिस प्रकार प्रबोध होने पर (जागने पर ) स्वप्न में प्राप्त हुआ समस्त दुःख दूर हो जाता है, उसी प्रकार प्रत्यगात्मबुद्धि से सर्वदा ही आत्मा के दुःखित्व की निवृत्ति हो जाती है ॥ १९३ ॥ कृष्णलादौ प्रमाऽजन्म तदन्यार्थाऽमृदुत्वतः । तत्त्वमस्यादिवाक्येषु न त्वेवमविरोधतः ॥१९४॥ कृष्णलादाविति—पूर्वं दिये गये कृष्णलपाक दृष्टान्त के वैषम्य को स्फुट करते हैं। 'कृष्णलान् श्रपयेत्' इत्यादि वाक्य से जो प्रमा की अनुत्पत्ति है, वह अन्य कारण से है। अर्थात् कृष्णलों की अमृदुलता (कठोरता) ही उसमें कारण है। किन्तु 'तत्त्वमसि' वाक्य में वैसी बात नहीं है, क्योंकि उसमें कोई ऐसा विरोध नहीं है। अर्थात् कृष्णलों के उबाले जाने पर भी उनमें पाकक्रिया नहीं होती, किन्तु तत्त्वमस्यादि वाक्यों में ऐसी बात नहीं है, क्योंकि उनमें ऐसा कोई विरोध नहीं है। अतः 'तत्त्वमसि' आदि महावाक्यों से प्रमा की अनुत्पत्ति होती है, यह नहीं कह सकते ॥ १९४ ॥ वाक्ये तत्त्वमसीत्यस्मिन् ज्ञातार्थं तदसिद्वयम् । त्वमर्थे सत्यसाहाय्याद्वाक्यं नोत्पादयेत्प्रमाम् ॥१९५॥ वाक्य इति—प्रकृत में वैसा विरोध नहीं है। पूर्वोक्त श्लोक (१८१) में जो कहा गया था, उसी को विस्तृत करते हुए त्वं-पदार्थ के विवेचन में अधिक प्रयत्न करने के लिये कहा जा रहा है—'तत्त्वमसि' वाक्य में 'तत्' और 'असि' इन दो पदों का अर्थ तो ज्ञात है, किन्तु 'त्वम्' पद का अर्थ ज्ञात न होने पर उसकी सहायता न होने के कारण उस वाक्य से अपरोक्ष निश्चयरूप प्रमा की उत्पत्ति नहीं हो सकती। अतः 'त्वम्' पद का शोधन करने के लिये विशेष प्रयत्न की आवश्यकता है ॥ १९५ ॥ तत्त्वमोस्तुल्यनीडार्थमसीत्येतत्पदं भवेत् ॥१९६॥ तत्त्वमोरिति—'तत्' और 'त्वम्' पदों का सामानाधिकरण्य प्रदर्शित करने के लिये ही 'असि' पद का उपयोग किया गया है। तुल्यनीडार्थ अर्थात् 'कुरु' 'चिन्तय' इत्यादि क्रिया की आकांक्षा का निवारण हो जाने से सामानाधिकरण्य की सिद्धि हो जाती है। अतः ऐक्यावलम्बनत्व के स्पष्टीकरणार्थ 'असि' और 'अस्मि' इत्यादि पदों का उपयोग किया गया है ॥ १९६ ॥ तच्छब्दः प्रत्यगात्मार्थस्तच्छब्दार्थस्त्वमस्तथा । *दुःखित्वाप्रत्यगात्मत्वं वारयेतामुभावपि ॥१९७॥ तच्छब्द इति—सामानाधिकरण्य के निराकांक्ष होने से क्या लाभ है? लाभ यह है कि 'तत्' और 'त्वम्' पदों का सामानाधिकरण्य होने से ही 'तत्' शब्द का अर्थ प्रत्यगात्मा है, और 'त्वम्' शब्द का अर्थ 'तत्' शब्दार्थभूत वस्तु है।

  • दुःखित्वात्—पाठान्तरम् । ३२

२५० - उपदेशसाहस्री - इस रीति से 'तत्' और 'त्वम्' पदार्थ का अभेद होने के कारण वे दोनों पद 'त्वम्' पदार्थ के दुःखित्व और 'तत्' पदार्थ के अनात्मत्व तथा परोक्षत्व का बाध करते हैं ॥ १९७ ॥ एवं च नेति नेत्यर्थं गमयेतां परस्परम् ॥१९८॥ एवमिति—इस प्रकार वाक्यार्थ करने पर अद्वितीयत्वपरक श्रुति से अविरोध सम्पन्न हो जाता है। अर्थात् वे परस्पर 'नेति-नेति' वाक्य के अर्थ का बोध कराते हैं ॥ १९८ ॥ एवं तत्त्वमसीत्यस्य गम्यमाने फले कथम् । अप्रमाणत्वमस्यो*क्त्वा क्रियापेक्षत्वमुच्यते ॥१९९॥ एवं तत्त्वमसीति—पूर्वपक्षी के मत में अकारण (प्रमाणरहित) ही श्रुतहानि और अश्रुतकल्पना करनी पड़ती है। इस तरह 'तत्त्वमसि' वाक्य के फल का ज्ञान हो जाने पर उसका अप्रामाण्य अथवा क्रियापेक्षत्व कैसे कहा जा सकता है ? उसके प्रामाण्य को पूर्व बता चुके हैं ॥ १९९ ॥ तस्मादाद्यन्तमध्येषु कुर्वित्येतद्विरोध्यतः । न कल्पाऽमोऽश्रुतत्वाच्च श्रुतत्यागोऽप्यनर्थकः ॥२००॥ तस्मादिति—आरंभ में 'तत्त्वमसि' इस प्रथमोपदेश में, मध्य में अर्थात् पदार्थ परिशोधन के अन्वय-व्यतिरेक- ग्रहण काल में और अन्त में अर्थात् निर्विचिकित्स ब्रह्मानुभाव के काल में 'कुरु'=करो—इस प्रकार की विधि का विरोध होने से और उसके श्रुतिमूलक न होने के कारण इसके क्रियापेक्षत्व की तो कल्पना भी नहीं की जा सकती। ऐसी अवस्था में ब्रह्मात्मैक्य रूप श्रुत अर्थ का त्याग करना भी व्यर्थ ही है ॥ २०० ॥ यथानुभूयते तृप्तिर्भुजेर्वाक्यान्न गम्यते । वाक्यस्य विधित्तिस्तद्वद्गोशकृत्पायसीक्रिया ॥२०१॥ यथेति—उक्त अर्थ को न समझ कर पुनः आक्षेप कर रहा है—जिस प्रकार भोजन करने से ही तृप्तिरूप फल का अनुभव होता है, केवल वाक्यार्थ के ज्ञान मात्र से नहीं, तथा जैसे गोशकृत् (गोमय) से पायस (खीर) नहीं बनती, क्योंकि वह पायस का साधन नहीं है। उसी प्रकार वाक्यार्थ के अवधारण मात्र से ब्रह्मात्मैक्य साक्षात्कार नहीं हो सकता। क्योंकि वह भी उसका साधन नहीं है ॥ २०१ ॥ सत्यमेवमनात्मार्थवाक्यात्पारोक्ष्यबोधनम् । प्रत्यगात्मनि न त्वेवं संख्याप्राप्तिवदध्रुवम् ॥२०२॥ सत्यमेवमिति—इस प्रकार सिद्धान्ती कहता है कि अनात्म वस्तु के प्रतिपादक वाक्य से परोक्ष ज्ञान ही होता है, यह कहना तो ठीक है, किन्तु 'दशमस्त्वमसि' वाक्य से दशम संख्या की प्राप्ति के समान प्रत्यगात्मा के विषय में वैसा अनिश्चित ज्ञान नहीं होता, अपितु निश्चित ही होता है। एवंच वाक्य, निश्चित रूप से अपरोक्ष ज्ञान का साधन है ॥२०२॥ †स्वसंवेद्यत्वपर्यायः स्वप्रमाणक इष्यताम् । निवृत्ता‡वहम्ः सिद्धः स्वात्मनोऽनुभवश्च नः ॥२०३॥ स्वयमिति—'आत्मा' को स्वयंप्रकाश और स्वतःप्रमाण समझो, जिसका अहंकार नष्ट हो गया है, उसे आत्मा का अनुभव होना सिद्ध ही है—यह हमारा सिद्धान्त है ॥ २०३ ॥ हृदयस्पशिनी 'स्वतः अपरोक्ष प्रत्यगात्मा ही ब्रह्म है',—इस उपदेश से अपरोक्ष ज्ञान होता है। आत्मा को स्वयंप्रकाश और स्वतःप्रमाण समझो। क्योंकि 'स्वयं ज्योतिष्ट्वादि' श्रुति १ इसमें प्रमाण है। तथाच वाक्य से ब्रह्मभेदक अहंकार १. (बृ. उ. ४।३।९, १४)

