भारतकोश
उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा

स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished364 पृष्ठ

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पृष्ठ 279

तत्त्वमसिप्रकरणम् २५३ सिद्ध इति—पूर्वपक्षो कहता है कि 'तुम नित्य सिद्ध मोक्ष (ब्रह्म) हो'—यह कहकर केवल वस्तुमात्र को प्रद- र्शित कर रहे हो तो श्रोता की वस्तु त्व विज्ञानमात्र में प्रवृत्ति कैसे हो पायेगी ? ।। २११ ।। हृदयस्पर्शिनी सिद्धान्ती के द्वारा की गई निन्दा को सुनकर पूर्वपक्षी अपने अभिप्राय को प्रकट कर रहा है—'तुम नित्य सिद्ध मोक्ष (ब्रह्म) हो' ऐसा कह कर केवल वस्तुमात्र को प्रदर्शित किया जाता है । ऐसी स्थिति में वस्तुत्वविज्ञान मात्र में श्रोता की प्रवृत्ति कैसे होगी ? तात्पर्य यह है कि 'मुमुक्षु पुरुष की आत्मविज्ञान में प्रवृत्ति होने के लिये सिद्ध ब्रह्म रूप मोक्ष तुम हो' यह कथन वस्तुमात्रकथनपरक है, तत्त्व में उसका कोई तात्पर्य नहीं है ।। २११ ।। कर्ता दुःख्यहमस्मीति प्रत्यक्षेणाऽनुभूयते । कर्ता दुःखी च माभूवमिति यत्नो भवेत्ततः ॥२१२॥ कर्तेति—अपने अभिप्राय को ही और अधिक स्पष्ट कर रहे हैं—जब यह प्रत्यक्ष अनुभव होता है कि 'मैं कर्ता हूँ', 'मैं दुःखी हूँ', तभी 'मैं कर्ता एवं दुःखी न होऊँ' ऐसा ज्ञान हो तो उसके लिये प्रयत्न हो सकेगा ।। २१२ ।। तद्विज्ञानाय युक्त्यादि कर्तव्यं श्रुतिरब्रवीत् । कर्तृत्वाद्यनुवादेन सिद्धत्वानुभवाय तु ॥२१३॥ तद्विज्ञानायेति—भगवती श्रुति ने उसके बोध के लिये ही कर्तृत्व आदि का अनुवाद करते हुए सिद्धत्व का अनुभव कराने के लिये युक्ति आदि की कर्तव्यता को बताया है ।। २१३ ।। हृदयस्पर्शिनी वाक्यश्रवण के अनन्तर 'मन्तव्यः' १ श्रुति से कर्तव्य को बताया गया है, इसलिये भी हमारा कथन स्वीकार करना चाहिये, यह पूर्वपक्षी का अभिप्राय है । श्रुति ने कर्तृत्वादि का अनुवाद करते हुए सिद्धत्व का अनुभव कराने के लिये ही युक्ति आदि की कर्तव्यता का निरूपण किया है । अर्थात् 'श्रोतव्यः' कहकर श्रुति 'निदिध्यासितव्यः' का विधान करती है। इस प्रकार श्रवण-मननादि की कर्तव्यता का उपदेश होने के कारण निश्चय किया जाता है कि आत्मज्ञान के लिये क्रिया की आवश्यकता है । 'त्वम्' से कर्तृत्व का अनुवाद करके वस्तुगत्या तुम सिद्ध मोक्ष ब्रह्मरूप हो, अतः उसके ज्ञानार्थ प्रयत्न करो—यह वाक्य का तात्पर्य है ।। २१३ ।। निर्दुःखो निष्क्रियोऽकामः सिद्धो मोक्षोऽहमित्यपि । गृहीत्वैव* विरुद्धार्थमादध्यात्कथमेव सः ॥२१४॥ निर्दुःख इति—सिद्धान्ती कहता है कि 'मैं दुःखरहित, निष्क्रिय, निष्काम, नित्यसिद्ध मोक्ष ही हूँ'—ऐसा समझने के बाद, कौन ऐसा होगा कि जो इसके विपरीत स्वभाववाले पदार्थों का ग्रहण करेगा ? ।। २१४ ।। हृदयस्पर्शिनी सिद्धान्ती कहता है कि पूर्वपक्षी की यह कल्पना श्रुत्यनुसारिणी नहीं है । "मैं दुःखरहित, निष्क्रिय, निष्काम, नित्यसिद्ध मोक्ष ही हूँ" ऐसा ग्रहण करके भी मनुष्य, उक्तार्थ के विपरीत स्वभाववाले पदार्थों को कैसे ग्रहण कर सकता है ? अतः वाक्य से वाक्यार्थ का ज्ञान होता ही नहीं—यह कथन उचित नहीं है । अन्यथा उसे अप्रमाण कहना होगा, और अनुभवविरोध भी होगा । तथाच ज्ञान के उत्पन्न होने पर तद्विरुद्ध प्रतिपत्ति ( ज्ञान ) होना संगत नहीं है ।। २१४ ।। सकामः सक्रियोऽसिद्ध इति मेऽनुभवः कथम् । अतो मे विपरीतस्य तद्ब्रूवान् वक्तुमर्हति ॥२१५॥ १. ( बृ. उ. २।४।५, ४।५।६ )

  • न्वैत्वं—पाठान्तरम् ।