भारतकोश
उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा

स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished364 पृष्ठ

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पृष्ठ 273

तत्त्वमसिप्रकरणम् २४७ तत्रैवं संभवत्यर्थे श्रुतहानाश्रुतार्थधीः । नैव कल्पयितुं युक्ता पदवाक्यार्थकोविदैः ॥१८४॥ तत्रेति—इस रीति से ‘तत्त्वमसि’ महावाक्य का पूर्वोक्त अर्थ संभव होने पर पद और वाक्य का रहस्य जानने वालों को श्रुत अर्थ का त्याग और अश्रुत अर्थ की कल्पना करनी उचित नहीं है ॥ १८४ ॥ प्रत्यक्षादीनि बाधेरन् कृष्णलादिषु पाकवत् । अक्षजादिनिभैरेतैः कथं स्याद्वाक्यबाधनम् ॥१८५॥ प्रत्यक्षादीनीति—पूर्वपक्षी का कहना है कि जैसे कृष्णल ( सुवर्ण खण्ड ) आदि का पाक नहीं हो सकता, वैसे ही प्रत्यक्षादि प्रमाणों से उक्त अखण्डार्थ का बाध हो जायगा । उस पर सिद्धान्ती कहता है कि इन प्रत्यक्षाभासादि प्रमाणों से उक्त महावाक्य के अखण्डार्थ का बाध कैसे हो पायगा ? ॥ १८५ ॥ हृदयस्पर्शिनी प्रत्यक्षादिविरुद्ध अर्थ में वाक्य का बाधदर्शन होने से पूर्ववादी दृष्टान्त देकर शंका कर रहा है । जैसे 'कृष्णलान् श्रपयेत्'१ वाक्य से कृष्णल (सुवर्णमय कण) का पाक श्रुत रहनेपर भी प्रत्यक्ष प्रमाण से उसका बाध किया जाता है, क्योंकि सुवर्ण कणों में विक्लित्ति होना संभव ही नहीं है । अतः पाकक्रियासाध्य संस्कारमात्र ही अदृष्टफल के लिये किया जाता है । उसी तरह यहाँ भी भेदग्राहक प्रत्यक्षादि प्रमाण, वाक्य की अखण्डार्थता का बाध कर देंगे । आत्मा का ब्रह्मत्व श्रुत रहने पर भी उसमें पूर्णता नहीं दिखाई देती । इसलिये प्रसंख्यान होने से वाक्य को आत्म- संस्कारार्थ ही मान लिया जाय । तब सिद्धान्ती उत्तर देता है कि प्रत्यक्षादि प्रमाणों से कर्तृत्ववादि का प्रतिभास यदि होता हो तो आपके कथनानुसार हो भी सकता है, किन्तु प्रत्यक्षादि प्रमाणों से कर्तृत्ववादि का ज्ञान (प्रतिभास) नहीं होता । क्योंकि आत्मा में दुःखित्वादि धर्मों की प्रतीति, अध्यस्त अहंकार आदि के सम्बन्ध से ही होती है । दुःखित्वादि धर्म, स्वतः आत्मा के नहीं हैं । अतः प्रत्यक्षाभासादि प्रमाणाभासों से प्रमाणभूत वाक्य का बाध कैसे किया जा सकता है ? अर्थात् उसका बाध कभी नहीं किया जा सकेगा । तथा 'प्रयाजे कृष्णलं जुहोति'२ के समान ब्रह्मज्ञान में संस्कृत हुए आत्मा का अन्यत्र विनियोग भी नहीं है, इसलिये वाक्य को संस्कारार्थ भी नहीं कहा जा सकता । और आत्मा की पूर्णता अर्थात् तत्काल ब्रह्मत्व, जो उसमें नहीं प्रतीत होता है, वह पदार्थ की दृढ़ बुद्धि न होने से है । तात्पर्य यह है कि प्रमाणाभास से महावाक्य का बाध नहीं होगा ॥ १८५ ॥ दुःख्यस्मीति सति ज्ञाने निर्दुःखोति न जायते । प्रत्यक्षादिनिभत्वेऽपि वाक्यान्न व्यभिचारतः ॥१८६॥ दुःखीति—पूर्वपक्षी कहता है कि आपके कथनानुसार दुःखित्वाभिमान का प्रत्यक्षाभासत्व सिद्ध रहने पर भी 'मैं दुःखी हूँ' यह ज्ञान होने पर उक्त वाक्य से 'मैं दुःखरहित हूँ' यह ज्ञान नहीं होता । उस पर सिद्धान्ती कहता है कि तुम ऐसा नहीं कह सकते, क्योंकि 'दुःखित्वज्ञान' का व्यभिचार दिखाई देता है ॥ १८६ ॥ हृदयस्पर्शिनी पूर्वपक्षी पुनः शंका करता है कि दुःखित्वाभिमान का प्रत्यक्षाभासत्व सिद्ध होने पर भी 'मैं दुःखी हूँ' यह ज्ञान तो होता है, किन्तु वाक्य से 'मैं दुःखहीन हूँ' यह ज्ञान नहीं होता । तब सिद्धान्ती कहता है कि ऐसी बात नहीं है, क्योंकि इस दुःखित्वज्ञान का व्यभिचार दिखाई देता है । पूर्वपक्षी के कहने का अभिप्राय यह है कि विरोधिता- लक्षण अप्रामाण्य के न रहने पर भी अनुपपत्तिलक्षण अप्रामाण्य तो वाक्य में है ही । प्रत्यक्ष तो पूर्व से ही सिद्ध रहने से असंजातविरोधी है, इसलिये वही प्रबल है, वाक्य प्रबल नहीं है । तब सिद्धान्ती व्यभिचारप्रदर्शन कर रहा है ॥ १८६ ॥ १. ( जै. सू. १०।१।१-३, २।१-२ ) २. ( तै. सं. २।३।२।३ )