  • क्त्वा—पाठान्तरम् । † स्वयं वे०—पाठान्तरम् । ‡ विदमः—पाठान्तरम् ।

तत्त्वमसिप्रकरणम् २५१ की निवृत्ति होनेपर हमारे मत में स्वात्मानुभव तो सिद्ध ही है। कोई किसी प्रकार की अनुपपत्ति नहीं है। पूर्वपक्षी के अनुमान 'विमतं परोक्षार्थज्ञानजनकं वाक्यत्वात् संमतवत्' में 'अनात्मविषयत्व' उपाधि है, और दशमस्त्वमसि में व्यभिचार भी है ॥ २०३ ॥ बुद्धीनां विषयो दुःखं नो यस्य विषया मताः । कुतोऽस्य दुःखसंबन्धो दृशेः स्यात्प्रत्यगात्मनः ॥२०४॥ बुद्धीनामिति—दुःख तो बुद्धिवृत्तियों का विषय है। तब जिसको विषय अभिमत ही नहीं है, उस साक्षीरूप प्रत्यगात्मा का दुःख के साथ सम्बन्ध कैसे हो सकता है ? ॥ २०४॥ हृदयस्पर्शिनी पहले की हुई दुःखानुभवविरोध की आशंका भी उचित नहीं है, क्योंकि दुःख तो व्यभिचारी होने से वह आत्मा का धर्म नहीं है, वह तो विषय का धर्म है। दुःख तो बुद्धिवृत्तियों का विषय है। जिसे विषय अभिमत नहीं है, उस साक्षी प्रत्यगात्मा का दुःख से संबंध कैसे हो सकता है। 'दुःखी अहमस्मि' सुनने पर अहंकार ही दुःखधर्मवान् है, ऐसा अनुभव होता है, अतः वह उसीका विषय है। बुद्धिवृत्त्याश्रय अहंकार का साक्षी जो आत्मा है, उसका वह धर्म नहीं है ॥ २०४ ॥ दृशिरेवाऽनुभूयेत स्वेनैवाऽनुभवात्मना । तदाभासतया जन्म धियोऽस्याऽनुभवः स्मृतः ॥२०५॥ दृशिरेवेति—ज्ञानस्वरूप आत्मा स्वयं अनुभवरूप है, वह अपने द्वारा ही अनुभव किया जाता है। चिदाभास की व्याप्ति से बुद्धिवृत्ति का उत्पन्न होना ही उसका अनुभव माना गया है ॥ २०५॥ हृदयस्पर्शिनी यदि प्रत्यगात्मा सर्वधर्मरहित है, तो उसका अनुभव कैसे हो पाता है ? ज्ञानस्वरूप आत्मा स्वयं अनुभव- स्वरूप है, अतः उसके स्वरूप के लिये अन्य किस अनुभव की अपेक्षा होगी ? अर्थात् वह अपने द्वारा ही अनुभव किया जाता है। चिदाभास की व्याप्ति से बुद्धिवृत्ति का उदय होना ही उसका विशेष अनुभव (आगन्तुक अनुभव) कहा गया है ॥ २०५ ॥ अशनायादिनिर्मुक्तः सिद्धो मोक्षस्त्वमेव सः । श्रोतव्यादि तवेत्येतद्विरुद्धं कथमुच्यते ॥२०६॥ अशनायादीति—क्षुधा-तृष्णा आदि से रहित जो नित्य सिद्ध मोक्ष (ब्रह्म) है, वह तुम ही हो। तब 'तुम्हारे लिये श्रवणादि अनुष्ठेय हैं'—यह विरुद्ध बात क्यों कह रहे हैं ? ॥ २०६॥ हृदयस्पर्शिनी क्षुधादि से रहित जो नित्य सिद्ध मोक्ष (ब्रह्मत्व) है, वह तुम ही हो अर्थात् सर्वसंसारविनिर्मुक्त नित्यसिद्ध मोक्ष (ब्रह्म) तुम ही हो, इस प्रकार आचार्य के द्वारा उपदेश दिये जानेपर पुनः यह कहना कि तुम्हारे लिये श्रवणादि अनुष्ठेय हैं, ऐसी विरुद्ध बात क्यों कही जाती है ? इससे तो यही अभिप्राय होगा कि 'तुम अविक्रिय ब्रह्म नहीं हो', और 'तुम कर्ता हो' आदि वाक्य ही प्रमाण होंगे ॥ २०६ ॥ सेत्स्यतीत्येव चेत्तत्स्याच्छ्रवणादि तदा भवेत् । मोक्षस्यानित्यता स्याद्विरोधे नान्यथा वचः ॥२०७॥ सेत्स्यतीति—यदि यह कहो कि 'आत्मा' में क्रिया तो सिद्ध ही है, इसलिये श्रवणादि को अनुष्ठेय कहा गया है। तब तो 'मोक्ष' को अनित्य कहना पड़ेगा। यह विरोध होने से उक्त महावाक्य की अन्य प्रकार से योजना नहीं कर सकते ॥ २०७॥

