भारतकोश
उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा

स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished364 पृष्ठ

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२४८ उपदेशसाहस्री स्वप्ने दुःख्यहमध्यासं दाहच्छेदादिहेतुतः । तत्कालभाविभिर्वाक्यैर्न बाधः क्रियते यदि ॥१८७॥ स्वप्न इति—व्यभिचार इस प्रकार है कि स्वप्नावस्था में मैं दाह-छेदन आदि कारणों से दुःखी था, उसके बाद आप्त जनों के उपदेश से दुःखरहित हो गया—यह अनुभव रहने से समझ में आता है कि दुःखित्व धर्म 'आत्मा' का नहीं है। यदि स्वप्न के वाक्यों से उसका बाध न भी हुआ हो तो......॥ १८७ ॥ हृदयस्पर्शिनी उसी व्यभिचार को दिखा रहे हैं—स्वप्नावस्था में दाह-छेदनादि कारणों से मैं दुःखी था । पश्चात् आप्त के उपदेश से दुःखहीन हो गया—यह अनुभव होता है, उस कारण यह दुःखित्व, आत्मा का धर्म नहीं है ॥१८७॥ समाप्तेस्तर्हि दुःखस्य प्राक्च तद्बाध इष्यताम् । न हि दुःखस्य सन्तानो भ्रान्तेर्वा दृश्यते क्वचित् ॥१८८॥ समाप्तेरिति—उस दुःख की समाप्ति में और उससे पूर्व उसके बाध का स्वीकार करो। क्योंकि शुक्ति-रजतादि के भ्रम के समान आत्मा में दुःखपरम्परा का रहना भी किसी ने देखा नहीं है ॥ १८८ ॥ हृदयस्पर्शिनी तथापि पूर्वपक्षी के अभिनिवेश के अनुसार कहें कि स्वप्नावस्था के वाक्यों से उसका बाध न भी किया गया हो तो उस दुःख की समाप्ति में और उससे पूर्व उसका बाध स्वीकार करना ही चाहिये, क्योंकि दुःख के पूर्व और उसकी समाप्ति में तो दुःख का अभाव ही है। शुक्तिरजतादि भ्रम के तुल्य आत्मा में दुःखपरम्परा के भी कभी दर्शन नहीं होते । वह भी आरोपित ही है। अतः उसे आत्मा का स्वरूप नहीं कह सकते, क्योंकि वह आगन्तुक है किन्तु आत्मा नित्यसिद्ध है। इसलिये वाक्य के असामर्थ्य की शंका भी नहीं की जा सकती है ॥ १८८ ॥ प्रत्यगात्मन आत्मत्वं दुःख्यस्मीत्यस्य बाधया । दशमं नवमस्येव वेद चेदविरुद्धता ॥१८९॥ प्रत्यगात्मनेति—जिस प्रकार लोक में नवम का बाध करके दशम व्यक्ति का ज्ञान होता है, उसी प्रकार यदि महावाक्य से 'मैं दुःखी हूँ' इस ज्ञान का बाध करके प्रत्यगात्मा के आत्मत्व का अनुभव हो जाता है, तब भी वाक्यार्थ के प्रबल रहने में कोई विरोध नहीं हो सकता ॥ १८९ ॥ हृदयस्पर्शिनी जिस प्रकार लोकव्यवहार में नवम का बाध करके दशम पुरुष का ज्ञान होता है, उसी प्रकार यदि महावाक्य द्वारा 'मैं दुःखी हूँ' इस ज्ञान का बाध करके प्रत्यगात्मा के आत्मत्व का अनुभव हो जाता है, तथापि वाक्यार्थ की प्रबलता में कोई विरोध नहीं हो सकता । अतः वाक्य को प्रत्यक्ष से दुर्बल नहीं कह सकते ॥ १८९ ॥ नित्यमुक्तत्वविज्ञानं वाक्याद्भवति नान्यतः । वाक्यार्थस्यापि विज्ञानं पदार्थस्मृतिपूर्वकम् ॥१९०॥ नित्येति—विस्तार से कहे गये न्यायार्थ को चार श्लोकों के द्वारा संक्षेप में कह रहे हैं। आत्मा के नित्य- मुक्तत्व का ज्ञान भी वाक्य से ही होता है, किसी अन्य प्रमाण से नहीं। तथा वाक्यार्थ का ज्ञान भी पदों के अर्थ की स्मृति के द्वारा ही हो सकता है ॥ १९० ॥ अन्वयव्यतिरेकाभ्यां पदार्थः स्मर्यते ध्रुवम् । एवं निर्दुःखमात्मानमक्रियं प्रतिपद्यते ॥१९१॥