उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)
Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary
आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा
स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२५२ उपदेशसाहस्री हृदयस्पार्शिनी यदि कहो कि 'तत्त्वमसि' इस उपदेशवाक्य में 'तत् त्वं सेत्स्यसि' ऐसा विपरिणाम करके उक्त महावाक्य की योजना कर लेंगे, तो 'एकं सन्धित्सतः अपरं प्रच्यवते'१—न्याय से मोक्ष की अनित्यता प्राप्त होगी । इस प्रकार उभयथा विरोध होने के कारण वाक्य में विपरिणाम करना उचित नहीं है । अभिप्राय यह है कि आत्मा में क्रिया सिद्ध होने के कारण श्रवणादि किये जाते हैं, ऐसा यदि कहें तो उस अवस्था में मोक्ष की अनित्यता का प्रसंग प्राप्त होगा । इस प्रकार विरोध उपस्थित होने के कारण उक्त वाक्य की योजना किसी अन्य प्रकार से नहीं करनी चाहिये ॥ २०७ ॥ श्रोतृत्वश्रोतव्ययोर्भेदो यदीष्टः स्याद्भवेदिदम् । इष्टार्थकोप एवं स्यान्न युक्तं सर्वथा वचः ॥२०८॥ श्रोत्रिति—श्रोता और श्रोतव्य विषय का भेद अभीष्ट रहने पर ही प्रसंख्यान (श्रवणादि कर्म) का अनुष्ठान हो सकता है, किन्तु ऐसा मानने पर अभीष्ट अर्थ की हानि हो जायगी । इसलिये भेद की अभीष्टता किसी प्रकार भी उचित नहीं है ॥ २०८ ॥ हृदयस्पार्शिनी यदि श्रोता और श्रोतव्य विषय का भेद अभीष्ट हो तो इस प्रकार का प्रसंख्यान अर्थात् श्रवणादि कर्म का संभव हो भी सकेगा, क्योंकि कार्य की उपपत्ति, कर्तृ-कर्म के भिन्न होनेपर ही हो पाती है, अन्यथा नहीं । कार्योपपत्ति के लिये भेद माननेपर इष्ट अर्थ (जीव का ब्रह्मभाव) का विनाश हो जायगा । क्योंकि अन्य में अन्य भाव नहीं होता । अतः प्रसंख्यान पक्ष में वाक्य सर्वथैव अप्रमाण होगा । एवं च प्रसंख्यानवाद भी उपपन्न नहीं है ॥ २०८ ॥ सिद्धो मोक्षोऽहमित्येवं ज्ञात्वाऽऽत्मानं भवेद्यदि । चिकीर्षुर्यः स मूढात्मा शास्त्रं चोद्घाटयत्यपि ॥२०९॥ सिद्ध इति—जो व्यक्ति 'मैं नित्य सिद्ध मोक्ष हूँ' इस प्रकार आत्मा को जानकर भी पुनः कर्मानुष्ठान की इच्छा करता है, वह मूढमति तो शास्त्र का उच्छेद ही कर रहा है, ऐसा समझना चाहिये ॥ २०९ ॥ न हि सिद्धस्य कर्तव्यं सकार्यस्य न सिद्धता । उभयालम्बनं कुर्वन्नाऽऽत्मानं वञ्चयत्यपि† ॥२१०॥ न हीति—सिद्ध वस्तु का कोई कर्तव्य नहीं होता तथा सक्रिय वस्तु (साध्य वस्तु) की सिद्धता नहीं हुआ करती। जो लोग दोनों का एकसाथ (युगपत्) आलम्बन (आश्रय) करते हैं, वे स्वयं ही अपने को धोखे में डालते हैं ॥२१०॥ हृदयस्पार्शिनी सिद्ध और साध्य के भेद से वस्तु दो प्रकार की होती है । घट-पटादि वस्तु विद्यमान रहती है, इस कारण वह सिद्ध है, और धर्मादि वस्तु अनुष्ठेय होने से साध्य कहलाती है । 'मोक्ष' तो आत्मा का स्वरूप ही है, अतः वह सिद्ध वस्तु है । सिद्ध वस्तु भी नित्य और अनित्य भेद से दो प्रकार की रहती है । नित्य वस्तु 'जन्य' नहीं हुआ करती । अतः जो लोग मोक्ष को जन्य मानते हैं, उनके मत से तो वह अनित्य सिद्ध होता है । अतः उनका इस प्रकार मानना कोरा भ्रम ही है । सिद्ध वस्तु कर्तव्य कोटि में नहीं आती, और कर्तव्य कोटि में आनेवाली वस्तु की सिद्धता नहीं कही जाती । किन्तु यह मूढ़बुद्धि व्यक्ति दोनों का एकसाथ आलम्बन करके अपनी ही वञ्चना करता रहता है ॥ २१० ॥ सिद्धो मोक्षस्त्वमित्येतद्वस्तुमात्रं प्रदर्श्यते । श्रोतुस्तथात्वविज्ञाने प्रवृत्तिः स्यात्कथं ‡न्त्विति ॥२११॥ १. इस न्याय का प्रयोग खण्डनखण्डखाद्य में अनैकान्तिक खण्डन के अवसर पर किया गया है । 'अनुसन्धित्सतः' इस पाठ भेद से उक्त न्याय का उपयोग सर्वदर्शनसंग्रह के आर्हत और अक्षपाददर्शन में भी हुआ है ।
- त्येव०—पाठान्तरम् । † त्यसो०—पाठान्तरम् । ‡ त्विति०—पाठान्तरम् ।