२५२ उपदेशसाहस्री हृदयस्पार्शिनी यदि कहो कि 'तत्त्वमसि' इस उपदेशवाक्य में 'तत् त्वं सेत्स्यसि' ऐसा विपरिणाम करके उक्त महावाक्य की योजना कर लेंगे, तो 'एकं सन्धित्सतः अपरं प्रच्यवते'१—न्याय से मोक्ष की अनित्यता प्राप्त होगी । इस प्रकार उभयथा विरोध होने के कारण वाक्य में विपरिणाम करना उचित नहीं है । अभिप्राय यह है कि आत्मा में क्रिया सिद्ध होने के कारण श्रवणादि किये जाते हैं, ऐसा यदि कहें तो उस अवस्था में मोक्ष की अनित्यता का प्रसंग प्राप्त होगा । इस प्रकार विरोध उपस्थित होने के कारण उक्त वाक्य की योजना किसी अन्य प्रकार से नहीं करनी चाहिये ॥ २०७ ॥ श्रोतृत्वश्रोतव्ययोर्भेदो यदीष्टः स्याद्भवेदिदम् । इष्टार्थकोप एवं स्यान्न युक्तं सर्वथा वचः ॥२०८॥ श्रोत्रिति—श्रोता और श्रोतव्य विषय का भेद अभीष्ट रहने पर ही प्रसंख्यान (श्रवणादि कर्म) का अनुष्ठान हो सकता है, किन्तु ऐसा मानने पर अभीष्ट अर्थ की हानि हो जायगी । इसलिये भेद की अभीष्टता किसी प्रकार भी उचित नहीं है ॥ २०८ ॥ हृदयस्पार्शिनी यदि श्रोता और श्रोतव्य विषय का भेद अभीष्ट हो तो इस प्रकार का प्रसंख्यान अर्थात् श्रवणादि कर्म का संभव हो भी सकेगा, क्योंकि कार्य की उपपत्ति, कर्तृ-कर्म के भिन्न होनेपर ही हो पाती है, अन्यथा नहीं । कार्योपपत्ति के लिये भेद माननेपर इष्ट अर्थ (जीव का ब्रह्मभाव) का विनाश हो जायगा । क्योंकि अन्य में अन्य भाव नहीं होता । अतः प्रसंख्यान पक्ष में वाक्य सर्वथैव अप्रमाण होगा । एवं च प्रसंख्यानवाद भी उपपन्न नहीं है ॥ २०८ ॥ सिद्धो मोक्षोऽहमित्येवं ज्ञात्वाऽऽत्मानं भवेद्यदि । चिकीर्षुर्यः स मूढात्मा शास्त्रं चोद्घाटयत्यपि ॥२०९॥ सिद्ध इति—जो व्यक्ति 'मैं नित्य सिद्ध मोक्ष हूँ' इस प्रकार आत्मा को जानकर भी पुनः कर्मानुष्ठान की इच्छा करता है, वह मूढमति तो शास्त्र का उच्छेद ही कर रहा है, ऐसा समझना चाहिये ॥ २०९ ॥ न हि सिद्धस्य कर्तव्यं सकार्यस्य न सिद्धता । उभयालम्बनं कुर्वन्नाऽऽत्मानं वञ्चयत्यपि† ॥२१०॥ न हीति—सिद्ध वस्तु का कोई कर्तव्य नहीं होता तथा सक्रिय वस्तु (साध्य वस्तु) की सिद्धता नहीं हुआ करती। जो लोग दोनों का एकसाथ (युगपत्) आलम्बन (आश्रय) करते हैं, वे स्वयं ही अपने को धोखे में डालते हैं ॥२१०॥ हृदयस्पार्शिनी सिद्ध और साध्य के भेद से वस्तु दो प्रकार की होती है । घट-पटादि वस्तु विद्यमान रहती है, इस कारण वह सिद्ध है, और धर्मादि वस्तु अनुष्ठेय होने से साध्य कहलाती है । 'मोक्ष' तो आत्मा का स्वरूप ही है, अतः वह सिद्ध वस्तु है । सिद्ध वस्तु भी नित्य और अनित्य भेद से दो प्रकार की रहती है । नित्य वस्तु 'जन्य' नहीं हुआ करती । अतः जो लोग मोक्ष को जन्य मानते हैं, उनके मत से तो वह अनित्य सिद्ध होता है । अतः उनका इस प्रकार मानना कोरा भ्रम ही है । सिद्ध वस्तु कर्तव्य कोटि में नहीं आती, और कर्तव्य कोटि में आनेवाली वस्तु की सिद्धता नहीं कही जाती । किन्तु यह मूढ़बुद्धि व्यक्ति दोनों का एकसाथ आलम्बन करके अपनी ही वञ्चना करता रहता है ॥ २१० ॥ सिद्धो मोक्षस्त्वमित्येतद्वस्तुमात्रं प्रदर्श्यते । श्रोतुस्तथात्वविज्ञाने प्रवृत्तिः स्यात्कथं ‡न्त्विति ॥२११॥ १. इस न्याय का प्रयोग खण्डनखण्डखाद्य में अनैकान्तिक खण्डन के अवसर पर किया गया है । 'अनुसन्धित्सतः' इस पाठ भेद से उक्त न्याय का उपयोग सर्वदर्शनसंग्रह के आर्हत और अक्षपाददर्शन में भी हुआ है ।

  • त्येव०—पाठान्तरम् । † त्यसो०—पाठान्तरम् । ‡ त्विति०—पाठान्तरम् ।

तत्त्वमसिप्रकरणम् २५३ सिद्ध इति—पूर्वपक्षो कहता है कि 'तुम नित्य सिद्ध मोक्ष (ब्रह्म) हो'—यह कहकर केवल वस्तुमात्र को प्रद- र्शित कर रहे हो तो श्रोता की वस्तु त्व विज्ञानमात्र में प्रवृत्ति कैसे हो पायेगी ? ।। २११ ।। हृदयस्पर्शिनी सिद्धान्ती के द्वारा की गई निन्दा को सुनकर पूर्वपक्षी अपने अभिप्राय को प्रकट कर रहा है—'तुम नित्य सिद्ध मोक्ष (ब्रह्म) हो' ऐसा कह कर केवल वस्तुमात्र को प्रदर्शित किया जाता है । ऐसी स्थिति में वस्तुत्वविज्ञान मात्र में श्रोता की प्रवृत्ति कैसे होगी ? तात्पर्य यह है कि 'मुमुक्षु पुरुष की आत्मविज्ञान में प्रवृत्ति होने के लिये सिद्ध ब्रह्म रूप मोक्ष तुम हो' यह कथन वस्तुमात्रकथनपरक है, तत्त्व में उसका कोई तात्पर्य नहीं है ।। २११ ।। कर्ता दुःख्यहमस्मीति प्रत्यक्षेणाऽनुभूयते । कर्ता दुःखी च माभूवमिति यत्नो भवेत्ततः ॥२१२॥ कर्तेति—अपने अभिप्राय को ही और अधिक स्पष्ट कर रहे हैं—जब यह प्रत्यक्ष अनुभव होता है कि 'मैं कर्ता हूँ', 'मैं दुःखी हूँ', तभी 'मैं कर्ता एवं दुःखी न होऊँ' ऐसा ज्ञान हो तो उसके लिये प्रयत्न हो सकेगा ।। २१२ ।। तद्विज्ञानाय युक्त्यादि कर्तव्यं श्रुतिरब्रवीत् । कर्तृत्वाद्यनुवादेन सिद्धत्वानुभवाय तु ॥२१३॥ तद्विज्ञानायेति—भगवती श्रुति ने उसके बोध के लिये ही कर्तृत्व आदि का अनुवाद करते हुए सिद्धत्व का अनुभव कराने के लिये युक्ति आदि की कर्तव्यता को बताया है ।। २१३ ।। हृदयस्पर्शिनी वाक्यश्रवण के अनन्तर 'मन्तव्यः' १ श्रुति से कर्तव्य को बताया गया है, इसलिये भी हमारा कथन स्वीकार करना चाहिये, यह पूर्वपक्षी का अभिप्राय है । श्रुति ने कर्तृत्वादि का अनुवाद करते हुए सिद्धत्व का अनुभव कराने के लिये ही युक्ति आदि की कर्तव्यता का निरूपण किया है । अर्थात् 'श्रोतव्यः' कहकर श्रुति 'निदिध्यासितव्यः' का विधान करती है। इस प्रकार श्रवण-मननादि की कर्तव्यता का उपदेश होने के कारण निश्चय किया जाता है कि आत्मज्ञान के लिये क्रिया की आवश्यकता है । 'त्वम्' से कर्तृत्व का अनुवाद करके वस्तुगत्या तुम सिद्ध मोक्ष ब्रह्मरूप हो, अतः उसके ज्ञानार्थ प्रयत्न करो—यह वाक्य का तात्पर्य है ।। २१३ ।। निर्दुःखो निष्क्रियोऽकामः सिद्धो मोक्षोऽहमित्यपि । गृहीत्वैव* विरुद्धार्थमादध्यात्कथमेव सः ॥२१४॥ निर्दुःख इति—सिद्धान्ती कहता है कि 'मैं दुःखरहित, निष्क्रिय, निष्काम, नित्यसिद्ध मोक्ष ही हूँ'—ऐसा समझने के बाद, कौन ऐसा होगा कि जो इसके विपरीत स्वभाववाले पदार्थों का ग्रहण करेगा ? ।। २१४ ।। हृदयस्पर्शिनी सिद्धान्ती कहता है कि पूर्वपक्षी की यह कल्पना श्रुत्यनुसारिणी नहीं है । "मैं दुःखरहित, निष्क्रिय, निष्काम, नित्यसिद्ध मोक्ष ही हूँ" ऐसा ग्रहण करके भी मनुष्य, उक्तार्थ के विपरीत स्वभाववाले पदार्थों को कैसे ग्रहण कर सकता है ? अतः वाक्य से वाक्यार्थ का ज्ञान होता ही नहीं—यह कथन उचित नहीं है । अन्यथा उसे अप्रमाण कहना होगा, और अनुभवविरोध भी होगा । तथाच ज्ञान के उत्पन्न होने पर तद्विरुद्ध प्रतिपत्ति ( ज्ञान ) होना संगत नहीं है ।। २१४ ।। सकामः सक्रियोऽसिद्ध इति मेऽनुभवः कथम् । अतो मे विपरीतस्य तद्ब्रूवान् वक्तुमर्हति ॥२१५॥ १. ( बृ. उ. २।४।५, ४।५।६ )

  • न्वैत्वं—पाठान्तरम् ।

२५४ उपदेशसाहस्री सकाम इति—इस पर पूर्वपक्षी का कहना है कि यदि गुरुपदिष्ट वाक्य के श्रवण मात्र से ही दुःखरहित आत्मा का साक्षात्कार हो जाता है, तो आप ही बताइये कि सकामत्वादि से विपरीत स्वभाववाले मुझको 'मैं सकाम, सक्रिय और असिद्ध हूँ'—यह अनुभव क्यों होता है ? ॥ २१५ ॥ हृदयस्पर्शिनी इसपर पूर्वपक्षी कहता है कि यदि वाक्यश्रवणमात्र से ही निर्दुःखादिरूप आत्मा का साक्षात्कार हो जाता है, तो बताओ कि सकामत्वादि से विपरीत स्वभाववाले मुझ ब्रह्मरूप हुए को 'मैं सकाम, सक्रिय और असिद्ध हूँ'— ऐसा अनुभव क्यों होता है ? ॥ २१५ ॥ इहैव घटते प्रश्नो न मुक्तत्वानुभूतये । प्रमाणेन विरोधी यः सोऽत्रार्थः प्रश्नमर्हति ॥२१६॥ इहैवेति—उस पर सिद्धान्ती का कहना है कि 'मैं अपने स्वभाव से अन्य स्वभाव वाला कैसे लगता हूँ ?' इस प्रकार का प्रश्न तो हो सकता है, तथापि 'मुक्तत्व' की अनुभूति के सम्बन्ध में कोई प्रश्न नहीं पैदा होता । क्योंकि जो वस्तु प्रमाणविरुद्ध होती है, उसी के विषय में लोग प्रश्न किया करते हैं ॥ २१६ ॥ हृदयस्पर्शिनी इस पर सिद्धान्ती कहता है कि 'मैं एक स्वभाव का होते हुए भी अन्य स्वभाव का कैसे जान पड़ता हूँ ?'— इस विषय में तो प्रश्न हो सकता है । किन्तु मुक्तत्व की अनुभूति के विषय में कोई प्रश्न नहीं हो सकता, क्योंकि जो वस्तु प्रमाण से विरुद्ध होती है, उसी के विषय में प्रश्न किया जा सकता है ॥ २१६ ॥ अहं निर्मुक्त इत्येव सदसीत्यन्यमानजः । प्रत्यक्षाभासजन्यत्वादुःखित्वं प्रश्नमर्हति ॥२१७॥ अहमिति—'मैं मुक्त हूँ', तथा 'तू सत् है'—यह ज्ञान श्रुतिप्रमाण से हुआ है । किन्तु 'मैं दुःखी हूँ' यह ज्ञान प्रत्यक्ष प्रमाणाभास से उत्पन्न होता है। अतः दुःखित्व के विषय में तो प्रश्न किया जा सकता है ॥ २१७ ॥ हृदयस्पर्शिनी 'प्रमाण' का स्वभाव तो अज्ञात का ज्ञापन करना है । ऐसे प्रमाण के द्वारा अपूर्वार्थ बोधित होने पर तद्विरोधी अर्थात् प्रमाणाभास के द्वारा गृहीत जो अर्थ है, उसके विषय में प्रश्न किया जा सकता है । 'मैं मुक्तस्वरूप हूँ' यह ज्ञान तथा 'तू सत् है' यह ज्ञान, अन्य प्रमाण (श्रुतिप्रमाण) से होता है। और दुःखित्व आदि का ज्ञान, प्रत्यक्षा- भास से होता है। अतः दुःखित्वादि के विषय में प्रश्न किया जा सकता है ॥ २१७ ॥ पृष्टमाकाङ्क्षितं वाच्यं दुःखाभावमभीप्सितम् ॥२१८॥ पृष्टमिति—अभिलषित ( अभीप्सित ) विषय का ही प्रश्न किया जाता है । अभिलषित विषय (वस्तु) क्या है ? यह पूछने पर यही कहा जायगा कि सबको अभिलषित वस्तु एक ही है, जिसे 'दुःखाभावरूप ब्रह्म' कहते हैं ॥ २१८ ॥ हृदयस्पर्शिनी शिष्य की आकांक्षा को देखते हुए भी कार्य की कल्पना करना उचित प्रतीत नहीं हो रही है । जिस वस्तु के विषय में प्रश्न किया जाता है, उसे अभिलषित कहते हैं । शिष्य की आकांक्षित क्या है ? तो कहना होगा कि उसे 'दुःखाभाव' ही अभिलषित ( आकांक्षित ) है । दुःख का अभाव है जिसमें, ऐसा दुःखाभाव, ब्रह्मरूप (मोक्षस्वरूप) ही है ॥ २१८ ॥ कथं हीदं निवर्तेत दुःखं सर्वात्मना मम । इति प्रश्नानुरूपं यद्वाच्यं दुःखनिवर्तकम् ॥२१९॥

तत्त्वमसिप्रकरणम् २५५ कथमिति—मेरे इस संसाररूप दुःख की आत्यन्तिक निवृत्ति किस प्रकार होगी ? यही प्रश्न किया गया है, अतः उसके अनुरूप ही उत्तर देना चाहिये । अतः दुःखनिवृत्ति के उपाय को बताना ही उचित है। एवं च दुःखनिवृत्ति का उपाय एकमात्र 'ज्ञान' ही है, 'कर्म' नहीं—यह श्रुति ने बताया है ॥ २१९ ॥ हृदयस्पर्शिनी शिष्य का जैसा प्रश्न हो, तदनुकूल ही उत्तर (प्रतिवचन) होना चाहिये—मेरा यह संसाररूप दुःख, सर्वथा निवृत्त (दूर) कैसे होगा ? इस प्रश्न के अनुरूप जो दुःख की निवृत्ति करने वाला हो, उसी का वर्णन करना उचित है । इससे भी स्पष्ट होता है कि दुःखनिवृत्ति का साधनभूत ज्ञान ही श्रुति का प्रतिपाद्य है, कर्म नहीं ॥२१९॥ श्रुतेः स्वात्मनि नाशङ्का प्रामाण्ये सति विद्यते । तस्मादात्मविमुक्तत्वं* प्रत्याययति तद्वचः । वक्तव्यं तत्तथार्थं स्याद्विरोधेऽसति केनचित् ॥२२०॥ श्रुतेरिति—भगवती श्रुति तो 'स्वतःप्रमाण' है। अतः अपने प्रतिपाद्य प्रमेय के विषय में उसे किञ्चिन्मात्र भी सन्देह नहीं है। अतः वह शब्द के द्वारा आत्मा की मुक्तता का बोध करा देती है। भगवती श्रुति सबकी परम आप्त है, इसलिये किसी प्रमाण का विरोध न रहने पर यथार्थ अर्थ का प्रतिपादन करना उसका कर्तव्य हो जाता है ॥ २२० ॥ हृदयस्पर्शिनी प्रसंख्यान के द्वारा प्रश्न के अनुरूप कहा, यह तो ठीक है, क्योंकि तद्व्यतिरेक से (तद्विपरीत) यदि कहेंगे तो श्रुति में दुःखापनोदन का सामर्थ्य नहीं है, यह शंका होती है। उसके उत्तर में कहते हैं कि प्रमेयावबोधन करना ही प्रमाण का कार्य है; उसके अतिरिक्त अन्य कोई कार्य नहीं। श्रुति का प्रामाण्य स्वतःसिद्ध है, अतः उसे अपने प्रमेय के विषय में कोई सन्देह नहीं है। अतः स्वप्रमेयावभास सामर्थ्याभाव की आशंका नहीं कर सकते । अतः श्रुतिवाक्य से आत्मा की मुक्तता का परिचय प्राप्त होता है। और किसी प्रमाण के साथ विरोध न रहने पर उसे अपना समुचित अर्थ ही बताना चाहिये ॥ २२० ॥ इतोऽन्योऽनुभवः कश्चिदात्मनो नोपपद्यते । अविज्ञातं विजानतां विज्ञातारमिति श्रुतेः ॥२२१॥ इत इति—उक्त अर्थ का अनुभव करानेवाला 'वाक्य' ही है, यदि उसका परित्याग करें तो अन्य कोई प्रकार नहीं है, जो अनुभव करावे और प्रकारान्तर की कल्पना भी श्रुति विरोध के कारण नहीं की जा सकती ॥ २२१ ॥ हृदयस्पर्शिनी “ज्ञानियों की दृष्टि में आत्मा अविज्ञात है¹” तथा “विज्ञाता को किस प्रमाण के द्वारा जाने²”—इन श्रुतियों के अनुसार इससे भिन्न आत्मा का कोई और अनुभव होना संभव नहीं है ॥ २२१ ॥ त्वंपदार्थविवेकाय संन्यासः सर्वकर्मणाम् । साधनत्वं व्रजत्येवं शान्तो दान्तानुशासनात् ॥२२२॥ त्वमिति—'त्वम्' पदार्थ का विवेक करने के लिये श्रुति ने समस्त कर्मों के त्याग को ही 'साधन' बताया है ॥ २२२ ॥ १. (के. उ. ११) २. (बृ. उ. २।४।१४)

  • त्वप्रत्ययं याति—पाठान्तरम् ।

२५६ उपदेशसाहस्री हृदयस्पर्शिनी "शान्तो१ दान्त उपरतस्तितिक्षुः समाहितो भूत्वात्मन्येवात्मानं पश्यति" ऐसी श्रुति होने के कारण 'त्वं' पद के अर्थ का विवेक करने के लिए समस्त कर्मों का त्याग, साधन बन जाता है। अतः वह अशास्त्रसंवेद्य नहीं है, जिससे उसका परित्याग नहीं किया जा सकता। तथाच, पदार्थाज्ञान से पूर्व वाक्यार्थज्ञान होने से पदार्थावधारण तक आश्रमधर्मों का विधिपूर्वक अनुष्ठान करना ही होगा। उसके पश्चात् वेदान्तवाक्य से ब्रह्मात्मतत्त्व का ज्ञान हो जाने पर 'मया इदं अस्मै कर्तव्यम्' इस प्रकार नियोज्य विषय का ज्ञान न होने से उस व्यक्ति के लिये कहीं भी विधि में प्रवृत्ति नहीं होगी। किन्तु साधक अवस्था में ज्ञान के अविरुद्ध निवृत्तिरूप आश्रमधर्म का अभ्यास रहने के कारण संस्कारमात्र शेष रहने से अनुवृत्तिमात्र होती रहती है, उस कारण यथेष्टाचरण के लिए कोई अवकाश नहीं है। अतः सिद्धान्ती के मत में कोई किसी प्रकार का दोष नहीं है ॥ २२२ ॥ त्वमर्थं प्रत्यगात्मानं पश्येदात्मानमात्मनि । वाक्यार्थं तत आत्मानं सर्वं पश्यति केवलम् ॥२२३॥ त्वमर्थमिति—शम-दमादि साधनसम्पत्ति से सम्पन्न पुरुष, 'त्वम्' पद के अर्थभूत 'प्रत्यगात्मा' को अपने अन्तः- करण में ही देखने का अभ्यास करता रहे। ऐसा अभ्यास करने से कालान्तर में वह सर्वत्र सभी को वाक्यार्थभूत 'शुद्ध आत्मा' के रूप में देखने लगता है ॥ २२३ ॥ हृदयस्पर्शिनी उपर्युक्त कथन का ही विस्तार करते हुए श्रौत वाक्यार्थज्ञान की उत्पत्ति के प्रकार को बता रहे हैं। शम, दम, उपरति, तितिक्षा, समाधान और श्रद्धा से सम्पन्न होकर जिज्ञासु व्यक्ति आत्माभास से व्याप्त हुए स्वकार्य-कारण संघात (शरीर) में ही, 'त्वं' पद के अर्थभूत प्रत्यक्चेतयितास्वरूप आत्मा को ही देखता रहे। इस प्रकार शोधित प्रत्यगात्मा को वह सर्वत्र देखने लगता है ॥ २२३ ॥ सर्वमात्मेति वाक्यार्थे विज्ञातेऽस्य प्रमाणतः । असत्त्वे ह्यन्यमानस्य विधिस्तं योजयेत्कथम् ॥२२४॥ सर्वमिति—श्रुति प्रमाण के बल पर 'सब आत्मा ही है'—इस वाक्यार्थ को अच्छी तरह से जान लेने पर अन्य अतिरिक्त प्रमाणों का मिथ्यात्व सिद्ध हो जाता है। तब उन मिथ्याभूत प्रमाणों की कौन-सी विधि उस मुमुक्षु को किसी कर्तव्य में नियुक्त कर सकेगी ? ॥ २२४ ॥ हृदयस्पर्शिनी प्रमाण के द्वारा 'सब आत्मा ही है'—इस वाक्यार्थ को विशेष रूप से जान लेने पर तथा अन्य प्रमाणों का मिथ्यात्व सिद्ध होनेपर उसे कोई विधिवाक्य किस प्रकार नियोजित कर सकेगा ? क्योंकि विधिविषयता तो भेद में ही होती है। ज्ञानी की भेददृष्टि तो समाप्त हो चुकी है। अतः उसके लिये कोई विधि-निषेध नहीं होते ॥ २२४ ॥ तस्माद्वाक्यार्थविज्ञानान्नोध्वं कर्मविधिर्भवेत् । नहि ब्रह्मास्मि कर्तेति विरुद्धे भवतो धियौ ॥२२५॥ तस्मादिति—श्रुत्युक्त ब्रह्मात्मैक्यप्रतिपादक वाक्य का अर्थ जान लेने पर मुमुक्षु पुरुष के लिये कोई कर्मविधि नहीं रह जाती। क्योंकि 'मैं ब्रह्म हूँ', और 'मैं कर्म का कर्ता हूँ'—ये दोनों ज्ञान परस्पर विपरीत हैं। दो विपरीत बुद्धियां (ज्ञान) एक साथ नहीं रह सकती ॥ २२५ ॥ १. बृ. उ. ४।४।२३—'समाहितः' तथा 'पश्यति'—यह काण्वपाठ है और 'श्रद्धावित्तः', तथा 'पश्येत्'—यह माध्यन्दिनपाठ है।

तत्त्वमसिप्रकरणम् २५७ हृदयस्पशिंनी वाक्यार्थज्ञान होने के पूर्व ही विधियों के लिए अवकाश रहता है, वाक्यार्थज्ञान हो जाने के पश्चात् नहीं । तात्पर्य यह है कि वाक्यार्थज्ञान हो जाने के अनन्तर कोई कर्मविधि नहीं रहती। क्योंकि 'मैं ब्रह्म हूँ' और 'मैं कर्ता हूँ' ये दो परस्परविरुद्ध बुद्धियाँ (ज्ञान) कभी एकसाथ नहीं रह सकती ॥ २२५ ॥ ब्रह्मास्मीति च विद्येयं नैव कर्तेति बाध्यते । सकामो बद्ध इत्येवं प्रमाणाभासजातया ॥२२६॥ ब्रह्मास्मीति—'मैं ब्रह्म हूँ'—इस ज्ञान (बुद्धि) को ही 'विद्या' कहते हैं। इसका बाध (निवृत्ति) प्रमाणा- भास से पैदा हुई बुद्धि के द्वारा नहीं हो सकता । अर्थात् 'मैं कर्ता हूँ', मैं सकाम हूँ', 'मैं बद्ध हूँ',—यह ज्ञान (बुद्धि) प्रमाणा- भास से होती है, यह सब अविद्या है। अतः 'अविद्या' से 'विद्या' का बाध नहीं हो सकता ॥ २२६ ॥ हृदयस्पशिनी फिर भी यह शंका हो सकती है कि ऐक्यज्ञान से भेदज्ञान का ही क्यों बाध होता है ? विपरीत बाध्य - बाधकभाव को ही क्यों न कहा जाय ? इस आशंका का समाधान यह है कि 'मैं ब्रह्म हूँ' ऐसी बुद्धि को ही ज्ञान कहते हैं और 'मैं कर्ता हूँ', 'मैं सकाम हूँ', 'मैं बद्ध हूँ' यह प्रमाणाभासजनित ज्ञान है। अतः विपरीत बाध्य-बाधकभाव नहीं हो सकता, क्योंकि 'बोधवृत्ति' तो प्रमाणजनित है, और 'कर्तृत्वादि बुद्धि' भ्रमजनित है। अतः ज्ञान से ही भ्रम का बाध होता है, भ्रम से ज्ञान का बाध नहीं होता ॥ २२६ ॥ शास्त्रादब्रह्मास्मि नान्योऽहमिति बुद्धिर्भवेद्दृढा । यदा युक्ता तदैवंधीर्यथा देहात्मधीरिव ॥२२७॥ शास्त्रादिति—शास्त्रप्रमाण से मुमुक्षु को जब 'मैं ब्रह्म हूँ, अन्य कोई नहीं हूँ'—यह निश्चित (सुदृढ़) ज्ञान (बुद्धि) हो जाता है, तब उसे 'देहात्मबुद्धि' नहीं होती, उसी तरह 'मैं कर्ता हूँ'—यह बुद्धि भी उसे नहीं होती ॥ २२७ ॥ हृदयस्पशिनी स्वभावप्रवृत्त बुद्धि का प्रमाणजनित बुद्धि से ही बाध होता है, इसे दृष्टान्त देकर बताते हैं। जैसे— शास्त्र के द्वारा 'मैं ब्रह्म हूँ, अन्य कोई नहीं हूँ'—यह बुद्धि जब दृढ़ हो जाती है, तब देहात्मबुद्धि अर्थात् 'मैं मनुष्य हूँ, कर्ता हूँ'—इस प्रकार की बुद्धि नहीं हुआ करती ॥ २२७ ॥ सभयाद्भयं प्राप्तस्तदर्थं यतते च यः। स पुनः सभयं गन्तुं स्वतन्त्रश्चेन्न *होच्छति ॥२२८॥ सभयादिति—जो व्यक्ति भय के स्थान से निकल कर भयरहित स्थान पर पहुँच गया हो, और उसी निर्भ- यता के लिये जो सतत प्रयत्न करता रहता हो वह यदि आने-जाने में स्वतन्त्र है, तो भी वह पुनः भय के स्थान में नहीं जा सकता ॥ २२८ ॥ हृदयस्पशिंनी जो आदमी भय से युक्त स्थान से निकल कर भयरहित स्थान में पहुँच गया है, और उसी के लिए वह प्रयत्न भी करता रहा है, वह आदमी जाने-आने की क्रिया में स्वतन्त्र रहता हुआ भी पुनः भय से युक्त स्थान में नहीं जाता ॥ २२८ ॥ यथेष्टाचरणप्राप्तिः संन्यासादिविधौ कुतः। पदार्थाज्ञानबुद्धस्य वाक्यार्थानुभवाथिनः१ ॥२२९॥ १. नै. सि. ४।६१-६२, तथा भ. गी. ४।१९, १४।२२ से तुलना की जा सकती है ।

  • गच्छति—पाठान्तरम् । ३३

२५८ उपदेशसाहस्री यथेष्टेति—'तत्' और 'त्वम्' पदों के अर्थ का सम्यक् विचार करके जिस मुमुक्षु को बोध (ज्ञान) हुआ है, और जो महावाक्यार्थ का अनुभव करना चाहता है, उसके लिये तो 'संन्यास' आदि का विधान किया गया है। ऐसी स्थिति में उसका स्वेच्छाचार (यथेष्टाचार) हो ही कैसे सकता है ? ॥ २२९ ॥ हृदयस्पर्शिनी विधि-निषेध से रहित होनेपर वह ज्ञानी पुरुष यथेष्ट आचरण करने लगेगा, ऐसी शंका करना उचित नहीं है। क्योंकि जिसे 'तत्' और 'त्वम्' पद का सम्यक् विचार करने से ज्ञान प्राप्त हुआ है, तथा जो वाक्यार्थ का अनुभव करने में लगा हुआ है, उसके लिए संन्यासविधि, श्रवणादि विधि बतायी गयी है। उससे वह देहाभिमान- शून्य हो जाता है। वह तो वाक्यार्थ का अनुभव करने में तत्पर रहता है। अतः उसके लिए यथेष्ट आचरण करने का कोई निमित्त ही नहीं है और अवसर भी नहीं है। उस ज्ञानी में मिथ्याज्ञान का लेश तक नहीं रहता। अतः वह मिथ्याज्ञानमूलक यथेष्टाचरण कैसे करेगा ? ॥ २२९ ॥ अतः सर्वमिदं सिद्धं यत्प्रागस्माभिरीरितम् ॥ २३०॥ अत इति-अतः पूर्व जो कुछ बताया गया है, वह सभी सिद्ध हो गया ॥ २३० ॥ यो हि यस्माद्विरक्तः स्यान्नासौ तस्मै प्रवर्तते । लोकत्रयाद्विरक्तत्वान्मुमुक्षुः किमितीहते ॥ २३१॥ योहीति-जो व्यक्ति, जिस वस्तु से विरक्त हो जाता है, वह पुनः उस वस्तु के प्रति प्रवृत्त नहीं होता । तब जो मुमुक्षु पुरुष तीनों लोकों से विरक्त हो चुका हो, वह किस वस्तु को चाहेगा ? अर्थात् उसे किसी वस्तु की इच्छा नहीं होती ॥ २३१ ॥ हृदयस्पर्शिनी जबकि मुमुक्षु को भी यथेष्ट चेष्टा नहीं किया करता, तब मुक्त पुरुष के यथेष्टाचरण की शंका ही कैसे की जा सकती है ? जो व्यक्ति जिससे विरक्त हो जाता है, उसके प्रति वह पुनः प्रवृत्त नहीं हुआ करता । फिर तीनों लोकों से विरक्त हुआ मुमुक्षु पुरुष किस वस्तु की इच्छा करेगा ? अर्थात् वह सर्वथैव निरिच्छ ही रहेगा ॥ २३१ ॥ क्षुधया पीड्यमानोऽपि न विषं ह्यत्तुमिच्छति । *मृष्टान्नध्वस्ततृड् जानन् नामूढस्तज्जिघत्सति ॥२३२॥ क्षुधयेति-भूख से व्याकुल होने पर भी कोई आदमी विष खाना नहीं चाहता । उसी तरह जिस ज्ञानी पुरुष की भूख (अन्न की इच्छा) सुस्वादु मधुर अन्न से शान्त हो चुकी है, वह पुनः उसे खाने की इच्छा नहीं करता । अर्थात् साधना के समय सभी विषयों में उसने दोष-दर्शन कर लिया है, अतः वह ज्ञानी पुरुष पुनः उन विषयों को कैसे स्वीकार करेगा ? ॥ २३२ ॥ हृदयस्पर्शिनी यदि यह कहें कि विद्वान् ज्ञानी पुरुष यद्यपि नियोग (विधि) के परतन्त्र न भी रहे, तो भी भिक्षाटनादि- प्रवृत्ति की तरह विषयान्तरों में भी उसकी प्रवृत्ति कदाचित् होना संभव है। इस शंका का समाधान यह है कि जितने भी विषय हैं, वे सभी दुःख के साधन हैं, ऐसा जिसका निश्चय हो चुका है, वह उन्हें विष की तरह त्याग देता है, अतः वह उन्हें पुनः ग्रहण नहीं करता। भिक्षाटनादि की जो प्रवृत्तियाँ हैं, वे ज्ञाननिष्ठा की विरोधी नहीं हैं। वे तो केवल शरीरस्थिति मात्र की साधनरूपा हैं, इसलिए वे आवश्यक हैं। उनसे कोई अपूर्वोपचय नहीं होता । अर्थात् जो पुरुष क्षुधा से पीड़ित (व्याकुल) है, वह भी विषभक्षण करना नहीं चाहता। तब जिसकी इच्छा मधुर अन्न से तृप्त हो चुकी है, वह ज्ञानी पुरुष उसे खाने की इच्छा कभी कर ही नहीं सकता। संस्कारवशात् भिक्षाटनादि प्रवृत्ति की अनुवृत्तिमात्र होती है ॥ २३२ ॥

  • मिष्टान्न—पाठान्तरम् ।

तत्त्वमसिप्रकरणम् २५९ वेदान्तवाक्यपुष्पेभ्यो ज्ञानामृतमधूत्तमम् । उज्जहारालिवद्यो नस्तस्मै सद्गुरवे नमः ॥२३३॥ वेदान्तेति—जिन्होंने हमारे लिये वेदान्त के वाक्य रूपी पुष्पों से मधुकर (भ्रमर) के समान ज्ञानामृतरूपी मधु निकाल कर दिया, उन सद्गुरु के लिये हमारा प्रणाम है ॥ २३३ ॥ हृदयस्पर्शिनी ज्ञानी पुरुष के लिए यद्यपि कोई कार्य शेष नहीं है, तथापि गुरु और शास्त्र के प्रति आदरबुद्धि रखनी ही होगी, इसलिए शिष्य-शिक्षार्थ यह बता रहे हैं कि जिन्होंने भ्रमर के समान वेदान्तवाक्यरूप पुष्पों से हमारे लिए ज्ञानामृतरूप उत्तम मधु निकालकर पान कराया है, उन सद्गुरुदेव के लिए प्रणाम है ॥ २३३ ॥ ॥ इत्यष्टादशं तत्त्वमसिप्रकरणं समाप्तम् ॥

पद्यभाग १९: तृष्णाज्वरनाशकप्रकरणम् (मनःसंवाद)

तृष्णाज्वरनाशकप्रकरणम् प्रयुज्य तृष्णाज्वरनाशकारणं चिकित्सितं ज्ञानविरागभेषजम् । न याति कामज्वरसन्निपातजां शरीरमालां शतयोगदुःखिताम् ॥१॥ प्रयुज्येति—तृष्णा रूपी ज्वर को नष्ट करने वाली ज्ञान-वैराग्य रूपी औषधि को जिसमें दिया जाता है, उस चिकित्सा का प्रयोग करने से मनुष्य को यह दुःखमयी शरीर-परम्परा प्राप्त नहीं होती¹, जो काम ज्वर की मूर्छा तथा सैकड़ों विषयों के सम्बन्ध से हुआ करती है ॥ १ ॥ हृदयस्पर्शिनी प्रकरण का नाम उसके प्रतिपाद्य विषय को ध्यान में रखकर दिया गया है । कुछ लोगों ने इस प्रकरण का नाम ‘भेषजप्रयोग प्रकरण' तथा कुछ लोगों ने 'आत्म-मनःसंवाद प्रकरण' भी रखा है। 'तत्' और 'त्वं' पदार्थ का शोधन संक्षिप्त तथा विस्तृत रूप से किया गया; और ब्रह्मात्मैक्यलक्षण वाक्यार्थज्ञान सफल है, समस्त वेदान्त वाक्यों से उसकी प्रतीति होती है, यह प्रमाण और युक्ति से भी बता चुके । नित्य-शुद्ध-बुद्ध-मुक्त, सत्य, ज्ञान, अनन्त आनन्द स्वरूप प्रत्यगात्मा के सम्बन्ध में भेद-विपर्यासादि अनेक अनर्थों के होते रहने में अहंकार, मन, बुद्धि, एवं चित्त का संघातारूप अन्तःकरण ही हेतुभूत है—यह भी बता चुके हैं। अब हम मुख्यतया यह बता रहे हैं कि आत्मा का संसार मनोऽध्यासमूलक ही होता है, अतः उस मन का स्वरूप और उसकी चेष्टाओं का अनुसन्धान करते हुए उसका विलापन करने में प्रयत्नशील होना चाहिये । इसी अभिप्राय से 'आत्म-मनःसंवादरूप प्रकरण' का प्रारंभ करने की इच्छा से ग्रंथकार प्रथमतः प्रकरण के प्रयोजन को बता रहे हैं—यह मानव प्राणी तृष्णारूपी ज्वर की नाशक ज्ञान-वैराग्यरूपी औषधि का प्रयोग करने से कामज्वरजनित मूर्छा तथा सैकड़ों विषयों के संबंध से प्राप्त होनेवाली दुःखमयी शरीर- परम्परा को प्राप्त नहीं होता है ॥ १ ॥ अहं ममेति त्वमनर्थमीहसे परार्थमिच्छन्ति तवान्य ईहितम् । न तेऽर्थबोधो न हि मेऽस्ति चार्थिता ततश्च युक्तः शम एव ते मनः ॥२॥ अह्मिति—हे मन ! तू 'अहम्-मम'-मैं और मेरा इस आकार से व्यर्थ चेष्टा करता रहता है । सांख्यवादी विद्वान् तेरी चेष्टा को परार्थ (पुरुष के भोगापवर्गार्थ) मानते हैं । तू मुझपर उपकार कर ही कैसे सकता है ? क्योंकि तू अचेतन है, अतः तुझे अर्थज्ञान का होना संभव नहीं है, और मुझमें कोई किसी प्रकार की अर्थिता नहीं है । ऐसी स्थिति में हे मन ! तेरा शान्त रहना ही समुचित है ॥ २ ॥ हृदयस्पर्शिनी इस औषधिप्रयोग प्रकरण का आत्ममनःसंवाद के रूप में विस्तार करते हुए बता रहे हैं—हे मन ! तू 'मैं, मेरा' इस प्रकार की व्यर्थ चेष्टा कर रहा है । यदि कहो कि मैं तुम्हारे लिये ही चेष्टा कर रहा हूँ, अतः उस चेष्टा को व्यर्थ क्यों कह रहे हो ? अन्य सांख्यवादी लोग तुम्हारी चेष्टा को परार्थ अर्थात् पुरुष के भोग और अपवर्ग के लिये मानते हैं । किन्तु हम वेदान्त सिद्धान्तवादी यह नहीं मानते । तुझे मेरा प्रयोजनीय विषय ही ज्ञात नहीं है, क्योंकि तू अचेतन है, और न मुझे तुझसे कुछ माँगना ही है । ऐसी स्थिति में, रे मन ! तेरा शान्त हो जाना ही उचित है ॥२॥ १. इस १९ वे प्रकरण को 'भेषज प्रकरण' भी कहते हैं, क्योंकि इसमें देहप्राप्ति रूप रोग को नष्ट करने वाली औषधि को बताया जा रहा । उसी तरह यह औषधोपचार, 'आत्म-मनःसंवाद' के रूप में किया जा रहा है, इसलिये इस प्रकरण को 'आत्म-मनःसंवाद' प्रकरण भी कहते हैं ।

तृष्णाज्वरनाशकप्रकरणम् २६१ यतो न चान्यः परमात् सनातनात् सदैव तृप्तोऽहमतो न मेऽर्थिता । सदैव तृप्तश्च न कामये हितं यतस्व चेतः प्रशमाय *ते हितम् ॥३॥ यत इति—मैं (प्रत्यगात्मा) सनातन अर्थात् पूर्णानन्दस्वरूप ‘परमात्मा’ से भिन्न नहीं हूँ, और सर्वदा ही तृप्त हूँ हूँ, अतः मुझे किसी भी वस्तु की इच्छा नहीं है। सर्वदा ही तृप्त रहने के कारण स्वयं के लिये किसी प्रकार के हित की भी इच्छा नहीं करता। अतः हे चित्त (मन) ! तू शान्त होने के लिये ही प्रयत्न (चेष्टा) कर, यही तेरे लिये हितकर होगा ॥ ३ ॥ हृदयस्पर्शिनी आत्मा के अर्थित्वाभाव को सिद्ध कर रहे हैं—मैं (आत्मा) तो सनातन पूर्णानन्दस्वरूप परमात्मा से पृथक् नहीं हूँ, मैं तो सदा-सर्वदा ही तृप्त हूँ। अतः मुझे किसी भी वस्तु की इच्छा नहीं है। मैं सर्वदा तृप्त होने के कारण अपने लिए किसी हित की कामना भी नहीं करता। इसलिए हे मन ! तू शान्त हो जाने का प्रयत्न कर। यही तेरे हित में होगा ॥ ३ ॥ षडूर्मिमालाभ्यतिवृत्त एव यः स एव चात्मा जगतश्च नः श्रुतेः । प्रमाणतश्चापि मया प्रवेद्यते मुधैव तस्माच्च मनस्तवेहितम् ॥४॥ षडूर्मिमालेति—जो पुरुष 'क्षुधा, पिपासा, शोक, मोह, जरा और मृत्यु'—इन छह ऊर्मिमाला (ऊर्मियों) से पार हो जाता है, वही पुरुष हमारा और जगत् का 'आत्मा' है। उसे हम 'यत्साक्षादपरोक्षाद् ब्रह्म'—इस श्रुति से तथा 'य आत्मा सर्वान्तरः'—इस श्रुति से और 'अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः'—इस स्मृति प्रमाण से भी सम्यक्तया (यथार्थरूप से) समझते हैं। अतः हे मन ! तेरी दौड़-धूप की चेष्टा करना व्यर्थ है ॥ ४ ॥ हृदयस्पर्शिनी परमात्मा से अभिन्न होने के कारण अपने अर्थित्वाभाव को बताया। अब परमात्मा से अपनी अभिन्नता का उपपादन कर रहे हैं—अशनाया (क्षुधा), पिपासा, शोक, मोह, जरा, मृत्यु ये छह ऊर्मियां कहलाती हैं। ये छह ऊर्मियाँ प्राण, मन, और देह की धर्मरूप हैं। ये छहों धर्म, नदी की ऊर्मि (तरंग) की तरह आविर्भाव-तिरोभावरूप हैं। यह आत्मा उक्त छह ऊर्मिमाला अर्थात् ऊर्मिपरम्परा को पार किये हुए है, वही हमारा और जगत् का आत्मा है। अर्थात् वह आत्मा निष्प्रपञ्च है। उसे हम श्रुति¹-स्मृति² के प्रमाणों से अच्छी तरह जानते हैं। अतः हे मन ! तेरी सब चेष्टाएँ व्यर्थ हैं ॥ ४ ॥ त्वयि प्रशान्ते नहि चास्ति भेदधीर्यतो जगन्मोहमुपैति मायया । ग्रहो हि मायाप्रभवस्य कारणं ग्रहाद्विमोके नहि साऽस्ति कस्यचित् ॥५॥ त्वयीति—तू जब शान्त हो जायगा, तब 'भेदबुद्धि' नहीं रह पायेगी। उस भेदबुद्धि से ही यह संसार, 'माया' के अधीन होकर 'मोह' को प्राप्त हो रहा है, क्योंकि 'भेदबुद्धि' से ही 'माया' की उत्पत्ति होती है। उस 'भेदबुद्धि' के निवृत्त होते ही वह 'माया' भी उसके लिये नहीं रह पाती ॥ ५ ॥ हृदयस्पर्शिनी तेरे शान्त हो जाने पर भेदबुद्धि नहीं रहती। भेदबुद्धि से ही यह संसार, माया के कारण मोह को प्राप्त होता है। क्योंकि अकृतार्थताभिमानलक्षणा माया की उत्पत्ति का कारण भेदज्ञान ही है। उस भेदज्ञान के निवृत्त होते ही वह माया भी किसी के लिये नहीं रहती। मन के प्रशांत होने पर वह भेदबुद्धि नहीं रह पाती, क्योंकि सुषुप्ति में मन का अभाव रहता है, तब भेदबुद्धि भी नहीं रहती, यह अन्वय-व्यतिरेक से सिद्ध है। सुषुप्ति में भेद- बुद्धि के न रहने पर माया-मोह भी नहीं रहता ॥ ५ ॥ १. (बृ. उ. ३।४।१) ‘यत्साक्षादपरोक्षाद् ब्रह्म’, ‘य आत्मा सर्वान्तरः’ । २. (भ. गी. १०।२०) ‘अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः ॥’

  • तेऽधिकम्—पाठान्तरम् ।